शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

कौवों के कुनबे

नदी पियासी तड़प रही है सूरज हुआ उदास
कर धान के वादे मरुथल से, है मेघों में उल्लास ॥

आग जलाने नदी निचोड़ी
बालू में से तेल
अँधियारों ने डाल दिया 
किरणों को फिर से जेल ।
शोधपत्र ले चोर हैं बैठे सिर पर धारे ताज 
हाथ भेड़ियों के तलवारें भेड़ें हुयीं उदास ॥

जौहरियों को काम मिला  
देने फूलों को पानी
स्वर्ण हार बनाने बैठे
हैं बगिया के माली ।
बाबा जी की कुटिया जैसे राजा का प्रासाद
रम्भा घिरी भीड़ से कोई ना सीता के पास ॥

ठग्गू-भग्गू के है ज़िम्मे
देना सबको उपदेश
धोबी करे किसानी, हो गये
पंडित जी रंगरेज ।
क़ातिल को मिल गयी सुरक्षा मृतकों को कुछ लाख

है कौवों के कुनबों में रौनक, हैं हंस बिचारे दास ॥     

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

The cosmic dance of matter and energy…


बहुरूपिया ब्रह्म कई रूपों में प्रकट होते ही नृत्य करने लगा, जैसे कृष्ण नाच रहे हों... हर गोपी के साथ, एक ही समय में । विभिन्न शैलियों में... विभिन्न मुद्राओं में... किंतु एक सुनिश्चित् अनुशासन में ब्रह्म के सभी रूप नृत्य में अहर्निश लीन हैं । कोई स्पिन कर रहा है, कोई एण्टीस्पिन, कोई हाफ़ स्पिन, कोई ओस्सीलेशन के ठुमकों में ही मस्त है तो कुछ को स्केटरिंग पसन्द है । कोई वर्टिकल नाच रहा है तो कोई होरिज़ेण्टल... अद्भुत् है यह नृत्य ।
परमाणु के भीतर अद्भुत् नृत्य चल रहा है । आकाशगंगाओं में वृहदाकार पिण्डों में नृत्य चल रहा है । नृत्य उनके भीतर भी है और उनके बाहर भी । सब अपने-अपने ऑर्बिट में नाच रहे हैं... कोई क्लॉक वाइज़ तो कोई एण्टीक्लॉक वाइज़ । यहाँ मैटर है, एण्टीमैटर है... सब अपने-अपने जोड़ों में, बिना जोड़ीदार के कोई भी इस नृत्य में भाग नहीं ले सकता । यहाँ अप है... यहाँ डाउन है, यहाँ पॉज़िटिव है... यहाँ निगेटिव है । सबकी युति है, अद्वैत ब्रह्म द्वैत रूप में प्रकट हुआ है ।
यहाँ प्रकाश देने वाले सूर्य हैं और अदम्य भूख से पीड़ित ब्लैक होल्स भी... जो सब कुछ निगल जाने के लिये तैयार बैठे हैं । यहाँ फ़ोटोंस हैं जो श्रृंग और गर्त बनाते हुये ऊर्ध्वाधर नृत्य करते हुये यात्रा कर रहे हैं । वे श्रृंग और गर्त की स्थितियों में भी एक संतुलन बनाये हुये हैं । और एक हम हैं जो सुख और दुःख में संतुलन नहीं बना पाते ।  

अव्यक्त से व्यक्त होने की प्रक्रिया में एक स्थिति है तन्मात्रा । तद् मात्रा, उसकी... ब्रह्म की मात्रा, अव्यक्त के गुणों की मात्रा । वैशेषिक दर्शन में पञ्चतन्मात्राओं का उल्लेख किया गया है । यह शब्द दुरूह है तो आप पेण्टाक्वार्क्स का चिंतन कर सकते हैं । एण्टी मैटर और पैरालल वर्ल्ड का सत्य हमें द्वैत के रहस्य के समीप ले जाता है । पॉज़िटिव और निगेटिव, तमस और प्रकाश, स्पिन और एण्टीस्पिन... यह श्रृंखला कभी समाप्त ही नहीं होती... नेति नेति ब्रह्माण्ड...
आकाश गंगाओं की संरचना से लेकर सौर्यमण्डलों और परमाणुओं... अंतरपरमाणुओं की संरचना तक के पैटर्न में कितनी अद्भुत् समानता है ! पुरुषोऽयं लोक संमितः... 
प्रकाश को प्रकट होना होता है, अंधकार को प्रकट होने की आवश्यकता नहीं.. वह तो विद्यमान है सर्वत्र । दोनों का संघर्ष इसीलिये है... दोनों अपना-अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैं । जगत् के लिये इनर्शिया भी उतनी ही आवश्यक है जितनी कि गति । हम इनर्शिया या गति में से किसी एक को चुन लेते हैं अपने लिये... दोनों के परिणाम भिन्न-भिन्न हैं इसलिये चुनने वाले को उनके भोग के लिये भी तैयार रहना चाहिये । 




Inside the small nutrino 


रविवार, 2 अक्टूबर 2016

ब्रह्म की आशिकी...


रति वर्जना नहीं, अनिवार्य है सृजन के लिये । रतिक्रीड़ा से कोई विरत नहीं, यह जितना अद्भुत् है उतना ही अपरिहार्य भी । जब प्रथम् बार यदृच्छा का स्पन्दन हुआ तो ब्रह्म जाग्रत होते ही आदिरति के उपक्रम में प्रवृत्त हुये । 
पिछली बार जब ब्रह्मरात्रि का अवसान हुआ तो भोर होते ही पूर्णमदः ने एक स्पन्दन का अनुभव किया । यह स्पन्दन और कुछ नहीं, यदृच्छा थी, ब्रह्म का महत् तत्व था जिसे आपने संज्ञा दी “अहं” । ब्रह्म के जागरण के साथ ही अहं की तरह काल भी अपने अस्तित्व में आया । काल को दिक् की अपेक्षा थी, दिक् के लिये सृष्टि की आवश्यकता थी । अस्तु आदिब्रह्म को सृष्टि के लिये प्रवृत्त होना पड़ा । ब्रह्म ने अभिलाषा की – “एकोऽस्मि बहुस्यामः”।
“बहु” होने के लिये विवेक की आवश्यकता थी, ब्रह्म विवेकी हुआ । विवेक ने स्वीकार और निषेध को अपना सहयोगी नियुक्त किया । रतिक्रीड़ा के लिये स्वीकृति आवश्यक थी ।
ब्रह्म के विवेकी होते ही विविधता प्रकट हुयी, विविधता से तन्मात्रायें (बोसोन यथा- फ़ोटॉन, ग़्ल्यूऑन, मेसॉन आदि) अस्तित्व में आयीं । वे प्रसन्न थीं और रति के लिये उत्सुक भी । तन्मात्राओं के द्रुत नृत्य से आकर्षण उत्पन्न हुआ, ब्रह्म आकर्षित हुआ और उसने तन्मात्राओं से रतिक्रीड़ा की । ब्रह्म विवेकी न हुआ होता तो तन्मात्रायें अस्तित्व में न आ पातीं, तन्मात्रायें अस्तित्व में न आ पातीं तो ब्रह्म रति में प्रवृत्त न हो पाता । ब्रह्म की यह दीर्घ रति है जो उसके जागने से लेकर सोने तक निरंतर चलती रहती है । आदिब्रह्म की आदिकामाग्नि ने उसे चिर आशिक़ बना दिया, ब्रह्म अपनी रचनाओं से रति करता है, रति से पञ्चमहाभूत उत्पन्न हुये, पञ्चमहाभूतों की पारस्परिक रति से फ़र्मियॉन्स उत्पन्न हुये और इलेक्ट्रॉन, पॉज़िट्रॉन, प्रोटोन, न्यूट्रॉन, न्यूट्रिनो, बेरियॉन आदि ब्रह्म के विविध स्वरूप अस्तित्व में आये ।
किसी रसिक ने परिहास किया – “ओह ! तो ब्रह्म ने अपनी ही पुत्री से सम्भोग किया !” जिनके लिये केवल अभिधा शक्ति ही ग्राह्य है वे ब्रह्म को बलात्कारी मान बैठे... ठीक अपनी तरह, जो अज्ञानवश अपनी ही बुद्धि से बलात्कार करते रहने के अभ्यस्त हैं ।       

परमाणुओं का विवाह और इलेक्ट्रॉन्स का लास्य नृत्य...

पिता ने पुत्री का विवाह किया, वह ससुराल चली गयी, देने वाला पिता अब निगेटिव हो गया है । पति ने नवविवाहिता का पाणिग्रहण किया, वह पॉज़िटिव हो गया... किंतु दाता अकिंचन हो गया ! इस विवाह का हर कोई साक्षी है । इलेक्ट्रॉन का एनर्जी स्टेट पॉज़िटिव है, दूसरों को एनर्जी देकर उसका इलेक्ट्रिक चार्ज़ निगेटिव हो जाता है । प्रोटॉन का एनर्जी स्टेट निगेटिव है, दूसरों से एनर्जी लेकर उसका इलेक्ट्रिक चार्ज़ पॉज़िटिव हो जाता है । अद्भुत् !

जब निर्गुण ब्रह्म सगुण ब्रह्म के रूप में अवतरित हुआ तो उसे मात्रा की आवश्यकता हुयी थी । ब्रह्म ने मात्रा को उत्पन्न किया, गुण और मात्रा का फ़्यूज़न हुआ । यह क्वार्क्स थे जो जन्म लेते ही नृत्य करने लगे । नृत्य प्रारम्भ हुआ तो लास्य उपजा, लास्य उपजा तो संघात हुआ, राग हुआ... ईर्ष्या भी हुयी... जड़ता भी हुयी । आदि शक्तियाँ प्रचण्ड संघात से रतिक्रीड़ा में लिप्त हुयीं । 
ब्रह्म की रास लीला (रहस्य लीला) अद्भुत् है, वह अपनी ही रचनाओं से रति करता है । रति उसकी विवशता है, सृष्टि की अपरिहार्य आवश्यकता है । प्रोटोन्स बड़े रसिक हैं, उनका सेल्फ़ ग्रेविटेशनल फ़ोर्स इलेक्ट्रॉन्स को दीवाना बना देता है । वे उन्मत्त भाव से प्रोटोन्स के चारो ओर चिर लास्यनृत्य में प्रवृत्त होते हैं गोया कृष्ण को घेर कर नृत्य में लीन हों गोपियाँ । ब्रह्म का प्रथम् भौतिक अस्तित्व परम अणु के रूप में प्रकट हुआ । प्रारम्भ में परमाणु उदास थे, वे बड़ी व्यग्रता से ब्रह्माण्ड में इतस्ततः भ्रमण करने लगे । ब्रह्म ने अपने विवेक से इसका समाधान पूछा तो उत्तर मिला कि परम अणु अन्य परम अणुओं से रति के अभिलाषी हैं । ब्रह्म ने स्मित हास्य से परमाणुओं को रति की अनुमति दी, परमाणुओं ने परस्पर विवाह किये । विवाह के पश्चात् एक परमाणु के इलेक्ट्रॉन्स को दूसरे परमाणु के अन्य इलेक्ट्रॉन्स से समझौता करना पड़ा । मानव समाज में यह प्रथा आज भी चल रही है, पटरानियों को आपस में समझौता करना ही पड़ता है ।
परमाणु रति में रत हुये तो अणुओं का जन्म हुआ । परमाणु की तरह अणु भी गुरुता की अभिलाषा में इतस्ततः नृत्य करने लगे, तुम इसे ही तो ब्राउनियन मूवमेण्ट पुकारते हो ।
अणु भी रति के अभिलाषी हो रति में प्रवृत्त हुये तो कण और विभिन्न कम्पाउण्ड्स बने । एक ब्रह्म बड़ी तीव्रता से बहु होता जा रहा था । ब्रह्म का विस्तार हुआ और एक विविधता सम्पन्न ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आ गया ।
किंतु रेण्डम नहीं है ब्राउनियन मूवमेण्ट । ब्रह्म जटिल है, ब्रह्म की सृष्टि जटिल है, उसका जागरण और शयन भी जटिल है... यह जटिलता सुनिश्चित् है, सुनिर्धारित है । तभी तो मैं ब्राउनियन मूवमेण्ट को रेण्डम नहीं स्वीकार कर पाता । यह जो रेण्डमनेस है वह हमारी अज्ञानता है । अणुओं के नृत्य का यह पैटर्न समझना होगा आपको ।
शिव कल्याण है, शिव सृष्टि है, शिव नृत्य है, शिव जागरण है, शिव शयन है ।
उमा ऊर्ध्वशक्ति है, शक्ति के अभाव में शिव शव है । उमा परमाणु की पोटेंशियल एनर्जी है, शिव का संयोग होता है तो पोटेंशियल एनर्जी कायनेटिक एनर्जी बन जाती है । शिव नृत्य करते हैं तो ऊर्जा उत्पन्न होती है, उस ऊर्जा से ही तो ब्रह्म मैटर बनकर साकार हो पाता है  
यह उमा है जो शिव को ताण्डव नृत्य के लिये प्रेरित करती है । शिव जब लास्य ताण्डव नृत्य करते हैं तो सृष्टि अस्तित्व में आती है, और जब वे रुद्र ताण्डव नृत्य करते हैं तो सृष्टि ब्रह्म को समर्पित होती है । तुम इसे प्रलय और महाप्रलय जान कर भयभीत होते हो, किंतु यह भूल जाते हो कि दिन भर के नृत्य और सृष्टि के पश्चात् यह उनके शयन का काल है । ब्रह्म का जागरण और शयन एक अनिवार्य प्रक्रिया है, शाश्वत और सुनिश्चित् ।  






  


रविवार, 25 सितंबर 2016

विकास...



समाज में असमानता थी
समानता के लिये
आरक्षण की ज़रूरत थी ।
हो गया आरक्षण
लोग होने लगे विकसित
छह दशक बाद
हो गया विकास
मच गयी होड़
चीखने लगे लोग
हम भी विकास करना चाहते हैं
विकास के लिये पिछड़ा बनना चाहते हैं ।
बाम्हन बोला... 
राजपूत बोला... 
बनिया बोला...  
हमें नहीं रहना अगड़ा
हमें हरिजन बना दो
हरिजन बोला
हमें दलित बना दो
दलित बोला
हमें महादलित बना दो
महादलित बोला
हमारे लिये एक नयी जाति बना दो
जो सबसे ज़्यादा गिरी हुयी हो
हमारा नाम
सबसे घृणास्पद वाला होना चाहिये
जैसे हगूड़ा या घास-कूड़ा
या फिर भेड़िया या कुत्ता
नाम सबसे घटिया हो अलबत्ता
विकास के लिये बेहद ज़रूरी है
आरक्षण हमारी मज़बूरी है
इसीलिये
दबे-कुचले, दीन-हीन बनने की
होड़ है
हंगामा है
आन्दोलन है
आग है
जुलूस है
भीड़ है
सड़क पर कार रोक कर
लड़कियों का बलात्कार है
दीन-हीन, दबे-कुचले बनने की
जबरई है
ग़रीब बनने की
तमन्ना है
ताकि कर सकें विकास
और बन जायें ख़ास । 

शनिवार, 24 सितंबर 2016

शुकबाला कभी नहीं मरती






सोचा था कि “धूपगुड़ी की गली” के बाद यह अध्याय बन्द हो जायेगा किंतु सोचा हुआ कब पूरा होता है भला ! वह अध्याय फिर एक दिन खोलना पड़ेगा, इसका लेश भी अनुमान नहीं था मुझे । वह कथा शुकबाला कोथा की इति नहीं हो सकी और मुझे विवश होकर एक बार फिर धूपगुड़ी जाना पड़ा । इस बार जब मैं उससे मिलने गया तो वहाँ वह अकेली नहीं थी, उसके साथ थी दोपदी सिंघार और अम्बर रंजन पाण्डेय भी । मुझे अच्छा लगा कि तीनों से एक साथ भेंट हो रही थी । इस अद्भुत् भेंट के बारे में बताने से पहले एक और बात बतानी आवश्यक है ।
दर-असल हुआ यह कि चेहरे की चौपाल पर जमे विद्वानों ने एक दिन सुना कि तोताबाला मर गयी । किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई तीन–चार दिन पहले से यूँ घोषणा करके मर सकता है । किंतु समाचार तो यही था कि दोपदी सिंघार की मृत्यु के बाद अब तोताबाला ठाकुर की भी मृत्यु हो चुकी थी । अंतर यही था कि दोपदी की मृत्यु अघोषित थी जबकि तोताबाला की मृत्यु पूर्व घोषित थी । किंतु मेरे जैसे ढीठ जिसके पीछे पड़ जायँ उसे तो उस लोक जाकर भी वापस आना ही पड़ता है, सो तोताबाला उर्फ़ शुकबाला और दोपदी सिंघार को भी आना ही पड़ा ।
धूपगुड़ी के उस तीन तल्ले वाले मकान में अम्बर को देखा तो मन हुआ कि अम्बर से पूछूँ क्या शुकबाला अपनी पूरी उम्र जी चुकी थी ? फिर सोचा, पहले शुकबाला से ही बात करूँगा, अम्बर की अपेक्षा वह कहीं अधिक परिचित है ।
मैंने मुस्कराते हुये शुकबाला की ओर देखा फिर अकबर वाला डायलॉग उलट कर सलीम की ओर से मारा – “अनारकली ! हम जानते हैं... अकबर तुझे जीने नहीं देगा... और हम तुझे मरने नहीं देंगे”।
डायलॉग सुनकर अम्बर मुस्कराये, बोले कुछ नहीं । मैं ही पुनः बोला – “अम्बर ! यदि तुम सोचते हो कि दोपदी और शुकबाला अब सदा के लिये मंच से जा चुकी हैं तो तुम बहुत बड़े धोखे में हो । वे दोनों कभी नहीं मर सकतीं, किंतु आज मैं केवल शुकबाला से ही मिलना चाहता हूँ... दोपदी से नहीं”।
अम्बर ने अपनी भृकुटि को सायास उठाया गोया मंच से यवनिका उठा रहे हों, माथे की सलवटें घनी हो गयीं और उनकी दृष्टि मेरे चेहरे से चिपक गयी ।
मैंने कहा – “मैं तुम्हारी दोपदी से तो कभी प्रेम कर ही नहीं सका किंतु इस अप्रेम की स्थिति में भी उसके अवाँछित अस्तित्व को नकार नहीं सकता । अब बात आती है शुकबाला की... क्या तुम समझते हो कि उसके साथ कुछ दिन खेल खेलकर जी भर जाने पर उसकी हत्या करके उसके अस्तित्व को समाप्त किया जाना सम्भव है”?
अम्बर ने शुकबाला को आँख से संकेत कर भीतर जाने का हुक्म दिया फिर बोले – “दोपदी की तरह शुकबाला का भी संवाद पूरा हुआ, यहाँ अब उसकी कोई आवश्यकता नहीं । रंगमंच पर कोई स्थायी नहीं टिका रह सकता । हमें अभी आगे भी जाना है, हम एक ही स्थान पर कैसे ठहर सकते हैं”?
मैंने कहा – “नहीं... तुम किसी भी पात्र के साथ मनमानी नहीं कर सकते । तुम्हें फिर से परकाया प्रवेश करना होगा । तुमने देखा नहीं कि किस तरह शुकबाला की क्षत-विक्षत लाश को मांसभक्षी गिद्ध नोच-नोच कर खा रहे हैं । न जाने कितने लोगों को शुकबाला से बेपनाह मोहब्बत हो गयी थी... न जाने कितने दीवाने उससे ब्याह कर उस प्रचण्ड समागम की दुर्दांत अनुभूति के लिये लालायित हो उठे थे... न जाने कितने लोग ताण्डवनृत्य के साथ जघन्य हत्यायों की लोमहर्षक घटनायें अपनी आँखों के सामने घटित होती हुयी देखने के स्वप्न देखने लगे थे, और तुमने अचानक इस कोटि-कोटि जनसमुदाय के स्वच्छन्द स्वप्नों पर तुषारापात् कर दिया ! नहीं अम्बर ! यह तो कतई उचित नहीं हुआ, तुम्हें एक बार फिर परकाया प्रवेश करना ही होगा”।
अम्बर कुछ दबाव में आते से दिखे, बोले – “देखिये मिसिर जी ! मेरा शिड्यूल बहुत टाइट है, मेरा कार्यक्रम पूर्व निर्धारित है, अभी मुझे परकाया प्रवेश के लिये फ़िलिस्तीन जाना है... और फिर एक ही पात्र में मैं बारम्बार परकाया प्रवेश नहीं कर सकता । यदि आप लोगों को यह इतना ही आवश्यक लगता है तो चौपाल में शुकबाला के बेशुमार दीवानों में से ही किसी को अब यह काम करना होगा”।
कुछ क्षण चुप रहकर अम्बर ने अपनी बात का उपसंहार करते हुये कहा – “ऐसा करता हूँ... मैं शुकबाला की आत्मा को जे.एन.यू. के मुख्य द्वार पर बेताल की तरह रहने के लिये कहे देता हूँ । शुकबाला के प्रेमी जब चाहें वहाँ जाकर उससे मिल सकते हैं । फ़िलिस्तीन जाने के लिये मेरी फ़्लाइट का समय हो रहा है... मैं चलता हूँ”।
अम्बर उठे और घर से बाहर निकल गये । मैंने शुकबाला को आवाज़ दी तो वह चुपचाप भीतर से निकलकर मेरे सामने बेजान सी आकर खड़ी हो गयी । मैंने पूछा – “मुझे पहचाना शुकबाला ? मैं हूँ डॉ. कौशलेन्द्र... वहाँ चेहरे की चौपाल पर पड़ी तुम्हारी क्षत-विक्षत लाश को देखकर मुझसे रहा नहीं गया । मैं उन नौ दिनों को कैसे भूल सकता हूँ जब ज्वर में तपते हुये एक अपरिचित की तुमने इतनी आत्मीयता से सेवा की थी । मैं तुम्हारा चिर ऋणी हूँ”।  
बहुत धीमी आवाज़ में शुकबाला ने कहा – “ऐसा मत कहिये... आपके यहाँ आने का उद्देश्य ही मेरी इस अंतिम यात्रा का पाथेय बन गया है । मुझे अम्बर से कोई शिकायत नहीं है... उन लोगों से भी नहीं है जो चौपाल पर मेरी निन्दा करते नहीं अघाते । शिकायत तो मुझे उन गिद्धों से भी नहीं है जो चौपाल पर पड़ी मेरी लाश को नोच-नोच कर खा रहे हैं... बल्कि ख़ुशी है मुझे... कि मर कर ही सही... मैं कुछ लोगों के काम तो आ सकी”।
जिस चौखट से एक बार अपने भरे नयनों से शुकबाला ने विदा दी थी मुझे उसी चौखट पर खड़े होकर चाहकर भी शुकबाला के लिये कुछ कर पाने में असमर्थ हो गया था मैं । अपने रुंधे कण्ठ से इतना ही बोल सका – “शुकबाला ! तुम कभी नहीं मर सकतीं...”

शुकबाला कुछ नहीं बोली, मेरी ओर देखकर केवल मुस्करायी भर... । उसकी मुस्कराहट में छिपा दुःख का अथाह सागर मेरी दृष्टि से छिपा नहीं रह सका । आँखों से बगावत कर खारे पानी की कुछ बूँदें निकलकर उस अथाह सागर से जा मिलीं । ये नामुराद आँसू बात ही कब मानते हैं मेरी ।      

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

धूपगुड़ी की गली...

भाद्रपद का कृष्णपक्ष ! रात के आठ ही बजे हैं लेकिन लगता है जैसे रात गहरा गयी है ! दो दिन से लगातार झमाझम बरसते काले मेघ जैसे प्रतिशोध पर उतारू थे । चर्चा थी कि, बंगाल की खाड़ी में चक्रवात आया है । धूपगुड़ी की गली-गली जैसे पद्मा हो चली, शुकबाला ने इससे पहले धूपगुड़ी की गलियों को कभी पद्मा-पद्मा होते नहीं देखा था । तिखण्डे पर अपने कमरे में लेटी मणिप्रभा ने शुकबाला से खिड़कियाँ बन्द कर देने को कहा । शुकबाला ने एक... दो...तीन खिड़कियाँ बन्द कर दीं किंतु जब चौथी खिड़की बन्द करने लगी तो उसके हाथ रुक गये । तेज हवा के साथ पानी की एक बौछार का कुछ अंश उसके चेहरे को भिगो कर फ़र्श पर बिखर गया । शुकबाला ने आकाश की ओर देखा – वर्षा रुकने के कहीं कोई संकेत नहीं । फिर नीचे झाँक कर नदी बन चुकी गली की ओर देखा, कोलाहल करती हहराती जलराशि, जैसे सब कुछ बहा ले जाने को आतुर हो अपने साथ । उसे किंचित सिहरन सी हुयी किंतु अगले ही पल प्रकृति की इस विनाशलीला को देख उसे रोमांच सा होने लगा । तभी नीचे से किसी ने पुकारा, “दीदीमोनी ! खोलिये, बस्तर से कोई बाबू मोशाय आये हैं”।
बस्तर से बाबू मोशाय ? वह भी इतनी वर्षा में ? कौन है यह ? – शुकबाला ने मन ही मन सोचा । सीढ़ियाँ उतरते समय वह कौतूहल से भर उठी, कौन है यह बाबू मोशाय ?   
द्वार खोलते ही शुकबाला का हृदय जैसे उस अपरिचित के लिये ममत्व से भर उठा । बोली, “ओह ! आप तो पूरी तरह भीग गये हैं, जल्दी से भीतर आ जाइये”।
पोर-पोर पानी टपकाते बाबू मोशाय को बहुत संकोच हुआ, बोले – “आपका घर गीला हो जायेगा, मैं पूरी तरह भीग चुका हूँ, मेरा सामान भी...”
शुकबाला हंसी, बात काटकर बोली, - “इस वारिश में कोई भीगे बिना बच सकता है, यह आपने सोचा भी कैसे ! आप संकोच मत कीजिये, जल्दी से अन्दर आकर कपड़े बदल लीजिये, नहीं तो सर्दी लग जायेगी । आइये-आइये, विलम्ब मत कीजिये”।
दोनों ऊपर पहुँचे तो मणिप्रभा ने पूछा – “कौन आया है धिये ?”
शुकबाला क्या कहती ! हंसकर बोली – “अतिथि हैं दादी ! हिंदी बोलते हैं, दूर से आये हैं”।
शुकबाला ने गुसलखाने की ओर संकेत करते हुये बाबू मोशाय से कहा – “आप कपड़े बदल लीजिये, तब तक मैं आपके लिये चाय बनाती हूँ”।
किसी अपरिचित के प्रति शुकबाला की इस आत्मीयता से बाबू मोशाय आत्मविभोर हो उठे । सोचने लगे, फ़ेसबुक की वर्चुअल चौपाल के लोग इस शुकबाला को कैसे जान पायेंगे भला !
शुकबाला उधर चाय बना चुकी थी और इधर बाबू मोशाय ने कपड़े बदल लिये थे । दोनों ने एक साथ कमरे में प्रवेश किया । चाय रखते ही बोली शुकबाला – “आप अपने सामान की चिंता मत कीजिये, मुझे दीजिये, सब सुखा दूँगी”।
बाबू मोशाय ने संकोच किया तो शुकबाला हँसकर बोली – “अपना पैसा कौड़ी निकाल लीजिये और बाकी सामान दे दीजिये मुझे”।
बाबू मोशाय और भी संकुचित हो गये, बोले – “नहीं-नहीं ...वैसी कोई बात नहीं । मैं तो यह सोच रहा हूँ कि मेरे कारण आपको कितना कष्ट उठाना पड़ रहा है । मुझे भादौं में लगातार इतनी वर्षा की आशा नहीं थी, सोचा था आपसे मिलकर तुरंत वापस चल दूँगा । लेकिन ट्रेन ही इतनी लेट हो गयी कि यहाँ आते-आते रात हो गयी”।
बाबू मोशाय ने अपने तर-ब-तर सामान की ओर संकेत कर कहा – “अब इसका जो करना है आप ही कीजिये”।
शुकबाला ने कहा – “चलिये, पहले चाय पी लेते हैं, यूँ हम बंगाली लोग आपकी तरह चाय नहीं पिया करते, खाया करते हैं”।
बाबू मोशाय हँस पड़े । इतनी देर बाद संकोच की दीवारें ढहनी शुरू हुयीं और वातावरण कुछ सामान्य हुआ ।
चाय पीते-पीते हँसकर पूछा शुकबाला ने –“तो कहाँ से चली थी आपकी ट्रेन जो इतनी लेट हो गयी”?
बाबू मोशाय ने पहले तो अपना परिचय दिया फिर पूरा किस्सा सुनाया कि वे जगदलपुर से वाल्टेयर होते हुये किस तरह और क्यों यहाँ तक आ पहुँचे ।
शुकबाला मुस्कराती हुयी उठी और डॉ. कौशलेन्द्र का तर-ब-तर सामान उठाकर अन्दर चली गयी । थोड़ी देर में वापस आते ही खिलखिलाकर हँस पड़ी शुकबाला । कौशलेन्द्र उसे देखता ही रह गया, मन में सोचा- कितना हँसती है यह लड़की! क्या सचमुच यही है वो शुकबाला जिसकी तलाश में यहाँ तक आ पहुँचा है वह ...अपनी विवादास्पद कविताओं के लिये कुख्यात हो चुकी शुकबाला या फिर कोई और है यह ?
कौशलेन्द्र ने पूछा – “आप हँस क्यों रही हैं ? कुछ अस्वाभाविक हुआ क्या”?
“अस्वाभाविक....” कहने लगी शुकबाला – “कोई इतना भी दीवाना होता है क्या ? आप डॉक्टर हैं और किसी अनजान लड़की की उलझी-उलझी कविताओं के पीछे-पीछे यहाँ तक चले आये... और वह भी इतने वर्षाकाल में ?”
कौशलेन्द्र को लगा, सचमुच अस्वाभाविक तो है ही, ऐसा भी कहीं होता है भला ! कविताओं के लिये ऐसी दीवानगी ! कि बस्तर से जलपायीगुड़ी तक आ पहुँचे !
कौशलेन्द्र को गम्भीर देखकर बोली शुकबाला – “अरे ! आप तो गम्भीर हो गये ! मैं तो बस यूँ ही कह रही थी । सच बताऊँ... मैं अभिभूत हूँ । निन्दा के सिवाय मुझे मिला ही क्या है अभी तक... और एक आप हैं जो शुकबाला को खोजते हुये भींगते-भागते यहाँ तक आ पहुँचे । सच तो यह है कि मेरे पास शब्द नहीं हैं कुछ कहने के लिये ....यह जो मैं इतना बके जा रही हूँ यह तो बस छलावा है यह शेखी बघारने के लिये कि मैं शब्दहीन नहीं हूँ” ।
शुकबाला ने देखा, कौशलेन्द्र का पूरा शरीर थर-थर काँप उठा था, आँखें भारी होकर झुकने सी लगी थीं । वह उठी और पास आकर खड़ी हो गयी, बोली- “आप ठीक तो हैं न बाबू मोशाय”?
कौशलेन्द्र को चुप देखकर शुकबाला ने उसके माथे को स्पर्श किया फिर किंचित परेशान होकर बोली –“लो हो गयी न सर्दी, तेज ज्वर भी है आपको तो । आप लेटिये, मैं काढ़ा बना कर लाती हूँ”।

वायरल फ़ीवर से मुक्त होने में कौशलेन्द्र को समय लग गया । शुकबाला के घर में रहते हुये उसका आज नौंवा दिन था ।  इस बीच शुकबाला की कविताओं को लेकर दोनों में कोई बात नहीं हुयी । शुकबाला ने जिस आत्मीय भाव से उसकी सुश्रुषा की उससे वह स्वयं को शुकबाला का ऋणी मान चुका था । नौंवे दिन उसने कहा – “अब मैं ठीक हूँ, और जा सकता हूँ । बस एक उपकार और कर दीजिये, कल की यात्रा के लिये मेरा आरक्षण करवा दीजिये”।
शुकबाला ने उलहना सा दिया, कहा – “अभी तो आपके आने का उद्देश्य ही पूरा नहीं हुआ, ऐसे कैसे चले जायेंगे”?
कौशलेन्द्र मुस्कराया, बोला – “इतने दिन में उद्देश्य पूरा नहीं हुआ तो और कब पूरा होगा ! मुझे जो जानना था, वह जान चुका हूँ ....अब और क्या शेष है !”
सर्वांग सुन्दरी श्यामा शुकबाला ठुमक कर बोली – “क्या जान लिया है, बाबू मोशाय! भला मैं भी तो जानूँ ! कैसी है शुकबाला !”
कौशलेन्द्र ने कहा – “गूँगे का गुड़”।

विदायी के समय मणिप्रभा ने बाबू मोशाय को यशस्वी होने का आशीष दिया । दरवाजे के पल्लू से सट कर खड़ी श्यामा सुन्दरी के चेहरे पर जैसे मेघ घिर आये थे । भरे गले से जैसे-तैसे वह इतना ही कह सकी – “फिर कब आओगे अतिथि”?

      और कौशलेन्द्र तो शुकबाला की ओर एक बार दृष्टिपात कर सकने का भी

 साहस नहीं कर सका । ड्रायवर ने पास आकर कहा – “समय हो गया है बाबू 

मोशाय!”

रविवार, 11 सितंबर 2016

राज नीति

तलाक दे चुका है राज
नीति अब यहाँ नहीं ।
ढूँढता हूँ मैं उसे
यहाँ वहाँ कहाँ नहीं ।

दिन में छिप गये उलूक
सामगान अब नहीं
खुल गया है राज ये  
यहाँ वहाँ कहाँ नहीं ।

सूरज से रार ठान ली
देखो तो राजहठ ये भी
तोते भी रट रहे वही
यहाँ वहाँ कहाँ नहीं । 

रात ढल चुकेगी जब
राज भी ढलेगा तब  
नीति फिर से आयेगी
यहाँ वहाँ कहाँ नहीं ।