मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

उपनयन संस्कार आमंत्रण पत्र प्रारूप


आधुनिक भारतीय समाज में उपनयन संस्कार की परम्परा लुप्त सी होती जा रही है । स्थिति यह है कि आमंत्रणपत्र छपवाने के लिये प्रेस वालों के पास इसके प्रारूप तक उपलब्ध नहीं हैं । हमने अंतरजाल पर खोजने का प्रयास किया किंतु वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी । तब मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि क्यों न इसका एक प्रारूप बनाया जाय ।

सनातनधर्मी आर्यों के षोडश संस्कारों में एक प्रमुख संस्कार है उपनयन संस्कार जो गुरुकुल जाने के समय किया जाता था । आधुनिक समय में गुरुकुल परम्परा के समाप्त हो जाने से इस संस्कार का भी महत्व लगभग समाप्त सा हो गया है । परम्परा निर्वहन के लिये अब केवल ब्राह्मण परिवारों में प्रायः विवाह के समय ही लड़कों को यज्ञोपवीत धारण करवा दिया जाता है जबकि “संस्करणं सम्यक करणं वा संस्कारः” एवं “संस्कारो हि गुणंतराधानमुच्यते के अनुसार यह आज भी प्रासंगिक बना हुआ है ।


वास्तव में उपनयन संस्कार द्विज होने की प्रक्रिया का एक व्रत है, एक तपश्चर्या है, उत्कृष्ट गुणों का अभ्यास है, आचार और विचार में निरंतर परिमार्जन की प्रक्रिया है, त्रुटियों की पुनरावृत्ति को रोकने का अनुभूत योग है, निरंतर सुधार की प्रक्रिया है, सभ्यता का प्रथम सोपान है, मानव जीवन को पवित्र, उत्कृष्ट और लोकहितकारी बनाने वाला एक आध्यात्मिक उपचार है । आज भले ही गुरुकुल प्रथा समाप्त हो गयी है किंतु संस्कार की आवश्यकता तो बनी ही हुयी है । संस्कारचेतना और संवेदना की वह सात्विक प्रक्रिया है जो मनुष्य के आचरण को सामाजिक एवं व्यावहारिक जीवन में ग्राह्य और अनुकरणीय बनाती है । 


                                      उपनयन संस्कार आमंत्रणपत्र  

                                                                        
                               
वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये । जगतः पितरौ वंदे पार्वती परमेश्वरौ ॥

स्नेही स्वजन !

“संस्कारो हि गुणंतराधानमुच्यते। आर्यो में प्रतिष्ठित ‘संस्कार’ चेतना और संवेदना की वह सात्विक प्रक्रिया है जो मनुष्य के आचरण को सामाजिक एवं व्यावहारिक जीवन में ग्राह्य और अनुकरणीय बनाती है । सनातनधर्म में द्विज होने की तपश्चर्या के प्रयासस्वरूप मेरे पुत्र चिरञ्जीव ..............
 प्रपौत्र श्री ........... पौत्र श्री ...................
के
उपनयन संस्कार (यज्ञोपवीत) के शुभ अवसर पर
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, विक्रम संवत २०७२
तदनुसार दिनांक २८ मई २०१५, दिन गुरुवार को
आप सभी सपरिवार सादर आमंत्रित हैं  । कृपया इस शुभ अवसर पर पधार कर ब्रह्मचारी को आशीर्वचन देकर हमें अनुग्रहीत करें ।

कार्यक्रम विवरण

उपनयन संस्कार                         – दिनांक २८ मई, २०१५; दिन गुरुवार,  प्रातः १० बजे
ब्रह्मभोज                                    – रात्रि ८ बजे से आपके आगमन तक ।
स्थान                                        – ................................................
प्रेषक –
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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

अफ़गानिस्तान की ग़रीबी और मज़हबी उन्माद का सौदा


अफ़गानिस्तान की ग़रीबी और मज़हबी उन्माद का सौदा

       ईसवी सन 652 में अफ़गानिस्तान में प्रवेश करने वाले इस्लाम ने अफगानिस्तान के जनजातीय कबीलों, ज़ोरोआस्ट्रियंस, पैगन्स, बौद्धों और सनातनधर्मियों को अपने हरे झण्डे के नीचे आने के लिये मज़बूर कर दिया था । यह वह ज़माना था जब अरब देश पूरी दुनिया में इस्लामिक विस्तार में लगातार कामयाब होते जा रहे थे । वे वर्तमान इज़्रेल से आगे बढ़कर ईरान, अफ़गानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताज़िकस्तान, उज़बेकिस्तान आदि देशों से होते हुये चीन और मंगोलिया की ओर बढ़ते जा रहे थे । 
ज़ल्दी ही भारत की धरती अरबों, शकों, हूणों और मंगोलिया के नव मुसलमान बने आदिवासियों के लिये भाग्यशाली साबित हुयी । इनमें से कुछ भारत में रच-बस गये तो कुछ हिन्दुस्तान के मालिक बनने में कामयाब हुये ।

      सोलहवीं शताब्दी के आते-आते सुदूर योरोप के कुछ देशों ने भारत में अपने पैर जमाने की कोशिशें कीं जिनमें से अंग्रेज़ कहीं अधिक सफल हुये । यह वह ज़माना था जब अंग्रेज़ पूरी दुनिया पर अपनी हुकूमत का सपना पूरा करने के लिये हर अनैतिक और अनानवीय हथकण्डा अपनाने में लगे हुये थे । भारत की अधिकांश देशी रियासतों के साथ-साथ बड़ी-बड़ी हुकूमतों पर भी अंग्रेज़ काबिज़ होते जा रहे थे । सिल्करूट से होते हुये चीन और रूस तक पहुँचने के लिये उत्तरपश्चिम के अफ़गानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कज़ाकिस्तान और ताज़िकिस्तान जैसे देशों को अपने कब्ज़े में करना अंग्रेज़ों के लिये ज़रूरी हो गया था । ब्रिटिशइण्डिया ने अफ़गानिस्तान पर हमला कर दिया । ख़ुद्दार अफगानी उन्हें अपने मुल्क में घुसने से रोकने में कामयाब रहे लेकिन तब तक दुनिया की दो और बड़ी ताकतों की निगाहें अफ़गानिस्तान पर जम गयीं । रूस ने अफ़गानिस्तान को अपना निशाना बनाया तो अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ मिलकर रूस के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया । रूस को वहाँ से जाना पड़ा लेकिन इस बीच अमेरिका और पाकिस्तान द्वारा पैदा किये गये भस्मासुर अपना वर्चस्व बना सकने में कामयाब हो गये । इस्लामिक शरीयत कानून की ज़द में पूरी दुनिया को लाने के लिये तालिबान और अलकायदा जैसे कट्टर संगठनों ने धार्मिक सत्ता स्थापित करने के लिये पूरी दुनिया में आतंक फैलाना शुरू कर दिया । आंतरिक संघर्षों, राजनैतिक अस्थिरता और विदेशी आक्रमणों से अफगानिस्तान जर्जर हो चुका था । अफ़गानिस्तान की ग़रीबी का सौदा किया गया । युवक और किशोर भी महज़ दो जून की रोटी के बदले में धार्मिक उन्मादी बनते जा रहे थे । पूरा अफ़गानिस्तान धार्मिक उन्मादियों के कब्ज़े में आ गया .....अशिक्षा और ग़रीबी बढ़ती गयी, अफ़गानिस्तान अवैध नशीले कारोबार का अड्डा बन गया ।  

     पाकिस्तान के कट्टरवादियों को अफ़गानिस्तान की धरती पर ख़ूनी खेल में मज़ा आने लगा था तो अमेरिका बड़ी ख़ामोशी से अपने हित साधने और अपनी दादागीरी बढ़ाने में लग गया । 1991 में रूस के टुकड़े हो गये और वह नेपथ्य में चला गया । इस बीच अमेरिका और पाकिस्तान की बोयी विषबेल दीग़र मुल्कों में भी पूरी तरह फैल चुकी थी और अब अमेरिका और पाकिस्तान भी उसकी विषाग्नि में झुलसने लगे । अंततः, पहले अमेरिका को और फिर पाकिस्तान को अपनी कूटचालों में पक्षपातपूर्ण परिवर्तन करने के लिये मज़बूर होना पड़ा । आज ये दोनो देश आतंकवाद के ख़िलाफ़ हैं किंतु सिर्फ़ अपने देश की धरती के लिये, वे दुनिया से आतंकवाद ख़त्म नहीं करना चाहते । 


कभी भूस्खलन तो कभी तालिबानियों के बौद्धिक स्खलन से ढहते कहर के बीच
खंडहर होते घर,
क्या यही है अफ़गानिस्तान की नियति ?  


गुफ़ाओं में घर


मनुष्य के साथ मनुष्य का व्यवहार इतना क्रूर कैसे हो सकता है ? किंतु यह है ......और ख़त्म होने का नाम भी नहीं ले रहा । 


तबाह करने वालों की तलाश में
कुछ और तबाहियाँ की तलाश 


ख़ौफ़ के सन्नाटे की गवाही 

हर तरफ़ दहशत और सिर्फ़ दहशत 


गृहयुद्ध में अपने दोनो हाथ खो चुकी एक छोटी सी बच्ची
अब चालीस साल की प्रौढ़ा हो चुकी है ।
ज़िन्दगी की मुश्किलों को रोज़मर्रा के अभ्यास में ढाल चुकी
इस स्त्री के दर्द की जाति क्या है ? 


अफ़गानी मासूमों का सामना विदेशी गन से 

रूस-पाकिस्तान और अमेरिका की तिकड़ी में फस गया काबुलीवाला अब कहीं नज़र नहीं आता, हो सकता है उसका भी घर किसी बम धमाके में धूल बनकर उड़ गया हो और अब उसका नाम-ओ-निशान भी न बचा हो । 


मासूमियत को कुचलती हैवानियत के सबक ! यह कौन सा धर्म है ?


मासूमियत पर तालिबानियत का काला साया ।
यह कौन सी इबादत है ? यह कैसी तालीम है जो सिर्फ़ मौत का खेल खेलना जानती है ? अफ़गानिस्तान की ख़ूबसूरत धरती को दोज़ख़ में तब्दील कर देने का क्या हक़ बनता है किसी को ? 


नन्हा तालिबानी 


हैवानियत का खेल देखने को मज़बूर कोमल मन 


अफ़गान में तालिबान  - चलो हैवानियत का खेल खेलें .....



बुधवार, 1 अप्रैल 2015

हक़ सपनों को जीने का

हक़ सपनों को जीने का

         अफ़गानिस्तान की ग़रीबी ने कुछ अफ़गानियों को ख़ूनी खेल का प्यादा बना दिया, वे अवैध नशे के कारोबार से जुड़ते गये, इस्लाम के नाम पर अपने ही भाइयों का ख़ून बहाते रहे ......और अपनी ही मासूम बच्चियों के ग़ुनहगार बनते गये .......ऐसे ग़ुनहगार जिसकी मिसाल भारतीय उपमहाद्वीप में इससे पहले कभी नहीं मिलती । 
         बच्चियों के यौनशोषण और उत्पीड़न के मामले में वे हैवानियत की सारी हदें पार करते चले गये । अपने से कई गुने उम्र के बुज़ुर्गों से शादी न करने की सज़ा उन्हें अपने नाक-कान गंवा कर देने के लिये मज़बूर होना पड़ता है । 
         इस्लाम के नाम पर आधी आबादी पर कहर टूटने की घटनायें कुछ  कम ज़रूर हुयी हैं किंतु पूरी तरह ख़त्म नहीं हुयीं । पड़ोस में कुछ लोग हैवानियत के शिकार होते रहें तो शेष दुनिया के लोगों को जगना ही होगा । 


काबुलीवाला तुम कहाँ हो ? 


रूस-पाकिस्तान और अमेरिका की तिकड़ी में फस गया काबुलीवाला अब कहीं नज़र नहीं आता, हो सकता है उसका भी घर किसी बम धमाके में धूल बनकर उड़ गया हो और अब उसका नाम-ओ-निशान भी न बचा हो । 


नीचे ओसामा ...ऊपर ख़ुदा ..........मगर मेरी कोई नहीं सुनता ......
कि मैं भी दुनिया की दीगर बच्चियों की तरह गुड़िया से खेलना चाहती हूँ ....


कोई बतायेगा .....मेरा ग़ुनाह ? क्यों अभिषप्त बना दिया है मुझे ? 
इस्लाम के नाम पर क्रूरता के कहर ढा कर किस ख़ुदा की इबादत करते हो तुम ? 


हक़ हमें भी है सपने देखने का .........
और उन्हें जीने का 



निकाह के नाम पर कामी बूढ़े की हबस की शिकार होने से ठीक पहले ......शून्य में खोयी दृष्टि ! मामा शकुनि का मुल्क कितना क्रूर हो गया है ..... 



क्रूर सैनिक कार्यवाही की दहशत अब नन्हें सपनों को ख़ौफ़ज़दा नहीं करती 




किसी देश की धरती पर विदेशी सैनिकों का होना अशुभ की घोषणा है । 


ज़ेहाद की कालिमा अगर हिफ़ाज़त में हो तो वहाँ कोई रोशनी कदम कैसे रख सकेगी !  


पढ़ायी के प्रति अफ़ग़ानी बच्चों का यह जज़्बा क़ाबिल-ए-तारीफ़ है,
हम उम्मीद की इस किरण को तहेदिल से सलाम करते हैं ।