शुक्रवार, 17 मार्च 2017

मार्क्स का नया अवतार – फ़्रेंकफ़र्त स्कूल



हम मानते हैं कि ‘सामाजिक समानता’ समाज की एक उच्च आदर्श स्थिति है । यद्यपि व्यावहारिक धरातल पर इस स्थिति को अपने पूर्ण आदर्श स्वरूप में प्राप्त कर सकना सम्भव तो नहीं तथापि सामाजिक समानता की अधिकतम स्थिति को प्राप्त करना सम्भव है और इसके लिये सत्ता एवं समाज को मिलकर आगे बढ़ना चाहिये । भारतीय सभ्यता के विभिन्न युगों में इस दिशा में प्रयास किये जाते रहे हैं और उनमें सफलतायें भी मिलती रही हैं जिसके स्पष्ट प्रमाण प्राचीन भारतीय समाज व सत्ता व्यवस्था के इतिहास से प्राप्त होते हैं ।    
ओट्टोमन साम्राज्य के अंतिम दिनों में योरोपीय देशों में वहाँ की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों के विरुद्ध क्रांतियों की एक श्रृंखला प्रारम्भ हुयी । तत्कालीन व्यवस्थाओं के विरुद्ध विभिन्न वैचारिक सिद्धांत अस्तित्व में आये । इसी श्रृंखला में ज़र्मन विचारकों ने अन्याय और शोषण विहीन समाज की संरचना पर नये सिरे से चिंतन करना प्रारम्भ किया ।
ईसवी सन 1818 में जन्मे कार्ल मार्क्स ने पूर्व दार्शनिकों और समाजशास्त्रियों चार्ल्स फ़ोरियर, जॉर्ज़ विलहेम फ़्रेडरिक हेगल, और फ़्रेडरिक एंजेल आदि की वैचारिक पृष्ठभूमि को आगे बढ़ाते हुये एक वैश्विक समाज व्यवस्था की कल्पना की । बाद में मार्क्स की विचारधारा को और समृद्ध करते हुये कार्ल ल्यूकेक्स, कार्ल ग्रूनबर्ग, हेनरिक ग्रॉसमैन, फ़्रेडरिक पोलोक, मैक्स हॉरख़ेयमर, थियोडोर अडोर्नो और हर्बर्ट मार्क्यूज़ आदि चिंतकों ने कुछ अंतर्विरोधों के सा थ आगे बढ़ाया । वर्तमान में इस परम्परा के ज़ुर्गेन हॅबरमास नव-मार्क्सवाद के पुरोधा बनकर उभरे हैं ।
इस बीच नवमार्क्सवाद को आगे बढ़ाने के लिए 1923 में कार्ल ल्यूकेक्स और फ़ेलिक्स वेल द्वारा फ़्रेंकफ़र्त में एक शोध संस्थान की स्थापना की गयी । कार्ल ल्यूकेक्स की विचारधारा ने सामाजिक समानता के अतिवाद को अपनाया जिसे नव साम्यवाद के नाम से जाना गया । यह विचारधारा मनुष्य और प्रकृति से जुड़े सभी विज्ञानों और सिद्धांतों का सामान्यीकरण करती है अर्थात् प्राकृतिकविज्ञानों (Natural sciences) के सार्वभौमिक सिद्धांतों की तरह ही समाजविज्ञान के सिद्धांतों को भी देश-काल-समाज-परम्परा आदि से निरपेक्ष सार्वभौमिक स्वीकारते हुये पूरे विश्व के सभी समाजों की एक समान व्याख्या करती है । जबकि फ़िज़िक्स के सिद्धांतों की तरह समाज के सिद्धांतों का सामान्यीकरण किया जाना एक अवैज्ञानिक चिंतन और अव्यावहारिक प्रयास है । यहाँ यह समझना भी आवश्यक है कि अभी तक हुये शोध कार्यों से यह ज्ञात हुआ है कि आधुनिक प्राकृतिक विज्ञानों की ब्रह्माण्डीय व्यापकता सिद्ध नहीं हो सकी है । ब्रह्माण्डीय घटनाओं में कुछ ऐसी भी घटनायें होती हैं जहाँ धरतीवासियों के फ़िज़िक्स के सिद्धांत उनकी व्याख्या कर पाने में असफल रहते हैं । धरती पर भी बारमूडा त्रिकोण के क्षेत्र में आधुनिक फ़िज़िक्स के सिद्धांत धराशायी हो जाते हैं । ऐसी स्थिति में “मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना” वाले मनुष्य समूह में कोई व्यवस्था पूरी धरती के लिए लागू किया जा सकना कितना वैज्ञानिक हो सकता है ?   
समाज के सभी नियमों और परम्पराओं का सामान्यीकरण किया जाना मानव स्वभाव की विविधताओं को समाप्त कर देना है । मार्क्समूलक वैश्विक समाज की रचना भी मानव स्वभाव की इस विविधता को स्वीकार नहीं करती । उत्तरमार्क्स काल (post-Marx-period) में विविधता की अस्वीकार्यता इतनी प्रचण्ड हो उठी कि लिंगभेदमुक्त समाज के साथ-साथ लिंगमुक्त (Gender free) समाज की भी माँग़ उठने लगी । स्त्री-पुरुष के लैंगिक भेद को अभेद मानते हुये समलैंगिक यौनसम्बन्धों (Homosexuality) की प्रशस्ति की जाने लगी, समलैगिक सम्बन्धों को प्राकृतिक माना जाना लगा, यौन सम्बन्धों की वर्जनाओं को तोड़ते हुये स्वेच्छाचारिता एवं मुक्तयौन सम्बन्धों (Free sex) को प्रमुखता दी जाने लगी, विवाहपूर्व यौन सम्बन्धों (pre-marital sexual relations) को नैतिकता के बन्धन से मुक्त माना जाने लगा, अवैवाहिक साहचर्य (Live in relationship) एवं विवाहेतर साहचर्य (extra-marital relations) की वकालत की जाने लगी । अप्राकृतिक यौनाचारों से जुड़ी नैतिकता को कुंठा का कारण मानते हुये यौनाचारों के अप्राकृतिक होने की सम्भावनाओं को ही अमान्य कर दिया गया । एक ऐसे विश्व की रचना के प्रयास किये जाने लगे जहाँ मनुष्यों को भी पशुओं की तरह स्वैच्छिक यौन सम्बन्धों की स्वतंत्रता होती है ।   

मार्क्स बाबा यथास्थिति के विरोधी थे । उनका विचार था कि सारी समस्याओं का मूल यथास्थिति में ही है । बाबा के शिष्य “आलोचना एवं विरोध की संस्कृति” को लेकर सत्ता, समाज, धर्म, परिवार और विवाह तक पहुँच गये । उत्तरमार्क्सवाद व्यक्ति की जिस स्वतंत्रता की कल्पना करता है, न केवल उसका स्वरूप विकृत और वीभत्स है अपितु उसके परिणाम और भी विकृत एवं वीभत्स हैं । आप कल्पना कीजिये, जिस समूह में स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के लिए बिना किसी मर्यादा के उपलब्ध होंगे क्या वहाँ एक अराजकता और अव्यवस्था उत्पन्न नहीं होगी ? मार्क्स व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए व्यक्तिगत प्रेम की हत्या कर देने के पक्षधर थे । उनका विचार था कि व्यक्तिगत प्रेम के कारण ही लोग भ्रष्टाचार की ओर बढ़ते हैं । जब माता-पिता-पुत्र-पुत्री जैसा कोई सम्बन्ध ही नहीं होगा तो भ्रष्टाचार का प्रश्न ही नहीं उठता । उत्तरमार्क्सयुग के विद्वानों द्वारा इसकी व्याख्या को एक नया आयाम दिया गया जिसके अनुसार यौन सम्बन्ध तो रखे जाने चाहिये किंतु स्त्री-पुरुष के बीच पति-पत्नी, माता-पिता या भाई-बहन जैसे कोई सम्बन्ध नहीं होने चाहिये ।
मार्क्स बाबा ने जिस मनुष्य समूह की कल्पना की है वह एक भयावह चित्र उपस्थित करता है, इस चित्र में अव्यवस्था है, अमर्यादा है, अराजकता है और संस्कृति की शून्यता है । यूँ, मार्क्स बाबा की दृष्टि में मनुष्य जीवन के लिए संस्कृति और धर्म की कोई आवश्यकता नहीं हुआ करती ।

गुरुवार, 16 मार्च 2017

आलोचना का सिद्धांत (The theory of Criticism)...



आलोचना (Criticism) एक सामान्य एवं स्वाभाविक बौद्धिक प्रतिक्रिया (Cognitive reaction) है जो बौद्धिक एवं आचरणजन्य विकारों से मुक्ति (emancipation from the intellectual morbidity and moral deviation) की दिशा में परिमार्जन (Ablution) का प्रथम चरण होती है । यह वह प्रक्रिया है जो समाज को गतिशील बनाये रखती है । संकीर्ण अर्थों में की गयी आलोचना नकारात्मक एवं उदार अर्थों में की गयी सकारात्मक होती है, दोनों का अंतर आलोचक की दृष्टि और उद्देश्यों पर निर्भर करता है । भारतीय परम्परा में सम्भाषा परिषदों के माध्यम से स्वस्थ विमर्श को प्रशस्त माना जाता रहा है । भारत में आलोचना की नहीं, समालोचना की परम्परा रही है जो गुण-दोष के आधार पर एक संतुलन की स्थिति की माँग करती है । संतुलन का अभाव आलोचना को अतिवाद की ओर ले जाता है । 
इतिहास बताता है कि उत्कृष्ट सामाजिक व्यवस्था भी कभी स्थायी नहीं हो पाती, उसमें विकार आना स्वाभाविक है । भारत में इन विकारों की रोकथाम (Prevention of morbidity and deviation) एवं आचरण (personal as well as social conducts) में निरंतर परिमार्जन के लिये एक मान्य एवं व्यावहारिक सनातन व्यवस्था (eternal laws of the nature in the perspective of human nature) सुस्थापित की गयी जिसे सनातनधर्म के नाम से लोक प्रसिद्धि प्राप्त हुयी । कालांतर में उसके अनुयायियों में भी विकार आते चले गये और उस व्यवस्था के सिद्धांत मात्र उपदेश भर बनकर रह गये । किसी सिद्धांत की उपादेयता तभी तक है जब तक वह व्यावहारिक और प्रामाणिक है । पश्चिम भी जब कई प्रकार के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, औद्योगिक आदि विकारों से ग्रस्त हुआ तो उन विकारों के विरुद्ध स्वर उठने प्रारम्भ हुये । कार्ल-मार्क्स ने शोषणमुक्त (Free of exploitation) समाज व्यवस्था की कल्पना की और नये सिद्धांत गढ़ने प्रारम्भ किये । वे एक विराट वैश्विक समाज (Global society) की सुदृढ़ संरचना (supper structure) के बारे में स्वप्न देख रहे थे । मार्क्स का स्वप्न यथास्थिति के विरुद्ध था जिसने वर्जनाओं के विरुद्ध जनमानस, विशेषकर युवा शक्ति को आकर्षित ही नहीं किया बल्कि उन्हें आक्रामक भी बना दिया । प्रचण्ड आलोचना को सैद्धांतिक मान्यता देने के सफल प्रयास किये गये और मार्क्स का स्वप्न आलोचना के बौद्धिक धरातल पर आकार लेने लगा जिससे पहले पश्चिम में एवं उसके पश्चात् पूरे विश्व में एक बौद्धिक क्रांति का सूत्रपात हुआ जिसने शीघ्र ही अतिवाद को धारण कर लिया । भारत के नव-आलोचकों ने इसे बौद्धिक एवं वैचारिक क्रांति (Cognitive and Conceptual revolution) के रूप में स्वीकार किया । 
मार्क्स ने तत्कालीन संस्थाओं, यथा – समाज, परिवार, विवाह, धर्म आदि को स्वतंत्रता के लिए बाधक तत्व मानते हुये मनुष्य के लिए अनावश्यक बताया । वे समाज, परिवार, विवाह, परम्परा, धर्म, सत्तातंत्र, औद्योगिक पूँजीवाद जन्य शोषण, असमानता और लिंगभेद आदि के विरुद्ध उठ खड़े हुये । उत्तरमार्क्स युग में स्त्रीमुक्ति एवं लिंगभेदमुक्ति (Gender discrimination free society) के साथ-साथ हर प्रकार के बन्धनों (Socio-ethical regulations and moral limitations) से मुक्ति के लिये अतिवादी सिद्धांतों का विकास होने लगा । राज्य और संस्था के विरुद्ध मार्क्सवाद का अतिवादी स्वरूप उसी प्रकार था जैसे किसी रोग से मुक्ति पाने के लिए रोगी को ही समाप्त कर दिया जाय । मार्क्स के शिष्यों ने इसी सिद्धांत को निरंतर आगे बढ़ाया और 1923 में ज़र्मनी के फ़्रेंकफ़र्त में सामाजिक-वैचारिक क्रांति (Socio-Conceptual revolution) के लिए एक संस्था की स्थापना की जिसे पूरी दुनिया में फ़्रेंकफर्त स्कूल के नाम से जाना गया ।   
फ़्रेंकफ़र्त स्कूल की विचारधारा आलोचना का सिद्धांत(Theory of criticism) का उद्देश्य एक ऐसा सामाजिक परिवर्तन करना है जिसमें तर्क और वैचारिक क्रांति के माध्यम से सामाजिक बन्धनों एवं विकारों से मुक्ति पायी जा सके एवं आधुनिक पूंजीवाद का विरोध किया जा सके । वास्तव में यह संस्था अतिवाद के एक अनंत भटकाव की वैश्विक नींव के रूप में स्थापित हुयी । फ़्रेंकफ़र्त स्कूल ने 22 अप्रैल 1969 को भारत में एक बेटे को जन्म दिया जिसका नाम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय रखा गया । “आलोचना का सिद्धांत” एवं “बन्धनों-मर्यादाओं से मुक्ति” की आकर्षक एवं चुम्बकीय शक्ति के साथ सभी सामाजिक मर्यादाओं और नैतिक वर्जनाओं को ध्वस्त करते हुये राष्ट्र के स्थान पर सत्ताविहीन वैश्विक समाज की स्थापना के लिये इस विश्वविद्यालय के विद्वान निरंतर सक्रिय बने हुये हैं, यह जानते हुये भी कि अपनी सैद्धांतिक अवधारणा के अनुरूप आज तक कोई भी कम्युनिस्ट देश न तो पूर्ण शोषणमुक्त हो सका, न सीमाविहीन हो सका और न संस्थामुक्त ।   

सोमवार, 13 मार्च 2017

पाकिस्तान ने नहीं, युद्ध ने



“मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं, युद्ध ने मारा”

किसी सैनिक की मृत्यु का कारण क्या है, देश या युद्ध ? जब गुरमेहर ने ‘देश’ को नहीं ‘युद्ध’ को सैनिक की मृत्यु का कारण बताया तो हलचल मच गयी । हर वह बच्चा गुरमेहर हो सकता है जिसके पिता युद्ध में मारे गये हैं । यदि पूरी दुनिया के बच्चे युद्ध को ही किसी सैनिक की मृत्यु का कारण मानते हैं तो गुरमेहर का प्रतिनिधि वाक्य इस तरह होगा – “मेरे सैनिक पिता को पाकिस्तान, चीन, अमेरिका, इस्लामिक स्टेट ....ने नहीं, युद्ध ने मारा है”।      
फ़रवरी दो हजार सत्रह में रामजस कॉलेज में हुये विवाद के समय जब वर्ष भर पुरानी यह बात सामने लायी गयी तो तात्कालिक परिस्थितियों के प्रभाव से आवेशित लोग गुरमेहर कौर के प्रति आक्रामक हो उठे । आवेश के वे क्षण व्यतीत हो चुके हैं और हमें गुरमेहर की बात पर एक बार पुनः चिंतन करना चाहिये ।

ठहरिये ! कुछ समय के लिए गुरमेहर को नेपथ्य में भेज देते हैं । हाँ ! अब ठीक है ।

तो प्रश्न यह है कि मारा किसने, ‘देश’ ने या ‘युद्ध’ ने ? यदि ‘देश’ ने मारा तो पूरा देश दोषी है, किंतु यदि ‘युद्ध’ ने मारा तो युद्ध का निर्णय लेने वाले लोग दोषी हैं ।
हम ‘देश’ से प्रारम्भ करते हैं । पाकिस्तान में बलूच भी हैं, कश्मीरी भी हैं, कुछ हिंदू भी हैं, कुछ अफ़गान शरणार्थी भी हैं, कुछ सूफ़ी भी हैं और हैं कुछ वे लोग भी हैं जो युद्ध को मानवता के लिए अभिषाप मानते हैं । जब पाकिस्तान भारत पर छद्म आक्रमण करता है तो क्या पाकिस्तान में रहने वाले ये नागरिक भी उसके लिए दोषी माने जायेंगे ?
युद्ध का निर्णय ‘राजा’ लेते हैं, युद्ध के तात्कालिक परिणाम ‘सेना’ और दूरगामी परिणाम ‘प्रजा’ भोगती है । पहले राजा भी प्रत्यक्ष युद्ध में भाग लेते थे, अब कोई राजा प्रत्यक्ष युद्ध में भाग नहीं लेता । राजा पूर्वापेक्षा अधिक सुरक्षित हो गये हैं, सेना पूर्वापेक्षा अधिक असुरक्षित हो गयी है । राजा तो होते ही हैं सुख भोगने के लिए । ‘राजा’ के अहं से प्रारम्भ होने वाले सभी युद्ध ‘प्रजा’ की आहुति के साथ समाप्त होते हैं ।
अब हम ‘युद्ध’ की बात करेंगे । क्या युद्ध इतने अनिवार्य होते हैं कि उनके बिना विवाद का समाधान नहीं हो सकता ? क्या युद्ध अभी तक किसी समस्या का समाधान कर सके हैं ?
नये युग में युद्ध से अब कोई सत्ताधीश नहीं मरता, सैनिक मरते हैं । युद्ध की तकनीक और रणनीति सत्ताधीश के अहं के कारणों को समाप्त कर देती है, वे कारण जो उन्हें शक्ति देते हैं, वह शक्ति जो उनके अहं का कारण बनती है ।
अहं को समाप्त करने के लिये युद्ध आवश्यक है क्या ?
युद्ध यदि समाधानकारक होते तो बारबार युद्ध नहीं होते । तब वह क्या है जो समाधानकारक हो सकता है ? क्या गुरमेहर ऐसे ही किसी समाधान की तलाश में है ?

बुधवार, 8 मार्च 2017

राष्ट्रवाद और देशप्रेम


 
कबीला तंत्र से लेकर देश और राष्ट्र तक की अवधारणा के लिए समाज के एक विशाल संकुल को दीर्घ यात्रा करनी पड़ती है । मानव इतिहास में यह यात्रा बहुत संघर्षपूर्ण रही है, यात्रा अभी पूरी नहीं हुयी है, कभी पूरी होगी भी नहीं । जिस युग में पश्चिमी समाज धार्मिक नियंत्रण से शासनतंत्र को मुक्त करने के लिए संघर्षरत था उससे सहस्रों वर्ष पूर्व आर्यावर्त्त में देश और राष्ट्र की अवधारणायें विकसित हो अपने मूर्त रूप में स्थापित हो चुकी थीं । आर्यावर्त्त भारत एक राष्ट्र के रूप में स्थापित् हो चुका था जिसमें कई राजे-रजवाड़े अपनी स्वतंत्र सत्ता के साथ राज्य करते थे । जब ऋग्वेद के श्री सूक्त में "प्रांदूर्भूतोस्मि राष्ट्रेस्मिन कीर्ति वृद्धि ददातु मे” कहा गया तो राष्ट्र की कीर्ति के लिए व्यक्ति के दायित्वों का निर्धारण कर दिया गया । आगे चलकर यजुर्वेद में इसे "वयं राष्ट्रेतरग्रयाम पुरोहिता:" कहकर परहित के लिए स्वस्फूर्त चेतना से आगे आने के संकल्प में समूह की भूमिका को और भी स्पष्ट कर दिया गया । पुनः अथर्ववेद में जिस ‘उत्तम निज’ की सहभागिता, यथा-  “अहं राष्ट्रे स्यामिवर्गे निजी भूयासमुत्तम:” का उल्लेख है वह भी राष्ट्र के प्रति व्यक्ति के दायित्वों की गम्भीरता को रेखांकित करता है ।
वैदिक युग में व्यष्टि, समाज और समष्टि को लेकर न केवल प्रखर चिंतन किया गया अपितु उसे व्यवहार योग्य भी बनाया गया जिसके परिणामस्वरूप भारतीय संस्कृति ने देशिक सीमाओं से परे भौगोलिक सीमारहित राष्ट्र की स्थापना कर मानव संस्कृति के शिखर को स्पर्श किया । पश्चिमी जगत ने सत्रहवीं शताब्दी में देश और राष्ट्र की अवधारणाओं पर अपने तरीके से चिंतन की एक नयी पहल की । कुछ लोगों ने भौतिक ‘देश’ को सांस्कृतिक ‘राष्ट्र’ का पर्याय स्वीकार किया तो कुछ लोगों ने राष्ट्र की अवधारणा को भौतिक सीमाओं और वैचारिक विस्तार से जोड़ते हुये समाज के लिये अहितकारी निरूपित किया । राष्ट्र विषयक यह विमर्श अब भारत में भी व्यापक हो चुका है । भारत में राष्ट्र की स्पष्ट, व्यापक और निर्दुष्ट अवधारणा के होते हुये भी स्वतंत्रता के पश्चात् से ही दिल्ली के दोनों प्रमुख विश्वविद्यालयों में वहाँ के विद्वानों द्वारा पश्चिमी देशों का अनुसरण करते हुये राष्ट्र की अवधारणा को मानव समाज के लिए शोषणमूलक एवं अन्यायकारी प्रचारित किये जाने का केन्द्र स्थापित कर लिया गया । पश्चिमी विचारधारा से प्रभावित दिल्ली के जवाहरलाल विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक भारत की सांस्कृतिक चेतना और जीवनमूल्यों के विरुद्ध युवा अध्येताओं की एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो भारत को समाप्त कर देगी । भौगोलिक सीमायें देश को निर्धारित करती हैं, सांस्कृतिक चेतना राष्ट्र को निर्धारित करती है । देश की रक्षा के लिए सांस्कृतिक चेतना अनिवार्य है ।   
समान हितों एवं समान सामाजिक लक्ष्यों के लिये समान उपायों में विश्वास रखने वाले विभिन्न संकुलों का विस्तार जिस भौगोलिक सीमा को स्पर्श करता है उसे हम एक देश मानते हैं । जबकि राष्ट्र तो देश की सीमाओं से परे सांस्कृतिक चेतना की एक अनुभूति है । राष्ट्र की अवधारणा में सांस्कृतिक चेतना के साथ जीवनमूल्यों और पूर्वजों की पारम्परिक सभ्यता में समानता की भावना प्रमुख है । समानतायें राष्ट्र की समृद्धि करती हैं जबकि विषमतायें राष्ट्र का ह्रास कर उसके विखण्डन का कारण बनती हैं । देशों और प्रांतों की भौगोलिक सीमाओं में परिवर्तन होते रहे हैं । वैदिक काल में राष्ट्र की सीमायें जनपदों और देशों की सीमाओं से परे हुआ करती थीं । तब सांस्कृतिक और धार्मिक समानताओं ने राष्ट्र को एक विराट स्वरूप प्रदान किया था । धार्मिक विषमताओं ने इस विराटता को सीमित करते हुये समय-समय पर राष्ट्र के स्वरूप में भी परिवर्तन किया है ।
देशप्रेम, अपनी धरती और उस पर उपलब्ध सभी संसाधनों एवं अपने जैसे लोगों के प्रति वह रागात्मक भाव है जो साहचर्य के साथ लोककल्याण हेतु स्वयं को उत्सर्ग के लिये प्रस्तुत करता है । यह मनुष्य का एक गुणात्मक और स्वाभाविक तत्व है जो हमें आपस में एक-दूसरे के प्रति उदार और ग्राह्य बनाता है ।
जब हम भारत राष्ट्र की बात करते हैं तो उसमें समान विचारधारा, समान संस्कृति, समान जीवनमूल्यों और समान उद्देश्यों वाले विभिन्न देशिक संकुलों के हितों का भाव होता है । राष्ट्र के साथ सभ्यता और संस्कृति की सुरक्षा का भाव जुड़ा हुआ है । भारत देश का कोई व्यक्ति नेपाल, मॉरीशस, श्रीलंका, मलेशिया, थाईलैण्ड आदि देशों में ऑस्ट्रेलिया, यूके, ज़र्मनी आदि देशों की अपेक्षा कहीं अधिक सहज और सुरक्षित अनुभव करता है । वास्तव में हमें राष्ट्र की अवधारणा को भौगोलिक सीमाओं से परे व्यापक रूप में समझना होगा । योरोपीय संघ की स्थापना योरोपीय राष्ट्र की अवधारणा का बीज है । किसी भी भूभाग के निवासियों के सांस्कृतिक विकास और उत्थान में उस भूभाग की प्राकृतिक परिस्थितियों, प्राकृतिक संसाधनों, सामूहिक साहचर्य, पर्व-उत्सव, सामाजिक मान्यताओं और जीवनशैली जैसे आवश्यक तत्वों का संयोग अपेक्षित होता है । समान सभ्यता और समान संस्कृति वाले लोग विस्थापन के समय राष्ट्रीय विस्तार को भी अपने साथ ले जाते हैं जो कभी-कभी स्थानीय समुदायों के साथ संघर्ष का कारण बनता है । उनकी आस्थायें अपने मूल देश के साथ जुड़ी होती हैं और वे अपने मूल देश के प्रति अधिक जुड़ाव का अनुभव करते हैं ।
भारत के सन्दर्भ में देखें तो सातवीं शताब्दी से यहाँ दो राष्ट्र विकसित हो रहे हैं । एक है मूल भारत और दूसरा है विदेशी अरब जिसे यहाँ अधिरोपित किया गया । दोनों सभ्यताओं, संस्कृतियों और जीवनमूल्यों में धरती-आकाश का अंतर है जिनके पारस्परिक टकरावों के कारण भारत में लगातार घरेलू संघर्ष एवं अशांति की स्थिति बनी हुयी है । योरोपीय लोग भारत में शासक बन कर रहे किंतु वे यहाँ ब्रिटिश राष्ट्र को अधिरोपित नहीं कर सके । मोहम्मद अली जिन्ना ने सभ्यताओं के इस मूल अंतर और उसके कारण सम्भावित संघर्षों और अहितों को समझने की भूल नहीं की किंतु भारत विभाजन के समय इस तरह की सैद्धांतिक और व्यावहारिक भूल करने में गांधी और नेहरू की अदूरदर्शिता का भरपूर योगदान रहा । राष्ट्र के मौलिक तत्वों और किसी संस्कृति के अस्तित्व के लिये राष्ट्र के अस्तित्व की आवश्यकता को इज़्राइलियों से अच्छा और कौन समझ सकता है भला ! वहीं, राष्ट्र खोने की पीड़ा को ज़ोरोस्ट्र से अधिक और कौन जान सकता है !
भारतीय मुसलमान भारत देश से प्रेम करते हैं किंतु जब भारत राष्ट्र से प्रेम के बात आती है तो उनका प्रेम अरब राष्ट्र के प्रति उमड़ता हुआ दिखायी देता है । उनके धर्म गुरु ही नहीं शिक्षित मुस्लिम समुदाय के लोग भी मोहम्मद बिन क़ासिम और बख़्तियार ख़िलज़ी को अपना आदर्श मानते हैं । तैमूर लंग, बाबर और औरंगज़ेब जैसे लोग भी भारतदेश से प्रेम करते रहे होंगे किंतु भारतराष्ट्र के प्रति उनका शत्रुभाव स्वयंप्रकाशित है । पुनः स्पष्ट कर दूँ, भारत देश से प्रेम का अर्थ है यहाँ की भौतिक सम्पदा और उसकी सुरक्षा से प्रेम जबकि भारत राष्ट्र से प्रेम का अर्थ है यहाँ की सभ्यता और संस्कृति से प्रेम ।     
मध्य एशिया में अरब की धरती पर ईसवी सन् 629 से 632 के मध्य मोहम्मद साहब द्वारा किये गये ज़िहादी युद्धों एवं उनके पश्चात् उनके अनुयायियों द्वारा अफ़्रीका, योरोप, एवं अन्य एशियायी देशों में इस्लामिक विस्तार हेतु किये गये सतत युद्धों की श्रृंखला ने पूर्व राष्ट्रीय चेतना को आरोपित राष्ट्रीय चेतना में परिवर्तित करने का कार्य किया । पिछले चौदह सौ वर्षों में धर्मांतरण के साथ आने वाली नयी जीवनशैलीजन्य वैश्विक उथल-पुथल में इस्लामिक राष्ट्रवाद ने राष्ट्र की अवधारणा को एक नया स्वरूप दे दिया जबकि साम्यवादी सिद्धांतों के पोषक भारतीय बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने भारतीय राष्ट्रवाद को ही प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर दिया है । भारतीय राष्ट्रवाद के प्रचण्ड विरोध के साथ भारत को विखण्डित कर एक वैश्विक राष्ट्र की कल्पना की जाने लगी है, जिसमें सब कुछ वैश्विक होगा... वैश्विक संस्कृति, वैश्विक सभ्यता, वैश्विक समाज व्यवस्था, वैश्विक शासन व्यवस्था... स्थानीय कुछ भी नहीं । यह परिकल्पना पूरी तरह अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक है । साम्यवादियों के लक्ष्य पर भारत की संस्कृति, सनातन मान्यतायें और व्यवस्थायें हैं जिसे पूरी तरह नष्ट करने के लिये “विश्ववाद” का छल किया जा रहा है । विश्ववादी जब भारतीय मूल्यों और सनातनधर्म के प्रति आक्रामक होते हैं ठीक उसी समय वे इस्लामिक राष्ट्रवाद के विस्तार पर मौन रहते हैं । उनका यह एकांगी विश्ववाद एक बहुत बड़ा बौद्धिक छल है जिसके जादुई प्रभाव में भारत की युवापीढ़ी भटकती जा रही है । युवा पीढ़ी को समझना होगा कि एक आदर्श स्थिति होते हुये भी विश्व को “एक राष्ट्र” बनाया जा सकना सम्भव नहीं है, राष्ट्र का आधार सभ्यता, संस्कृति और सामाजिक मूल्य हैं जिनका विस्तार देश की भौगोलिक सीमाओं से परे होता है ।
हम सहज विकसित सभ्यता, संस्कृति, सामाजिक मूल्यों, वैवाहिक सम्बन्धों, आध्यात्मिक चेतना और दार्शनिक मान्यताओं आदि के आधार पर राष्ट्र की बात करते हैं जबकि इस्लामिक ज़िहादी राष्ट्रविस्तार के आधार पर सभ्यता, संस्कृति और मूल्यों के अधिरोपण की बात करते हैं । वहाँ स्वाभाविक विकास नहीं, हत्या और बलात्कार के साये में थोपा हुआ परिवर्तन है । भारत में साम्यवादियों का इस्लामिक प्रेम और हिन्दुओं के प्रति उनकी घृणा अब स्पष्ट हो चुकी है । वर्तमान में सीरिया और ईराक़ में ग़ैर-इस्लामिक लोगों का नस्लीय उन्मूलन इस्लामिक राष्ट्रवाद के सिद्धांतों का प्रत्यक्ष प्रमाण है । जबकि भारत के अतिरिक्त नेपाल, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, जावा, सुमात्रा, मलाया, मॉरीशस एवं फ़िज़ी आदि की सम्प्रभुता सनातनी भारतीय राष्ट्रवाद के आदर्श के प्रमाण हैं । इस्लामिक राष्ट्रवाद ने पर्सिया की तरह अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश का धर्मांतरण के माध्यम से ही राष्ट्रांतरण कर भारत राष्ट्र से विखण्डित कर दिया । इस्लामिक राष्ट्रवाद के कारण ही कश्मीर घाटी दशकों से अशांत और हिंसक बनी हुयी है । वर्तमान में सांस्कृतिक और धार्मिक टकरावों से भारत का देशिक और राष्ट्रीय अस्तित्व एक बार पुनः संकटपूर्ण हो गया है । जावा, सुमात्रा और मलाया जैसे देश धर्मांतरण के बाद भी अपने राष्ट्रीय तत्व को सहेज कर रख सकने में किंचित सफल हुये हैं वे आज भी अपने मूल राष्ट्र के सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े हुये हैं जबकि पाकिस्तान ने अधिरोपित राष्ट्र के सांस्कृतिक मूल्यों को स्वीकार करना अधिक लाभदायक माना । यह इस बात को इंगित करता है कि राष्ट्रीय चेतना में वैयक्तिक चिंतन का कितना प्रभाव होता है ।
मध्य एशिया में इस्लामिक राष्ट्रकूटों के ग़ैर इस्लामिक मूल कबीले अपनी पृथक पहचान के लिये आज भी संघर्षरत हैं । यदि इस्लाम न होता तो शायद पूरे विश्व की कबीला संस्कृतियों का अस्तित्व सुरक्षित बना रहता । इस्लामिक राष्ट्र के विस्तारयुद्ध में बचे-खुचे मूल कबीले अपनी राष्ट्रीय पहचान क़ायम नहीं रख सके जिसके कारण यहूदी, कुर्द, यज़ीदी, और शॉबेक आदि का अस्तित्व ही संकटपूर्ण हो गया है । इस बीच यहूदियों ने अपने राष्ट्रीय अस्तित्व के लिये सफल संघर्ष किया जो विश्व के भारत जैसे अन्य संकटग्रस्त राष्ट्रों के लिए एक प्रेरक उदाहरण है ।
धर्मांतरण से आक्रांता देश की सीमायें क्षीण होती हैं जबकि आक्रामक राष्ट्र की सीमाओं का विस्तार होता है । राष्ट्र की सीमाओं का विस्तार विस्थापन और पलायन से भी होता है जैसा कि ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, मॉरीशस, सूरीनाम, फ़िज़ी और गुयाना आदि देशों का हुआ है । जब इस्लामिक राष्ट्र की बात होती है तो राष्ट्र का एक असहिष्णु स्वरूप उभरता है जिसमें ग़ैर-मुस्लिम लोगों का अस्तित्व और उनका राष्ट्रबोध संकटग्रस्त कर दिया जाता है । यहाँ विस्तार है, हिंसा है, युद्ध है और मनुष्यता के लिये संकट है । जब सनातनी भारतीय राष्ट्र की बात होती है तो भारत से लेकर गुयाना और सूरीनाम तक कई देशों का एक उदार एवं ग्राह्य स्वरूप उभरता है जिसमें विविध विचारधाराओं का स्वागत और सम्मान है । यहाँ सहिष्णुता है, अहिंसा का आग्रह है, शांति की आकांक्षा है और निःशर्त मानवीय मूल्यों के संरक्षण की आश्वस्ति है ।