मुँह खुला ही रहता है
चिर बुभुक्षित
ड्रैगन का
निगलने को कुछ भी
किसी भी दिशा में
मिल जाए जो भी
जहाँ भी।
चौकन्ने
मंथर गति से चलते
ड्रैगन की तीक्ष्ण दृष्टि से
बचेगा नहीं
असावधान रहेगा जो भी
और
नहीं होगी दूरदृष्टि
जिसमें भी।
तुम तो गाते रहे
हिंदी-चीनी भाई-भाई
और उधर बासठ हो गया।
तुमने कहा कुछ नहीं हुआ
डोकलाम में
और उधर बनती रहीं
सैन्य अधोसंरचनायें ताक्सिन में,
बनते रहे दो सैन्यमार्ग
अरुणाचल में
साठ किलोमीटर भीतर तक।
तुम झूठ बोलते रहे
पल-पल
आत्मविश्वासपूर्ण अभिनय के साथ।
कौन हो तुम?
चौकीदार तो नहीं हो सकते
नायक भी नहीं हो सकते
बंधु भी नहीं, सखा भी नहीं
ओह ! अब समझा
तुम जो हो
वह बताएगा कौन!
सुनने के बाद
अपना सही परिचय
मृत्युदंड निश्चित है
इसलिए सत्यवादी मौन है
गूँजता है तो केवल तुम्हारा ही
अट्टहास दिग्दिगंत में
पर अब और नहीं
तैयार हो गये हैं कुछ लोग
करने अनावृत सारे रहस्य
भले ही मिले
क्यों न मृत्युदंड
और तुम!
तुम तो मरते ही रहते हो पल-पल
तुम्हें क्या पड़ता है
कोई अंतर
किसी के मरने से!
बेताल बेसुर
गाते रहे वर्षों से
मन की बात
केवल अपनी
बिना सुने
किसी और के मन की
बेताल जो ठहरे!
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