बुधवार, 6 अप्रैल 2016

राष्ट्रप्रेमियों को लाठी, राष्ट्र्द्रोहियों को बिरियानी ....

यही है भारत का वर्तमान जो भविष्य का एक भयानक चित्र उपस्थित करता है । यदि आप इस चित्र को और स्पष्ट देखना चाहते हैं तो आपको मेरे साथ 26 वर्ष पूर्व के कालखण्ड की एक झलक देखनी होगी । 1990 में जब मैं एन.आई.ए. जयपुर में एम.एस. का छात्र था, एक कश्मीरी ब्राह्मण छात्र प्रायः मुझसे मिलने आया करता था । एक दिन उसने बताया था कि घाटी में पण्डितों को नारकीय स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है । वहाँ के मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजस में स्थानीय सीनियर्स उत्तरभारतीयों को हिन्दुस्तान मुर्दाबाद और पाकिस्तान ज़िन्दाबाद के नारे लगाने के लिये या फ़िर घाटी छोड़ने के लिये मज़बूर करते हैं ।

यह 1990 की बात है जब घाटी में कश्मीरी पण्डितों को मारा-पीटा जा रहा था, उनकी हत्यायें हो रही थीं, उनकी लड़कियों से बलात्कार हो रहे थे और उन्हें अपने पूर्वजों की धरती छोड़ने के लिये मज़बूर किया जा रहा था । घाटी के पण्डित अपनी सारी सम्पत्ति कश्मीरी मुस्लिमों को लुटाकर दिल्ली के शरणार्थी शिविरों में जीने के लिये मज़बूर हो रहे थे । यह एक इस्लामिक उन्माद था जो दीर्घकाल से घाटी में पोषित होता आ रहा था ।

स्वतंत्र भारत में यह भी एक दौर था जब महबूबा मुफ़्ती की रिहायी के बदले में देशद्रोहियों को जेलों से निकालकर उनकी माँद तक पहुँचाने की एक नयी परम्परा का सूत्रपात हुआ जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की अपंगता का सबसे कुरूप चरित्र है । आज वही महबूबा कश्मीर की मुख्यमंत्री हैं जिनके शासन में एन.आई.टी. की छात्राओं को स्थानीय नागरिकों द्वारा बलात्कार की धमकियाँ दी जा रही हैं । 1990 में भी यही हुआ था जब कश्मीरी पण्डितों की लड़कियों को बलात्कार की न केवल धमकियाँ दी जाती थीं बल्कि उनके साथ बलात्कार की क्रूर घटनायें हो भी रही थीं । यही वह कारण था जिसने पण्डितों को घाटी छोड़ने पर विवश कर दिया था । पण्डितों के बाद अब ग़ैरकश्मीरियों की बारी है और देश के बुद्धिजीवी ख़ामोश हैं । मुझे घिन आने लगी है इन बुद्धिजीवियों से ।

तो किस्सा यह हुआ कि 31 मार्च 2016 को वेस्ट इण्डीज़ और भारत के बीच टी.ट्वेंटी मैच में भारत की पराजय पर कश्मीरी छात्रों द्वारा ज़श्न मनाते हुये श्रीनगर के एन.आई.टी. कैम्पस में पाकिस्तानी ध्वज फहराया गया और पाकिस्तान ज़िन्दाबाद के नारे लगाये गये । इस राष्ट्रविरोधी गतिविधि का विरोध करने के लिये ग़ैरकश्मीरी छात्रों द्वारा अगले दिन एक अप्रैल को तिरंगा लहराया गया तो छात्रों के दोनो समूह आमने-सामने आ गये और विवाद हुआ । केन्द्र सरकार के अधीन संचालित संस्था के कैम्पस में तिरंगा लहराने वाले छात्रों को जेके पुलिस द्वारा “साले हिन्दुस्तानी” कहकर बुरी तरह पीटा गया जबकि पाकिस्तान ज़िन्दाबाद के नारे लगने वालों पर जेके पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की । जेके पुलिस ने छात्रों से तिरंगा छिना लिया । और उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया ।

यह तो उबाल था जबकि आग तो दशकों पहले से भड़कती रही है । लड़कियों को स्थानीय नागरिकों द्वारा बलात्कार की धमकियाँ दी जाती रही हैं । प्रोफेसर्स द्वारा परीक्षा में 1-2 नम्बर देकर ज़िन्दगी तबाह कर देने की धमकी दी जाती रही है । छात्रों की केवल दो ही मांगे हैं – 1- जेके पुलिस से उनका तिरंगा वापस दिलाया जाय और 2- एन.आई.टी. को शिफ़्ट किया जाय ।


एन.आई.टी. श्रीनगर में पाकिस्तान प्रेमी भारतीयों ने उत्पात किया, ग़ैरकश्मीरी छात्रों के साथ मारपीट की और उस भारत के प्रति अपनी नफ़रत का प्रदर्शन किया जो उन्हें उच्चशिक्षा उपलब्ध करवा रहा है । पी.डी.पी. की महबूबा ख़ामोश हैं और गठबन्धन का हिस्सा बनी भाजपा स्वयं को जंजीरों में जकड़ा पा रही है । कश्मीर की उच्चशिक्षित नयीपीढ़ी यदि कश्मीर को पाकिस्तान का एक हिस्सा बनाना चाहती है और पृथकतावादी शीर्ष नेताओं का आशीर्वाद भी उन्हें प्राप्त हो तो कोई भी शक्ति कश्मीर को अधिक समय तक मनमानी करने से कैसे रोक सकेगी, विशेषकर तब और भी जबकि शेष भारत के राजनीतिज्ञों में भी पारस्परिक विद्वेष हो, राष्ट्रीय भावना का अभाव हो और अपनी सम्पूर्ण शक्ति एक-दूसरे को नीचा दिखाने में ही जाया करने की तीव्र प्रतिद्वन्दता की वृत्ति हो ?
भारत अपने विभिन्न अंतर्द्वन्द्वों में जकड़ता जा रहा है, राजनीति में अपराधियों का वर्चस्व है और परिस्थितियाँ लोगों को सच बोलने के लिये हतोत्साहित करने वाली हैं । हमें अब यह स्वीकर कर लेना चाहिये कि स्वातंत्र्योत्तर भारत में बिखराव और पारस्परिक टकराव की प्रक्रिया जन्म ले चुकी है । 

नयी पीढ़ी की भारत के प्रति यह बगावत मामूली बात नहीं है । आये दिन होने वाली इस तरह की घटनायें थमने का नाम नहीं ले रहीं । कश्मीर की सत्ता में पी.डी.पी. और भा.ज.पा. के गठबन्धन की सरकार है । पी.डी.पी. का पृथकतावादी तत्वों के प्रति रुझान नरम है या यूँ कह लीजिये कि सहयोगी है । निश्चित् ही भा.ज.पा. कश्मीर में बेबस है । कश्मीर के युवा शेष भारत की आर्थिक मदद पर अपना विकास कर रहे हैं तो ज़ाहिर है कि उन्हीं के द्वारा उठायी जाने वाली पृथकतावादी आवाज़ों से शेष भारत के लोगों को तकलीफ़ होगी । सरकार को इस बात पर गहरायी से मंथन करने की आवश्यकता है कि आख़िर कश्मीर के युवाओं को पाकिस्तान से इतनी मोहब्बत और भारत से इतनी नफ़रत क्यों है ?

हम वर्तमान भारत के भीतर एक और हिंदुस्तान और पाकिस्तान देखते हैं । भारत के भीतर का यह हिन्दुस्तान हिन्दुओं और मुस्लिमों का है जबकि भारत के भीतर का पाकिस्तान एक और बंटवारे के लिये बेताब है । क्या यह भारत का दुर्भाग्य और सरकारों की असफलता का परिणाम है ?
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोग पाकिस्तान से मुक्त होना चाहते हैं और भारतीय कश्मीर के लोग पाकिस्तान में शामिल होना चाहते हैं । इस मामले में दोनो देशों की सरकारों का रवैया विचारणीय है । आख़िर कश्मीर घाटी के लोग कब चैन की सांस ले सकेंगे ?
एन.आई.टी. श्रीनगर के भारत विरोधी ये छात्र भारत सरकार द्वारा प्रदत्त सुविधाओं का लाभ उठाकर भारत के तकनीकी शत्रु की भूमिका निभाने के लिये तैयार होने जा रहे हैं । तकनीकी ज्ञान में दक्ष होकर ये छात्र हमारे लिये ग़ुलाब की नहीं घातक हथियारों की खेती करने जा रहे हैं । स्पष्ट है कि भारत में भारत के शत्रुओं की एक घातक खेप तैयार हो रही है ।

भारत के भीतर कई विश्वविद्यालयों के छात्रों और शिक्षकों द्वारा भारत के विरोध में हो रहे अनवरत व्याख्यानों और प्रदर्शनों पर सरकार की नीति अभी तक स्पष्ट नहीं है । इन घटनाओं पर राज्य सरकारों का कोई अंकुश भी नहीं है । हमारी चिंता का विषय यह है कि भारत की शिक्षित पीढ़ी का भारत के प्रति ऐसा विघटनकारी चिंतन क्यों है ? भारत की आम जनता के आर्थिक सहयोग से उच्चशिक्षा संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र और उनके गुरु जी बड़ी ग़ुस्ताख़ी के साथ जनता के पैसों की डकैती डाल रहे हैं और सरकारें मूक-दर्शक बनी हुयी हैं । राज्य सरकारों ने अभी तक हमें हमारी चिंताओं के लिये लेश भी आश्वस्त नहीं किया है । हम जानना चाहते हैं कि भारत की आम जनता यूँ ही लुटती रहेगी और अपने पैसे से अपने लिये दुश्मन तैयार करती रहेगी ?
भाजपा गठबन्धन सरकार को अपना गठबन्धन समाप्त करने के लिये गम्भीरता से विचार करना चाहिये । जेके पुलिस के जिन जवानों ने ग़ैर कश्मीरी छात्रों को “साले हिन्दुस्तानी” कहकर पिटायी की है उन पर देशद्रोह का मुकद्दमा चलना चाहिये । दूसरी ओर, भाजपा यदि सोचती है कि वह कश्मीर में सत्ता में बने रहकर देश का कुछ भी भला कर सकने की स्थिति में हैं तो यह उनकी भयानक भूल है । सत्य यह है कि वहाँ भाजपा सत्ता में रहकर देश और दल दोनो को गम्भीर क्षति पहुँचाने का कारण बन रही है ।  
अब प्रश्न यह उठता है कि हम भारत के आम नागरिक केन्द्र सरकार को जेके के लिये कोई टैक्स क्यों दें ? क्या हम हमारे धन का एक हिस्सा हमारे विरुद्ध स्तेमाल करने के लिये दें ? क्या हम अपना पैसा उन लोगों की उच्च शिक्षा के लिये दें जो हमारी लड़कियों से बलात्कार करना चाहते हैं ? हम टैक्स न देकर अपराधी नहीं बन सकते किंतु भारत सरकार से यह माँग तो कर ही सकते हैं कि हमारे दिये गये टैक्स का कोई हिस्सा जेके पर ख़र्च न किया जाय ।  


आज मैं यह स्वीकार करता हूँ कि श्रीनगर के एन.आई.टी. की इस घटना ने मेरे मन में उच्चशिक्षा संस्थानों के शिक्षकों के प्रति नफ़रत और हिकारत को और भी बढ़ा दिया है । मेरी इस नफ़रत में राष्ट्रविरोधी शिक्षक तो हैं ही, वे भी हैं जो शिक्षक होकर भी अन्याय के विरुद्ध मौन हैं । बल्कि मेरी नफ़रत में हर वह भारतीय भी सम्मिलित है जो भारत में लगी आग से निर्लिप्त है ।  

सोमवार, 28 मार्च 2016

लगी हुयी है आग

युद्ध

महाभारत का युद्ध
अभी समाप्त नहीं हुआ है ।
अभिमन्यु आज भी चक्रव्यूह में घिरा है
और भीष्म महामण्डलेश्वर हो गया है ।
पाण्डव कहीं अज्ञातवास पर हैं, 
कृष्ण ने अपनी भूमिका बदल दी है
और जनता चौपाई गा रही है –
कोउ नृप होहि हमैं का हानी .. 
  
ग़रीब साम्यवाद की अमीर ख्ख़्वाहिशें

कन्हैया ग़रीब है
बेहद ग़रीब है
वह ग़रीबी को भगाना चाहता है
ग़रीबों के लिये लड़ना चाहता है
लड़ाई के लिये देश-विदेश जाना चाहता है
आँगनबाड़ी में काम करने वाली उसकी माँ
एक-एक पाई जोड़कर
हवाई जहाज की टिकट की व्यवस्था करती है ।
कन्हैया
अब आसमान में उड़ता है
अपने नारों में लाल रंग भरता है ।
दोस्तो !
साम्यवाद की शुरुआत
कुछ इसी तरह होती है
जो कुछ समय बाद
थ्येन-ऑन-मन चौक पर
लाल रंग में ख़त्म हो जाती है ।   

एक हिंदू की मौत

भारत की राजधानी में
एक डॉक्टर की हत्या होती रही
और पड़ोसी सहिष्णु बन गये ...
क्रूर हिंसक तमाशे पर
समाज की निर्विकारिता
और अ-प्रतिक्रिया ने
शिक्षा को उसकी औकात बता दी ।
संस्कृति
कटघरे में खड़ी हो गयी
और लोग होली मनाने
घरों में दुबक गये ।
मामला एक डॉक्टर का था
जो न तो दलित था और न मुस्लिम
इसलिये
चिंता की कोई बात नहीं
जाइये .....
आप भी सो जाइये
रात बहुत गहरी हो चली है ।          

हैरानी

केसरिया इनका, लाल उनका,  हरा हमारा ....
ऊपरवाला हैरान है
रंग बनाते समय
यह तो कभी सोचा ही नहीं !

ग़नीमत है
कि झगड़े रंगों में नहीं
रंगे हुये लोगों में हैं ।

बटवारा

पहचान बट गयी
धर्म बट गये
महापुरुष बट गये
रंग बट गये
वेश बट गये
देश बटना शेष है एक बार फिर ।
असुर शक्तिशाली हैं
और बेचारी प्रजा को भरोसा है
कि होने ही वाला है कोई अवतार
शेष लोग प्रतीक्षारत् हैं
देखने के लिये
देश को बटता हुआ
एक बार फिर ।
क्या भारत

सचमुच एक चेतनाशून्य देश हो गया है !   

गुरुवार, 17 मार्च 2016

वैश्विक संस्कृति एवं वैश्विक समाज – एक यूटोपियन थॉट


भारत में वामपंथी चिंतन की जड़ें मार्क्स, लेनिन, स्टालिन और माओवाद से पोषित होती रही हैं । वामपंथी विचारधारा की नयीपौध तैयार करने के उद्देश्य से उच्च शैक्षणिक संस्थानों के उपयोग ने एक नये युग का सूत्रपात किया है । दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय इसमें अग्रणी रहे हैं । जे.एन.यू. का चिंतन अपने विस्फोटक स्वरूप के कारण कई बार चर्चा में आता रहा है । उसकी इस विशिष्टता के कारण हम उसे “जेनुयाई चिंतन” कहना चाहते हैं । जेनुयाई चिंतन को भारतीय चिंतक विरोधाभासी चिंतन मानते हैं । किंतु किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पूर्व जेनुयाई चिंतन के कुछ प्रमुख बिन्दुओं पर तार्किक विमर्श करना उचित होगा । इस चिंतन के प्रमुख आधार तत्व हैं –
      मानव-मानव में कोई भेद नहीं होता इसलिये जाति, धर्म या अन्य किसी आधार पर विश्वमानवसमाज का वर्गीकरण असमानता और शोषणजनक होने से निन्दनीय और त्याज्य है ।
      ईश्वर एक अवैज्ञानिक विचार है जिसका कोई प्रामाणिक अस्तित्व नहीं है । ईश्वर की अवधारणा व्यक्ति को भाग्यवादी बनाती है जिससे वह अपने दुःखों के लिये सत्ता और समाज की व्यवस्था को नही बल्कि किसी अदृश्य शक्ति को उत्तरदायी मानकर अपने साथ होने वाले अन्याय को बिना किसी विरोध के स्वीकार कर लेता है ।
      धर्म एक ऐसी अवधारणा है जिसकी मानव को उसके व्यावहारिक जीवन में कोई आवश्यकता नहीं होती । दूसरी ओर धर्म समाज को विखण्डित करता है और व्यक्ति को पाखण्डपूर्ण कर्मकाण्डों में उलझा देता है ।
      भैंस और बकरी की तरह मनुष्य भी अपने आप में एक जाति है इसके अतिरिक्त मनुष्य की अन्य कोई जाति या उपजाति हो ही नहीं सकती ।
      मानव की एक ही जाति है इसलिये उसका केवल एक ही समाज है । एक ही समाज होने कारण उसकी एक ही संस्कृति है और एक ही राष्ट्र है । मानव समाज का वर्गीकरण अवैज्ञानिक होने से स्वीकार्य नहीं है ।
      मनुष्य का स्वाभाविक अधिकार पूरी धरती पर है इसलिये वैश्विक राष्ट्र की अवधारणा ही नैसर्गिक है । विभिन्न राष्ट्रों की अवधारणा का मूल शासन और शोषण करने की प्रवृत्ति में स्थित है इसलिये यह अन्यायपूर्ण होने से अग्राह्य है ।
      राष्ट्रवाद युद्धों की पृष्ठभूमि तैयार करता है जिसमें निर्बलजन, जो कि सदा ही शासित होते हैं, अन्यायपूर्ण हिंसा और मृत्यु के शिकार होते हैं । राष्ट्रवाद एक ऐसी चाल है जो शासकों को शासन और शोषण करने के लिये सतत सुरक्षा उपलब्ध करवाती है ।
      सबल और दबंग व्यक्ति ही शासक बनने के लिये संघर्ष करते हैं जिनमें निर्बलों का दुरुपयोग किया जाता है । शासन का उद्देश्य आम आदमी की समस्यायोंका समाधान करना नहीं बल्कि सत्ता की आवश्यकताओं को बनाये रखना होता है । इससे एक ऐसे तंत्र का विकास होता है जो शोषणमूलक सत्ता की रक्षा करता है ।
      सम्पूर्ण धरती के मनुष्य एक ही वैश्विकपरिवार के सदस्य हैं, मनुष्यों का केवल एक ही वैश्विकसमाज है, मनुष्य की केवल एक ही वैश्विकसंस्कृति है, पूरी धरती पर केवल एक ही वैश्विकराष्ट्र है ।


            यह चिंतन जेनुयाई संस्कृति के पुरोधा उच्चशिक्षित शिक्षकों का है जिसके प्रति नई पीढ़ी का आकर्षण बढ़ता ही जा रहा है । इस चिंतन को एकबारगी ही नकार देने की अपेक्षा इस आकर्षण के कारणों पर मंथन करने की आवश्यकता है । ईश्वर और धर्म के अस्तित्व की उपेक्षा करने वाला वामपंथ और जेनुयाई चिंतन विज्ञान और वैज्ञानिक प्रमाणों पर ही भरोसा करना चाहता है इसीलिये ये लोग बारम्बार विज्ञान की बात करते हैं ।  यहाँ हम सबसे पहले वैज्ञानिक प्रमाणों की वैज्ञानिकता पर ही चिन्तन करना उचित समझते हैं ।

            वामचिंतन दृष्टव्य भौतिकजगत और इन्द्रियग्राह्य अनुभूतियों के अतिरिक्त सत्ता के अन्य किसी अस्तित्व को नकारता है । इसलिये यहाँ हम व्यक्त(मैनीफ़ेस्ट) के पूर्व एवं पश्चात् की अव्यक्त(अनमैनीफ़ेस्ट) स्थिति की वैज्ञानिकता पर चिंतन नहीं करेंगे । किंतु वैज्ञानिक प्रमाणों की अल्प उपलब्धता और पारस्परिक वैज्ञानिक खण्डनों से उत्पन्न अनिश्चय एवं विरोधाभास की स्थिति के कारण भौतिक जगत के वे बहुत से तथ्य जो प्रश्नों के घेरे में हैं, क्या अस्तित्वविहीन मान लिये जायेंगे ?
            भौतिक जगत सीमित है, उसकी ग्राह्यता और भी अधिक सीमित है और उसकी वैज्ञानिकता के प्रमाण तो अत्यल्प हैं तो क्या सम्पूर्ण भौतिक जगत के अस्तित्व को अस्वीकार  कर दिया जाना उचित होगा ? चलिये, अब हम प्रामाणिकता की बात करते हैं । भौतिकवादी लोगों द्वारा सीमित भौतिक जगत के सीमित वैज्ञानिक प्रमाणों के लिये आधुनिक वैज्ञानिक विश्लेषणजन्य परिणामों को ही मान्य किया जाता है । किंतु ऐसा करते समय वे एकांगी परिणामों के स्वाभाविक दोषों को भी आमंत्रित करते हैं । मनुष्य की अपनी सीमायें हैं, वह जगत से ऊपर नहीं है, उसी का एक भाग है इसलिये उसका सर्वज्ञाता होने का विश्वास ही अवैज्ञानिक है । भौतिक जगत की भौतिकविश्लेषणात्मक प्रक्रिया ही विघटनात्मक होती है तब उससे प्राप्त परिणामों पर विश्वास कैसे किया जा सकता है ? कहीं न कहीं, कभी न कभी आप्तोपदेशों और ऐतिह्य प्रमाणों पर भरोसा करना ही पड़ेगा । ब्राउनियन मूवमेण्ट को कक्षा 10 वीं के कितने छात्रों ने प्रत्यक्ष देखा है ? फ़ोटॉन्स को कितने भौतिकशास्त्रियों ने देखा है ? ब्लैक होल्स को किसने देखा है ? माइटोकॉंडियल फ़ंक्शन्स, ब्रेन और जीन्स के गूढ़ रहस्य को कितना प्रत्यक्ष किया जा सका है ? किंतु क्या हम इन सब पर भरोसा नहीं करते ? हममें से हर व्यक्ति ने इसका प्रत्यक्ष नहीं किया है फिर भी हम सब इन पर भरोसा करते हैं क्योंकि अन्य लोगों ने इस पर भरोसा किया है । अन्य लोगों ने भरोसा इसलिये किया है क्योंकि उन तथ्यों पर कई वैज्ञानिकों ने भरोसा किया है । और यही तो आप्तोपदेश और ऐतिह्य प्रमाण है । तब ऋषियों के आप्तोपदेश के प्रति इतना दुराग्रह क्यों है ?
            हम सब जानते हैं कि प्रयोगशालाओं के विश्लेषणात्मक परिणाम सदा एक जैसे नहीं होते । उनमें प्रायः भिन्नता और अपूर्णता की सम्भावनायें बनी रहती हैं । तब यह सब कितना वैज्ञानिक है ? क्या ऐसी वैज्ञानिकता संदेह से परे है ?
            दृष्टव्य जगत की विविधतायें इसे जटिल बनाती हैं, इस जटिलता के रहस्य को जान पाना मनुष्य के वश की बात नहीं है । हम भौतिक विज्ञान के न्यूनतम अंश को ही जान सके हैं । इसलिये जेनुयाई भौतिकवाद की वैज्ञानिकता एकांगी होने से अव्याप्त दोष से ग्रस्त है ।   

अभी हमने जेनुयाई चिंतन के भौतिकवाद और उसके वैज्ञानिक पक्ष पर चिंतन का प्रयास किया जिसका सारांश यह कि वैज्ञानिक प्रमाणों और उनकी व्याख्या के लिये मनुष्य की सीमायें व क्षमतायें बहुत सीमित हैं । भौतिक जगत् के सभी रहस्यों को जान पाना और वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर उनकी व्याख्या कर पाना अभी पूरी तरह सम्भव नहीं हो पाया है किंतु अपनी इस सीमा के कारण हम भौतिक जगत के शेष अज्ञात रहस्यों की सत्ता और अस्तित्व की उपेक्षा नहीं कर सकते । ऐसा करना सत्य को नकारना होगा इसलिये कई बार हमें सत्य को ज्ञात भौतिक प्रमाणों के अतिरिक्त अन्य प्रमाणों के आधार पर जानने और मानने के लिये कोई मार्ग खोजना होता है । पराभौतिक एवं मनोवैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर ऐसे मार्ग खोजे जाने के प्रयास विश्व की सभी सभ्यताओं में न जाने कबसे होते आये हैं । आशय यह है कि किसी तथ्य और उसके अस्तित्व को वैज्ञानिक प्रमाणों के अभाव में असत्य घोषित कर दिया जाना एक अ-वैज्ञानिक आचरण है ।

जेनुयाई चिंतन के अनुसार मानव-मानव में कोई भेद नहीं होता इसलिये जाति, धर्म या अन्य किसी आधार पर विश्वमानवसमाज का वर्गीकरण असमानता और शोषणजनक होने से निन्दनीय और त्याज्य है । यदि हम उनके इस कथन की वैज्ञानिक व्याख्या करें तो पायेंगे कि यह एक बहुत बड़ा वैचारिक छल है जिसे बड़ी कुशलता से परोसा गया है । हम मानते हैं कि “मानव” अन्य प्राणियों से भिन्न गुणों वाली एक भिन्न प्रजाति है, इस प्रजाति में कोई भेद नहीं किंतु भौगोलिक स्थितियों एवं वातावरण के कारण उनके रहन-सहन, भोजन, चिंतन और आचरण आदि में विविधतायें पायी जाती हैं । उनकी क्षमता, सहनशीलता और दक्षता आदि में भी विविधता पायी जाती है । मानव रक्त के चार समूह होते हैं, कोई आवश्यक नहीं कि एक समूह का रक्त दूसरे समूह के रक्त के प्रति सहनशील हो । ब्लड-ट्रांस्फ़्यूजन से पूर्व ब्लड-ग्रुप की मैचिंग में हुयी असावधानी से किसी की मृत्यु सम्भव है । अंगप्रत्यारोपण के अनुभव हमें बताते हैं कि एक मनुष्य का अंग दूसरे मनुष्य के लिये उपयुक्त हो भी सकता है और नहीं भी । सेल्युलर रिज़ेक्शन एक सामान्य घटना है जिससे आज हम सभी परिचित हो चुके हैं । कुछ प्रकार की जेनेटिक व्याधियाँ विशेष प्रकार के एथिकल समूहों में ही मिलती हैं, सभी में नहीं । सिकलसेल और थैलेसीमिया जैसी व्याधियाँ कुछ जाति समूहों और रेसेज़ में ही पायी जाती हैं । ये वैज्ञानिक तथ्य यह प्रमाणित करते हैं कि एक ही प्रजाति होते हुये भी मनुष्य का शरीर और मन विविधताओं का भण्डार है जिसके कारण कई प्रकार के स्वाभाविक वर्ग अपने अस्तित्व में आते हैं । तथापि सामाजिक सुविधाओं एवं अधिकारों को लेकर उनमें कोई विभेद किया जाना अन्यायपूर्ण है । इसीलिये हम आरक्षण को भी मनुष्य के विकास मार्ग का अवरोध मानते हैं । वहीं हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि सब धान बाइस पसेरी नहीं तौला जा सकता । हम मनुष्य के सामाजिक-राजनैतिक वर्गीकरण का विरोध करते हैं किंतु स्वाभाविक क्षमताओं, दक्षताओं और रुचियों के कारण उनमें वर्गीकरण होना एक स्वाभाविक घटना है ।
जेनुयाई चिंतन ईश्वर और धर्म को लेकर अपने हठीले स्वभाव के लिये जाना जाता है । ईश्वर की सत्ता को नकारने के पीछे उनके अपने तर्क हैं किंतु भारतीय चिंतन (जिसे वे परम्परावादी चिंतन कहकर हेय दृष्टि से देखने के अभ्यस्त हैं) ईश्वर के अनादि, अनंत, अखण्ड, निर्विकार, निर्गुण और सनातन स्वरूप को स्वीकार करता आया है । ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और विलय की घटनाओं ने हमें मैटर और इनर्जी के पारस्परिक वैज्ञानिक सम्बन्धों के चिंतन के लिये सदा ही प्रेरित किया है । भौतिक विज्ञान की दृष्टि से इनके पारस्परिक रूपांतरण के सत्य को स्वीकारा जा चुका है । भारतीय चिंतनपरम्परा ‘व्यक्त’ और ‘अव्यक्त’ के मध्य एक निश्चित वैज्ञानिक सम्बन्ध की व्याख्या करती है । यह व्याख्या हमें अभिभूत करती है, हमें किसी इन्द्रियातीत परम व्यवस्था के अस्तित्व को स्वीकारने के लिये तैयार करती है । किंतु भारतीय मनीषा यहाँ भी हठ करती प्रतीत नहीं होती, व्यक्त-अव्यक्त को समझने के लिये यदि आपके पास कोई अन्य सिद्धांत है तो आप उसकी व्याख्या करने और स्वीकारने के लिये स्वतंत्र हैं ।
धर्म को लेकर मनुष्य समाज में कई धारणायें हैं । कुछ इसे अफ़ीम के रूप में देखते हैं तो कुछ इसे विज्ञान के रूप में भी देखते और स्वीकार करते हैं । धर्म का पाखण्ड उसे विकृत बनाता है जबकि नैसर्गिक स्व-भाव का बोध उसे आचरणीय बनाता है । गुड़ का मीठा होना उसका धर्म है, ब्लैक होल का तीव्र गुरुत्वाकर्षण उसका धर्म है, ब्रह्माण्डीय पिण्डों का परिभ्रमण उनका धर्म है, ब्राउनियन मूवमेण्ट पदार्थ का धर्म है, शांति और सुख के लिये प्रयत्न करना मनुष्य का धर्म है । क्या धर्म का यह स्वरूप अफ़ीम प्रतीत होता है ?
हम सिद्धांतों और शब्दों की भ्रामक और जानबूझकर मिथ्या व्याख्यायें करते रहे हैं । भारतीय चिंतन “स्व” “भाव” को धर्म मानता है । यह धर्म किसी भौतिक पिण्ड के अस्तित्व के लिये अपरिहार्य है । ग्रीष्म ऋतु में प्यास लगना शरीर का धर्म है । ग़र्मियों में हल्के और सफ़ेद कपड़े पहनना और सर्दियों में भारी और रंगीन कपड़े पहनना किसी क्षेत्र विशेष के लोगों का धर्म है । मर्यादित स्वतंत्रता हम सबका धर्म है । अनुशासन समाज का धर्म है । एकता राष्ट्र का धर्म है । और बन्धुत्वभाव का आचरण विश्व का धर्म है । दूसरे के धर्म को बाधित किये बिना अपने अस्तित्व को सात्विक तरीके से बनाये रखना धर्म है । और ऐसे धर्म का पालन न करना ही अधर्म है । दूसरों के धर्म पालन के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करना अधर्म है ।
समाज को धर्म विखण्डित नहीं करता, कर ही नहीं सकता । समाज को जो विखण्डित करता है वह है हठ, विचार थोपने की उग्रता और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानते हुये अन्य लोगों को हेय समझते हुये उनका उपहास करने की प्रवृत्ति ।

हम स्वीकार करते हैं कि धर्म और ईश्वर को लेकर अभी तक जितनी भी व्याख्यायें की गयी हैं उन्हें परवर्ती कालों में विकृत किया जाता रहा है । यह भी मनुष्य का एक स्वभाव है, स्थानीय स्तर पर समाज और वृहत स्तर पर राष्ट्र इस प्रकार के नकारात्मक स्वभाव को अनुशासित करने का प्रयास करते रहते हैं । क्या हम इन प्रयासों को आवश्यक नहीं समझते ? वस्तुतः व्यक्ति और समाज बहुत ही जटिल व्यवस्थाओं के बीच अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये बाध्य होते हैं । यह जटिलता ही हमें सहनशीलता, सद्भाव और सहकारिता के लिये प्रेरित करती है ।   

शनिवार, 12 मार्च 2016

जे.एन.यू. काण्ड

ख़ूनी ख़ंज़र के रखवाले लेने आये आज़ादी
गाली दे-दे माँग रहे वे जाने कैसी आज़ादी ॥
आग लगाकर घर में मेरे कहते दे दो आज़ादी
बन्दी है घर में ही उनके डरी-डरी सी आज़ादी ॥
गाँव का उनके हाल अज़ब सब आये करने बरबादी
सहमा-सहमा सच रहता है झूठ ने ले ली आज़ादी ॥
गरियाने की देवों-पुरुखों को उन्हें चाहिये आज़ादी
लिये कामिनी चौराहों पर नंग-नाच की आज़ादी ॥
मुझे बता दे इतना कोई ये कहाँ मिलेगी आज़ादी
जहाँ से उनको उठा के दे दूँ उनके मन की आज़ादी ॥
टुकड़े-टुकड़े कर घर मेरा बाँट रहे वे आबादी
आज़ादी हैरान देखकर असली-नकली आज़ादी ॥
स्मृति ग्रंथ जलाकर बोले यहाँ नहीं है आज़ादी
आतंकी को हीरो मनवाने माँग रहे हैं आज़ादी ॥  
रोज-रोज इनके करतब से घायल होती आज़ादी
मिथ्यारोपों की झड़ी लगा बोले यही है आज़ादी ॥
साम्यवाद से ब्याह रचाया मनबसिया है शहज़ादी
कश्मीरी पंडित को बेघर कर माँग रहे हैं आज़ादी ॥
हिंदू है किरकिरी आँख की, अरबी-चीनी दादा-दादी  

ख़ुद को कहते मूल निवासी माँग रहे हैं आज़ादी ॥  

गुरुवार, 10 मार्च 2016

राष्ट्रवाद की वैचारिक छिछियाहट

Lecture series on Nationalism – Prabhat Patnaik on “What it means to be National?” (09.03.2016)  # Stand with JNU
आज प्रभात पटनायक का भाषण सुना ...

राष्ट्रवाद पर बोलते हुये उन्होंने बताया कि भारतीय राष्ट्रवाद पश्चिमी उपनिवेशवाद की प्रतिक्रिया से उपजा राष्ट्रवाद है । आज का भारतीय राष्ट्रवाद पूँजीवाद का महिमामण्डन करता है, जबकि पश्चिमी राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि भारत से भिन्न है ।
पटनायक जी मृत्युदण्ड के विरोधी हैं भले ही वह कितना भी बड़ा अपराधी क्यों न हो । इस तरह उन्होंने वाम-आदर्शवाद के अनुरूप एक आमआदमी के मन में मानवता के रक्षक बनकर और जघन्य अपराधियों के मन में मुक्तिदाता बनकर अपनी बौद्धिक प्रतिभा की छाप छोड़ने का प्रयास किया है । वे राष्ट्रवाद को बीफ़ खाने और आतंकवादियों के समर्थन के मौलिक अधिकार से जोड़ने के पक्षधर नहीं हैं ।
वामपंथी एक बात बहुत दमदारी से कहते हैं –  “कुछ लोगों ने राष्ट्रवाद की अपनी परिभाषा बनायी है । उनकी बात और उनके सिद्धांतों को स्वीकार करना ही राष्ट्रवाद है और स्वीकार न करना ही राष्ट्रद्रोह है ।”

आज राष्ट्रवाद की कई परिभाषायें सामने आ रही हैं, और जिस रूप में आ रही हैं उससे यह आभास होने लगा है कि राष्ट्रवाद एक बहुत गन्दी बात हो गयी है, इतनी गन्दी कि अब एक ख़ूनी क्रांति होनी ही चाहिये
हमारा राष्ट्रवाद ... तुम्हारा राष्ट्रवाद ... उनका राष्ट्रवाद ...। भारत में कई राष्ट्रवाद आपस में युद्ध के लिये तैयार हैं । ईंटभट्टे पर काम करने वाला मज़दूर भकुआया खड़ा है ....यह राष्ट्रवाद क्या इतना ख़तरनाक मुद्दा है .... कि लोग इतने उत्तेजित हो रहे हैं !
वैचारिक छिछियाहट के साथ वामपंथी और उच्च शिक्षित जेनुयाई जनता से शिकायत कर रहे हैं ...देखो देखो ...मैं बीफ़ खाता हूँ तो ये मुझे राष्ट्रद्रोही कहते हैं, मैं मृत्युदण्ड का विरोध करता हूँ तो ये भगवायी मुझे राष्ट्रद्रोही कहते हैं, मैं पुलिस और सेना के जवानों से स्त्रियों के बलात्कार का विरोध करता हूँ तो ये फासीवादी लोग मुझे राष्ट्रद्रोही कहते हैं, मैं बापू के हत्यारे की पूजा नहीं करता हूँ तो ये संघी मुझे राष्ट्रद्रोही कहते हैं .... । क्या हमें बोलने की आज़ादी नहीं है ? क्या हम अपने दिल की सच्ची बात कहने का अधिकार नहीं रखते ?

संसद पर आक्रमण करने वाले और देश की सम्प्रभुता को चुनौती देने वाले षड्यंत्रकारियों को दिये जाने वाले मृत्युदण्ड को मानवाधिकार का उल्लंघन मानने वाले किंतु युद्ध में होने वाली सैनिक हत्याओं पर मौन रहनेवालों को बुद्धिवादी माना जाय या बौद्धिकशूद्र !
वैश्विक समाज और न्याय की वकालत करने वाले लोग, जो झीरमघाटी में सैनिकों की नृशंस हत्या कर उनके शवों पर नृत्य करने वाले माओवादियों के विरोध में एक शब्द नहीं कहते, उनकी बौद्धिकता को क्या संज्ञा दी जाय ! ये लोग मृत्यु-मृत्यु में इतनी विभेदक दृष्टि क्यों रखते हैं ? क्या उन्हें सबसे पहले युद्धों के विरुद्ध ही नहीं खड़े होना चाहिये ?
भारतीय राष्ट्रवाद के बारे में अपने पूर्व लेख मैं पहले भी कह चुका हूँ कि यह किसी प्रतिक्रिया का तात्कालिक परिणाम नहीं है, बल्कि “भारतीय राष्ट्रवाद अपने स्वाभाविक भौगोलिक विस्तार, विकसित सांस्कृतिक चेतना, भिन्न-भिन्न दार्शनिक सिद्धांतों की स्वीकार्यता, आध्यात्मिक चिंतन एवं उत्कृष्ट मानवीय मूल्यों की रक्षा के प्रति सजगता को केन्द्र मान कर स्वाभाविकरूप में विकसित हुआ है । इस राष्ट्रवाद में सत्तालिप्सा का स्वार्थ नहीं अपितु वैचारिक विरोधाभासों के होते हुये भी एक स्वाभाविक जनचेतना है । इसमें अपने जीवनमूल्यों के प्रति स्वाभिमान है, लोककल्याण के प्रति निष्ठा की भावना है और अपनी सांस्कृतिक चेतना के प्रति सम्मान का भाव है ।”
पटनायक जी ने हिटलर और गांधी के राष्ट्रवाद की चर्चा की । महोदय जी ! भारतीय राष्ट्रवाद हिटलर और गांधी से सहस्रों वर्ष पूर्व ही विकसित हो कर प्रतिष्ठित हो चुका था ।

आज मैं देश के सभी नागरिकों से ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लोगों से कहना चाहूँगा कि “एकांगी चिंतन” और “अर्धसत्य” बुद्धिवाद का वह संकट है जो सत्य और लोककल्याण की हत्या कर देता है । साम्यवाद एक ऐसा ही बुद्धिवाद है । इस लाल जादू से सावधान रहिये !