रविवार, 16 अगस्त 2026

गालीयुग मोहन मन भावय

जेन-जी ने अपने प्रथम आंदोलन का प्रारंभ पोर्नगालियों के साथ किया। संघस्वामी मोहन भागवत जेन-जी से बहुत प्रभावित हुए और उन्हें सर्वाधिक विचारशील, प्रगतिशील और विचारवान पाया। 
कुछ लोगों को जेन-जी की पोर्नगालियों से आपत्ति हुई। वे उनकी प्रगतिशीलता को समझ नहीं सके। प्रधानमंत्री ने पोर्नगालीबाज नारीशक्तियों को क्षमा कर दिया और उन्हें गले लगाने की इच्छा व्यक्त की।  
किसी ने कहा स्त्री कैसी भी हो, किसी भी स्थिति में स्त्री के चरित्र पर लांछन नहीं लगाया जाना चाहिए। 
जेन-जी आंदोलन में पोर्नगालीबाज लड़कों से अधिक संख्या लड़कियों की रही। 
जब कोई गाली देता है तो वे गालियाँ ही स्त्रीप्रधान होती हैं, यथा माँ की गाली, बहन की गाली या स्त्री जननांगों के वीभत्स क्रियास्वरूपों की गाली...। गाली कभी पुरुष प्रधान नहीं होती। स्त्री मर्म है, सर्वाधिक चोट मर्मस्थल में ही लगती है। इसीलिए पुरुषवाचक गाली नहीं बनी। जेन जी लड़कियाँ भी स्त्रीसूचक गालियाँ ही देती हैं। गाली स्त्रीवाचक होती है पर यह अपमान की पराकाष्ठा है पुरुष के लिए। इसी अपमान में छिपा है स्त्री का महत्व और उसकी प्रतिष्ठा। अपमान तो वह पीड़ा है जो शब्दशर से बिंधकर उत्पन्न होती है। शर स्त्री को चुभता है, पीड़ा पुरुष को होती है। स्त्री-पुरुष संबंधों के इस अति संवेदनशील पक्ष को भारतीय ही समझ सकते हैं जहाँ पैराडाॅक्स की भरमार है। 
...तो स्त्रीसूचक गालियाँ स्त्री से अधिक पुरुष को घायल करती हैं। गाली देना पाप है परंतु यह पुरुष की अपेक्षा स्त्री महत्व और उसके सम्मान को ही अधिक इंगित करता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.