शनिवार, 24 अक्टूबर 2020

पारिजात की निर्मम हत्या

कल विद्युत विभाग के कर्मचारियों ने पॉवर मैंटीनेंस के नाम पर मेरे प्रिय मित्र पारिजात की निर्मम हत्या कर दी । खेत में उसका क्षत-विक्षत शरीर देखकर मैं दुःख और रोष से भर उठा । वह मेरा मित्र था, वह एक बहुत अच्छा डॉक्टर था, वह कन्नौज के इत्र वालों का कच्चा माल था, वह परिंदों का एक मोहल्ला था, वह क्या नहीं था!

धरती से आसमान की ओर दस फ़िट ऊपर उठकर अपनी बाहें फैलाते हुये अनजान परिंदों को बुलाकर आश्रय देने वाले मेरे मित्र से किसी को भला क्या ख़तरा हो सकता था! पारिजात की फैली बाहों से बिजली के तारों की ऊँचाई अभी भी लगभग पंद्रह फ़िट दूर थी । विद्युत विभाग के कर्मचारियों ने मुझसे कुछ भी पूछने या सूचना देने की भी आवश्यकता नहीं समझी थी और मेरे खेत में खड़े मात्र चार साल की उम्र वाले पारिजात की कुल्हाड़ी से काटकर निर्मम हत्या कर दी ।

मुझे मालुम है कि आज वे तमाम लोग भी मेरी ही तरह बहुत दुःखी होंगे जो कभी धरती पर बिखरे पारिजात के मदहोश कर देने वाले नन्हें पुष्पों को चुनकर ख़ुश होते रहे होंगे, या जिन्होंने ज्वर में तपती अपनी बिटिया को उसके पत्तों का रस पिलाकर बिटिया के ज्वर को शांत किया होगा, या जिन्होंने सियाटिक शूल से पीड़ित और तमाम इलाज़ करवाकर थक चुकने के बाद पारिजात के पत्तों का रस पिलाकर अपने वृद्ध माता-पिता की पीड़ा को दूर किया होगा, या जिन्होंने न्यूराइटिस या डायबिटिक न्यूरोपैथी से पीड़ित किसी व्यक्ति की पीड़ा का शमन पारिजात के पत्रस्वरस पिलाकर किया होगा, या जिन्होंने एलोपेसिया में पारिजात के बीजों का लेप करके रोग से मुक्ति पायी होगी

मुझे मालुम है कि आज आसमान में उड़ते हुये तमाम परिंदों ने जब उन्हें आमंत्रित करने वाले पारिजात को खेत में धराशायी देखा होगा तो वे कितने दुःखी हुये होंगे!

मुझे मालुम है कि मेरे मोहल्ले के बच्चों को पारिजात के भीनी ख़ुश्बू वाले नन्हें पुष्प चुनने का अवसर अब कभी नहीं मिलेगा ।   

मेरा आत्मीय मित्र पारिजात यानी परिंदों को आश्रय देने के लिए सदा तत्पर रहने वाला, हरसिंगार यानी विष्णु की पूजा और श्रंगार के लिये पुष्प देने वाला, नाइट ज़ास्मीन यानी रात में अपनी भीनी सुगंध से पूरे मोहल्ले को सराबोर कर देने वाला, निक्टेंथस अर्बोरट्रिस्टिस यानी रात में चुपके से नारंगी बिंदी वाले सफेद फूलों को धरती पर बिखेर देने वाला हम सबका प्रिय मित्र अब हमारे बीच नहीं रहा । मुझे नहीं पता कि विद्युत विभाग के कर्मचारियों को इस तरह की स्वेच्छाचारिता और किसी मेडीसिनल प्लांट की निर्मम हत्या कर देने की खुली छूट किसने दी है ? 

कल मेरे मित्र की हत्या की शोकसभा है । कल मैं अपने खेत पर अपने प्रिय मित्र के क्षत-विक्षत शरीर के पास बैठकर उसकी आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करूँगा । 


डार्क मैटर – महाशक्ति का अदृश्य भंडार

कोरोना विषाणु के सम्बंध में अभी तक जितनी भी जानकारियाँ विषय विशेषज्ञों द्वारा दुनिया को दी गयी हैं उनमें परिवर्तनशीलता के साथ-साथ विरोधाभासी तत्वों की बाहुल्यता रही है । अत्याधुनिक उपकरणों और संसाधनों से युक्त दुनिया भर की प्रयोगशालायें कोरोना के सम्बंध में अपनी ही खोजी हुयी सूचनाओं का अगले ही दिन खण्डन करती रही हैं । विज्ञान ही विज्ञान का खंडन करता रहा है, विज्ञान ही विज्ञान को नकारता रहा है । कोरोना के सत्य को प्रकाशित करने के स्थान पर विज्ञान ही जनमानस को दिग्भ्रमित करता रहा है । 

इस लेख का प्रतिपाद्य विषय कोरोना-विषाणु और डार्क-मैटर के प्रसंग में ज्ञान और विज्ञान के मूलभूत अंतर को समझना है ।   

ज्ञान व्यापक और सार्वकालिक होता है, विज्ञान संख्यादेशज और कालापेक्षी होता है । ज्ञान अपौरुषेय है, विज्ञान पौरुषेय है । ज्ञान तब भी था जब विज्ञान नहीं था । विज्ञान मानव सभ्यता के साथ उदित और अस्त होता है । ज्ञान पूर्ण है इसलिए उसे विकसित नहीं किया जा सकता जबकि विज्ञान अपूर्ण होने से विकसित किया जाता है । ज्ञान अपरिवर्तनीय है इसलिये क्षरित नहीं होता । विज्ञान परिवर्तनीय है इसलिये क्षरण स्वभाव वाला होता है । ज्ञान भौतिक प्रमाणों से परे का विषय है जबकि विज्ञान भौतिक प्रमाणों के सहारे ही आगे बढ़ता है ।   

ईश्वर का कोई भौतिक प्रमाण नहीं है इसलिए विज्ञानवादी ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करते । किंतु आश्चर्यजनकरूप से डार्क-मैटर और डार्क-एनर्ज़ी का भी अभी तक कोई भौतिक प्रमाण नहीं पाया गया है तथापि विज्ञानवादी उसकी सत्ता को स्वीकार करते हैं ।

विज्ञानवादियों के अनुसार ईश्वर एक काल्पनिक विषय है जिसका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं होता । डार्क-मैटर और डार्क-एनर्ज़ी भी काल्पनिक विषय हैं तथापि विज्ञानवादी उसके वास्तविक अस्तित्व को स्वीकार करते हैं ।

संख्या का भी स्वयं में कोई अस्तित्व नहीं होता किंतु दृश्य जगत की गणना के लिए संख्या की हाइपोथेटिकल मध्यस्थता अनिवार्य है । संख्याओं के सहारे की गयी गणना से ही वैज्ञानिकों को डार्क-मैटर और डार्क-एनर्ज़ी के अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए प्रमाण उपलब्ध हो सके हैं यानी सकल ब्रह्माण्ड के 95 भाग की उपस्थिति का प्रमाण अनुमान पर आधारित है ।

हाइपोथीसिसि एक मानसिक रचना प्रक्रिया है जिसके अभाव में किसी भी वैज्ञानिक गतिविधि का प्रारम्भ ही असम्भव है । यह सकल ब्रह्माण्ड भी ब्रह्म की मानस रचना है, एकोऽस्मि बहुस्यामः, एक हूँ बहुत हो जाऊँ  ...अ हाइपोथेटिकल क्रिएशन । फ़्रॉम वन टु मल्टी, अद्वैत से द्वैत ...यहाँ भी गणीतीय संख्यायें हमें चमत्कृत करती हैं ।

भौतिक प्रमाणों के सहारे आगे बढ़ने वाले आधुनिक विज्ञानवादियों द्वारा दृष्टव्य से परे अदृष्टव्य की सत्ता को सैद्धांतिकरूप से स्वीकार करना यानी दृश्य ब्रह्माण्ड (ऑब्ज़रवेबल मैटर एण्ड एनर्जी) से परे अदृश्य ब्रह्माण्ड (नॉनऑब्ज़रवेबल मैटर एण्ड एनर्ज़ी) की सत्ता को सत्य मान लेना कितना विरोधाभासी और आश्चर्यजनक है !

हम उस अदृश्य डार्क-मैटर और डार्क-एनर्ज़ी की बात कर रहे हैं जो सकल ब्रह्माण्ड का 95 प्रतिशत भाग बनाते हैं और जिनकी उपस्थिति की व्याख्या वर्तमान पैरामीटर्स और सिद्धान्तों से नहीं की जा सकती । इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फ़ील्ड्स और डार्क मैटर्स का एक-दूसरे पर कोई प्रभाव नहीं होता इसलिए इन्हें भौतिक संसाधनों से डिटेक्ट कर पाना भी सम्भव नहीं होता ।  

एस्ट्रोफ़िज़िकल ऑब्ज़रवेशंस के द्वारा डिस्क शेप आकाशगंगाओं के इलिप्टिकल विस्तार का प्रमाण मिलता है । गैलेक्सी के रोटेशन कर्व से अनुमान किया जाता है कि वहाँ आकर्षण-विकर्षण और अवरोध उत्पन्न करने वाली कोई अदृश्य सत्ता उपस्थित होनी चाहिये, भले ही वह सत्ता अभी तक डिटेक्टेबल नहीं हो सकी है । अनुमान है कि इस अदृश्य सत्ता के घटक सब-एटॉमिक पार्टिकल्स हो सकते हैं । कदाचित ये वीकली इंटरएक्टिंग मास्सिव पार्टिकल्स हैं जो गैलेक्सी रोटेशन कर्व के लिये उत्तरदायी हो सकते हैं । अनुमान है कि आकाशगंगाओं का यह विस्तार उस अदृश्य मैटर के कारण ही सम्भव है जिसे डार्क-मैटर की संज्ञा दी गयी है ।

ब्रह्माण्ड की कुल मास-एनर्ज़ी के घटकों में सम्मिलित हैं – 5% सामान्य मैटर और ऊर्जा; 27% डार्क-मैटर एवं 68% डार्क-एनर्ज़ी । इस तरह डार्क-मैटर ब्रह्माण्ड के कुल मास का 85% भाग है जबकि कुल मास-इनर्ज़ी में डार्क-इनर्ज़ी एवं डार्क-मैटर की सहभागिता 95% है ।

विज्ञानवादी स्वीकार करते हैं कि ब्रह्माण्ड का 95 प्रतिशत भाग अदृश्य है और अनुमान एवं गणितीय तथा एस्ट्रोफ़िज़िकल ऑब्ज़रवेशंस पर आधारित है । ये तथ्य परिवर्तनशील हैं । ईश्वर भी अदृष्य और अनुमान प्रमाण पर आधारित एक नियामक सत्ता है ...और यह तथ्य परिवर्तनशील नहीं है ।

सब-एटॉमिक पार्टिकल्स से लेकर विराट दृश्य जगत और फिर अदृश्य जगत के घटक डार्क-मैटर एवं डार्क-एनर्ज़ी के होने एवं संचालित होने की आश्चर्यजनक सुव्यवस्था का कोई व्यवस्थापक तो होना ही चाहिये न!

ब्रह्माण्ड की सुव्यवस्था अपरिवर्तनीय है, जो अपरिवर्तनीय है वही शुद्ध ज्ञान है ।

कोरोना वायरस से सम्बंधित अभी तक खोजे गये तथ्य परिवर्तनीय हैं, जो परिवर्तनीय है वही विज्ञान है ।       


रविवार, 18 अक्टूबर 2020

एक पिटीशन, नो रिलीजन...

मोतीहारी वाले मिसिर जी इंसानी दुनिया के सभी लौकिक धर्मों को समाप्त कर दिये जाने के पक्ष में हैं । यह पहली बार नहीं है जब इस विषय पर उनसे हमारी गम्भीर चर्चा हुयी है । गोरखपुर वाले ओझा जी भी सदा की तरह उन्हीं के साथ खड़े दिखायी देते हैं । बल्कि आज तो उन्होंने एक कदम और आगे बढ़कर यहाँ तक कह दिया कि यदि आप शांति, स्वास्थ्य और सुख चाहते हैं तो आपको दुनिया के समस्त अत्याधुनिक संसाधनों से विरत होना ही होगा । मैंने जानना चाहा कि क्या वे विज्ञान और अत्याधुनिक तकनीकी उपकरणों को समाप्त कर दिये जाने की ओर संकेत कर रहे हैं, तो उन्होंने कहा – “हाँ! मैं चाहता हूँ कि मनुष्य की मशीनों पर निर्भरता समाप्त हो और वह आत्मनिर्भर एवं पुरुषार्थी बने । हम एक नकारात्मक और पंगु सभ्यता के विकास की होड़ में लगे हुये हैं” ।

धर्म के वर्चस्व को लेकर दुनिया भर में पहले भी विनाशकारी युद्ध होते रहे हैं । आज हम पुनः आर्मीनिया और अज़रबैजान के रूप में क्रिश्चियनिज़्म और इस्लामिज़्म को आमने-सामने एक-दूसरे को तबाह करते हुये देख रहे हैं । धर्म की सुप्रीमेसी को लेकर होने वाले विवादों और युद्धों में धार्मिक ध्रुवीकरण होना इस बात का प्रतीक है कि हम किसी भी “इज़्म” को लेकर कितने दुराग्रही हैं । इस्लामिज़्म के पक्ष मे टर्की, पाकिस्तान और ईरान आदि देश अज़रबैजान के साथ खड़े हो चुके हैं । नागोर्नो-क़ाराबाख़ में कुछ मोर्चों पर आर्मीनियाई सेना को पीछे हटना पड़ा है । युद्ध के नियमों के विरुद्ध दोनों देश एक-दूसरे की बस्तियों पर घातक आक्रमण कर रहे हैं जिससे बड़ी संख्या में दोनों ओर के निर्दोष नागरिक मारे जा रहे हैं । अज़रबैजान के सैनिक तो आर्मीनियाई सैनिकों के कटे हुये सिर लेकर वीडियो भी बना रहे हैं । यह धार्मिक उन्माद की क्रूर पराकाष्ठा है ।

मोतीहारी वाले मिसिर जी पहले भी कह चुके हैं कि – “कोई भी लौकिक धर्म कितना ही अच्छा क्यों न हो अपने जन्म के साथ ही विकृति की ओर चल पड़ता है । यह उसी तरह है जैसे कोई जीव जन्म लेने के बाद निरंतर बुढ़ापे और अनिवार्य मृत्यु की दिशा में यात्रा प्रारम्भ कर दिया करता है । भारत में भी धार्मिक उन्माद और धार्मिक वर्चस्व की होड़ एक विनाशकारी पथ पर निरंतर आगे की ओर बढ़ती जा रही है । इसे रोकना होगा अन्यथा महाविनाश को कोई भी रोक नहीं सकेगा ...और इसे रोकने का एक ही मार्ग है – सभी लौकिक धर्मों का अंत” ।

हमने मिसिर जी से पूछा कि क्या वे चीन का अनुसरण करने की बात कह रहे हैं तो उन्होंने कहा- “नहीं, हम स्केण्डेनेवियन कंट्रीज़ के नागरिकों की लौकिक धर्मों पर निर्भरता को अस्वीकार करने वाली सोच की बात कर रहे हैं” ।

शनिवार, 17 अक्टूबर 2020

आंदोलन – विकास के लिए नहीं, पिछड़ने के लिए...

आंदोलन होते हैं, आग लगायी जाती है, चक्का जाम किया जाता है, मारपीट होती है, गोलियाँ चलती हैं ...आंदोलनकारियों की माँग़ होती है कि उन्हें भी पिछड़ा, दलित, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति में शामिल कर लिया जाना चाहिये ..क्योंकि आगे न बढ़कर केवल पीछे जाना उनका अधिकार है । कोपीनधारी और भिक्षुकवृत्ति विप्र विस्मित है ...जाट, गुर्जर, यदु जैसे न जाने कितने राजवंश के लोग आरक्षित होना चाहते हैं, सरकार की बैसाखियों पर चलने के लिए अपनी टाँगें लोड़ देने की गुहार कर रहे हैं ...उन्हें हर हाल में आरक्षण चाहिये । 

स्वाधीन भारत में आंदोलन होते हैं क्योंकि जाटों को आरक्षण चाहिये, पटेलों को आरक्षण चाहिये, गुर्जरों को आरक्षण चाहिये... सबको आरक्षण चाहिये । आंदोलन में क्रांति की धुन होती है, जनधन की हानि होती है, हम आगे बढ़ने के लिए नहीं बल्कि पीछे जाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं । हमें आरक्षण के बल पर सरकारी नौकरी चाहिये, कर्ज़ माफ़ी चाहिये, मुकदमे हटाये जाने चाहिये ...हमें सारी सुविधायें चाहिये ...आरक्षण की योग्यता पर ।

भरतपुर के नीरज गुर्जर शिक्षित नेता हैं, कैमरे के सामने अंग्रेज़ी में बोलकर अपनी योग्यता को फ़ोर्टीफ़ाइड करके पेश करने में दक्ष हैं और चाहते हैं कि सरकार उनके ऊपर पिछड़े होने की मोहर लगा दे । भारत के लोग अद्भुत हैं । राजवंश के लोग प्रजावंश के उत्तराधिकारी बन जाने के लिए अधीर हो रहे हैं । उन्हें संसद और विधान सभा की आरक्षण वाली सीट से टिकट भी चाहिये ....यानी राजवंश के लोगों को राजवंश में पुनः प्रवेश के लिए आरक्षण की बैसाखी चाहिये ।  

सरकार आरक्षण समाप्त नहीं कर सकती किंतु सरकारी संस्थान समाप्त कर सकती है । मोतीहारी वाले मिसिर जी सरकारी संस्थानों के निजीकरण का समर्थन करने लगे हैं ....क्योंकि इससे उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ने की सुनिश्चितता है ....और इसलिए भी कि तब सरकारी नौकरियों के अवसर और भी कम हो जायेंगे और निजी संस्थानों में नौकरियों के लिए लोगों को आरक्षण की योग्यता से मोहभंग हो जायेगा ।

 

सरकारी कम्पनियों का निजीकरण...

बस्तर में भी निजीकरण का विरोध हो रहा है क्योंकि नगरनार प्लांट से सरकार अपनी हिस्सेदारी समाप्त कर रही है ।

कई सरकारी बैंक निजी किए जा चुके हैं । मुम्बई का एक पोर्ट अदाणी समूह ने ख़रीद लिया है और रेलवे में निजी क्षेत्रों की हिस्सेदारी बढ़ रही है । अव्यवस्था और घाटे के केंद्र बन चुके सरकारी संस्थान समाप्त होने की चर्चा से ही आरक्षणप्रेमी लोग परेशान होने लगते हैं, वे चाहते हैं कि घाटे में रहने वाले सभी सरकारी संस्थान बने रहने चाहिये ।

सरकारी कम्पनियों के शेयर्स से दूर रहने की सलाह पर शेयर मार्केट के दलालों की मोहर सरकारी कार्यप्रणाली की वह जन्मकुण्डली है जिसका अध्ययन हमें दुःखी और निराश करता है ।

पाकिस्तान के डेढ़ सौ फ़ाइटर जेट तबाही मचायेंगे आर्मीनिया में...

टर्की, पाकिस्तान और ईरान वह तिकड़ी है जो केवल इस्लाम के नाम पर एकजुट होकर आर्मीनिया को तबाह कर देने के लिए परमाणुशक्ति का प्रयोग करने से भी नहीं हिचकने वाली । भारत के जम्मू-काश्मीर को नागोर्नो-क़ाराबाख़ बना देने के लिए व्याकुल फ़ारुख़ अब्दुल्ला नामक एक आदमी तो पहले ही कह चुका है कि पाकिस्तान ने एटम बम ईद पर चलाने के लिए नहीं बना रखे हैं ।           


गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

गांधी जी की आत्मा के नाम एक खुला पत्र...

हे स्वर्गीय मोहनदास करमचंद गांधी जी !

खेद है कि मैं आपको नमस्ते या राम-राम नहीं लिख सकूँगा क्योंकि भारत में अभिवादन के ये शब्द भगवावाद और फासीवाद के प्रतीक हो गये हैं किंतु अस्सलाम वालेकुम या सलाम जैसे शब्द भी नहीं लिख सकूँगा क्योंकि हमारी भाषा में अभिवादन के भावसमृद्ध शब्दों का लेश भी अभाव नहीं है । अस्तु, मैं सीधे-सीधे अपनी बात लिख रहा हूँ, बुरा मत मानियेगा ।

यह सच है कि हमारी पीढ़ी ने उस समय तक जन्म न होने के कारण स्वतंत्रता संग्राम में कोई योगदान नहीं दिया किंतु उस समय बोई गयी व्यवस्थायें पल्लवित-पुष्पित होकर आज हमें यह सोचने के लिए विवश करने लगी हैं कि किसी नागरिक के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में स्वतंत्रता का औचित्य क्या है ?

आपने अपने युग में हुये धार्मिक दंगों में नृशंस हिंसा का तांडव देखा है, हम अपने युग में होने वाले धार्मिक दंगों की हिंसा से उत्पीड़ित हो रहे हैं । यह एक सुस्थापित तथ्य है कि विदेशी आक्रमणकारी शासक बनकर भारत की सनातन संस्कृति को नष्ट करने के हर तरह के उपाय करते रहे हैं किंतु स्वतंत्रता के बाद भी इस प्रक्रिया पर विराम नहीं लग सका । उन्हीं विदेशी आक्रमणकारियों के वंशजों द्वारा भारत की सनातन संस्कृति को नष्ट करने और भारत की रही सही डेमोग्राफ़ी को पूरी तरह बदल देने के षड्यंत्र भारत में आज भी फलीभूत हो रहे हैं ।

हे गांधी जी की आत्मा जी ! हम आपको सूचित करना चाहते हैं कि आज की पीढ़ी को विरासत में जो भारत मिला है वहाँ (असम में) सरकारी सहयोग से चलने वाले दीनी तालीम वाले मदरसों को सामान्य स्कूलों में रूपांतरित किए जाने, क़ाफ़िर की लड़की को प्रेमजाल में फाँसकर धर्मांतरण किये जाने की घटनाओं का विरोध किये जाने और मुस्लिम शासन में मंदिरों को ढहा कर उनके स्थान पर बनायी गयी मस्ज़िदों को पूर्ववत सनातनी आराधना स्थल बनाये जाने की माँग करने से भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब और सेक्युलरिज़्म के संकटग्रस्त हो जाने के हो-हल्ला से परेशान होकर मुझे प्रायः आपकी याद आती रहती है । भारत में इस्लामिक हुक़ूमत लाने, पूरे भारत को धर्मांतरित करने और क़ाफ़िरों को काटकर फेक देने जैसी भयभीत करने वाली इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर खुलेआम मिलने वाली धमकियों ने हमारा जीना दुर्लभ कर दिया है ।

हे गांधी जी की आत्मा जी ! यशपाल की मानें तो साल 1947 में बँटवारे के समय लाहौर में सिखों की लड़कियों के साथ होने वाले दुष्कर्मों की घटनाओं पर दिल्ली में शरणार्थी शिविरों के सिख प्रतिनिधि मण्डल को दी गयी आपकी सलाह मुझे भयभीत करती है इसलिए हम आपसे यह नहीं पूछेंगे कि भारत के सनातनी लोगों को अपनी प्राणरक्षा और सम्मान को बचाने के लिए क्या करना होगा ।

सम्प्रति, हम सनातनी लोग इस्लामिक स्कॉलर्स, मौलवियों, इस्लामिक एक्टिविस्ट्स और भारत विरोधी राजनेताओं द्वारा अपने ऊपर थोपे गये जिन विचारों और व्यवस्थाओं को मानने और स्वीकार करने के लिए विवश किये जा रहे हैं उनके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं – 

-      भारतीय मदरसों में दीनी तालीम दिया जाना सेक्युलरिज़्म है किंतु भारत में कुम्भ का आयोजन भगवावाद, संघवाद, फासीवाद और हिटलरशाही है ।

-      मुस्लिम युवक का किसी क़ाफ़िर को दुश्मन मानना किंतु उसकी लड़की से प्रेम करके उसका धर्मांतरण करना और उससे निक़ाह करना शरीयत के अनुसार ज़ायज़ है किंतु किसी हिंदू युवक का किसी मुसलमान की लड़के से प्रेम करना सेक्युलरिज़्म के ख़िलाफ़ है ।

-      भारत में हजारों मंदिरों को ध्वस्त कर उनके ऊपर मस्ज़िद का निर्माण ज़ायज़ है जबकि इस तरह की मस्ज़िदों को पूर्ववत् मंदिर में रूपांतरित करने की माँग़ करना सेक्युलरिज़्म के ख़िलाफ़ है ।

यदि सेक्युलरिज़्म और गंगा-जमुनी तहज़ीब का यही अर्थ और उद्देश्य है तो निस्संदेह भारत की संस्कृति और सभ्यता को बचाये रख पाना असम्भव है, और हम इस तरह की किसी व्यवस्था के विरुद्ध वैचारिक क्रांति करने के लिए बाध्य हैं ।

स्वाधीन भारत में संविधान और क़ानून की धज्जियाँ उड़ाते वक्तव्य...

इण्डिया में इण्डियन पीनल कोड की धारा 124-ए के विरुद्ध खुलेआम सार्वजनिक वक्तव्यों पर आमजनता, प्रबुद्धजनता, नेता, अभिनेता, साहित्यकार, अतिबुद्धिजीवियों और माननीय सुप्रीम कोर्ट की अद्भुत् ख़ामोशी मुझे हैरान नहीं, परेशान करती है । मुझे नहीं मालुम, इन वक्तव्यों पर आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी –

1-   “चीन के सहयोग से लद्दाख को भारत से खाली करवाया जाय”। – दिनांक 15.10.2020 को जी.न्यूज़ कार्यक्रम में पीडीपी के नेता मोहित भान का आह्वान ।

2-   “जम्मू-कश्मीर में धारा 370 फिर से बहाल करने के लिए चीन से सहयोग लेना चाहिये” । - दिनांक 12.10.2020 को जी.न्यूज़ के एक कार्यक्रम में डॉ. फ़ारुख़ अब्दुल्ला का वीडियो संदेश ।

 

-      हम हैं स्वतंत्र भारत के भयभीत सनातनी नागरिक       

सोमवार, 12 अक्टूबर 2020

संविधान की शपथ लेकर संविधान पर वार...

आतंकवादी बनकर भारत पर हमला करने के कई ख़तरे हैं लेकिन बिना किसी ख़तरे के ...बल्कि भारत की शाही सुविधाओं का उपभोग करते हुये भारत के विरुद्ध षड्यंत्र करने और भारतीय संविधान से विश्वासघात करने का एक शाही तरीका भी कुछ लोगों ने ईज़ाद कर लिया है । यह एक क़माल का तरीका है जिसमें शिकार ख़ुद अपने शिकारी की रक्षा करने के लिए विवश होता है और बारम्बार शिकार होता रहता है । इस तरीके को स्तेमाल करने के लिए किसी भी तरह भारत की संसद में सदस्य की हैसियत पाना होता है या महज़ एक अलगाववादी नेता बनना होता है । भारतीय संसद का सदस्य बनने के बाद भारतीयों की कमाई से शाही ज़िंदगी जीते हुये और भारत सरकार द्वारा उपलब्ध करायी गयी सुरक्षा सुविधाओं का उपभोग करते हुये पाकिस्तान जाकर भारत की सरकार को गिराने के लिए निवेदन करने या कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए चीन की मदद लेने की इच्छा प्रकट की जा सकती है ।

एक सांसद रहते हुये डॉक्टर फ़ारुख़ अब्दुल्ला का चरित्र हमेशा ही भारत विरोधी रहा है । यह आदमी भारत की संसद में भारत के एक संसदीय क्षेत्र का सम्माननीय प्रतिनिधि है किंतु भारत की संसद द्वारा लायी गयी एक व्यवस्था के विरुद्ध चीन का सहयोग लेने की बात करता है और जम्मू कश्मीर को भारत से अलग करके एक अलग रियासत बनाने के लिए पाँच अगस्त 2020 को लंदन या वाशिंगटन में भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन में सम्मिलित न हो पाने से दुःखी होता है । यह आदमी भारत की संसद का सदस्य है किंतु केवल अपनी मज़लूम क़ौम के लिए चिंतित होने की बात कहता है भारत के लिए नहीं । यह आदमी डॉक्टर है और उसका मानना है कि उसकी “मज़लूम क़ौम के लोगों ने अल्लाह को छोड़कर शैतान को पकड़ लिया है”, उन लोगों का “अल्लाह में पक्का ईमान नहीं है” । यह आदमी “अल्लाह का दामन थामकर” अपनी “क़ौम को मुश्किल से निकालना” चाहता है । भारत का नमक खाने वाले इस आदमी का ख़याल है कि जम्मू-कश्मीर को भारत की मुख्य धारा से जोड़ने की नयी व्यवस्था से उसकी मज़लूम क़ौम मुश्किल में आ गयी है ।      

और सबसे क़माल की बात तो यह है कि डॉक्टर फ़ारुख़ अब्दुल्ला नामक ज़हरीले आदमी के भारतविरोधी कृत्यों को देशद्रोह मानना एक ग़ुस्ताख़ी है,यूँ वह बात अलग है कि पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री और पी.ओ.के. के वज़ीर के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मामला दर्ज़ करवा देना वहाँ की सियासत के लिए बहुत मामूली सी बात है ।

          ...तो मैं ख़ुशी-ख़ुशी यह ग़ुस्ताख़ी करना चाहता हूँ और भारत के एक ज़िम्मेदार नागरिक की हैसियत से डॉक्टर फ़ारुख़ अब्दुल्ला नामक आदमी पर सांसद रहते हुये भारत के विरुद्ध चीन की मदद लेने का मंसूबा रखने के ज़ुर्म में देशद्रोह का मुकदमा दर्ज़ करने की माँग़ करता हूँ ।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

धर्म-युद्ध का तेरहवाँ दिन...

उठाकर अपना सिर

देखता है एक बच्चा

आसमान में उड़ते युद्धक विमान ।  

भर जाता है गर्व से

भूख से बिलबिलाता छोटा सा बच्चा

सोचता है  

कर ली है कितनी तरक्की

उसके मुल्क ने!

 

होते ही विमान के ओझल

वह फिर माँगने लगता है

भीख

फैलाकर अपने नन्हें हाथ

दे दाता के नाम तुझको अल्ला रक्खे...।

युद्ध

जिस दिन होगा

मर जायेगा यह बच्चा

उड़ जायेंगे हवा में

ज़िस्म के कतरे कतरे 

किसी क्लस्टर बम के गिरने से ।

मर जायेंगे

बहुत से सैनिक

बहुत से परिंदे,

रहेंगे जीवित 

केवल वे

जिन्होंने शुरू की थी जंग ।

बैठेंगे फिर

एक ही टेबल पर

करेंगे 

एक समझौता वार्ता  

और फिर करेंगे हुक़ूमत

अपनी-अपनी रियाया पर ।

2-

महासंहारक हथियारों के

इस ज़ख़ीरे पर

इतराते समय

कितने बेशर्म

और ग़ुस्ताख़ हो जाया करते हो तुम

धूर्त!  

मेरे ख़ून-पसीने की ताक़त को

कितनी चतुरायी से

छिपा लिया है तुमने

इस ज़ख़ीरे के भीतर ।