शनिवार, 17 अगस्त 2024

सत्तासंरक्षित एक और निर्भया

एक चिकित्सा वैज्ञानिक की क्रूरहत्या

कोलकाता मेडिकल कॉलेज में चेस्ट मेडिसिन विभाग की पीजी अध्येता एवं पर्यावरण विज्ञान की शोध वैज्ञानिक डॉक्टर मौमिता देवनाथ के साथ रात्रिकालीन सेवा के समय मारपीट की गयी, सामूहिक यौनदुष्कर्म हुआ, क्रूर हत्या की गयी और इसके बाद पुनः उनके मृत शरीर के साथ यौनदुष्कर्म किया गया । अर्थात् इस जघन्य अपराध में मारपीट, हत्या और यौनदुष्कर्मों की कई पर्ते हैं जिसने हिन्दूविरोधी पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित विश्व भर के मानवतावादियों को हिला कर रख दिया है ।   

इतना सब कुछ होता रहा पर चिकित्सालय में किसी को उनकी चीखें सुनायी नहीं दीं । प्राचार्य डॉक्टर संदीप घोष और पुलिस अधिकारियों द्वारा घटना के कई घंटे बाद छात्रा के माता-पिता को हत्या के स्थान पर आत्महत्या करने की सूचना दी गयी । सुबह देखा गया कि डॉक्टर मौमिता का शरीर क्षत-विक्षत था, शरीर पर मल्टीपल इंजूरीज़ थीं, चश्मे का काँच आँखों में घुसा हुआ था जहाँ से रक्तस्राव हो रहा था, उनकी टाँगें चीर दी गयी थीं और शरीर निर्वस्त्र था । पुलिस और चिकित्सालय के विद्वान अधिकारियों को प्रथम दृष्ट्या यह घटना आत्महत्या लगी, हत्या और यौनदुष्कर्म नहीं लगा । यह कैसी कर्तव्यपरायण पुलिस है और ये कैसे विद्वान डॉक्टर्स हैं जिन्हें यह ज्ञान प्राप्त है कि आत्महत्या करने वाली लड़की अपनी आँखों में काँच घुसेड़ लेती है, निर्वस्त्र होकर अपने शरीर को क्षत-विक्षत कर लेती है, अपनी टाँगें चीर लेती है और सामूहिक दुष्कर्म करवा लेती है ?

कोलकाता पुलिस के राक्षसअधिकारियो ! नराधम डॉक्टर संदीप घोष ! तुमने झूठ बोलने और धूर्तता की कोई सीमा ही नहीं रखी ! क्या तुम्हारा अभी तक का जीवन ऐसा ही रहा है, ऐसा ही अपराध और धूर्ततापूर्ण ? मेडिकल जूरिस्प्रूडेंस में अपने छात्रों को यही पढ़ाते रहे हो तुम ? तुम लोग कलंक पर कलंक हो, तुम्हारे लिए सारी गालियाँ तुच्छ हैं, तुम्हारे पापों के लिए कोई भी दण्ड बहुत कम है

कोलकाता पुलिस के अपराधी-अधिकारियो ! पकड़ा गया हत्यारा पोर्न-एडिक्ट है जो तुम्हारे लिए सिविक-वालंटियर के रूप में काम करता है । क्या तुमने कोलकाता में ऐसे ही अपराधियों को सिविक वालंटियर बनाया हुआ है ? तुम्हारा अपराधशास्त्र का ज्ञान कितना है, यह तो पूरी दुनिया ने देख लिया है किंतु घटना का परीक्षण एवं की गयी अन्य कार्यवाहियाँ अपराधी को बचाने वाली हैं, यह भी पूरी दुनिया ने देख लिया है । जघन्य अपराधी की रक्षा करते समय तुमने एक क्षण के लिए भी अपनी बेटी या बहन के बारे में क्यों नहीं सोचा ? तुम लोग समाज के सामने अपना इतना वीभत्स चेहरा लेकर कैसे घूम-फिर लेते हो ?

यौनदुष्कर्म और जघन्य हत्या के अपराध में संलिप्त सत्ता –

भारत में अपराध और उसमें सत्ता की न्यूनाधिक संलिप्तता कोई नई बात नहीं है किंतु जिस तरह एक चिकित्सा वैज्ञानिक की हत्या और उसके बाद प्रमाणों को नष्ट करने में सत्ता की खुलकर भागीदारी हो रही है वह राज्यसरकार का एक और अराजक-आचरण है और इसीलिए जन-आक्रोशकारक और एक अपघटित समाज के विनाशक भविष्य की संकेतक है । सत्ता कितनी अराजक और निर्लज्ज हो सकती है, यह पूरी दुनिया ने भारत की इस घटना से देख लिया है । सामान्यतः अपराधी लोग अपने अपराध को छिपाने के लिए प्रमाणों को नष्ट करने का प्रयास करते रहे हैं, किंतु अरविंद केजरीवाल के बाद अब ममता बनर्जी भी ऐसी निर्लज्ज सत्ताधीश बन गयी हैं जो अपने और अपने पाले हुये अराजकतत्वों के कुकर्मों के प्रमाण नष्ट करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से कुछ भी करने के लिए तैयार रहती हैं ।

कल रात अपराध के प्रमाण नष्ट करने के लिए हॉस्पिटल में सात हजार लोगों की भीड़ कहाँ से आ गयी, क्यों आ गयी, किसने उन्हें बुलाया, किसने उन्हें दारू पिलायी, किसने उन्हें इस काम के लिए पैसे दिये, किसने उन्हें संरक्षण दिया ? क्या पुलिस, स्थानीय प्रशासन और सत्ता की भीगीदारी के बिना यह सब सम्भव था ?

डॉक्टर मौमिता देवनाथ के साथ जो भी हुआ है उसके लिए अपराध शब्द भी बहुत छोटा पड़ गया है । मौमिता की हत्या एक डॉक्टर की ही हत्या नहीं है बल्कि पर्यावरण और चिकित्सा में पीएच डी. शोधवैज्ञानिक और एक बहुमुखी प्रतिभा की हत्या है, एक आत्मस्फूर्त सच्चे समाजसेवी की हत्या है, भारतीय सभ्यता और आदर्शों की हत्या है, चिकित्साव्यवसाय की पवित्रता और परोपकारिता की हत्या है, नैतिकमूल्यों और मानवता की हत्या है, नारी सशक्तिकरण और सम्मान के लिए की जाती रही राजनैतिक घोषणाओं की हत्या है, सनातन संस्कारों और संवैधानिक अधिकारों की हत्या है । यह सत्ता के संरक्षण में विकृत होते समाज का वास्तविक चित्र है जो बड़ा विद्रूप और भयानक है । 

डॉक्टर मौमिता देवनाथ को एक और निर्भया किसने बनाया ? निर्भयाओं की यह श्रंखला कब समाप्त होगी ? हत्या एवं यौनदुष्कर्म में निकृष्ट-सत्ता की संलिप्तता और बढ़ती अराजकता के बाद भी राष्ट्रपति को राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए अभी कितनी और निर्भयाओं की प्रतीक्षा है ?  

समाज, सत्ता और न्यायालय विचार करें कि क्यों नहीं इस तरह के अपराधों में संलिप्त चिकित्सकों एवं अधिकारियों के चिकित्साव्यवसाय एवं शिक्षण कार्यों पर आजीवन प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये ?

चिकित्सा जैसे पवित्र व्यावसायिक क्षेत्र में जघन्य अपराधियों की जड़ों का निरंतर सुदृढ़ होते जाना एक चिंता का विषय है । चिकित्सा शिक्षा की श्रेष्ठता एवं प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने के विषय पर अभी तक कभी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता क्यों नहीं समझी गयी ? मेडिकल प्रवेश परीक्षा में नैतिकतापात्रता के परीक्षण का अभाव चिंता का विषय है । छात्र के नैतिकमूल्यों का कोई परीक्षण नहीं किया जाता, क्या यह उचित है ? हम समाज को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं ?

एक दृष्टि में एक और निर्भया –

पीड़िता – डॉक्टर मौमिता देवनाथ, निवासी कोलकाता ।

मृतका के बारे में आयु एकतीस वर्ष, अविवाहित, बहुमुखी प्रतिभा, शोधवैज्ञानिक, चेस्ट मेडिसिन में पीजीटी, पर्यावरण विज्ञान में पीएच.डी. अध्येता, “श्वसनतंत्र के स्वास्थ्य पर वायुप्रदूषण का प्रभाव (Impact of air pollution on respiratory health)विषय पर शोधरत, स्वास्थ्य देखभाल नीतियाँ (Health care policies) में सक्रियता, मेडिसिन और पर्यावरण शोध में उत्कृष्टता

हत्या का कारण – मेडिकल कॉलेज-हॉस्पिटल में चल रही अवैध गतिविधियों का समर्थन न करना ।

हत्या का दिनांक – ०९ अगस्त २०२४, समय – ब्राह्ममुहूर्त ।

हत्या का स्थान – सेमिनार हॉल, आर.जी.कर मेडिकल कॉलेज-हॉस्पिटल, कोलकाता ।  

घटना का सारांश – सेमिनार हॉल में सोते समय अचानक आक्रमण कर मार-पीट, यौनदुष्कर्म, हत्या एवं हत्या के बाद शव के साथ पुनः यौनदुष्कर्म (नेक्रोफीलिया) और अंत में मृतशरीर का अंग-भंग ।

पकड़ा गया हत्यारा – संजय रॉय, कोलकाता पुलिस में स्वयंसेवी समाजकार्यकर्ता ।

आज दिनांक तक सामने आये अन्य अपराधियों के नाम – डॉक्टर आर्शीन आलम, डॉक्टर गुलाम आज़म और डॉक्टर शुभदीप महापात्र ।

घटना में संलिप्त अन्य सहयोगी एवं संरक्षक – कॉलेज के प्राचार्य डॉक्टर संदीप घोष, स्थानीय पुलिस अधिकारी, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, कॉलेज के कुछ अराजक छात्र और इंटर्नी डॉक्टर्स   

जघन्यता – मल्टीपल इंजूरी, मृत्यु से पूर्व एवं पश्चात् सामूहिक यौनदुष्कर्म, चिरी हुयी टाँगें, क्षत-विक्षत शरीर ।  

प्रशासनिक संलिप्तता एवं संरक्षण – यौनदुष्कर्म एवं हत्या के बाद चिकित्सालय प्रशासन और पुलिस ने घटना की जघन्यता को छिपाते हुये छात्रा के माता-पिता को घटना की मिथ्या सूचना दी कि उसने आत्महत्या कर ली है । प्राचार्य संदीप घोष ने अपराधियों को संरक्षण ही नहीं दिया बल्कि घटना के प्रमाण नष्ट करने के लिए पर्याप्त समय भी दिया । मृतका के माता-पिता को ढाई घंटे तक प्रतीक्षा करवाने के बाद चिकित्सालय प्रशासन द्वारा देखने की अनुमति दी गयी । पुलिस ने प्रारम्भिक अन्वेषण की पूरी तरह उपेक्षा की और अपराधियों को प्रमाण मिटाने के भरपूर अवसर उपलब्ध करवाये । अपराध अन्वेषण में स्थानीय लोक प्रशासन के अधिकारियों का कोई सहयोग नहीं मिला ।  

शासन की संलिप्तता एवं संरक्षण जघन्य घटना के बाद कई दिन तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मौन रहीं, इस बीच घटना स्थल पर सात हजार लोगों की अराजक भीड़ ने बांग्लादेश शैली में चिकित्सालय पर रात में आक्रमण किया और प्रमाणों को नष्ट करने के लिए तोड़फोड़ की, विरोधप्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ मारपीट की और विरोध प्रदर्शन कर रही नर्सेज को भी उनके साथ यौनदुष्कर्म करने की धमकी दी । मुख्यमंत्री ने घटना के प्रमाणों को नष्ट करने की अपराधियों को खुली छूट दी जो निर्लज्जता ही नहीं आपराधिक संलिप्तता और संरक्षण भी है । घटना के बाद माँग करने कर भी कॉलेज एवं हॉस्पिटल के डॉक्टर्स को कोई सुरक्षा व्यवस्था अभी तक उपलब्ध नहीं करवायी गयी है ।

मेडिकल कॉलेज में संचालित अन्य गतिविधियाँ – आर्थिक भ्रष्टाचार के साथ-साथ देहव्यापार, ड्रग्सव्यापार, पोर्नोग्राफी, ब्लैक-मेलिंग, गुंडागर्दी और अराजक गतिविधियों का संचालन एवं संरक्षण ।

लोक-प्रतिक्रिया जनाक्रोश, भारतीय डॉक्टर्स में भय एवं असुरक्षा की भावना, पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित देश-विदेश में विरोध प्रदर्शन  

अपराधियों का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच – भारत में नेक्रोफीलिया (शव के साथ यौनदुष्कर्म) एक मानसिक विकृत तो मानी जाती है किंतु उसके लिए कोई आपराधिक धारा नहीं है । भारत के नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए इन बड़े-बड़े विद्वानों को भारत की प्राचीन विधि संहिता की आवश्यकता क्यों नहीं होती ?  

गुरुवार, 15 अगस्त 2024

बांग्लादेश से लेकर बंगाल तक अराजक भीड की सत्ता

            क्या हो गया है बंगालियों को ? यह क्या हो गया है उस बंगभूमि को जहाँ सुभाष चंद्र बोस, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, शरत चंद्र, महाश्वेता देवी, आशापूर्णा देवी, ताराशंकर, सत्यजित रे और बिधान चंद्र रॉय जैसे मूर्धन्य विद्वानों ने सामाजिक मूल्यों के लिए सत्य की अलख जगाये रखने में अपना सारा जीवन होम कर दिया ! आज उसी बंगाल के डायमंड हार्बर और फ़्रेंच कॉलोनी चंदननगर जैसे कई शहरों और कस्बों में बिना किसी लड़की को साथ ले जाए किसी होटल में कमरा नहीं मिलता । कोई उद्योगपति पश्चिम बंगाल में किसी उद्योग को लगाने के पक्ष में क्यों नहीं हैं ? बंगालियों को इस विषय में आत्ममंथन की आवश्यकता है ।   

शॉपेन ऑर ही नहीं, विनोबा भावे ने भी शासनमुक्त समाज की कल्पना की थी । मैं पिछले दो दशकों से पश्चिम बंगाल में शासनमुक्त भीड़ के दर्शन करता रहा हूँ, भीड़ का एक ऐसा देश जहाँ “अपने देश” जैसी कोई अनुभूती नहीं होती, जहाँ कोई समाज नहीं, कोई शासन नहीं, कोई प्रशासन नहीं । पश्चिम बंगाल जैसी अराजक अनुभूति भारत के अन्य प्रांतों में नहीं होती । वहाँ अराजक भीड़ की सत्ता है, अपराधियों के समूहों की सत्ता है, अमानवीय आचरण वालों की सत्ता है । पिछले कुछ वर्षों से मैंने पश्चिम बंगाल जाना बंद कर दिया है । वहाँ अब कोई आवारा मसीहा नहीं मिलता ।

आर.जी. कर कोलकाता मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल की जघन्य घटना झकझोरने वाली है । काश! आज वहाँ शरत और बंकिम जैसे लोग होते ।

पीजी डॉक्टर के साथ हुए जघन्य अपराध के बाद अब संवेदनशून्य हॉस्पिटल प्रशासन से लेकर शासन और प्रशासन भी अपराधियों के पक्ष में खड़े दिखायी देने लगे हैं । कल रात गुंडों की भीड़ ने न्याय के समर्थन में आंदोलनरत डॉक्टर्स पर आक्रमण कर दिया उन्हें जान बचाने के लिए भागना पड़ा । लड़की की हत्या के बाद भी उस चिकित्सालय के डॉक्टर्स की सुरक्षा के प्रति प्रशासन की उपेक्षा किस बात की घोषणा करती है !  

बंगाल के अपराधी संगठित और शक्तिशाली हैं, उनके सहयोगियों की भीड़ ने कल आधी रात को हॉस्पिटल में घुस कर तोड़-फोड़ की और अपराध के प्रमाण नष्ट करने के सभी यथासम्भव प्रयास किए । कौन है जो इस तरह, इतनी निर्भयता और दबंगई के साथ अपराध के प्रमाण नष्ट करता है ? कौन है इतना शक्तिशाली जिसे जघन्य अपराध करने के बाद भी किसी का डर नहीं है ? अराजकता की यह एक नयी परम्परा है जो बताती है कि पश्चिम बंगाल में शासन-प्रशासन जैसा कुछ भी है ही नहीं ।

अब तक तो यह स्पष्ट हो चुका है कि इस पूरी घटना में सत्ता और हॉस्पिटल प्रशासन ही संलिप्त नहीं है बल्कि डॉक्टर्स में भी कुछ विश्वासघाती लोग संलिप्त हैं । हो सकता है वहाँ पहले से ही कुछ अवैध गतिविधियाँ चलती रही हों जिनका विरोध विक्टिम लड़की द्वारा किया जाता रहा हो या उस पर भी उनमें संलिप्त होने के लिए दबाव बनाया जाता रहा हो और वह इसके लिए तैयार न हो रही हो । यदि ऐसा कुछ है तो यह चिकित्सा सेवाओं के लिए बहुत बड़ा कलंक है, इसकी गम्भीरता को तुरंत समझे जाने की आवश्यकता है । यह घटना प्याज की तरह कई आवरणों से घिरी हुयी लग रही है । हर आवरण सामने आते ही हृदय को दहला देता है, मस्तिष्क को झकझोर देता है ।

पश्चिम बंगाल में सी.बी.आई. पर हिंसक आक्रमण होता है, आई.डी. के अधिकारियों पर हिंसक आक्रमण होता है, किसी भी जाँच में अधिकारियों को सहयोग नहीं किया जाता, जय श्रीराम कहने पर पुलिस लाठीचार्ज होता है, उच्च न्यायालय के निर्णय को मानने से इंकार कर दिया जाता है, पुलिस और धार्मिक शोभायात्राओं पर पथराव होता है, सड़क पर खून बहा देने की धमकियाँ स्वयं मुख्यमंत्री द्वारा दी जाती हैं, कई स्थानों में दुर्गापूजा प्रतिबंधित रहती है जिसमें पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी जी का गाँव भी सम्मिलित रहा है, चुनाव में हिंसा होती है, चुनाव जीतने के बाद हर्षोन्माद में और भी हिंसा होती है, स्त्रियों को भीड़ के सामने भूमि पर पटक कर डंडे, हंटर और लातों से इस्लामिक तरीके से पीटा जाता है और संवेदनशून्य भीड़ मौन होकर देखती रहती है... यह कैसा बंगाल है, ये कैसे बंगाली मानुष हैं ?

गृहमंत्री जी, प्रधानमंत्री जी और राष्ट्रपति जी को पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए अभी कितनी और अराजकता एवं निर्भयाओं की प्रतीक्षा है ?

मंगलवार, 13 अगस्त 2024

नहीं रुक रहा हिन्दू-नरसंहार

 *नहीं रुक रहा हिन्दू-नरसंहार*


आज नौवें दिन भी बांग्लादेश में हिन्दुओं एवं अन्य अल्पसंख्यकों के नरसंहार और उत्पीड़न में कोई कमी नहीं हो पा रही है । रूस और इज़्रेल पर प्रतिबंध लगाने के लिए उतावली रहने वाली विश्वसमुदाय की बड़ी शक्तियाँ भी मौन हैं । ऐसा लगता है कि हर कोई हिन्दू-उन्मूलन की प्रतीक्षा कर रहा था ।  

बांग्लादेशी हिन्दुओं का अपराध क्या है ? निरंकुश हुयी अराजक भीड़ अपने देश के सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय के विरुद्ध आंदोलन करती है और पाँच अगस्त को बहुमत से चुनी अपनी ही सरकार को उखाड़ फेकती है । भीड़ नहीं चाहती कि पाकिस्तान से बांग्लादेश को स्वतंत्रता दिलाने में बलिदान हुये सैनिकों के परिजनों को आरक्षण दिया जाय । सरकार भीड़ की माँग पर झुक जाती है, आरक्षण समाप्त कर देती है पर सर्वोच्च न्यायालय जनता और सरकार के निर्णय के विरुद्ध आरक्षण को पुनः लागू किये जाने का निर्णय पारित करता है जिसे बांग्लादेश की भीड़ स्वीकार करने से मना कर देती है । 

बांग्लादेश में असंगत घटनाओं का एक विचित्र गुम्फन है जिसमें भीड़ न्यायालय के विरुद्ध सड़कों पर उतरती है और प्रधानमंत्री को त्यागपत्र देकर देश से निर्वासित हो जाने के लिए विवश कर देती है । बात यहाँ समाप्त हो जानी चाहिये थी पर ऐसा नहीं होता, भीड़ विजय के हर्षोन्माद में अल्पसंख्यक हिन्दुओं का नरसंहार प्रारम्भ कर देती है, जिनका इस पूरे प्रकरण से कोई लेना-देना नहीं होता । हिन्दुओं की सम्पत्तियाँ, पशुधन और स्त्रियाँ लूटी जाने लगती हैं, उनके घरों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और मंदिरों में तोड़-फोड़ के बाद उनमें आग लगायी जाने लगती है और पूरा विश्व इस क्रूर-अराजकता और हिन्दू-नरसंहार को मौनधारण किए देखता रहता है । ये घटनायें असंगत अवश्य दिखायी देती हैं पर हैं नहीं । बहुमत से निर्वाचित सरकारों को सत्ताच्युत करने और विकासशील देशों की आर्थिक प्रगति को रोकने के लिए और महाशक्तियों के षड्यंत्र तो पूरे विश्व में रचे ही जा रहे हैं किंतु इस्लामिक कट्टरवादियों के लिए बहाना कुछ भी हो, हर कहीं हिन्दू-नरसंहार ही उनका अंतिम उद्देश्य हुआ करता है ।    

इसी हिंसा के बीच चीन एवं पाकिस्तान समर्थित और नोबेल पुरस्कार विजेता एक हिन्दूविरोधी एवं भारतविरोधी प्रवासीपाकिस्तानी मोहम्मद यूनुस ब्रिटेन से बांग्लादेश में अवतरित होता है, और इस शर्त पर अंतरिम सरकार का प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार हो जाता है कि देश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार तुरंत बंद कर दिए जाएँ, किंतु यदि ऐसा न हुआ तो वह अपने पद से त्यागपत्र दे देगा । यह एक लुभावनी और आदर्श प्रस्तावना थी जिसका एक भी अंश आज दिनांक तेरह अगस्त तक वास्तविकता के धरातल पर क्रियान्वयित नहीं हो सका । बांग्लादेश में न तो नरसंहार रुका, न यौनहिंसा रुकी, न मोहम्मद यूनुस ने त्यागपत्र देकर पुनः ब्रिटेन के लिए प्रस्थान किया और न वहाँ की सेना या पुलिस ने अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए कोई तात्कालिक कार्यवाही की । अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री मोहम्मद यूनुस जब भी संचार माध्यमों के सामने प्रकट हुये उनके चेहरे पर एक बार भी दुःख का भाव दिखायी नहीं दिया बल्कि एक कुटिल मुस्कराहट ही देखी जाती रही । यह अल्पसंख्यकों और विश्व के साथ मोहम्मद यूनुस का दुस्साहस और ढिठाई भरा एक छल था । इस व्यक्ति में यदि थोड़ी सी भी मनुष्यता होती तो शपथग्रहण के साथ ही हिंसा रोकने के लिए कड़ी कार्यवाही करता, जबकि उसमें ऐसी कोई इच्छाशक्ति आज भी नहीं है । 

इस समय बांग्लादेश में सरकार होकर भी कोई सरकार नहीं है, ऐसी सरकार का होना, किसी सरकार के न होने से भी अधिक बुरा है । इस हिन्दू-विरोधी सरकार ने कट्टरपंथियों और हिंसक भीड़ को एक तरह से अभयदान दे दिया है । 

आज बांग्लादेश के गृहमंत्री ने हिन्दू-नरसंहार, लूटमार और क्रूर यौनदुष्कर्मों को रोक सकने में सरकार की विफलता के लिए हिन्दुओं से क्षमायाचना की है किंतु नरसंहार को रोकने की इच्छाशक्ति प्रकट नहीं की, कोई दृढ़ आश्वासन नहीं दिया अर्थात् यह सब अभी होता रहेगा और वे बीच-बीच में प्रकट होकर अपने पापों के लिए क्षमायाचना करते रहेंगे ! अद्भुत राजनीतिक कपट है !  

बांग्लादेश में हिन्दू-नरसंहार ही नहीं होता, समय-समय पर बौद्धों एवं ईसाइयों का भी नरसंहार और हिंसापूर्वक धर्मांतरण होता रहता है । वास्तव में उनकी विकृत सोच के अनुसार इस तरह वे अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए “काफ़िरों का इस्लामिक धर्मानुकूल नरसंहार“ किया करते हैं । 

मुस्लिम देश की महिला प्रधानमंत्री किसी दूसरे मुस्लिम देश में शरण लेने की अपेक्षा एक ऐसे देश में तात्कालिक शरण लेने के लिए बाध्य होती हैं जो मुस्लिम देश नहीं है और जहाँ के बहुसंख्यक हिन्दुओं को आये दिन पाकिस्तान और बांग्लादेश में ही नहीं बल्कि अपने देश में भी नरसंहार, यौन-उत्पीड़न और धर्मांतरण का सामना करना पड़ता है ।

जिन हिन्दुओं को भारत का नेताप्रतिपक्ष संसद में मिथ्या आरोप लगाकर लांछित करता है कि हिन्दू हत्यारे हैं, केवल हिंसा और घृणा करते हैं, उसी हिन्दूसमुदाय के लोग बांग्लादेश में जातीय हिंसा से पीड़ित होते हैं पर वहाँ की पुलिस या सेना उनकी रक्षा नहीं करती । ऐसी हिंसक और विषम स्थितियों में जब उसी हिन्दूसमुदाय के लोग अपने घरों से बाहर निकलकर “जयराम श्रीराम जय-जय राम” और हरे कृष्णा हरे रामा” गाते हुये निकलते हैं तो क्या वे हिंसा और घृणा का संदेश दे रहे होते हैं ? भारत की संसद का नेताप्रतिपक्ष अपने वक्तव्य पर न तो लज्जित होता है, न कोई खेद व्यक्त करता है, न पीड़ित समुदाय के दुःख से दुःखी होता है और न उनके प्रति संवेदना प्रकट करता है । नेताप्रतिपक्ष की बहन प्रियंका बढेरा को जब यह पता चला कि बांग्लादेश में अब ईसाइयों के साथ भी वही होने लगा है जो हिन्दुओं के साथ इतने दिनों से होता आ रहा है तब कल उन्होंने नरसंहार के विरोध में वक्तव्य दिया । नरसंहार के विरोध में भी पक्षपात! 

बांग्लादेश के हिन्दुओं को मुस्लिम कट्टरता का सामना अपने बुद्धिकौशल और साहस के साथ करना ही होगा, पलायन करने या इधर-उधर छिपने-भागने की आवश्यकता नहीं है । कोई भी निर्बलता उन्हें समाप्त कर देगी । बांग्लादेश उनके पूर्वजों का देश है, जननी जन्मभूमि है, उनकी कर्मभूमि है और उनका पूरा अधिकार है, वे किसी की कृपा पर वहाँ नहीं रहते, बांग्लादेश के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान है । समावेशी और व्यापक सोच वाले हिन्दू बांग्लादेश के साथ खड़े हैं, वहाँ के हिन्दुओं के ही साथ नहीं बल्कि बौद्धों और ईसाइयों के साथ भी खड़े हैं । 

सावधान! बांग्लादेश की हिंसा को लेकर भारत में की जा रही विरोधाभासी प्रतिक्रियाएँ भारतीय समाज के लिए आसन्न संकट की सूचक हैं ।

शनिवार, 10 अगस्त 2024

बांग्लादेश में माल-ए-गनीमत

बांग्लादेश में भीड़ के द्वारा सत्तापरिवर्तन के बाद अंतरिम सरकार के प्रमुख की नियुक्ति हो चुकी है तथापि पिछले लगभग एक सप्ताह से चल रही साम्प्रदायिक हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही । बांग्लादेश हिन्दू-बुद्धिस्ट-क्रिस्चियन यूनिटी काउंसिल के अनुसार बांग्लादेश के कुल ६४ जिलों में से ४५ जिले इस समय हिन्दू-नरसंहार से पीड़ित हो रहे हैं । बांग्लादेश के एक मानवाधिकार समूह के आँकड़े बताते हैं कि केवल २०१३ से २०२१ के बीच हिन्दुओं पर ३६७९  बार हिंसक आक्रमण किये गये थे 

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस नोबल पुरस्कार विजेता होने के साथ-साथ हिन्दू-विरोधी और भारत-विरोधी भी हैं यही कारण है कि उनमें हिन्दू-नरसंहार रोकने की इच्छा शक्ति का अभी तक अभाव ही देखने को मिला है । नोबल-पुरस्कार विजेता होने के लिए क्या मानवीय और नैतिक मूल्यों की आवश्यकता नहीं होती? जब चारो ओर नरसंहार और यौनदुष्कर्म हो रहे हों तब एक नोबल पुरस्कार विजेता एवं राष्ट्रप्रमुख की कुटिल मुस्कराहट उसके मनुष्य होने पर भी संदेह उत्पन्न करती है । नोआखाली में भीड़ के द्वारा घरों में घुसकर हिन्दू लड़कियों को बलात् उठाया जा रहा है, उनके साथ यौनदुष्कर्म हो रहे हैं, हिन्दू घरों एवं उनकी सम्पत्तियों को लूटने के बाद आग लगायी जा रही है और कई स्थानों पर तो हिन्दुओं को जीवित ही जलाये जाने जाने की घटनायें भी हो रही हैं । मुस्लिम परम्परा के अनुसार इस्लामिक विस्तार के लिए की जाने वाली साम्प्रदायिक हिंसा में लूटमार को क्रूरता या पाप नहीं माना जाता बल्कि सम्पत्तियों के साथ पशुधन और स्त्रियों को भी लूटना माल-ए-गनीमत माना जाता है । साम्प्रदायिक हिंसा में हिन्दू नरसंहार के पीछे इस्लामिक मान्यता के अनुसार अ-मुस्लिमों की हत्या और लूट को महिमामंडित किया जाना एक बहुत बड़ा कारण है । यद्यपि मानवतावादी कुछ मुसलमान इसका समर्थन नहीं करते पर ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है और उन्हें तस्लीमा नसरीन की तरह निर्वासित होना पड़ता है ।    

नोआखाली में यौनदुष्कर्म की घटनाओं ने मुस्लिम-लीग के डायरेक्ट-एक्शन-डे जैसी ऐयिहासिक घटनाओं को दोहराना प्रारम्भ कर दिया है, और इस सबके बीच नोबल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के चेहरे पर स्थायी भाव से चिपक चुकी कुटिल मुस्कराहट धूमिल होने का नाम नहीं ले रही । हिन्दू नरसंहार के विरोध में बीरगंज (नेपाल) के लोग प्रदर्शन कर रहे हैं जबकि भारत में मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना रशीदी ने भारत के हिन्दू-संगठनों द्वारा बांग्लादेश की घटनाओं के विरोध को औचित्यहीन बताया है । उसने पूछा कि भारत के लोगों को बांग्लादेश के हिन्दुओं से क्या लेना देना ? यह उनका आंतरिक विषय है ।   

मौसमी एक हिन्दू वकील हैं जो बांग्लादेश के पंचगढ़ जिले में प्रेक्टिस करती हैं । मौसमी की बेटी भारत के सिलीगुड़ी में है, पिता की मेडिकल स्टोर की दुकान लूट ली गयी है और वे स्वयं कुछ दिनों से एक समय चावल-नमक खाकर किसी तरह जीवित हैं । उन्होंने बताया कि बुर्का पहनने के बाद भी हिन्दू नाम होने के कारण वकालत में आने के बाद प्रारम्भ के एक वर्ष तक उन्हें एक भी केस नहीं मिला । वे फोन पर बेटी से बात करती हैं तो माँ-बेटी अधिकांश समय रोती ही रहती हैं । मौसमी मान चुकी हैं कि उन्हें किसी भी दिन मार दिया जाएगा किंतु संतोष यह है कि उनकी बेटी भले ही अनाथ हो जाये पर जीवित तो रहेगी ।

मौसमी और उनकी बेटी की इस त्रासदीपूर्ण मनःस्थिति को समझ पाना हर किसी के लिए सम्भव नहीं, इसके लिए तो कुछ समय के लिए हमें मौसमी और उनकी बेटी बनना पड़ेगा । यह आत्मा को कँपा देने वाली स्थिति है जिसे न तो सेक्युलर्स कभी समझ सकेंगे, न मानवाधिकार आयोग और न कभी संयुक्त राष्ट्र संघ ।

मणिपुर हिंसा के एक पक्ष को लेकर हंगामा करने वाले विपक्षी दल अब चुप हैं क्योंकि यहाँ पीड़ित पक्ष हिन्दू है । मणिपुर में भी जब तक पीड़ित पक्ष हिन्दू रहा तब तक हर कोई चुप रहा और जब मैतेयियों के एक वर्ग ने बदले की कार्यवाही की तो सभी विपक्षी दल रोने लगे । केवल वोट पाने के लिए पीड़ितों के साथ पक्षपात करना सत्तालोभी राजनीति का सर्वाधिक निंदनीय और अमानवीय पक्ष है ।

हमें भारत के हिन्दुओं से तो नहीं पर नेपाल के हिन्दुओं से थोड़ी सी आशा अवश्य है कि वे दुनिया में कम से कम एक देश तो ऐसा बनाने की दिशा में अब तीव्रता से आगे बढ़ेंगे जहाँ हिन्दू अपने स्वाभिमान के साथ जीवित रह सकें । भारत के काने राजनीतिज्ञों ने संवेदना और मानवीयता की भी जाति और धर्म निश्चित कर दिये हैं, वे केवल एक ही आँख से देख पाते हैं, जो वे देखना चाहते हैं, रौल विंची और मौलाना रशीदी की तरह ।     

गुरुवार, 8 अगस्त 2024

भारत हो सकता है अगला बांग्लादेश ?

            बांग्लादेश में बलात् सत्तापलट के बाद हुयी हिंसा में हिन्दुओं के नरसंहार पर मानवाधिकारवादियों को भले ही चिंता न हो पर मातृदेश होने के करण भारत को तो चिंतित होना ही चाहिये । यह भारत का सहज प्राकृतिक अधिकार है और नैतिक कर्तव्य भी । हिन्दुओं के लिए पूरे विश्व में भारत के अतिरिक्त और कोई स्थान ऐसा नहीं है जहाँ वे शरण ले सकें जबकि कहीं भी होने वाले हिन्दूनरसंहार में आज तक वे कभी भी दोषी नहीं पाये गये हैं । खंडित भारत में जहाँ-तहाँ रह रहे भारतवंशी हिन्दुओं का क्या दोष हो सकता है ?

राजसत्ता के लिए किसी भी सीमा को तोड़ देने वाली कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और शिवसेनाउद्धव गुट के कई नेता अपने इस्लामप्रेम में मोहांध होकर हिन्दूविरोधी और हिंसक वक्तव्य पिछले कई वर्षों से देते आ रहे हैं । इनके लक्ष्य पर हर वह व्यक्ति होता है जो हिन्दुओं के लिए न्याय की बात करता है । बांग्लादेश में सत्तापलट के बाद हो रही हिंसा और हिन्दू-नरसंहार से उत्साहित भारत के कई नेता भारत में भी वैसा ही होने की घोषणा करने लगे हैं । यह दुःखद नहीं, आक्रोश उत्पन्न करने वाला है ।

दिल्ली में शेख मुज़ीबुर्रहमान की पुस्तक शिकवा-ए-हिन्द: द पॉलिटिकल फ़्यूचर ऑफ़ इंडियन मुस्लिम्सके विमोचन के अवसर पर कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री ख़ुर्शीद आलम ने कहा –

“जो बांग्लादेश में हो रहा है वैसा ही भारत में भी हो सकता है”।

कांग्रेस के एक और वरिष्ठ नेता सज्जन सिंह वर्मा ने तो कई कोस आगे बढ़ते हुये घोषणा कर दी कि –

“श्रीलंका और बांग्लादेश के बाद अब अगला नम्बर भारत का है । याद रखना मोदी जी! एक दिन यह जनता जो सड़क पर हिलोरें ले रही है, एक दिन तुम्हारी गलत नीतियों के कारण तुम्हारे प्रधानमंत्री निवास में घुस जायेगी और कब्जा कर लेगी । जिस तरह शेख हसीना के घर में जनता घुस गयी उसी तरह अब मोदी के घर में भी घुसने वाली है”।

कोई भी सभ्य समाज इस तरह के वक्तव्य की न तो प्रशंसा कर सकता है और न सहमत हो सकता है । सज्जन सिंह वर्मा को भाषायी अभद्रता और राजनीतिक आतंक का दुस्साहस उनके ही नेता के सार्वजनिक वक्तव्यों से मिलता है जो वर्तमान में विपक्ष के नेता हैं । यह भारत का दुर्भाग्य है कि एक अभद्र और असंस्कारी व्यक्ति भारत की संसद में विपक्ष का नेता है । फ़रवरी २०२० में दिल्ली में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुये कांग्रेस के रौल विंची खान घाँढी ने विषवमन करते हुये अपने भाषण में कहा था–

“यह हिन्दुस्तान की सच्चाई है, इसको आप सुन लीजिए, और आप देखना, अभी यह नरेंद्र मोद्दी जो भाषण दे रहा है ना, यह छह महीने बाद, सात-आठ महीने बाद घर से नहीं निकल पायेगा, हिन्दुस्तान के युवा उसको ऐसा ड़डा मारेंगे, इसको समझा देंगे कि हिन्दुस्तान के युवा को रोजगार दिये बिना यह देश आगे नहीं बढ़ सकता”।

रौल विंची खान घाँढी का ही एक और वक्तव्य देखिये – “देश भर में पेट्रोल छिड़क दिया गया है, अब तीली लगाने की देर है”।

राजनीतिक दलों में मतवैषम्यता स्वाभाविक है किंतु सत्ता के लिए सारी सीमायें तोड़ते जाना किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता, विशेषकर हिन्दूहितों के मूल्य पर । सभी दलों को देश के प्रति निष्ठावान होना चाहिए न कि किसी सम्प्रदाय के प्रति!

विगत कुछ वर्षों से बारम्बार यह स्पष्ट होता रहा है कि पूरा विपक्ष हिन्दूहितों के विद्वेष से भरा बैठा है, नरेंद्र मोदी हिन्दूविद्वेष के मूल्य पर मुस्लिमहितों के लिए देश का पैसा लुटाने के पक्ष में नहीं हैं, हिन्दुओं के नरसंहार के पक्ष में नहीं हैं, भारतीय संस्कृति पर विदेशी आक्रमण के पक्ष में नहीं हैं, यही कारण है कि विपक्ष नरेंद्र मोदी के विरुद्ध हिंसक भाषा का प्रयोग करने लगा है । मोदी झूठा और जुमलेबाज है, हाय-हाय मोदी मर जा तू, मोदी हत्यारा है, मोदी तेरी कब्र खुदेगी इंशा अल्ला इंशा अल्ला, मोदी तानाशाह है, मोदी ने हिटलर को भी पीछे छोड़ दिया है, मोदी कायर है, मोदी हमारा सामना नहीं कर सकता, मोदी हमारे सामने डिबेट नहीं कर सकता इस तरह की भाषा की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिये । यह अस्तरीय है, अभद्र है, मूर्खतापूर्ण है ...यह सोचकर इसकी उपेक्षा भारत के लिए बहुत भारी पड़ सकती है । बांग्लादेश में जो हुआ, जो हो रहा है क्या वह सब भद्र और बुद्धिमान लोगों के द्वारा किया जा रहा है? हिंसा तो अभद्र और मूर्ख लोग ही करते हैं न! इस तरह के अराजक वक्तव्य अराजक घटनाओं की पूर्वसूचना देते हैं । कोई भी सभ्य समाज व्यक्तिगत राजनैतिक हितों के लिए इसकी अनुमति नहीं दे सकता । देश के विवेकशील और निष्ठावान लोगों को साहस के साथ आगे आने की आवश्यकता है अन्यथा हिन्दू सभ्यता इतिहास में भी नहीं बचेगी ।