रविवार, 26 जून 2022

पारिस्थितिकी हार रही है

         पर्यावरण और पारिस्थितिकी जैसे शब्द बौद्धिकभाषणों और पाठ्यक्रमों से निकलकर जब तक बाहर आएँगे तब तक सब कुछ बदल चुका होगा। विद्यार्थी इस विषय के प्रति गम्भीर नहीं हो पाते, वे केवल परीक्षा उत्तीर्ण भर करना चाहते हैं।

कुलाँचे भरती कौतुकीसभ्यता और संसाधनों की छीना झपटी के लिए होने वाले युद्धों ने पारिस्थितिकी को सर्वाधिक क्षतिग्रस्त किया है। चीन और अमेरिका जैसे “सभ्य माने जाने वाले असभ्य देश” पर्यावरण को प्रदूषित करने वालों में सबसे आगे हैं। इस दौड़ में भारत भी पीछे नहीं है। सिक्किम को छोड़ दें तो भारत का कोई भी प्रांत स्वच्छता के प्रति न तो जागरूक हुआ है और न गम्भीर। उत्तर के हिमांचल, उत्तराखण्ड और पञ्जाब तथा पूर्व के बंगाल, असम और मेघालय जैसे प्राकृतिकदृष्टि से रमणीय प्रांतों में भी स्वच्छता के प्रति उदासीनता कष्टदायी है। वह बात अलग है कि पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक बनावट कचरे को छिपाने का भरपूर प्रयास करती है।

मैदानी क्षेत्र के नगरों और महानगरों में साफ-सफाई के भरपूर नारों और गीतों के बीच अट्टहास करते कचरों के ढेर आज भी दिखायी देते हैं। कचरे के ढेरों को ढँक देने या स्थानांतरित कर देने से कचरा समाप्त नहीं हो जाता। मेरा आशय कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण और पुनर्नवीनीकरण से है। जो लोग कचरे को आज भी नदियों के किनारे फेक रहे हैं या जला रहे हैं वे सारी योजनाओं और आदेशों को धता बताते हुये अपना व्यापार या नौकरी भर कर रहे हैं जिसके तरीके और मानक स्वयं उनके द्वारा तैयार किए जाते हैं। कस्बों से लेकर नगरों तक मांसविक्रेता जैव अपशिष्ट को कैसे नष्ट करते हैं, इसकी वास्तविकता को देखा जा सकता है। चिकित्सालयों में भी रंग-बिरंगे कचरे के डिब्बों की तब तक कोई सार्थकता नहीं है जब तक कि जैव-चिकित्सा अपशिष्टों को वैज्ञानिक तरीके से नष्ट नहीं किया जाता। यदि सारा अपशिष्ट अंततः कचरे की गाड़ी में ही डाल देना है तो कचरों के इस दिखावटी सेग्रीगेशन से कौन सा उद्देश्य पूरा होने वाला है!

सरकारी आदेशों के अनुसार चिकित्सालयों के लिए जैवचिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन अनिवार्य है। चिकित्सालयों द्वारा सरकार को जैव अपशिष्ट प्रबंधन की जानकारी दी जाती है, किंतु यह बिल्कुल आवश्यक नहीं है कि सारी जानकारी सही ही हो। जैव-अपशिष्ट प्रबंधन एक ऐसा उपक्रम है जिसके लिए ईमानदारी से रिपोर्टिंग करके कोई अपनी नौकरी से हाथ नहीं धोना चाहता। जब नौकरी का एकमात्र उद्देश्य वेतन लेना हो और सत्य जब संकट को आमंत्रित करने वाला हो जाय तो झूठ के साम्राज्य को कोई चुनौती नहीं दे सकता।

गुरुवार, 23 जून 2022

सांस्कृतिक पाखण्ड

         धर्मनिरपेक्षता के पाखण्ड के बाद से जिन दो शब्दों को धूर्ततापूर्ण तरीके से भारतीय जनमानस के सामने परोसा जाता रहा है वे हैं “विविधता” और “साझीसंस्कृति”। इन शब्दों का भारतीय सनातन संस्कृति पर आक्रमण के लिए धूर्ततापूर्वक प्रयोग किया जाता रहा और हम सब दुष्टतापूर्वक की जाती रही विकृत व्याख्याओं को सुन-सुन कर आत्ममुग्ध होते रहे।

हमने न कभी “विविधता में एकता” को समझने का प्रयास किया और न “साझीसंस्कृति” को, किंतु यह प्रयास यदि अभी भी न किया गया तो भारत अगले कुछ ही दशकों में ईरान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, तुर्की और स्पेन आदि देशों की श्रेणी में खड़ा दिखायी देगा।

जब हम विविधता में एकता की बात करते हैं तो उसमें भारतीय उपमहाद्वीप की जीवनशैलियों और सांस्कृतिक तत्वों का ही समावेश किया जा सकना सम्भव है। इस विविधता में विदेशी जीवनशैली और सांस्कृतिक तत्वों का समावेश पूरी तरह अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक है। हम भारत में अलास्का या कनाडा की जीवनशैली का घालमेल नहीं कर सकते, उनके सांस्कृतिक मूल्यों और लोकपरम्पराओं का घालमेल नहीं कर सकते। किसी भी देश की जीवनशैली, लोकरीतियों और सांस्कृतिक विकास का धरातल वहाँ की भौगोलिक स्थितियों और पारिस्थितिकी से प्रभावित होता है। भारत में अलास्का या अरब को थोप कर विविधता में एकता का राग अलापना नितांत अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक है। प्रकृति की आवश्यकता यदि एकता वाली होती तो विविधता होती ही क्यों!

परस्पर विपरीत आदर्शों एवं आचरणों वाली जीवनशैली का घालमेल कैसे किया जा सकता है? मनुष्य और राक्षस की, देवता और दैत्य की या सुर और असुर की संस्कृतियाँ साझा नहीं हो सकतीं। यदि इन संस्कृतियों का साझा विकास हुआ होता तो इनमें टकराव और भिन्नताएँ होती ही क्यों!

हर देश और समाज की अपनी सांस्कृतिक विशेषता होती है, उसका विकास स्वतंत्ररूप से अपने उपादानों और तरीकों से होता है। कोई भी संस्कृति साझा हो ही नहीं सकती। हाँ! हम कुछ चीजों को अपनाते हैं, जो हमारी नहीं होतीं, किंतु इस तरह का समावेश ठीक वैसा ही नहीं होता, हम अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उनमें कुछ न कुछ रूपांतरण करते हैं। पूरी धरती पर ऐसा ही होता है। सभी देशों के लोग एक ही तरह से रोटी नहीं पकाते, एक ही तरह से नृत्य नहीं करते, एक ही तरह की भाषा का उपयोग नहीं करते, एक ही तरह की वेश-भूषा धारण नहीं करते,,,। बहुत कुछ है जो “एक सा नहीं” होता, यह “एक सा न होना” ही उस देश की सांस्कृतिक विशेषता है। हम दूरदेशीय किन्हीं दो सांस्कृतिक विशेषताओं का घालमेल कर ही नहीं सकते, जो किया जाता है वह बलपूर्वक होता है और उसे स्थानापन्न किया जाना कहते हैं। एक संस्कृति की हत्या कर दूसरी संस्कृति को स्थापित किया जाता है, यही होता है। जब तक यह पूरी तरह नहीं हो जाता तब तक हिंसा और संघर्ष होते रहते हैं। पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान के आंतरिक हिंसक संघर्ष हमारे सामने हैं।   

शिवसेना के भगवान

             दिनांक 22 जून 2022, दिन बुधवार को एक टीवी चैनल के एंकर ने भारत को एक नया भगवान प्रदान किया, भारत की जनता धन्य हुयी। एंकर जी ने घोषणा करते हुये बताया कि “शिवसेना के भगवान मुख्यमंत्री निवास “वर्षा” से निकल कर प्रस्थान कर चुके हैं और अब कुछ ही देर में “मातोश्री” पहुँचने ही वाले हैं, मातोश्री जो कि शिवसेना का मंदिर है, वहाँ शिवसैनिकों की भीड़ पहले से ही उनके स्वागत के लिए एकत्र हो चुकी है। शिवसेना के भगवान अब मुख्यमंत्री निवास में नहीं बल्कि अपने मंदिर में रहेंगे”।  

            मैं अचम्भित हूँ, टीवी चैनल्स के एकंर्स दासत्व के ऐसे भाव और कलमतोड़ महिमामण्डन के शब्द कहाँ से लेकर आते हैं! मैं इसे धूर्तता और लोकतांत्रिक अराजकता कहना चाहता हूँ जो वंशवाद को स्थापित करने के लिए उर्वरक तत्व हैं।

भारतीय लोग भगवान के बिना अपने आपको पंगु क्यों पाते हैं! यह एक ऐसी रुग्णता है जो हमारे अंदर के दासत्व को प्रक्षेपित करती है। हम किसी को महिमामंडित करते समय सारी मर्यादाएँ लाँघ जाते हैं। पहले हमने सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान बनाया और अब उद्धव ठाकरे को शिवसेना का भगवान बना दिया है।

विख्यात रंगनिर्देशक पद्मश्री बंसी कौल कहा करते थे कि “हमारे देश में व्यक्तियों को संस्थाओं की तुलना में बहुत महत्व दिया जाता है। इससे संस्थाओं के विकास का रास्ता अवरुद्ध हो गया है। व्यक्ति की आयु सीमित होती है किंतु संस्था अमर होती है”।

जब हम व्यक्ति को महत्व देना प्रारम्भ कर देते हैं तो संस्था नेपथ्य में धकेल दी जाती है जहाँ कालांतर में उसकी मृत्यु हो जाती है। व्यक्तिपूजा उन प्रतिभाओं की भी निर्मम हत्या कर देती है जो बौद्धिक पूँजी के रूप में कभी चिन्हित तक नहीं हो पाती और जिसके कारण समाज एवं देश को बौद्धिक सम्पदाओं से वंचित होना पड़ता है।  

विकासोन्मुखी देश के लिए आवश्यक राजनीति को रुग्ण करना हो और सभ्यता के लिए आवश्यक कला को निर्जीव करना हो तो दासत्वभाव के साथ व्यक्तिपूजा प्रारम्भ कर दीजिए। किसी समाज पर धूर्ततापूर्वक किए जाने वाले वैचारिक आक्रमण की इन चालों को समझना होगा।

हमने जिसे भी भगवान बनाया वे सब विवादास्पद हो गये, उनकी महानता पर प्रश्नचिन्ह लगने लगे। यदि हमने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और योगीराज श्रीकृष्ण को भगवान न बनाया होता तो आज वे विवादस्पद न बना दिए गये होते, लोग उन पर आधारहीन आरोप नहीं लगाते, उनके अस्तित्व को काल्पनिक नहीं मानते, उनके जन्मस्थानों पर मुकदमें नहीं हुए होते और आज उन्हें लेकर उनकी इतनी दुर्दशा न हुयी होती।

किसी भी व्यक्ति की महानता उसकी मृत्यु के बाद एक ब्लैंक चेक होती है जिसे भुनाने के लिए की जाने वाली छीना-झपटी उस महान व्यक्ति को केवल अपमानित ही करती है। सद्विचार अमर होते हैं, व्यक्ति नहीं। भारतीय महर्षि अपने नाम को नहीं, विचारों को प्रमुखता देते रहे, इसीलिए वेद अपौरुषेय हैं।  

बुधवार, 22 जून 2022

देवों का नाश हो

             चीन और अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों के देवों ने असुरों को वरदान में महाविध्वंसकारी अस्त्र-शस्त्र दे दिये हैं। वे असुर तो थे ही अब दैत्य भी बन गये हैं। पात्रता का विचार किए बिना किसी को भी संहारक शक्तियाँ प्रदान करने वाले देवों का नाश हो!

हमने उन्हें रोटी दी, उन्होंने उसका मूल्य हमें धमकी देकर चुका दिया। हमने उन्हें गुरुद्वारे में इबादत का आमंत्रण दिया, उन्हें बिरियानी खिलायी, बदले में उन्होंने हमारे गुरुद्वारे को ही बम से उड़ा दिया।

हमें उनकी ज़िंदगी की बहुत परवाह है, वदले में हम सब मरने के लिए तैयार हैं।

मृत लोगों का देश

मनुष्यों की बायोलॉजिकल या सेलुलर डेथ से पूर्व भी कई प्रकार की मृत्यु होती है जिनके बारे में प्रायः कोई चर्चा नहीं होती। कुछ लोग नैतिक और सामाजिक मृत्यु की बात करते हैं जिसे कोई सुनना भी नहीं चाहता। आज उन मौतों की चर्चा आवश्यक हो गयी है जिनसे भारत सहित दुनिया के कई देश प्रभावित हो चुके हैं।

छोटे-मोटे अपराध करने वाला व्यक्ति विपन्न और अल्पशिक्षित हो सकता है किंतु बहुत गम्भीर और बड़े-बड़े अपराध करने वाले लोगों को प्रायः उच्चशिक्षित और सम्पन्न पाया गया है। मनुष्यता की स्थापना में बड़ी-बड़ी शैक्षणिक उपाधियों और बड़े-बड़े पदों की भूमिका हो सकती है, किंतु है नहीं, क्योंकि वे जीवन भर मनुष्य नहीं हो पाते।

किसी देश की आम जनता जब बहुत बड़े-बड़े लोगों को वैचारिक और सांस्कृतिक दृष्टि से मृत पाती है तो शनैः शनैः वह देश भी मृत होने लगता है। दुनिया के कई देश मृत लोगों के देश बन चुके हैं, जिनमें भारत सबसे आगे है।

भारत एक ऐसा देश बन चुका है जो भारत में भारत को खोज रहा है, …जो हर रोगी को स्टीरॉयड्स खिलाने के हठ पर अड़ा है, …जो हर पर्वत को नदी और हर नदी को पर्वत बना देने की कार्ययोजनाओं में व्यस्त है, …जो विकास के लिए देश के प्रत्येक नागरिक को कलेक्टर बना देना चाहता है, …जो गंगा को जमुना और जमुना को गंगा बना देना चाहता है, …जो गुलाब को बेसरम का फूल और बेसरम के फूल को गुलाब का फूल बना देने के शोधकार्यों में लगा हुआ है।

            खारे और मीठे जल वाले सागरों को एक में नहीं मिलाया जा सकता। कुछ असभ्य, अतार्किक, अवैज्ञानिक, असामाजिक और हठी लोगों ने हठ करके केले के पास ही बबूल को भी रोप दिया है। तनिक सी हवा के चलते ही बबूल के काँटे केले के पत्तों को तार-तार कर देते हैं। हठीले लोगों ने भारत के विकास के लिए हिरणों के जंगल में ही भूखे शेरों को भी छोड़ दिया है, वे इसे शेरों का मौलिक अधिकार कहते हैं।

भारत में चारो ओर बबूल के जंगल बड़ी तीव्रता से बढ़ते जा रहे हैं और केले के पत्तों ने तार-तार होकर भी मौन रहना सीख लिया है।

सोमवार, 20 जून 2022

मानवता के लिए योग

         योगेन चित्तस्य पदेन वाचा मलं शरीरस्य च वैद्यकेन। 

योऽपा करोत्तम प्रवरं मुनीनाम् पतञ्जलिं प्राञ्जलिरान तोऽस्मि॥

 इस शताब्दी का आठवाँ विश्वयोगदिवस मनाया जा रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध अभी तक समाप्त नहीं हुआ है, चीन-ताइवान युद्ध और भारत-पाकिस्तान युद्ध की भूमिकाएँ रची जाने लगी हैं। सृजन से अधिक विनाश के उपकरणों का निर्माण किया जा रहा है। नित नये महाविध्वंसक आयुधों का निर्माण हो रहा है।

भारत में निरंकुश हो चुकी अराजकता गृहयुद्ध जैसी स्थितियाँ निर्मित करने में लगी है। आये दिन हिंसा हो रही है। परिश्रम से अर्जित सम्पत्तियों को नष्ट किया जा रहा है। दशकों से बनायी जाती रही नस्लीय और साम्प्रदायिक विनाश की नींव अब हर किसी को स्पष्ट दिखायी देने लगी है। चारो ओर असंतोष, आक्रोश और विरोध की आग है, समाधान के प्रयास कहीं दिखायी नहीं देते, शायद किसी को उसकी आवश्यकता भी नहीं है।

मानवता की भी बात की जाती है जो कागजों और भाषणों में बंदी हो चुकी है। आये दिन होने वाली छुटपुट हिंसाओं और युद्ध में न जाने कितने लोगों की हत्याएँ हो रही हैं, इसी बीच विश्वयोगदिवस भी मनाया जा रहा है। शायद यूक्रेन में हो रहे युद्ध के बीच दोनों पक्षों के सैनिक भी सुबह-सुबह योग कर रहे होंगे। योग तो पाकिस्तान और चीन में भी किया जाने लगा है जहाँ मानवता को रौंदते हुये विस्तारवाद की ही पूजा की जाती है। हम सब ऐसे ही विरोधाभासों के बीच मुस्कराने के लिए बाध्य हैं।

कुछ लोग पूछते हैं योग तो रोज करता हूँ, लाभ क्यों नहीं हो रहा? यही प्रश्न महर्षि पतञ्जलि से पूछा जाता तो वे बताते कि हमने तो अष्टाङ्ग योग के लिए कहा था आप तो केवल योगासन और प्राणायाम ही कर रहे हैं वह भी बीच में छलाँग लगाकर, यम और नियम की सीढ़ियों पर चढ़े बिना सीधे आसन और प्राणायाम! बीज बोये बिना खेत में बजूका लगाकर अच्छी फसल की आशा कर रहे हैं! परिणामस्वरूप यह सभ्यता योगासन और प्राणायाम करते हुये भी प्रतिपल महाविनाश की ओर बढ़ती जा रही है।

अभी तक स्वस्थ्य तन और स्वस्थ्य मन के लिए योग की बातें की जाती रही हैं। मधुमेह, कैंसर, हृदयरोग, एंज़ाइटी और पार्किंसोनिज़्म जैसी व्याधियों की चिकित्सा के लिए औषधियों के साथ-साथ योगासन और प्राणायाम का भी उपयोग किया जाने लगा है। अर्थात चिकित्सा के स्थूल उपायों के साथ-साथ सूक्ष्म उपायों का भी उपयोग किया जाने लगा है। किंतु इतना ही पर्याप्त नहीं है, समस्याएँ अभी भी हैं, जो विभिन्न रूपों में हमारे सामने आती जा रही हैं। जो सचमुच सुख और शांति चाहते हैं उन्हें एक बार फिर अष्टाङ्गयोग के विभिन्न अङ्गों के बारे में चिंतन-मनन की आवश्यकता है।

यदि समाज और प्रकृति अस्वस्थ है तो हम भी उसकी अस्वस्थता से प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकते। मानवता और विश्वबंधुत्व हमारी आवश्यकता है, शांति और प्रसन्नता हमारी आवश्यकता है, इसीलिए अष्टाङ्गयोग भी हमारी आवश्यकता है।

हम डार्क-वेव के युग में प्रवेश कर चुके हैं, भौतिकता बढ़ रही है पर वह स्थूल से सूक्ष्मतर होती जा रही है। फ़्री-रेडिकल्स शरीर में ही नहीं, समाज में भी हैं और उनका सामना करने के लिए उपलब्ध एण्टीऑक्सीडेन्ट्स पर्याप्त नहीं हैं। मानवता के लिए हमें समाज में पनपते फ़्री-रेडिकल्स को यम-नियम के द्वारा संतुलित करना होगा।   

शुक्रवार, 17 जून 2022

अग्निपथ

 "अग्निवीर का अग्निकाण्ड" लेख पर कई लोगों ने टिप्पणियाँ भेजी हैं। टीवी डिबेट्स में आने वाले विद्वानों की शैली में हम विमर्श नहीं कर सकेंगे। किसी सार्थक विमर्श को एक स्वस्थ्य एवं सकारात्मक वातावरण की अपेक्षा होती है जिसके लिए मर्यादा, अध्ययन और तर्क की आवश्यकता होती है। जिन लोगों ने विमर्श में गम्भीरता दिखायी है, उनका स्वागत है। जो प्रश्न प्रायः उठाये जा रहे हैं उनमें से विचारणीय हैं – 1-इस नौकरी को चार साल के लिए ही क्यों रखा गया, चार साल के बाद युवक क्या करेगा, चार साल तो प्रशिक्षण में ही निकल जाएँगे तो ऐसी नौकरी का क्या अर्थ? 2- सेना को प्रयोगशाला या मजाक का विषय क्यों बनाया जा रहा है? 3- चार साल के बाद पुनः बेरोजगार हुये युवक सेना की गोपनीयता को भंग कर सकते हैं या अपने सैन्य प्रशिक्षण का दुरुपयोग आतंकी गतिविधियों के लिए कर सकते हैं जिससे देश की सुरक्षा ख़तरे में आ सकती है।

 

किसी पद के लिए 25 स्थान रिक्त हैं किंतु प्रथम चरण में भर्ती 100 लोगों की कर ली जाती है, इस अपेक्षा के साथ कि इन एक सौ लोगों में श्रेष्ठता के लिए प्रतिस्पर्धा होगी तो सेना के लिए श्रेष्ठतम 25 लोगों का चयन चार साल बाद दूसरे चरण में किया जा सकेगा। अतिरिक्त 75 लोगों को घर वापस न भेजकर अन्य सेवाओं की तैयारी के लिये सेना में एक प्लेटफ़ॉर्म प्राप्त होगा जो सवैतनिक होगा। यह उनकी अतिरिक्त योग्यता होगी जो उन्हें विभिन्न क्षेत्रों की अन्य सेवाओं के चयन में प्राथमिकता दिलाने वाली होगी। इन 75 में से शायद ही कोई ऐसा होगा जो आगे भी बेरोजगार हो सकेगा। अंतिम विकल्प निजी व्यवसाय का है, जो हर किसी के लिए खुला है।

हाँ! दुनिया भर की सेनायें कई तरह के प्रयोग करती रहती हैं किंतु वे किसी रंगरूट को अपने प्रयोग का गिनी पिग नहीं बनातीं। चीन और पाकिस्तान अचानक आक्रमण करने के लिये जाने जाते हैं। और भारत की सेना को तो 1947 के बाद से लगभग प्रतिदिन ही युद्ध करना पड़ रहा है। जब शत्रु अपने चारो हो तो आने वाले समय के लिए पहले से तैयारी क्यों नहीं की जानी चाहिए? यह मजाक नहीं गम्भीरता है।

संवादहीनता का आरोप सही है, सरकार युवाओं को यह समझाने में असफल रही कि चार वर्षीय यह सेवा अंतिम नहीं है, वहीं युवकों ने भी योजना को समझने में गम्भीरता का परिचय न देकर, हिंसा और अराजकता का सहारा लेना अधिक उचित समझा। ऐसे युवकों को कोई सरकारी नौकरी क्यों मिलनी चाहिए?    

सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किंतु चार साल के बाद सेना से वापस से आये अतिरिक्त जवानों के आतंकी गतिविधियों में लिप्त होने की उतनी ही आशंकाएं हो सकती हैं जितनी कि सेना में कार्यरत या सेवानिवृत्त सैनिकों की। आशंकाओं को कारण बनाकर किसी बड़ी गतिविधि को रोका नहीं जा सकता। हमें सकारात्मक दिशा में सोचने की आवश्यकता है।

अग्निपथ

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम अभी तक जीवन में शिक्षा के महत्व का निर्धारण नहीं कर सके। इसे वैयक्तिक विकास के स्थान पर आजीविका का साधन मान लिया गया है। हम आस्तिक हैं, ईश्वर की सत्ता में विश्वास करते हैं, पूजा-पाठ करते हैं जिसके बदले में हमारी ईश्वर से अपेक्षा होती है कि वह हमारी सभी भौतिक ऐषणाओं का हमें मनोनुकूल परिणाम देगा। हमारी अपेक्षा पूरी नहीं होती तो हम ईश्वर के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगाने लगते हैं। आजीविका के लिए सरकारी नौकरी ही क्यों? निजी क्षेत्रों की नौकरियाँ भी हैं, निजी व्यवसाय भी हैं। उनके बार में क्यों नहीं सोचा जाना चाहिये? युवक सुंदर पिचाई क्यों नहीं बनना चाहते? समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलता है कि रेलवे में स्वीपर के पद के लिए इंजीनियर्स और पीएच.डी. वालों ने भी आवेदन भेजे हैं। हमें यह भी पढ़ने को मिलता है कि कोई इंजीयर लाखों के पैकेज को छोड़कर गन्ने का रस बेचने या डेयरी व्यवसाय के लिए भारत वापस आ गया है। इन दोनों घटनाओं में से हमारे लिए प्रेरक कौन सी होनी चाहिए?

 “उत्तम खेती मद्धम बान, निखिद चाकरी भीख निदान” को हम गुजरे जमाने की कहावत कहकर एक कोने में फेक सकते हैं किंतु यह विचार नहीं करना चाहते कि यह कहावत आज इतनी अव्यावहारिक हो गयी तो उसके कारण क्या हैं! मौर्यकाल में भारत की समृद्धि के क्या कारण थे!

सरकारी नौकरी में मेरी दुर्दशा देख-देख कर बड़े हुये मेरे बेटे ने प्रारम्भ से ही सरकारी नौकरी का लक्ष्य नहीं बनाया किंतु शिक्षा से मुँह भी नहीं मोड़ा। हमारे एक युवा साथी सरकारी नौकरी छोड़ने का मन बना चुके हैं। माना कि हर व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता किंतु हम केवल इतना ही बताना चाहते हैं कि सरकारी नौकरी ही जीवन नहीं है। हमारे देश की प्रतिभायें निजी क्षेत्रों की नौकरियों को प्राथमिकता क्यों देती हैं? और क्यों कुछ लोग पीएच.डी के बाद भी केवल सरकारी नौकरी ही करना चाहते हैं, भले ही वह स्वीपर की ही क्यों न हो?  

हमें माध्यम और लक्ष्य के भेद को समझना होगा। चार साल की सेवा लक्ष्य नहीं, माध्यम है। औपचारिक शिक्षा के कुछ न्यून पड़ावों पर भी नौकरी की जा सकती है फिर भी लोग उच्च पड़ावों की ओर आगे बढ़ते हैं। छात्रवृत्ति के लिए परिश्रम करने वाले सभी छात्रों को छात्रवृत्ति नहीं मिलती किंतु केवल इसीलिए अन्य छात्र पढ़ायी छोड़ नहीं देते। छात्रवृत्ति लक्ष्य नहीं प्रोत्साहन का तरीका है जिससे छात्रों में प्रतिस्पर्धा का भाव बढ़ता है और वे अपेक्षाकृत अच्छे परिणाम लाने के लिए प्रयत्नशील होते हैं। किसी प्रतियोगी परीक्षा में उत्तीर्ण हुए सभी लोगों को नौकरी नहीं मिल जाती, साक्षात्कार के लिए बुलाये जाने वाले अभ्यर्थियों की संख्या वास्तविक पदों से कहीं अधिक होती है। हर अग्निवीर को सेना में स्थायी नहीं किया जायेगा किंतु 25 प्रतिशत तो हैं जो स्थायी होने की पात्रता रखते हैं। शेष 75 प्रतिशत वे हैं जो निर्धारित पदों से अधिक हैं और उन्हें अवसर दिया गया है कि वे सेना में चार साल रहते हुये अपने भविष्य के लिए और अच्छी तरह तैयारी करें। इन लोगों का प्रशिक्षण व्यर्थ नहीं जायेगा। आजीविका के लिए कुछ नहीं तो अंत में स्वतंत्र व्यवसाय तो किया ही जा सकता है। आख़िर स्वतंत्र व्यवसाय से लोगों को इतना परहेज क्यों है?

सरकारी नौकरियों की कार्यशैली के बारे में कुछ न कहा जाय वही अच्छा होगा। हम अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में क्यों नहीं पढ़ाते? अपनी चिकित्सा सरकारी चिकित्सालयों में क्यों नहीं करवाते? सरकारी बस छोड़कर निजी कैब में ऑफ़िस क्यों जाते हैं? सरकारी कम्पनियों के शेयर एक बार ख़रीद लेने के बाद वर्षों तक कान पकड़कर कसमें क्यों खाते रहते हैं? हर सरकारी व्यवस्था को उपेक्षा और नकारात्मक भाव से क्यों देखते हैं? यदि सरकारी संस्थाएँ इतनी ख़राब और घटिया हैं तो हमें केवल नौकरी ही सरकारी क्यों चाहिये?

रेल सरकारी थी, जला दी। विद्यालय सरकारी था, जला दिया। जो कुछ सरकारी है उसे तोड़ देने, जला देने वाली अपसंस्कृति का समर्थन कैसे किया जा सकता है? किसी को चार साल का यह सवैतनिक प्रशिक्षण पसंद नहीं तो यह बाध्यकारी भी तो नहीं है। अजीत जोगी ने चिकित्सा का त्रिवर्षीय पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया था जिसका पूरे देश में मजाक बनाया जाता रहा। किंतु जब उन युवकों/युवतियों को नियुक्तियाँ दी गयीं और उनके परिणाम देखे गये तो उसकी स्वीकार्यता होने लगी। आप चिकित्सा से जुड़े हर व्यक्ति या कर्मचारी से चिकित्सक की ही भूमिका की अपेक्षा क्यों करते हैं! देश की सम्पत्ति को आग लगाने वाले युवकों से सेना के लिए अपेक्षित योग्यता की आशा कैसे की जा सकती है! क्या इस तरह हम अराजकता और निरंकुशता को प्रोत्साहित नहीं कर रहे हैं!  

ऐलान-ए-जंग

         वे कहते हैं कि उन्होंने देश को आज़ादी दिलायी थी और अब वे उसमें आग लगा देंगे। उनका ख़्याल है कि उनका मालिक आज भी भारत का बादशाह है जिसकी पूजा हर किसी को करनी ही चाहिए भले ही वह कितना भी अराजक, अमर्यादित, निरंकुश, स्वार्थी और लुटेरा क्यों न हो।

यह वो मध्ययुगीन मानसिकता है जो हिंसा के माध्यम से दुनिया पर हुकूमत करना अपना अधिकार समझती है। यह जिंघेस ख़ान, तैमूर लंग, और बाबर की परम्परा है जो अपने अलावा किसी और को बर्दाश्त नहीं करती। यह औरंगजेबी परम्परा है जो अपने ही सगे भाइयों की हत्या करके बादशाहत छीन लेती है। इस परम्परा को जनता से कोई अभिप्राय नहीं होता, हुकूमत उनके लिए सर्वोपरि होती है। यह वो मानसिकता है जो यह मानती है कि वे सर्वोपरि हैं, सभी कानूनों, नैतिकताओं और सीमाओं से ऊपर इसीलिए उनके आपराधिक कृत्यों का भी विरोध करना अक्षम्य अपराध है।

यह वो परम्परा है जो अपने कबीले के सरदार की ख़ुशी के लिए पूरी बस्ती में आग लगा देती है और बस्ती को लूटकर जश्न मनाती है। भारत का टूटा-फूटा लोकतंत्र यह नहीं समझ पाता कि कबीले के सरदार के प्रति इतना घातक और विनाशकारी समर्पण उपजता कहाँ से और कैसे है?

भारत का लोकतंत्र इतना अवश्य समझ चुका है कि भारत में अराजकता, दासता और निरंकुश भेड़िया तंत्र को स्थापित करने के लिए भरपूर उर्वरता की कमी नहीं है।