शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

जोग माया संसार

-      भव्य है बाबा का आश्रम ।
-    दिन भर पसीना बहाते श्रमिकों और कृषकों के लिए दुर्लभ हैं बाबा और उनके माया संसार ।
-      भारत बाबाओं का देश है । भारत की माटी बहुत उर्वरक है बाबाओं के लिए
-    दाढ़ी वाले बाबा, बिना दाढ़ी वाले बाबा, गेरुवा वस्त्रधारी बाबा, श्वेतवस्त्रधारी बाबा, धोती और कुर्ता-पाजामा से लेकर जींस और स्टाइलिश परिधानधारी बाबा, देशी सुन्दरियों और विदेशी गौरांगिनियों से मंडित-सेवित अभिजात्य बाबा, फलाहारी बाबा, सर्वभक्षी बाबा, गँजेड़ी बाबा, शराबी बाबा, शुद्ध अंग्रेज़ी से लेकर अशुद्ध हिंदी तक बोलने वाले बाबा, माया संसार में आँखें मूँदे डुबकी लगाते ऐश्वर्यसम्पन्न बाबा, धन-कुबेर को पराजित करते धन्नासेठ बाबा...    
-      मठ-मंदिर में बाबा, माया में बाबा, सत्ता में बाबा, विपक्ष में बाबा, भोग में बाबा, रोग में बाबा, व्यापार में बाबा, जेल में बाबा...
-      अद्भुत् है बाबाओं का जोगमाया संसार ।
                           
-      वीतरागी ने उपदेश दिया – “...भोग नहीं योग”।
-      निषेध कर दिया – “...ठगिनी माया का त्याग करो”।
-     एकादश इन्द्रियों वाले शरीरधारी विकल हो उठे, संत के वचनामृत का पान और पालन किए बिना मुक्ति नहीं मिलेगी ।
-     द्विविधा यह थी कि अग्नि को ताप से मुक्त कैसे किया जाय ? हिम को शीत से मुक्त कैसे किया जाय ? इन्द्रियों को उनके धर्मपालन से रोका कैसे जाय ?
-    भक्तों ने बल प्रयोग किया ...इन्द्रियों का दमन किया ...फिर एक दिन अचानक विस्फोट हुआ ...भक्तों को अपने-अपने स्वामी बाबाओं के साथ पापकुण्ड में आकण्ठ डूबे हुए देखा गया ।
-      निषेध का अतिवाद और अप्रासंगिकता इन्द्रियों को रास नहीं आई । इन्द्रियाँ अपने स्वभाव का त्याग कैसे कर सकती हैं भला !

-      किसी ने कहा – “...भोग भी और योग भी”।
-   ओशो ने भी निषेध नहीं किया, स्वीकार किया । जो जैसा है उसे उसी रूप में ...उसके गुणधर्म के साथ स्वीकार किया ...माया को आनन्द के साथ स्वीकार किया और यात्रा करते रहने का संकल्प लिया ।
-      यात्रा होती रहेगी तो वर्तमान पीछे छूटता रहेगा... भोग पीछे छूट जाएगा ।
-      यात्रा में कुछ तो साथ रहेगा । जब भोग होगा तो योग नहीं होगा, जब योग होगा तो भोग पीछे छूट जाएगा । दोनों को साथ रखना है तो विदेह होना होगा, बिना विदेह हुए... बिना कृष्ण हुए सम्भव नहीं है स्थितप्रज्ञ हो पाना । विदेह होना स्थूल से सूक्ष्म होना है..., द्रव्य से ऊर्जा होना है..., जड़ता से चेतना की स्थिति तक पहुँचना है ।  
-      निषेध के साथ यात्रा नहीं हो सकती, स्वीकार के साथ सम्भव है यात्रा ।
-      अब लाख टके का प्रश्न यह है कि भोग से आगे की यात्रा कैसे की जाय ? द्विविधा है कि कहीं उसी में लिपटे रह गए तो ? ...तो कैसे मिल सकेगा मोक्ष ?

-      आयुर्वेद के ऋषियों ने कहा – “प्रसन्नात्मेन्द्रिय मनः ...”।
-      उन्होंने आत्मा और मन की ही नहीं इन्द्रियों की भी प्रसन्नता का उपदेश दिया ।
-     प्रसन्नता का अर्थ है निर्मलता । मल रहित इन्द्रियों के साथ की गई यात्रा ही प्रशस्त है ।
-     मलरहित इन्द्रियाँ ? हाँ ! विकारशून्य... स्वाभाविक । स्व-भाव में रहते हुए... स्व-धर्म का पालन करते हुए संतुष्ट होती हुई इन्द्रियाँ मलरहित होती हैं । स्व-भाव और स्व-धर्म को विवेक की अपेक्षा होती है । विवेक किसी भी यात्री को स्व-धर्म से विचलित नहीं होने देता । यात्रा में त्याग की नहीं विवेक की आवश्यकता है ।               
    

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

सत्ता का कठोर दर्शन


प्राचीन इतिहास में दुष्ट और अत्याचारी राजाओं के साथ-साथ प्रजावत्सल राजाओं के भी आख्यान पढ़ने को मिलते हैं । भारत की वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में “प्रजावत्सलता” का गुण एक स्वप्न भर होकर रह गया है । वर्तमान भारत के ऐतिहासिक आख्यानों में हमारी आने वाली पीढ़ियों को शासकों के केवल एक ही वर्ग के आख्यान पढ़ने को मिल सकेंगे । यह असंतुलन कलियुग की चरमावस्था का द्योतक है तथापि अभी हम किसी अवतार की सम्भावनाओं के समीप भी नहीं हैं । हमें अपने उद्धार का पथ स्वयं ही निर्मित करना होगा । 

प्रजा को वर्तमान शासकों से यह आशा करने का कोई आधार नहीं है कि वे लोकहित का कोई कार्य या उद्धार जैसा कोई महान कार्य कर सकेंगे । विश्व के सभी देशों में न्यूनाधिक यही स्थिति है । सत्ताधीश लोकहित्त के न्यूनतम कार्य भी उतने ही करते हैं जितने कि सत्ता में बने रहने के लिए अपरिहार्य हों । प्रजा की स्थिति पिंजरे में बन्द उस शेर की तरह होती है जिसे केवल जीवित भर रहने के लिए भोजन दिया जाता हो । आधुनिक औद्योगिक वैश्वीकरण केवल निर्मम शोषण के सुदृढ़ स्तम्भों पर टिका हुआ है । रेशम पथ को पुनः स्थापित करने के पीछे चीन की तड़प और तिकड़म इसका ताजा उदाहरण है । आधुनिक तकनीक और वैश्वीकरण ने निर्ममता एवं शोषण को और भी व्यापक कर दिया है ।

अब हमें यह निर्मम सत्य स्वीकार कर लेना चाहिए कि सत्ता, औद्योगिक क्रांति और शोषण का गठबन्धन उस निरंकुश शक्ति के लिए आवश्यक है जिसके लिए सत्ताधीश लालायित रहते हैं । हमें यह सत्य भी स्वीकार कर लेना चाहिए कि सत्ताधीशों की जाति से प्रजा की जाति पूरी तरह भिन्न हुआ करती है । हमारे देश में प्रशासनिक अधिकारी नामक एक तीसरी जाति और होती है जो सत्ताधीशों के लिए हथियार का काम करती है । आदर्श के भूखे और जागरूक लोगों को  सत्ताधीशों और उनके हथियारों की धूर्तता कभी रास नहीं आती ।

सत्ताधीशों की योजनाओं और आश्वासनों के छल को समझने के लिए हमें सत्ताधीशों और संतों के उद्देश्यों एवं उनकी कार्यप्रणाली को ध्यान में रखते हुए विश्लेषण करना चाहिए । सत्ताधीश चौथ वसूलने वाले दबंगों की जाति का वह संगठित धड़ा है जिसने शोषित प्रजा से ही बड़ी चालाकी और धूर्तता से चौथ वसूलने के अधिकार को प्राप्त कर लिया है । अर्थात् भेड़िए ने खरगोश का शिकार करने की मान्यता खरगोश से ही प्राप्त कर ली है । आम आदमी को यह स्वीकार करना होगा कि भेड़िए से किसी सात्विक गुण की आशा नहीं की जा सकती । मर्यादापुरुषोत्तम या विक्रमादित्य जैसे लोग विरले ही होते हैं । रावण, कंस और जरासन्ध की भीड़ से मर्यादापुरुषोत्तम के आदर्शों की आशा नहीं की जानी चाहिए ।   
हम सत्ताधीशों से यह आशा नहीं कर सकते कि वे शासन तंत्र के आदर्श मूल्यों को जीते हुए लोककल्याण में प्रवृत्त होंगे । यह एक उच्च मानवीय गुण है जो सात्विक संतों के ही आचरण में मिल सकता है । इसका सबसे बड़ा प्रमाण है दुनिया भर में फैले आतंकवाद को पोषित करने वाले आर्थिक स्रोतों को संरक्षण देने वाले देशों के राजनीतिज्ञों की महत्वाकांक्षाएं । शक्तिसम्पन्न देश चाहें तो आतंकवाद को समूल नष्ट करने में विलम्ब नहीं होगा ।
मिथ्या आश्वासनों, दम्भपूर्ण मिथ्या प्रदर्शनों और आत्म प्रशंसा के आडम्बर में मुग्ध राजनीतिज्ञ से लोककल्याण की आशा करना व्यर्थ है । 

समाज अपनी स्वाभाविक ऊर्जा से लुढ़कता हुआ चलता है, लोग अपनी दिव्य ऊर्जा से आगे बढ़ते हैं, सत्ता का उसमें कोई योगदान नहीं होता, प्रत्युत सत्ताएं तो उनके मार्ग की अवरोधक ही होती हैं । यह सब लिखने का उद्देश्य आलोचना करना नहीं अपितु वास्तविकता को समझ कर स्वीकार करना और तदनुसार अपने उत्थान का मार्ग स्वयं तलाश करना है । 

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

बदमाश औरतें

सर्दियों की एक दोपहर । मरीज़ों की भीड़ के बीच डाकिए ने पैकेट थमाया, एक कागज पर हस्ताक्षर लिए और चला गया । ओपीडी निपटाने के बाद एक बजे भोजनावकाश में पैकेट खोला तो सामने थी “बदमाश औरतें” ।
मेरी कल्पना के मंच पर चेहरे को काले नकाब से ढके, हाथ में बंदूक उठाए घोड़े को भगाती पुतली बाई नुमा कुछ औरतें धूल के गुबार उड़ाती हुईं निकल गईं । थोड़ा साहस जुटाया... किताब खोली... तब तक पुतलीबाई जा चुकी थी । वह वापस नहीं आई, मैंने चैन की सांस ली किंतु...
किंतु...  पहले सफ़े पर ही अस्पताल का एक कमरा दिखाई दिया । यह बर्न यूनिट था, अपनी ख़ास गंध के साथ । सफ़ेद पट्टियों में लिपटे ज़ख़्म... कराहते लोग... कुछ ज़िंदगी तो कुछ दर्द से मुक्ति के लिए मौत माँगते लोग । उफ़्फ़ ! दर्द... दर्द... दर्द... और दर्द । बेड नम्बर एक पर ही मिल गई चुन्नियों में लिपटे दर्द ... दर्द की महक और ख़ामोश चीखों वाली हीर । ख़ामोशियों के जंगल में वक़्त धीरे से मुस्कराया, हीर ने मेरी तरफ़ नज़रें उठाकर देखा फिर बोली  “अभी और इम्तहां बाकी है ....” । मैंने कहा – “बिना इम्तहां भी कोई ज़िंदगी होती है भला”! 
बात सुनकर हीर मुस्कराई, दर्द मुस्कराया, कुछ और नज़्में भी मुस्कराने लगीं । अस्पताल के वार्ड में रात घिर आई थी, अँधेरों ने फफोलों को छू दिया, सिसकती रात के ज़िस्म से फिर रिसने लगीं कुछ नज़्में ।
ठहरी हुई औरत भीतर से कितनी भरी हुई है... यह कोई नहीं जानता और वह झील की तरह शरीफ़ मान ली जाती है । दुनियादारी की मानें तो यही रिवाज़ है ।
कभी-कभी भरी हुई कोई औरत ठहर नहीं पाती... वह झील नहीं...  बहती हुई सरिता बन जाती है और पुराने रिवाज़ टूटने लगते हैं । पास खड़े बरगद को किसी रिवाज़ का टूटना अच्छा नहीं लगता... तो पल भर में बहती नदी सैलाब के आरोपों से घेर दी जाती है । दुनियादारी की मानें तो यह भी एक रिवाज़ है ।
रिवाज़ें जब टूटती हैं तो “आग पर कदम” रखने पड़ते हैं । यह आग सवाल करती है, हीर भी सवाल करती है ...और सवाल करने वाली हर औरत की तरह चुप-चुप रहने वाली शर्मीली हीर भी एक “बदमाश औरत” बन कर नज़्मों की छाती में सुलगते अक्षरों की अगन बो देने के लिए बेताब हो उठती है । आग बो देने का यह संकल्प ही हीर की संवेदनाओं को झील से निकालकर बहती नदी बना देता है । सूखे पेड़ पर टंगी कविता बह उठती है, किसी रचनाकार की रचनाधर्मिता का यह चरम बिंदु है ।
औरतें कविता नहीं लिखतीं, ख़ुद हो जाती हैं कविता... और बेदर्द दुनिया की बेहयाई तो देखिए कि बड़ी चालाकी से हर हमदर्दी का लफ़्ज़ औरत के ज़िस्म से लिबास उतारने और उसे तवायफ़ बनाने में जुट जाता है । लेकिन हक़ीकत का एक और पहलू यह भी है कि हीर की सबसे छोटी नज़्म “तवायफ़-1” पल भर में में लोगों को नंगा कर देती है और पाठक भौंचक हो देखता रह जाता है ।
हीर की नज़्मों में अँधेरे की ग़िरफ़्त में घुटती रोशनी की कुछ कतरे हैं, आनंद की तलाश में छटपटाते दर्दों के काफ़िले हैं, बेपनाह मोहब्बत में डूबे बेहद नाज़ुक शीशे हैं, दुनिया को नंगा करती चीखें हैं, शराफ़त के चोले में दम घुटकर मर जाने से इंकार कर देने वाली बदमाश औरते हैं और है शाश्वत प्रेम की तलाश । यह तलाश ही साहित्य को प्रवाह देती है और उसे मरने से बचाती है ।   
धुप्प अँधेरेमें कहीं कंकरीली कहीं दलदली तो कहीं तपती रेतीली धरती पर भटकने की अभ्यस्त हीर ने पता नहीं कब अपने आसपास बिखरी...  नम हो चुकी राख में से चिंगारियाँ खोजकर अपने सीने में सहेज लेने में महारत हासिल कर ली थी... नदी की रेत में से सोने के बारीक कण खोजते किसी वंचित सोनझरिया की तरह । हीर की सहेजी ये चिंगारियाँ अब सम सामयिक साहित्य की ही नहीं बल्कि सैद्धांतिक क्रिटिक की भी अमानत बन चुकी हैं ।      

नज़्म हमारे आपके चारों ओर हर वक़्त साया बनकर चलती है पर दिखती कभी नहीं । नज़्म को देखन के लिए हीर जैसी आँखें चाहिए । जब कोड़े बरसते हैं तो नज़्म गर्भ में आती है । इस नज़्म के पैदा होने की राह में चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं, हाथों में छुरे लिए चारों ओर खड़े ज़र्राह मौके की तलाश में हैं । नज़्म को गर्भपात से ख़ुद को बचाना होगा । हीर को यह बात अच्छी तरह पता है इसलिए एक सजग गर्भिणी की ज़िम्मेदारियों को निभाती हुई हीर ने दर्द की कई मंजिले तय कर ली हैं । हीर की यह यात्रा... यह तलाश... यह क्रांति... अनवरत चालू है... उन्हें यह पक्का यक़ीन है कि कुछ अधूरी नज़्में...  ताउम्र का साथ निभा जाती हैं...  लिखे जाने के इंतज़ार में । 


गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

बस्तर को बूझा ही किसने

मड़िया-आमा-चार क्या कहने
महुआ मस्ती फूलों के गहने
अचरज से भर मसला सबने    
बस्तर को बूझा ही किसने ।

बघवा जब तक रहे विचरते
गीत सुने मैना के सबने
क्यों मौन है मैना जंगल सूने
बस्तर को बूझा ही किसने ।

प्राण घुटे घोटुल के अपने
चतुरों ने आ बेचे सपने
चारागाह बनाया सबने 
बस्तर को बूझा ही किसने ।

जंगल नदिया बिखरे प्रस्तर
ले रत्न गर्भ में सोया बस्तर    
आया जो भी लगा वो छलने

बस्तर को बूझा ही किसने ।


शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

गणतंत्र दिवस पर देश की सेना के साथ क्रूर मज़ाक

पत्थरबाजों को सामूहिक माफ़ी का फैसला... 

तुम से तो ऐसी उम्मीद न थी संबिद !
तुम भी मर गए ?

आख़िर यह भी शीशा ही निकला
मौका देखा
और झन्न से टूट गया
भारत को अब शीशे नहीं
कन्नाड़ी चाहिए ।

आज पत्थरबाजों को माफ़ी
कल चारा चोरों को माफ़ी
परसों बलात्कारियों को माफ़ी
उसके अगले दिन घोटालेबाजों को माफ़ी ...
इस देश का संविधान माफ़ीनामे में डूब गया है ।
चलो
कहीं किसी टापू में चलकर
बाकी ज़िंदग़ी गुजार लें ।


कश्मीर से चालू हुयी अरबी पत्थरबाजी परम्परा अंततः सरकारी तौर पर भारत में स्वीकार कर ली गई है । गणतंत्र दिवस के दिन भारतीय सेना पर पत्थर फेंकने वाले सैकड़ों आतंकवाद समर्थकों को माफ़ करने अलोकतांत्रिक फ़ैसले ने देशवासियों को बेहद निराश ही नहीं किया बल्कि आक्रोश से भी भर दिया है । आज का दिन... भारत के नागरिकों के दुर्भाग्य का दिन है । हमें भारत और जम्मू-कश्मीर की सरकारों से अब कोई उम्मीद नहीं रही ।
आज ज़ी-न्यूज की टीवी डिबेट में संबिद पात्रा एक सरकारी भोंपू बनकर प्रस्तुत हुए जिससे उनकी असमय नैतिक मृत्यु हो गयी । संबिद अब एक भोंपू मात्र रह गये हैं और भारत को इस भोंपू की कोई आवश्यकता नहीं है । सरकार के ग़लत फ़ैसले का समर्थन करने के कारण एक प्रखर वक्ता संबिद पात्रा की नैतिक और सामाजिक मृत्यु पर भारत को गहरा दुःख है ।

केंद्र की भाजपा और राज्य की मुफ़्ती सरकार ने इतने अलोकतांत्रिक और अपराध प्रोत्साहित करने वाला निर्णय भारत की जनता पर थोपते समय इतना भी नहीं सोचा कि इससे सेना के मनोबल पर क्या प्रभाव पड़ेगा । क्या भारत के देशभक्त नागरिक अब भी अपने युवकों को सेना में अपमानित होने और पत्थर खाने के लिए भेजने की आवश्यकता समझ सकेंगे ?

महबूबा मुफ़्ती तो कभी पत्थरबाजों के साथ होती हैं ...तो कभी उनके ख़िलाफ़ किंतु केंद्र सरकार भी पत्थरबाजों के साथ खड़ी हो जायेगी इसकी उम्मीद भारत के किसी भी नागरिक को कभी नहीं थी । भारत के लोग ख़ुद को छला हुआ महसूस कर रहे हैं । देश के साथ घोर विश्वासघात हुआ है, और अब यह सिद्ध हो गया है कि कोई भी राजनीतिक दल या उसकी नीतियाँ भारत के साथ नहीं बल्कि अपने व्यक्तिअगत स्वार्थों के साथ हैं जिसके लिए वे कुछ भी करने को हर क्षण तैयार हैं । अर्थात देशवासियों को अपनी रक्षा अब ख़ुद करनी होगी । जनता को सोचना होगा कि जब सरकारें आतंकियों के साथ हैं तो उन्हें किसके साथ होना चाहिए ?


          गणतंत्र दिवस के दिन पत्थरबाजों को आम माफ़ी देना क्या आतंकवाद को संरक्षण देना नहीं है ? जो सरकार देश की सेना के साथ नहीं है वह देश की जनता के साथ कैसे हो सकती है ? देश को सोचना होगा कि पत्थरबाजों को माफ़ी देने का फ़ैसला कितना ज़ायज़ है ?

रविवार, 24 दिसंबर 2017

किस ऑफ़ लव

मुक्त चिंतन की तड़प –“किस ऑफ़ लवअ रिवोल्यूशन अगेंस्ट मोरल पुलिसिंग

यह किस्सा केर-वनाच्छादित प्रांत ‘केरल’ की है ।  बुज़ुर्ग सूरज के झांकने में अभी छह घंटे शेष थे किंतु किसी ने भी उसके आने की प्रतीक्षा नहीं की, लोग हमेशा की तरह उस दिन भी ज़ल्दी में थे । उल्हइते लोगों ने रात बारह बजे ही बीसवीं सदी को टा-टा बाय-बाय करके भगा दिया था ।
सूरज दादा को धरती के आधुनिक मनुष्यों से गम्भीर शिकायत थी । पुराने लोगों के आदर्श ‘तमसोमा ज्योतिर्गमय’ से प्रतिलोम गमन करते हुए उन लोगों ने दिन की मर्यादा की तो ऐसा कम तैसी की ही, परिभाषा को भी खण्ड-खण्ड कर डाला था । लोगों को आगे बढ़ने की बहुत ज़ल्दी हुआ करती थी इसलिए उन्होंने तारीख़ बदलने के लिए भोर तक की प्रतीक्षा करना बन्द कर दिया था । रात को जैसे ही बारह बजते कि लोग तारीख़ बदल दिया करते । नया दिन अर्धरात्रि के अन्धकार में ही अपनी यात्रा प्रारम्भ करने के लिए विवश हो जाता । सुबह जब तक सूरज दादा धरती की ओर झाँकते और पशु-पक्षी सो कर उठ पाते तब तक तारीख़ बदल चुकी होती । रात के अंधेरे में बदली हुई तारीख़ का अब कोई गवाह नहीं हुआ करता । सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर शंभूनाथ मिश्र को लगता कि टू-जी घोटाले जैसे न जाने कितने घोटालों के सबूत न मिल पाने का यही परम रहस्य है ।
यह इक्कीसवीं सदी का पहला दिन था, कोज्झिकोडे शहर के लोग मौज-मस्ती के मूड में थे । अधर और ललिथा ने भी परिणय सूत्र में बंधने की प्रतीक्षा किए बिना ही एक लिप-लॉप चटका दिया... वह भी पार्क में दिन-दहाड़े ।
कोज्झिकोडे के अधर ने फ़्रांस से अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद कोच्चि में अपना व्यवसाय स्थापित करना सुनिश्चित किया था । भरपूर ऊर्जा और आत्मविश्वास के साथ अधर ने ललिथा को अपने निर्णय की सूचना दी तो उसके सपनों को जैसे पर लग गए । दोनों एक पार्क में मिले तो आनन्दातिरेक में ललिथा ने अधर को आलिंगन में भर लिया, प्रत्युत्तर में अधर ने भी अपने अधर ललिथा के अधरों से चिपका दिए । सार्वजनिक स्थान में मात्र तेरह सेकेण्ड्स का मुक्त प्रेमालिंगन और लिप-लॉक कोज्झिकोडे में चर्चा का विषय बन गया ।
पार्क में कुछ बुज़ुर्ग भी अपने बच्चों के बच्चों को घुमाने-टहलाने के लिए लाए थे, उन्होंने रात्रिचर्या को सूरज की रोशनी में देखा तो उन्हें बुरा लगा । नन्हें कृष्णा ने एक प्रेमी युगल को एक-दूसरे के अधर चबाते-चूंसते देखा तो इसे एक नया खेल समझकर खेलने के प्रयास में अपनी छोटी बहिन रुक्मिणी के होठ चबा डाले । बच्ची इस अचानक हुए आक्रमण से घबरा गई और पीड़ा से चीख उठी । पार्क की घास पर बैठे दादा श्वेतकेतु अय्यर ने बच्ची की चीख सुनी तो दौड़े ।
कोज्झिकोडे में इक्कीसवीं शताब्दी कुछ इस तरह आई थी कि उसकी चर्चा महीनों नहीं बल्कि वर्षों तक होती रही थी । वृद्ध अय्यर उस समय तो बच्चों को लेकर घर चले गए किंतु पार्क की घटना से व्यथित हो गए थे । उन्होंने कुछ लोगों के सामने आधुनिक युवाओं के आचरण के प्रति अपनी चिंता व्यक्त की । कुछ लोग प्रेमी युगल के इस अमर्यादित आचरण से क्रुद्ध हो गए और उन्होंने पार्क में जाकर अधर और ललिथा की धुनाई कर दी । उन्हें पूरा विश्वास था कि भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है जो इस उच्छ्रंखल आचरण को रोक सके । वे भारत की पंगु न्याय व्यवस्था और अतिभ्रष्ट प्रशासन के सामने कोई फरियाद ले जाने की अपेक्षा स्वयं ही विक्रमादित्य बन जाने में विश्वास करने वाले लोग थे ।
केरल में हुई इस घटना की प्रतिक्रिया पूरे देश में हुई । महाज्ञानियों ने अपने प्रवचन में कहा – “हमें एक-दूसरे की निजता का सम्मान करना सीखना और सिखाना होगा । घर हो या गलियाँ या फिर पार्क, हमें हर कहीं प्रेम और उसके सार्वजनिक प्रदर्शन करने का अधिकार है । यह हमारी इच्छा और अधिकार है कि हम चुम्बन के लिए कौन सा समय और कौन सा स्थान तय करें । इस पर कोई नैतिक या कानूनी प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता । जहाँ तक बच्चों पर ऐसे प्रदर्शन के दुष्प्रभाव पड़ने की सम्भावना है तो यह मनुवादियों का केवल एक फासीवादी बहाना है जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता । वास्तव में बच्चों के मस्तिष्क पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव का कारण प्रेमालिंगनबद्ध चुम्बन दृश्य नहीं बल्कि घर में पिता द्वारा माँ के साथ की गई मारपीट के दृश्य हैं”।  
फ़्रांस में रहकर पढ़ा-लिखा अधर भारतीय परिवेश में लेश भी कढ़ा हुआ नहीं था, उसे इस मोरल पुलिसिंग का कोई औचित्य समझ में नहीं आया । पिटते समय वह चीख रहा था – “यह हमारा व्यक्तिगत मामला है, कोई हमारे रिश्तों पर पहरा कैसे दे सकता है ? हमने किसी का क्या बिगाड़ा है ? हम अपनी ज़िन्दग़ी कैसे जिएं यह दूसरे लोग तय करने वाले कौन होते हैं”?
ललिथा ने इसे ‘ब्राह्मणीय मनुवादी हिन्दू पुलिसिंग’ कहते हुए अपना आक्रोश व्यक्त किया जबकि अधर ने इस पुलिसिंग के विरुद्ध रिवोल्यूशन करने की ठान ली ।
मारपीट करने वाले युवाओं के मुखिया वी. शेखरन ने अपनी गिरफ़्तारी के समय मुक्तकामप्रदर्शन के अतिउत्साही प्रेमियों को सुनाते हुए कहा – “भारतीय संस्कृति के विरुद्ध आचरण करने के लिए भारत का समाज किसी को नैतिक अनुमति नहीं दे सकता । ऐसी उच्छ्रंखलता सहन नहीं की जा सकती”।
भीड़ में खड़े अधर और ललिथा के मित्र वी. शेखरन पर टूट पड़े – “तुम्हारा पाखण्डी समाज भारत का कानून नहीं है, तुम किसी को अनुमति देने या न देने वाले कौन होते हो ? यदि तुम स्वयं को भारतीय संस्कृति का ठेकेदार मानते हो तो तुम्हारी भारतीय संस्कृति हमारी जीवनशैली की शत्रु है जो हमारे निजी जीवन के प्रति हिंसा की सीमा तक असहिष्णु है । हम ऐसी संस्कृति को पैरों के नीचे कुचल देंगे”।
आधुनिक भारत की नई पीढ़ी के एक बहुचर्चित शिक्षित वर्ग में कामकेलि का मुक्त प्रदर्शन मौलिक अधिकार के रूप में चिन्हित किया जा चुका था । संस्कृत और हिन्दी के साहित्यकारों ने प्राचीन साहित्य के हवाले से मुक्त काम प्रदर्शन को नैतिक और मनुष्य की आवश्यकता सिद्ध करने का प्रयास किया । भारत की प्राचीन संस्कृति और जीवन मूल्यों से विरक्त हुए इन लोगों में प्रख्यात विश्वविद्यालयों के छात्र, शोधछात्र, इंजीनियर्स, साहित्यकार, इतिहासकार, चिंतक और प्रोफ़ेसर्स सम्मिलित थे जो रात्रिकालीन गुह्य आचरण और दिनचर्या के मुक्त आचरण के मध्य किसी प्रकार के विभेद के पक्ष में नहीं थे । वे इस प्रकार के किसी भी विभेद को असमान सामाजिक व्यवस्था का कारण मानते थे ।
बात फैली तो योरोप के मुक्त समाज ने देखा कि इक्कीसवीं शताब्दी की भारतीय युवा पीढ़ी काम-वासना को लेकर दो अतिवादी विपरीत ध्रुवों पर खड़ी हो चुकी है । इण्डियन पैराडॉक्स सात समन्दर पार एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया ।  
अधर और ललिथा के साथ हुई मार-पीट का विवाद स्थानीय थाने की सरकारी पुलिस तक पहुँचा । सरकारी पुलिस ने पूरा मामला जानने के बाद स्थानीय जनता द्वारा की गई मोरल पुलिसिंग के विरुद्ध सामान्य कार्यवाही तो की किंतु बाद में स्वयं भी रात्रिचर्या वाले आचरण के दिनचर्या में व्यवहृत किए जाने पर आपत्ति की । मुक्त प्रेमालिंगनबद्ध चुम्बन के विरुद्ध अब हिन्दू संगठनों की मोरल पुलिसिंग को सरकारी पुलिस का भी सहयोग मिलने लगा । टकराव बढ़ा तो दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी सेनायें जुटाने में देर नहीं की । विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक वैलेंटाइन डे का उपयोग चूमा-चाटी समूह के सदस्यों की सदस्यता में वृद्धि के लिए किया जाने लगा । केरल में रात्रिचर्या और दिनचर्या के मध्य साम्यवादी अभेद दृष्टि की वकालत की जाने लगी । विज्ञान प्रमाणित सर्काडियन रीद्म के विरुद्ध गॉड्स ऑन कंट्री केरल की शिक्षित युवा पीढ़ी रिवोल्यूशन के लिए तैयार हो चुकी थी । कामज्वर से छटपटाती हुई इक्कीसवीं शताब्दी नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ फेकने के लिए उद्यत हो उठी । इस बीच सूरज के उजाले में मुक्त चूमा-चाटी के सार्वजनिक प्रदर्शन के पक्ष में फ़्री थिंकर्सनामक एक बौद्धिक सेना संगठित हो कर प्रकट हुई जिसका उद्देश्य भारत को योरोप की संस्कृति में ढालना था ।   
अक्टूबर 2014 में कोज्झिकोडे के एक कैफ़े में प्रेमालिंगनायमान एक युगल को सार्वजनिकरूप से चुम्बन करते हुये देखे जाने पर भारतीय जनता युवा मोर्चा के लोगों द्वारा मारपीट किए जाने की घटना को मलयाली टी.वी. समाचार चैनल ‘जय हिन्द’ ने अपने चैनल पर प्रदर्शित किया । इस घटना ने केरल ही नहीं बल्कि पूरे देश भर के फ़्री-थिंकर्स को आक्रोशित कर दिया । मुक्त-चिंतकों ने कामक्रीड़ा को रात्रिचर्या की गुह्यता और सामाजिक-नैतिक बन्धन से आज़ाद कराने के लिए एक आन्दोलन प्रारम्भ किया जिसका भारत के युवाओं ने हिप-हिप हुर्रे के साथ स्वागत किया । कुछ अतिउत्साहित फ़्री-थिंकर्सने अंतरजाल की सोशल साइट मुख पोथी’ (फ़ेसबुक) पर भी किस ऑफ़ लवआन्दोलन प्रारम्भ कर दिया ।    
नौ अक्टूबर 2014 को दिल्ली में ‘किस ऑफ़ लव’ प्रदर्शन के बाद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय सहित भारत के अन्य विश्वविद्यालयों में भी इसे एक उत्सव के रूप में मनाये जाने की नई परम्परा प्रारम्भ की गई । कुछ छात्र-छात्राओं ने प्रोफ़ेसर मटुक नाथ और उनकी शिष्या जूली के प्रेम-आदर्श को स्मरण कर अपने जीवन को धन्य किया ।
इंजीनियरिंग के अध्ययन के लिए ग्राम्य वातावरण से शहर के नए वातावरण में आये कृष्णा और शांथा को ‘किस ऑफ़ लव आन्दोलन’ ने बहुत आकर्षित किया । वे भी प्रेम करने और उसे दिखाने को अपना मौलिक अधिकार मानकर इस आन्दोलन में सबके साथ हो लिए । सार्वजनिक प्रदर्शन के समय जब वे एक-दूसरे के साथ प्रेमालिंगनबद्ध हो पूर्ण तन्मयता के साथ चुम्बनरत थे तो साथ के लोग उनकी कामातुरता के तीव्र आवेग से चिंतित हो उठे । खिलखिलाती मांगलिका ने परिहास करते हुए अपने मित्र शांथनु से कहा – “लगता है कृष्णा-शांथा के लिए बिस्तर की व्यवस्था यहीं करनी होगी”।
नागराजन एक समझदार छात्र नेता के रूप में जाना जाता था । उसने नए खिलाड़ियों की अवश आवेशित कामावेग की नाजुकता को समझ कर दाल-भात में मूसल चन्द बनते हुए कृष्णा को शांथा से अलग किया और कृष्णा को आलिंगनबद्ध कर चुम्बन करने लगा । इस बीच भीड़ में से एक अनजान युवक ने आगे बढ़कर शांथा को थाम लिया और आलिंगनबद्ध हो चुम्बनालीन हो गया । कृष्णा ने देखा तो उसका रक्तचाप उबाल खाने लगा । उसने नागराजन से स्वयं को मुक्त किया और लपककर अनजान युवक के आलिंगन से शांथा को भी किसी तरह मुक्त करवाया ।
कृष्णा और शांथा को लगा कि वे एक जाल में फंस चुके हैं जिससे अब तुरंत निकलना होगा । वे दोनों बदहवास हो वहाँ से निकलना ही चाहते थे कि तभी भीड़ में से निकलकर सामंथा ने शांथा को अपनी बाहों में बुरी तरह जकड़ कर अधरपान करना प्रारम्भ कर दिया । शीघ्र ही शांथा ने अनुभव किया कि यह अधरपान कम अधरकर्तन अधिक था । वह छटपटाई तो विकल कृष्णा ने सामंथा के सुन्दर कपोल पर एक प्रहार किया । नागराजन को फिर सामने आना पड़ा, उसने सामंथा को अपनी ओर खींचकर चूसना शुरू कर दिया । शांथा को मुक्ति मिली किंतु अब तक वह लस्त हो चुकी थी । कृष्णा के सुषुप्त ग्राम्यसंस्कार अचानक भड़भड़ा कर जाग चुके थे, उसे लगा कि आधुनिकता के चक्कर में उसने अपनी शांथा को स्वयं ही दुःशासनों के हाथों में सौंप दिया था । ग्लानि और अपराधबोध से ग्रस्त कृष्णा को उसकी शांथा लुटी-लुटी सी लगने लगी । वह किसी तरह शांथा का हाथ पकड़कर वहाँ से निकल भागने में कामयाब हो गया ।

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समलैंगिकों और कामकुंठितों के लिए फ़्री थिंकर्स का ‘किस ऑफ़ लव’ आन्दोलन एक सुअवसर के रूप में सामने आया, उन्होंने आन्दोलन को सफल बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया । सोशल साइट मुख पोथीपर प्रारम्भ किए गए मुक्तकामप्रदर्शन आन्दोलन किस ऑफ़ लवके साथ लाखों लोग जुड़ चुके थे । उत्साहित फ़्री थिंकर्स ने दो नवम्बर 2014 को कोच्चि के मरीन ड्राइव पर प्रेम-प्रदर्शन का आयोजन किया । युवक-युवतियों के मरीन ड्राइव पर प्रेमालिंगनबद्ध चुम्बन प्रदर्शन को रोकने के लिए कई धार्मिक और राजनैतिक संस्थाओं के लोग एकत्र हुए ।
प्रेमालिंगनबद्ध चुम्बन के दीवाने मुक्त-चिंतकों ने दो नवम्बर 2014 को कोचीन के एर्णाकुलम लॉ कॉलेज से एक पदयात्रा प्रारम्भ की जो मरीन ड्राइव पर एक हंगामे और पुलिस द्वारा छात्र-छात्राओं की ग़िरफ़्तारी के साथ समाप्त हुयी । एर्णाकुलम में हल्ला हो गया कि इस पदयात्रा में सम्मिलित लोगों के साथ शिवसेना, बजरंगदल आदि हिन्दू संगठनों के लोगों ने मारपीट की है ।
कोच्चि में दो नवम्बर 2014 को हुयी घटना के बाद एकजुटता दिखाते हुये जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र-छात्रायें और कुछ परमादरणीय गुरुजन शाम साढ़े चार बजे गंगा ढाबा पर एकत्र हुए । मोरल पुलिसिंग के विरुद्ध नारे लगाते हुए अपने प्रचण्ड तर्क में एक प्रोफ़ेसर साहब ने घोषणा की – “...प्रेमालिंगन और चुम्बन वैदिक परम्परा है और खजुराहो के मन्दिरों में भी उत्खचित है इसलिए यह उनका मौलिक अधिकार है जिसे किसी भी स्थिति में प्रतिबन्धित नहीं किया जा सकता” । गुरु जी की इस मौलिक घोषणा के पश्चात् गंगा ढाबा एक तीर्थ स्थल की तरह पवित्र हो गया ।
दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मुक्त-चिंतकों ने ‘प्रेमलसित चुम्बन’ का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जिससे उत्साहित हो कर कोच्चि में भी प्रेम के मुक्त प्रदर्शन को मौलिक अधिकार मानते हुए आन्दोलन किया गया । फिर तो जैसे ‘प्रेमलसित चुम्बनान्दोलनम्’ की भारत भर में बाढ़ सी आ गई । हिन्दू संगठनों की मोरल पुलिसिंग के विरुद्ध पाँच नवम्बर 2014 को जादवपुर विवि कोलकाता के छात्रों ने ‘किस ऑफ़ लव’ का सार्वजनिक प्रदर्शन किया । इस प्रदर्शन का एक तात्कालिक लाभ तो अम्बर और नित्या चटर्जी को उसी दिन प्राप्त हो गया ।
जो नित्या विवाह की देहरी के बहाने अभी तक अम्बर को अपने होठों के पास नहीं फ़टकने देती थी, वही अब सार्वजनिकरूप से अम्बर को अधरपान के लिए मना नहीं कर सकी । ‘गंवारू लड़की’ के ठप्पे से बचने के लिए ऐसा करना अत्यावश्यक था । अधरपान के सार्वजनिक प्रदर्शन के तत्काल पश्चात् नित्या एक ‘आदर्श शहरी लड़की’ बन जाने के आत्मविश्वास से भर गई । इन गौरवपूर्ण क्षणों में उसके छलकते हुए आत्मविश्वास को उसके छोटे भाई नीलांजन ने भी अनुभव किया । उसे अपनी बहन से ईर्ष्या हुई, काश ! आज उसके बन्द भाग्य को भी खोलने वाली कोई मिल गई होती ।
उस दिन नीलांजन को अकेले ही घर जाना पड़ा । नित्या उसके साथ नहीं गई जिससे नीलांजन को बहुत बुरा लग रहा था किंतु गंवारूपन और पिछड़ेपन से मुक्त होने के लिए आधुनिक सभ्यता की यह एक अनिवार्य शर्त थी जिसे पूरा करने के लिए अपनी कुंवारी दीदी को उसके मित्र के साथ रात्रिचर्या के लिए जाती हुई देखना और मन मसोस कर रह जाना आवश्यक था ।
उस रात अम्बर और नित्या ने यौनसुख की वर्जनाओं को तोड़-मरोड़ कर नाली में फेंक दिया था । अब वे दकियानूस भारतीय मनुवाद से मुक्त हो स्वयं को पूरी तरह किसी योरोपीय प्रेमीयुगल की तरह अनुभव करने लगे थे । उनका जीवन धन्य हो चुका था जबकि नीलांजन का जीवन धन्य होना अभी शेष था ।      
पाँच नवम्बर 2014 रविवार शाम साढ़े पाँच बजे आई.आई. टी. मुम्बई के छात्र-छात्राओं एवं उनके प्राध्यापकों ने किसिंग डेका आह्वान किया । इस अवसर पर इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डॉक्टरल अध्येता उदीप्ता चटर्जी ने अपने प्रवचन में कहा “आधुनिक दुनिया में प्रेम और उसके प्रदर्शन के अधिकार पर नैतिक प्रतिबन्ध को स्वीकार नहीं किया जा सकता । सार्वजनिक स्थलों पर प्रेम-प्रदर्शन भारत में अपराध नहीं माना जाता
मुम्बई की ‘लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल, ट्रांसजेण्डर एवं क्वीर कम्युनिटी’ के लिए काम करने वाली साथीनामक संस्था के सहयोग से इंजीनियरिंग कॉलेज के ‘प्रोग्रेसिव एण्ड डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स’ ने ‘किसिंग डे’ नामक आनन्दोत्सव के प्रदर्शन का आयोजन किया । उच्चशिक्षा उपाधिधारी छात्र राहुल मगंती से एक पत्रकार ने पूछा –“यौनोत्सर्जित प्रेम तो नितांत व्यक्तिगत आचरण है, इसके सार्वजनिक प्रदर्शन की आवश्यकता क्यों है”?
राहुल मगंती ने लाल सलाम वाले अंदाज़ में उत्तर दिया – “किसी युगल को पार्क या किसी सार्वजनिक स्थान में प्रेम करने से रोकना ‘लव एण्ड सेक्सुअलिटी’ के अधिकार के विरुद्ध है । यह एक तरह का मोरल फ़ासिज़्महै जिसके विरोध के लिए ‘हग एण्ड किस’ का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जाना आवश्यक है”।   
आन्दोलन अपने उफान पर था... साथ ही मुक्तयौनाकांक्षी भी आर-पार की लड़ाई के मूड में आ गए । एर्णाकुलम महाराजा कॉलेज में सात नवम्बर 2014 को हग ऑफ़ लवआन्दोलन किया गया जिस पर कार्यवाही करते हुए कॉलेज प्रशासन ने दस आन्दोलनकारी विद्यार्थियों को दस दिन के लिए शैक्षणिक सत्र से वंचित कर दिया । इससे उत्तेजित होकर सात दिसम्बर 2014 को कोज्झिकोडे बस स्टैण्ड पर युवक-युवतियों द्वारा ‘किस इन द स्ट्रीट्स’ का प्रदर्शन किया गया ।  बस स्टैण्ड पर अपरान्ह दो बजकर पैंतालीस मिनट पर लगभग दस लोगों का पहला जत्था सामने आया जिसमें तीन लड़कियाँ थीं, उसके बाद युवक-युवतियाँ छोटे-छोटे समूहों में सड़क पर आते गये, उन्होंने प्रदर्शन किए और नुक्कड़ नाटक भी । शिवसेना, हनुमान सेना और बजरंगदल के लोगों ने उन्हें रोकना चाहा परिणामतः पुलिस ने दोनों पक्षों के लोगों को ग़िरफ़्तार किया । ग़िरफ़्तार क्रांतिकारियों ने पुलिस वैन में ले जाए जाते समय भी चुम्बनालीन हो प्रदर्शन किया और फिर हवालात में भी लिपलॉक करते रहे जिससे पुलिस के सामने एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई जो अप्रिय तो थी किंतु उससे मुक्ति का उनके पास कोई उपाय नहीं था ।   
यह एक ऐसा आन्दोलन था जो छात्र-छात्राओं एवं राजनैतिक-धार्मिक संस्थाओं के बीच उच्छ्रंखल प्रेमाभिव्यक्ति एवं नैतिक मर्यादाओं के मध्य छेड़ा गया था । आधुनिक शिक्षित युवा पीढ़ी नैतिक सिद्धांतों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी । उच्छ्रंखल प्रेम प्रदर्शन को रोकने के लिए किए जाने वाले प्रयासों में नैतिक शुचिता का अभाव स्पष्ट दिखायी दे रहा था । दोनों ही पक्ष आक्रोशित थे, उनके आचरण में विवेक और संयम का अभाव देखा जा सकता था । वे प्रदर्शनकारियों को उनके जैसे मुक्त आचरण के लिए अपनी बहनें उनके हवाले कर देने के लिए कहने लगे ।  विरोध प्रदर्शन के प्रतिविरोधी पक्ष से जब आक्रोश में ‘सेंड योर सिस्टर्स टु किस अस’ के नारे लगाए जाने लगे तो उनके अपने ही नैतिक सिद्धांत छिन्न-भिन्न हो गए । फ़्री थिंकर्स को प्रत्याक्रमण का अवसर मिला और उन्होंने पूछना शुरू किया कि क्या बहनें अपने भाइयों की सम्पत्ति होती हैं जिन्हें किसी को भी स्तेमाल के लिए सौंप दिया जाना चाहिए ?
एक राजनेता ने वक्तव्य दिया – “प्रेम-प्रदर्शन को कुचलने के पीछे राजनीतिक उद्देश्य छिपे हैं । ये लोग भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं । उन्होंने हिन्दू धर्म को ही राष्ट्रीयता घोषित कर दिया है । किस ऑफ़ लव प्रदर्शन के दौरान ऐसे ही विरोधियों द्वारा अमर्यादित आचरण किया जा रहा है । वे प्रदर्शनकारी लड़कियों को स्लट्स मानते हैं और पुरुष प्रदर्शनकारियों को अपनी बहनों को उनके पास भेजने के लिए कहते हैं”।
फ़्री थिंकर्स के मुक्त-चिंतन के समर्थन एवं मोरल पुलिसिंग के विरोध में हैदराबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, पांडिचेरी विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय और प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय कोलकाता के साथ-साथ इण्डियन इंस्टीच्यूट ऑफ़ साइंस-एजूकेशन एण्ड रिसर्च कोलकाता, आई.आई.टी. मद्रास एवं मुम्बई ने भी पाँच नवम्बर 2014 को विरोध प्रदर्शन किया । 2014 में छेड़े गए ‘किस ऑफ़ लव’ को पहले तो आन्दोलन और फिर बाद में उत्सव के रूप में मोरल पुलिसिंग के विरुद्ध सामाजिक युद्ध के एक प्रतीक रूप में पूरे भारत में अपनाया गया ।    
आठ नवम्बर 2014 को दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं की अगुआई में दिल्ली विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली एवं राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं द्वारा झण्डेवालान स्थित राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ कार्यालय के सामने आलिंगन-चुम्बन के साथ ‘रिवोल्यूशन फ़ॉर राइट ऑफ़ किसिंग एण्ड हगिंग’ का प्रदर्शन किया । हिन्दू सेना के सदस्यों ने इस मुक्त-काम-प्रदर्शन का विरोध किया जो तुरंत हिंसा में बदल गया । भारत के गंवार लोगों के प्राचीन जीवनमूल्यों के संरक्षक ठेकेदार प्रेम को ‘करने’ तक सीमित रखने के लिए हिंसा पर उतारू थे जबकि आधुनिक भारत के सभ्य युवा प्रेम करने को ‘प्रदर्शन’ की सीमा तक ले जाने के लिए सड़क पर कामक्रीड़ाओं का स्थान-स्थान पर आयोजन करने के लिए कटिबद्ध हो चुके थे ।
कोज्झिकोडे के लॉ कॉलेज के छात्रों द्वारा दस दिसम्बर 2014 को हग ऑफ़ लवऔर थिरुवनंतपुरम में तेरह दिसम्बर 2014 को किस ऑफ़ लवअगेंस्ट मोरल फ़ासिज़्म जैसे प्रतिक्रियात्मक आन्दोलन किए गए ।
 भारत के फ़्री थिंकर्स किस ऑफ़ लवके बाद हग ऑफ़ लवसे होते हुए किस इन द स्ट्रीट्सतक पहुँच गए । इस बीच दिल्ली उच्चन्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने भी रात्रिकालीन वैयक्तिक आचरण के सार्वजनिक प्रदर्शन को आपराधिक कृत्य स्वीकार करने से इंकार कर दिया जिससे फ़्री थिंकर्स सम्प्रदाय में हर्ष एवं उत्साह की लहर दौड़ गई । जिस दिन यह ऑर्डर पास हुआ उस दिन हिन्दी की प्रोफ़ेसर राधा खोब्रागढ़े अपनी लिस्बियन मित्र वृंदा बनर्जी के साथ खजुराहो प्रवास पर थीं । ख़बर मिलने के बाद वे दोनों ख़ुशी से झूम उठीं, उन्होंने चियर्स किया और फिर कमरे का दरवाज़ा बन्द करके सिक्स्टी नाइन हो गईं ।

सॉफ़्ट वेयर इंजीनियर राहुल पाशुपलन एवं उनकी पत्नी रश्मि नायर ने 2015 में ‘किस ऑफ़ लव’ आन्दोलन को और आगे बढ़ाया । वे सार्वजनिक स्थलों पर प्रेम प्रदर्शन को अपना मौलिक अधिकार और इस पर लगाए जाने वाले प्रतिबन्ध को ‘मोरल फ़ासिज़्म’ मानते थे ।
एक दिन केरल के लोगों को स्थानीय समाचार पत्रों से ज्ञात हुआ कि एक सेक्स रैकेट संचालित करने वाले जिन दो लोगों को पुलिस ने गिरफ़्तार किया है वे कोई और नहीं बल्कि ‘किस ऑफ़ लव’ के आयोजक रश्मि पाशुपलन और रश्मि नायर ही हैं । इस प्रेम दिवाने युगल को पन्द्रह माह तक जेल में रहना पड़ा । बाद में राहुल एक फ़िल्म निर्माता बन गए ।  
अपसंस्कृति को संस्कृति स्वीकार कर चुके लोग अपने पक्ष में कुतर्कों को आकर्षक शब्दों से अलंकृत कर भारी भरकम बनाने का प्रयास करने लगे । कार्ल मार्क्स और शॉपेनहॉर के सम्प्रदायविहीन दर्शन से अनुप्राणित भारत के शिक्षित लोगों के एक वर्ग की मुक्तविचारधारा अब तक एक सुस्थापित सम्प्रदाय का रूप धारण कर चुकी थी । मुक्तयौन संबन्धों और वैश्यावृत्ति के बीच केवल मुद्रा विनिमय को ही विभाजक और नैतिक रेखा स्वीकार कर लिया गया । भारत का एक बड़ा वर्ग इस परिवर्तन में भारत को आधुनिक होता हुआ देखने लगा ।
बंगाल की इतिहासकार चारु गुप्ता संस्कृति को गतिशील मानती हैं, उनके अनुसार – “संस्कृति कोई स्थायी तत्व नहीं है, यह समाज की आर्थिक और सामाजिक जीवनशैली के अनुरूप निरंतर परिवर्तित होती रहती है
गाँव के पढ़े-लिखे किंतु पुरानी विचारधारा में विश्वास रखने वाले गंवारू प्रोफ़ेसर गौरीशंकर त्रिपाठी को सभ्य इतिहासकार चारु गुप्ता के विचार समझ में नहीं आ सके । उन्होंने अपने से दो साल बड़े सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर शंभूनाथ मिश्र से पूछा – “का हो मिसिर जी ! ई चारु गुप्ता का कह रही हैं ? संस्कृति के अनुरूप जीवनशैली होती है कि जीवनशैली के अनुरूप संस्कृति होती है”?
मिश्र जी ने नेत्र बन्द किए, कुछ क्षण समाधिस्थ से हुए फिर धीरे-धीरे बोले – “संस्कृति हमारे विचारों और आचरण का वह परिमार्जित स्वरूप है जो अपने मूल्यों के कारण प्रशंसित और अनुकरणीय है । संस्कृति निरंतर ऊर्ध्वगामी होती है, इस दृष्टि से यह स्थायी तत्व नहीं है किंतु यदि जीवनमूल्यों में क्षरण होता है तो उसे संस्कृति नहीं अपसंस्कृति कहा जायेगा । आर्थिक और सामाजिक जीवनशैली जब संस्कृति को प्रभावित करने लगे तो फिर वह संस्कृति नहीं रह जाती बल्कि अपसंस्कृति हो जाती है । संस्कृति से जीवनशैली नियंत्रित होती है, जीवनशैली से संस्कृति के नियंत्रण और परिमार्जन का प्रश्न ही नहीं उठता”।
दोनों वृद्ध विप्रों को आधुनिक भारत के युवाओं की अधोगामी चिंतन दिशा से दुःख हुआ । वे दोनों गहन सोच में डूब गए ।

अम्बर को सैन फ़्रांसिस्को में नौकरी मिल गई, नित्या के प्रति उसके आकर्षण का ज्वार उतर चुका था । वहाँ जाकर उसने एक कनाडियन व्यापारी की बेटी से विवाह कर लिया ।  
अम्बर के सैन फ़्रांसिस्को जाने के एक महीने बाद ही परित्यक्त कुमारी नित्या चटर्जी ने एक ख़ूबसूरत बच्ची को जन्म दिया । आँखों से गंगा-जमुना बहाती नित्या ने बच्ची का नाम रखा – “संस्कृति” ।