मठाधीश बनते ही काले अंग्रेज सर्वज्ञानी हो गये हैं । ज्ञान-विज्ञान-धर्म-अध्यात्म-नीति-विधान-न्याय-राजनीति-कला-पुरातत्व-इतिहास... सभी विषयों का एकछत्र मठाधीश हर काला अंग्रेज है । कोई भी विषय ऐसा नहीं जिसमें ये स्वयं को निष्णात न मानते हों । इनका ज्ञान अद्भुत है, धुंध से परिपूर्ण, स्पष्ट कुछ भी नहीं, आभासी भी नहीं, अदृश्य भी नहीं ।
काले अंग्रेजों का हठ है कि ब्रह्माण्ड की गतिविधियाँ
सुचारु रूप से चलाने के लिये धूम्रकेतु को सूर्य और सूर्य को धूम्रकेतु का पद एवं दायित्व
दिया जाना आवश्यक है । सूर्य! अब तुम्हें अपने दायित्व धूम्रकेतुओं को सौंप देने चाहिये
। ताम्रपत्रों पर लिख दिया गया है – “धूम्रकेतु को उसके नाम से पुकारा जाना अपराध माना
जायेगा, उन्हें कूड़ा-कचरा,
सड़ा हुआ, दुर्गंधित, और निरीह जैसे अर्थों को ज्ञापित करने वाले संबोधनों से ही संबोधित किया सकेगा
। यही न्याय है ।
ब्रह्माण्ड के सम्राट रहे धूम्रकेतु अनायास ही
तीन या पाँच हजार वर्ष पूर्व शोषित, वंचित और पीड़ित हो गये, उनकी
प्रजा में जो सूर्य थे उन्होंने अपने सम्राटों पर अमानवीय और अब्रह्माण्डीय अत्याचार
किये इसलिये अब सभी धूम्रकेतुओं को सूर्य बना देना होगा, धरती पर हमारा अवतार इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये
हुआ है । दबंग सूर्यों के लिये इस विधान का पालन करना ही प्रायश्चित है और यही दण्ड
भी ...दोनों एक साथ ।
काले अंग्रेजों ने शब्दों के नये अर्थ गढ़े,
नयी परिभाषायें लिखीं, नये विधान रचे ...और सिद्ध कर दिया कि वे सर्वशक्तिमान
हैं, वे ही परमपिता परमेश्वर और
इस ब्रह्माण्ड के रचयिता हैं । काले अंग्रेजों का दृढ़ विश्वास है कि ईश्वर एक काल्पनिक
शब्द है जिसका कोई अस्तित्व नहीं होता, जिसका अस्तित्व होता है वह वे स्वयं हैं इसलिये उनका बनाया विधान ही सनातन सत्य
है । उन्होंने नई-नई जातियाँ बनाकर जातियाँ समाप्त करने का बीड़ा उठाया ताकि जातियाँ
सदा के लिये बनी रहें । उन्होंने खर-पतवार के बीज बो कर खर-पतवार समाप्त करने का बीड़ा
उठाया ताकि खर-पतवार सदा अंकुरित, पुष्पित और पल्लवित होते रहें । उन्होंने यह ज्ञान भी दिया कि सूर्य तो इस ब्रह्माण्ड
के पिंड हैं ही नहीं, ब्रह्माण्ड
के बाहर से आकर धरती पर टपक पड़े इसीलिये इनका बहिष्कार करना फिर धीरे-धीरे इन सबका
समूल उच्छेद कर देना ही एकमात्र उपाय है ।
उद्घोषणा की जा चुकी है, संकल्प लिया जा चुका है ...कि अब काले अंग्रेज
रुकेंगे नहीं, धूम्रकेतुओं को सूर्य
के दायित्व सौंपने के लिये ब्रह्माण्ड के बाहर से आकर टपके सूर्यों का उन्मूलन हो जाने
तक उनके विविध अभियान चलते ही रहेंगे ।
अत्याचारी सूर्यो! तुम वापस जाओ, जहाँ से आकर टपके थे वहीं ...अखिल ब्रह्माण्ड
की सीमाओं से बाहर । यदि तुम ब्रह्माण्ड से बाहर नहीं गये तो हमारे धूम्रकेतु और ब्रह्माण्ड
के मूलपिण्ड एक साथ मिलकर तुम्हारी बेटियों को खींचते हुये ले जायेंगे... कहीं भी,
अपने घर... या झाड़ियों में... या किसी
खण्डहर में... फिर उनके साथ दुष्कर्म करेंगे और फिर उनकी हत्या कर देंगे । जो धूम्रकेतु
किसी सूर्य की ओर उँगली से संकेत कर देगा उसे लाखों चंद्रमा उपहार स्वरूप दिये जायेंगे,
वहीं सूर्य की आँखें फोड़ दी जायेंगी,
हाथ-पाँव काट दिये जायेंगे और जीवन भर
यूँ ही मरने के लिये छोड़ दिया जायेगा ।
...और काले अंग्रेजों को यह भी दृढ़ विश्वास है कि
धरती पर छायी धुंध पूरे ब्रह्माण्ड की धुंध है, सूर्य इस धुंध से कभी मुक्त नहीं हो सकेगा । सूर्य का
अंत निश्चित है । अब ब्रह्माण्ड में केवल धूम्रकेतुओं का ही साम्राज्य होगा।