मंगलवार, 13 मई 2025

युद्ध रुका क्यों ?

 *कौन हारा कौन जीता*

जब दो योद्धा अपनी-अपनी जीत के प्रमाण प्रस्तुत करने लगें और कोई निष्पक्ष निर्णायक अनुपस्थित हो तो भ्रम स्वाभाविक है । प्रायः होता यह है कि जिसके प्रमाण अधिक सजे-सँवरे लगें वह सत्य के नहीं, झूठ के अधिक समीप होता है । पाकिस्तानी समाचार चैनल – “365 News Live” में अपनी जीत और भारत की पराजय के समाचार परोसने वाले लोगों के ठहाके, उनका आत्मविश्वास, विरोधाभासी वक्तव्य और भारत की पराजय के कूटप्रमाण सारी पोल खोल कर रख देते हैं । ऐसी निर्लज्जता अन्यत्र दुर्लभ है ।    

झूठ को सत्य की तरह प्रस्तुत करने में तकनीक की भूमिका ने कई विवादों और भ्रमों को जन्म दिया है । यह आधुनिक समाज का सर्वाधिक कलंकित पक्ष है । “अश्वत्थामा हतो नरो कुंजरो वा” जैसे भ्रम उत्पन्न करना युद्ध के समय रणनीतिकौशल के अंश हैं, पर अपने ही लोगों के समक्ष झूठ पर अड़े रहना किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं होना चाहिये । पाकिस्तान ने यही किया है, वह सदा से ऐसा ही करता रहा है । वह कभी अपनी पराजय को स्वीकार नहीं करता प्रत्युत अपने शत्रुपक्ष की जीत को उसकी पराजय बताकर और उसके कूटरचित प्रमाण प्रस्तुत कर पूरी दुनिया के साथ-साथ अपनी जनता के साथ भी छल करता रहा है । विडम्बना यह है कि ईरान, तुर्की और अजरबैजान जैसे मुस्लिम देशों के साथ-साथ चीन भी इस छल के लिये पाकिस्तान का ही समर्थन करता रहा है । चीन की एक समृद्ध दार्शनिक परम्परा रही है, उसका छलपूर्ण व्यवहार चिंताजनक है ।

हर बात में प्रतिकूल टिप्पणियाँ करने वाला अतिदुर्बल विपक्ष पूछता है कि अचानक युद्ध रुका क्यों ? रुका तो ट्रम्प के कहने से क्यों रुका ? पाक अधिकृत कश्मीर वापस लिया क्यों नहीं ? बलूचिस्तान को स्वतंत्र कराया क्यों नहीं ? पाकिस्तान को खण्ड-खण्ड किया क्यों नहीं ?  

 

*युद्ध रुका क्यों?*

भारतीय सेना और प्रधानमंत्री के वक्तव्यों के बाद स्थिति अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है । यह युद्ध पाकिस्तान के विरुद्ध तो था ही नहीं, यह तो पाकिस्तानी सेना समर्थित आतंकवादियों के विरुद्ध था । हम ही इसे पाकिस्तान के विरुद्ध समझ बैठे थे । पाकिस्तान में भारत समर्थक बलूच हैं, पख़्तून हैं, सिंधी हैं, हम अपने समर्थकों से युद्ध कैसे कर सकते हैं!

पहलगाम नरसंहार के बाद हुये इस प्रत्याक्रमण में शत्रु को भरपूर क्षति पहुँचाने के बाद और पाकिस्तान की सेना की ओर से युद्धविराम की पहल के बाद युद्ध करते रहने का कोई अर्थ नहीं था, विशेषकर तब और भी जब शत्रु महामूर्ख, आत्महंता और जनहित के कल्याण से निष्प्रयोजित भी हो ।

युद्ध के समय पाकिस्तान में दो बार भूकम्प के झटकों का अनुभव किया गया । यह पाकिस्तान का भूमिगत परमाणुपरीक्षण था । उसे पता है कि भारत पर परमाणु बम डालने के बाद उसका भी अस्तित्व बच नहीं सकेगा किंतु इससे उसे कोई प्रयोजन नहीं, उसका तो सारा प्रयोजन गजवा-ए-हिंद के लिये शहीद होकर अल्लाह की गोद में बैठकर अंगूर की शराब पीने और बहत्तर हूरों की सेवायें प्राप्त करने तक ही सीमित है ।

विशेषज्ञों के अनुसार पाकिस्तान के परमाणु बम त्रिस्तरीय हैं जिनके एक स्तर का नियंत्रण अमेरिका के पास है । समाचार है कि अमेरिका की चिंता इस बात को लेकर है कि आतंकनियंत्रित पाकिस्तान का न्यूक्लियर नियंत्रण कहीं अन्य आतंकी समूहों ने तो नहीं ले लिया । सर्वविदित है कि पाकिस्तान की राजनीति आतंक और अल्लाह के नाम पर ही चलती है, वहाँ की कठपुतली सत्ता आतंकवादियों को कभी भी न्यूक्लियर नियंत्रण को दे सकती है जिससे एशिया के अन्य देश भी संकट में पड़ सकते हैं । भारत ने पाकिस्तान के परमाणु बम की धमकी को देखते हुये उसके सैन्य केंद्र को लक्ष्य बनाकर आक्रमण किया जिससे वहाँ के तकनीकी संयत्रों को भारी क्षति हुयी है और वहाँ रेडिएशन होने की आशंका व्यक्त की जाने लगी है । अभी तो पाकिस्तान इस स्थिति में नहीं रह गया कि वह निकट भविष्य में कहीं परमाणु बम डाल सके ।

भारत ने विश्वबंधुत्व के उत्तरदायित्व की महती भूमिकाओं का निर्वहन किया है । हमें केवल अपने ही नहीं, दूसरों के कल्याण के बारे में भी सोचना होता है । पाकिस्तान एक ऐसा झोलाछाप डॉक्टर है जो किसी औषधि के साइड-इफ़ेक्ट्स की चिंता किये बिना रोगियों को औषधि देने तक ही सीमित है, फिर उसका परिणाम कुछ भी क्यों न हो, उससे पाकिस्तान को कोई प्रयोजन नहीं । भारत के पास चिकित्सा की वैश्विक उपाधियाँ हैं, इसलिये उसे तो हर बात की चिंता करनी ही होगी न!   

हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि भारत किसी देश, किसी सभ्यता या किसी सम्प्रदाय के विरुद्ध कभी आक्रामक नहीं रहा है । भारत का इतिहास आक्रमण का नहीं, सुरक्षात्मक प्रत्याक्रमण का रहा है, और यह भारत के लिये गर्व का विषय है ।    

सोमवार, 12 मई 2025

झूठ के समंदर में

आज वैशाख पूर्णिमा है और सीमा के उस पार झूठ की मंडी में बहार है । नेता अभिनेता से लेकर सड़क पर खड़ा आमआदमी तक झूठ में नहा-नहा कर मगन हो रहा है । झूठ उधर ही नहीं, इधर भी है, कुत्सित चालें उधर भी हैं, इधर भी हैं ।

कोई मोदी को संसद में स्पष्टीकरण के लिये बुला रहा है, कोई उनका त्यागपत्र माँग रहा है तो कोई क्षमायाचना मँगवाने के लिये रार कर रहा है । विवेक श्रीवास्तव को क्रोध है कि मोदी ट्रम्प के बहकावे में क्यों आये? उदय राज को दुःख है कि नाम सिंदूर क्यों है । कल पूछेंगे कि भारत का नाम भारत क्यों है ! सदा उदास रहने वाले उदय राज! सिंदूर को सिंदूर न कहें तो क्या बिक्सा ओरेल्लाना चलेगा !    

सत्यान्वेषी अँधेरे में भटक रहे हैं, झूठ के इस समंदर में सच की नन्हीं मछली न जाने कहाँ छिपा दी गयी है! कौन जीता कौन हारा, कौन गिड़गड़ाया किसके आगे । किसने किसके सैनिक मारे, कौन जान बचाकर भागे । बड़के-बड़के डीजीएमओ बोल रहे हैं, हमको तुमको पता नहीं कुछ, कितनी सच्ची कितनी झूठी हाँक रहे हैं । बनकर मुखिया घूम रहे सब, ट्रम्प बीच में कूद रहे हैं । कभी इधर की कभी उधर की, चीनी फ़्रांसीसी बोल रहे हैं । सगा कौन है कौन हितैषी, ना कोई रिश्ता ना कोई नाता, क्यों फूफ़ा बनके घूम रहे हैं!    

पाकिस्तान को क्या कहा जाय, उसके लिये तो केवल इतना ही संदेश है –

 लाख जतन भी ना ढकयँ साँचे हों जो काम

कभी उजागर होएँगे सब काम-धाम और नाम ॥

मिथ्या इतना बोलिये जा में मुँह छिपि जाय

कालिख भी कुछ कम लगय लज्जा भी रहि जाय ॥

गुरुवार, 8 मई 2025

असुर और दैत्य परम्परा के पोषक

             एक भारतीय नेता उवाच - ऑपरेशन सिंदूरएक धर्म विशेष का प्रतीक है, ऑपरेशन का कोई धर्मनिरपेक्ष नाम होना चाहिये था

बिहार की एक महिला विधायक उवाच - पहलगाम नरसंहार हुआ ही नहीं, यह तो केवल जुमलेबाज का दुषप्रचार है

ऐसे लोगों को क्यों नहीं कारागार में डाला जाना चाहिये ? हम जानते हैं कि कोई भी मीलॉर्ड इन भारतविरोधी कृत्यों पर स्वसंज्ञान नही लेगा, यह तो भारत के नागरिकों को ही करना होगा । हमारे न्यायालय सफेद हाथी हैं जिनकी आम नागरिक के लिये उपयोगिता को समझना और स्वीकार करना कठिन है । स्वातंत्र्योत्तर भारत की न्यायव्यवस्था सर्वाधिक भ्रष्ट और अन्यायपूर्ण व्यवस्था ही सिद्ध होती रही है ।

पहलगाम नरसंहार पर आरोपों=प्रत्यारोपों की शृंखला का कोई अंत नहीं है । धरती पर असुरों और दैत्यों की परम्पराओं के पोषक सदा से रहते आये हैं । पाकिस्तान के अपराधों और कुकृत्यों को मोदी का झूठा प्रचार मानने वालों की कमी न भारत में है, न पाकिस्तान में और न विश्व के अन्य देशों में ।

छल, प्रपंच और द्वेष जैसे दुर्गुणों के आधार पर निर्मित पाकिस्तान के नेता अपने कुकृत्यों को सदा से नकारते रहे हैं । वहाँ के लोग भारत को अपना शत्रु मानते रहे हैं, इसीलिये वे लोग भारत पर अत्याचार और आक्रमण करना अपना धर्म मानते हैं । संचार माध्यमों पर चल रहे वीडियोज़ में अधिकांश भारतीय मुसलमान भी पहलगाम नरसंहार को झूठ और ऑपरेशन सिंदूर को मोदी का मुसलमानों पर अत्याचार बताने में लेश भी लज्जित नहीं होते । भारत के ऐसे अभारतीय और पाकिस्तानप्रेमी नागरिकों को भारत में रहने का कोई भी नैतिक, सामाजिक या राष्ट्रीय अधिकार क्यों होना चाहिये? हम भी तो इसके विरुद्ध कभी कोई आंदोलन नहीं करते

पाकिस्तान की आरजू काज़मी चर्चा में रहती हैं, उन्हें खुलकर पाकिस्तान के विरोध में और भारत के पक्ष में बोलते हुये सुना जाता है पर हमने उन्हें भारत के विरोध में और मोदी का अपमान करते हुये भी सुना है । सीमा हैदर एक बार पुनः चर्चा में हैं, कई लोग उन्हें पाकिस्तान की जासूस मान रहे हैं, उनके पास इसके तर्क भी हैं पर वे भारत में चैन से रह रही हैं । त्रिया चरित्र को समझना इतना सरल है क्या ! पर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिये कि भारत में अंबर जैदी, सुबुही खान, याना मीर और नाज़िया इलाही खान जैसी विवेकशील नारियों की भी कमी नहीं है ।

हम पुनः पाकिस्तान पर आते हैं, जो पहलगाम नरसंहार घटना की जाँच कराने की माँग कर रहा है । कौन करेगा जाँच, चीन, तुर्की, मलेशिया, ईरान, बांग्लादेश....? पाकिस्तान के इस प्रलाप में अभी तक हर घटना का प्रमाण माँगने वाले भारतीय नेता सम्मिलित नहीं हुये, यह आश्चर्य है । हमने मोतीहारी वाले मिसिर जी से पूछा, असुर इतने प्रभावी कैसे हो जाते हैं कि मनुष्यत्व और दैवत्व का अस्तित्व ही संकट में आ जाता है? उन्होंने इसका कारण ब्रह्माण्ड की भौतिक संरचना को बताया -  “As you know the visible universe is only 5 percent of the entire cosmos i.e. 95% of the cosmos is invisible and hence dark, which contains 26.8% dark matter and 68.2% dark energy.  So, the negative charges, hidden elements and invisible powers are dominant over divinity.” – मोतीहारी वाले मिसिर जी ।

शनिवार, 3 मई 2025

मूर्तियाँ

 गढ़ डालीं हमने

सुंदर-सुंदर मूर्तियाँ

उन लोगों की

जो लगे विचारक

और शुभचिंतक भी हम सबके ।

हमने भगवान बना डाला उन सबको

जो काम आ सकते थे हम सबके

मनुष्यों की तरह ।

पता था

गढ़ी हुयी मूर्तियाँ निष्प्राण होती हैं

हमने ठूँस दिये उनमें विचार

उनके नहीं

अपने लक्ष्यों को पूरा करने वाले

निजी विचार ।

मूर्तियाँ अब अस्त्र-शस्त्र बन गयी हैं

जिनसे हत्या करते हैं हम प्रतिक्षण

उन्हीं विचारकों और चिंतकों की

उनके विचारों और चिंतन की ।

 

दिवंगत हो चुके लोगों के शवों से

अब हम व्यापार करते हैं

गढ़कर भगवान, भगवान से

हम टकरार करते हैं

दिन-रात सबकी आँखों में

हम धूल झोकते हैं

तुम्हें भी तो लगता है अच्छा

धूल झुकी आँखों से निहारना

निहारते ही रहना मृगमरीचिका ।      

क्या भारत हिन्दूविहीन हो जायेगा

तमसोमा ज्योतिर्गमय एक शुभेक्षा और संकल्प ही नहीं प्रत्युत भौतिक रचना प्रक्रिया का एक सिद्धांत भी है । तमस से ज्योति, यिन से याँग, प्रकृति से पुरुष, फ़्रॉम नथिंग टु एवरीथिंग... जगत की यही गति है । यहाँ कोई बिंदु अंतिम नहीं होता, जिसे आप अंतिम मान बैठे हैं वह संक्रांति बिंदु है । डॉक्टर फ़्रिट्ज़ॉफ़ काप्रा आपके अंतिम बिंदु को टर्निंग प्वाइंट मानते हैं । यी ज़िंग  में भी यही वर्णित है । यह शून्य का वह काल है जो एकोऽस्मि बहुस्यामः की यद्रच्छा के साथ ब्रह्माण्डीय सृजन को अभिव्यक्त करता है। – मोतीहारी वाले मिसिर जी 

 

हिंदुओं का हिंदुओं के प्रति निरंतर विश्वासघात, एकता और दूरदर्शिता का अभाव, भारतीय मूल्यों से विद्रोह, विदेशी मूल्यों का अनुकरण और विदेशी दासता के लिये उद्दाम लालसा आदि ऐसे तथ्य हैं जिनसे हिंदू समाज के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग गये हैं, क्या इस रुग्ण समाज की प्रॉग्नोसिस शून्य है ?

पहलगाम आक्रमण के पश्चात् ऐसी-ऐसी सच्चाइयाँ सामने आ रही हैं जिनसे लोग आशंकित हो रहे हैं । लाखों भारतीय लड़कियों की पाकिस्तान में ससुराल होने के बाद भी भारत में ही निवास और संतानोत्पादन से परिवर्तित हो रहे जनसांख्यिकीय असंतुलन के प्रति सरकारें कैसे और क्यों अनभिज्ञ बनी रहीं, राजनेताओं और अतिबुद्धिजीवियों द्वारा पहलगाम की घटना को मनगढंत सिद्ध करने के प्रयास, कश्मीरी जनता का पाकिस्तान प्रेम और भारत से शत्रुता का भाव, विपक्षी नेताओं द्वारा घटना की वास्तविकता को छिपाने के प्रयास कि धर्म पूछकर हत्या नहीं की गयी ...आदि ऐसी सच्चाइयाँ हैं जो भारत पर इस्लामिक शासन के बढ़ते वर्चस्व को प्रमाणित करती हैं । ...तो क्या भारत एक असहिष्णु इस्लामिक देश में परिवर्तित होता जा रहा है ? क्या धरती हिंदूविहीन हो जायेगी ? क्या भारत में एक ऐसा तंत्र विकसित होकर सशक्त हो चुका है जो मानवीय मूल्यों और नैतिकता को निगलता जा रहा है ?

छह हजार वर्ष प्राचीन चीनी दर्शन शास्त्र यी ज़िंग (आई चिंग) में भी सभी प्रकार के परिवर्तनों को सतत और अवश्यंभावी मानते हुये उनकी भवितव्यता को स्वीकार किया गया है – “After a time of decay comes the turning point. The powerful light has been banished returns. There is movement, but it is not brought about by force. The movement is natural, arising spontaneously. For this reason the transformation of the old becomes easy. The old is discarded and the new is introduced, both measures accord with the time; therefore no harm results.”

ऐसा कुछ भी नहीं जो सदा के लिये समाप्त हो पाता हो । जो हो पाता है वह परिवर्तन भर है । क्वांटम फ़िज़िक्स से भी सबने यही सिद्ध किया है । तमस भी उतना ही आवश्यक है जितना कि प्रकाश । मात्र तीन प्रतिशत दृष्टव्य ब्रह्माण्ड की सृष्टि उस अंधकार के गर्भ से ही हो पाती है जो कुल ब्रह्माण्ड का ९७ प्रतिशत है । यह जो बृहदाकार धर्मच्युत समाज है उसी में से प्रस्फुटित होगें सनातन के सिद्धांत को जानने और मानने वाले । तमस ही रूपांतरित होगा प्रकाश में । आज जो दृष्टव्य है, प्रकाशित है, शक्तिशाली है... वह विलुप्त हो जायेगा तमस के गर्भ में । विश्वासघातियों, स्वार्थियों, मिथ्याचारियों और मानवतापीड़कों को एक दिन तमस में समाहित होना होगा ...परंतु संक्रांति के उस बिंदु पर हर किसी को अपनी भूमिका सुनिश्चित करनी ही होगी जिससे हम और आप भी उस टर्निंग प्वाइंट के साक्षी और सहभागी बन सकें ।

बुद्धि और विवेक में उलझा आरक्षण

          “बुद्धि का कार्य विश्लेषण करना है, जबकि विश्लेषण को स्वीकार या अस्वीकार करने वाला विवेक उचित-अनुचित का निर्धारण करता है । इसीलिये बुद्धि से विवेक कहीं अधिक सैद्धांतिक और व्यावहारिक है । विश्लेषण में त्रुटि की आशंका हो सकती है पर विवेक के परिणाम त्रुटि से परे होते हैं”। - मोतीहारी वाले मिसिर जी 

 

विश्व के लगभग सभी देशों में आरक्षण को लागू किया गया है, किंतु जातिगत आधार पर बौद्धिक आरक्षण केवल भारत में ही है । अन्य देशों में वृद्धों और विकलांगो के लिए सुविधाओं का आरक्षण है: जबकि पढ़ाई, नौकरी और पदोन्नति वाला आरक्षण भारत के अतिरिक्त कदाचित ही किसी अन्य देश में हो । इस तरह के अप्राकृतिक और अवैज्ञानिक आरक्षण में गुणात्मकता का कोई मूल्य नहीं होता जिससे समाज, प्रशासन और उद्योग की गतिविधियाँ ह्रासोन्मुखी होने लगती हैं । यही कारण है कि आरक्षण पाने के लिए लोगों में अपनी जाति और वर्ग बदलने के लिए आंदोलन और संघर्ष तक होने लगे हैं । कुछ लोग तो मतांतरण (धर्मांतरण) के बाद भी अपनी पिछली त्याज्य जाति के वाहक बने रहते हैं । भीमराव अम्बेडकर भी एक निश्चित अवधि तक के लिये ही आरक्षण के पक्ष में थे, सदा के लिए नहीं । आज यदि भीमराव जी होते तो वे स्वयं भी आरक्षण का विरोध करते ।

 

वर्ष २०२१ में आरक्षण के समर्थन में अपने विचार रखते हुये डॉक्टर विकास दिव्यकीर्ति अपने छात्रों को सम्बोधित करते हुये पूरे देश से पूछते हैं, “इस विषय पर हमारे समाज में इतना विवाद क्यों हैं? ...आरक्षण से संसाधनों के वितरण के अवसर मिलते हैं । आरक्षणविरोधियों को लगता है कि सरकार उनके संसाधनों को छीन रही है जिन पर पिछले तीन हजार सालों से उनका अधिकार रहा है, इसीलिये वे मानते हैं कि आरक्षण से अयोग्य लोगों को संसाधन दे दिये जाते हैं । सत्तर साल से आरक्षण दे रहे हो, कब तक दोगे? एससी, एसटी, पिछड़ा वर्ग, महिला, विकलांग आदि सब मिलाकर जनसंख्या के कुल ९० प्रतिशत हैं । ९० प्रतिशत को सत्तर साल से ४९ प्रतिशत आरक्षण दे रहे हैं, और इस बात से बहुत लोगों के पेट में खलबली मची हुयी है । तीन हजार साल तक पढ़ाई-लिखाई पर ब्राह्मणों का हक था, पूरे सौ प्रतिशत आरक्षण, तब किसी को पेट में दर्द नहीं हुआ । ब्राह्मण जनसंख्या केवल दस प्रतिशत थी, दस प्रतिशत लोगों ने सौ प्रतिशत सीटें घेरीं तीन हजार साल तक और अब सत्तर साल से परेशान हो गये”।

प्रोफ़ेसर दिव्यकीर्ति जी का कथन सत्य से परे है, धर्मपाल ने अपनी पुस्तक “द ट्री ऑफ़ इण्डिया” में लिखा है कि अठारहवीं शताब्दी में भारत के नागरिक शतप्रतिशत शिक्षित हुआ करते थे । इस शतप्रतिशत में केवल ब्राह्मण ही हैं क्या? …तब भीमराव के पिता सेना में सूबेदार कैसे बन गये? स्वयं भीमराव कैसे शिक्षित हो सके ? वैदिक काल में मंत्र और ऋचायें लिखने वालों में केवल ब्राह्मण ऋषि ही नहीं अपितु महिलायें और अन्य सभी वर्णों के ऋषि सम्मिलित हुआ करते थे । दिव्यकीर्ति जी जाति और वर्ण में घालमेल कर रहे हैं । वे शिल्पज्ञान में दक्षता के आधार पर सहज गति से बनी व्यावसायिक उपाधियों को ही अन्य छद्मविद्वानों की तरह ही जाति मान बैठे हैं जबकि भारतीय शास्त्रोक्त समाज व्यवस्था में जाति जैसी कोई व्यवस्था थी ही नहीं ।

वर्णव्यवस्था के बारे में, बिना यह जाने हुये कि वर्ण किसी जातक के पूर्वकर्मों और शेष ऐषणाओं के आधार पर प्रकृति द्वारा निर्धारित एक वैज्ञानिक व्यवस्था है, लोग विरोध करने लगते हैं । वर्णव्यवस्था को सरलता से समझने के लिए हीमोग्लोबिनोपैथी जैसी जेनेटिक व्याधियों की अगली पीढ़ी तक पहुँचने की वैज्ञानिक प्रक्रिया पर चिंतन करना कुछ प्रासंगिक होगा । एक ही परिवार में भिन्न-भिन्न वर्णों के लोगों का जन्म लेना इसकी वैज्ञानिकता का प्रमाण है । यदि आपको अपने जन्म का सही-सही समय और दिन ज्ञात है तो आप ज्योतिषीय गणना करके अपने वर्ण का पता लगा सकते हैं । कोई भी जातक किसी भी कुल में जन्म लेकर किसी भी वर्ण का हो सकता है, प्रकृति की यही वर्णव्यवस्था है । यह व्यवस्था उतनी ही सत्य है जितनी कि वैदिकोक्त त्रिदोष एवं त्रिगुण व्यवस्था । मेरा ही उदाहरण लीजिये, मेरा जन्म ब्राह्मणकुल में हुआ पर मेरा वर्ण वैश्य है, मेरे विचार, कार्यपद्धति और आचरण वैश्यों जैसे ही हैं जबकि मेरे बेटे का वर्ण ब्राह्मण है । मेडिकल की भाषा में कहें तो वर्णव्यवस्था जेनेरिक है और जातिव्यवस्था पेटेंट ।

 

वार्णिक गुण जातक के समवाय (अपरिहार्य, अयुक्तसिद्ध) गुण होते हैं, वह अपने तप से उन्हें न्यून या अधिक तो कर सकता है पर पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता । जातीय वर्गीकरण अवैज्ञानिक है जो समाज या राजा द्वारा निर्धारित किया जाता है, ब्राह्मणों द्वारा नहीं । स्वतंत्र भारत की सरकारें भी जातियाँ गढ़ने में पीछे नहीं हैं, और अब तो जनता स्वयं भी आरक्षण के लाभ लेने के लिए किसी भी जाति का नाम धारण करने के लिये उतावली है ।

जब हम जातीय आरक्षण करते हैं तो वर्णव्यवस्था का उल्लंघन करते हैं, वास्तव में ऐसा आरक्षण समाज विध्वंसक है जो योग्यता और दक्षता को नहीं प्रत्युत जाति को वरीय स्वीकार करता है । यही कारण है कि संसाधनों की खोज में भारतीय प्रतिभायें पलायन करने को विवश होती हैं । दिव्यकीर्ति जैसे लोगों को इन बिंदुओं पर चिंतन करने की आवश्यकता क्यों नहीं होती ?

आरोप लगते रहे हैं कि बाह्मणों ने जातियाँ रचकर समाज में विभाजन और ऊँच-नीच का विध्वंसक बीजारोपण किया है । जातियाँ यदि ब्राह्मणों ने बनायीं हैं तो आप उसे मान ही क्यों ही रहे हैं, जातिव्यवस्था का बहिष्कार क्यों नहीं करते? बल्कि आप तो आरक्षण वाले समूह में स्वयं को सम्मिलित किये जाने के लिये आंदोलन तक करने लगे हैं । कोपीनधारी और भिक्षाटन करने वाले दरिद्र ब्राह्मण कब इतने शक्तिशाली हो गये जो अत्याचार करने लगे और जातिव्यवस्था को हर किसी के लिये अनिवार्य और स्वीकार्य बना दिया ? अत्याचार वह करता है जो शक्तिशाली होता है, निर्बल कब किसी पर अत्याचार करता है ? राजवंशों की ओर आइये, कितने ब्राह्मण राजा हुये हैं ? भारत में प्रायः ब्राह्मणेतर समुदाय के लोग ही सत्ता के अधिकारी होते रहे हैं, आज भी हैं, आगे भी होते रहेंगे, क्योंकि सत्ता ब्राह्मणों के लिये है ही नहीं, वे उसके लिये उपयुक्त पात्र नहीं हैं ।

आजकल राजनीतिक स्वार्थ को देखते हुये ब्राह्मणों के लिये भी निर्धनता के आधार पर आरक्षण देने की बातें उठने लगी हैं । यह भी अनुचित है, ब्राह्मणों को पंगु मत बनाइये । हम जाति और आरक्षण, दोनों के सैद्धांतिक और व्यावहारिक विरोधी हैं । बहुत से लोग जातीय आरक्षण और जातीय जनगणना के समर्थक हैं । ये वे लोग हैं जो जातिव्यवस्था के लिये ब्राह्मणों को जी भर-भर कोसते हैं पर जातीय जनगणना और जातीय आरक्षण के प्रबल समर्थक हैं । आज के आरक्षित समुदाय के पूर्वज कभी राजा हुआ करते थे, वे सत्ता में रहे हैं, सम्पन्न रहे हैं, शक्तिशाली रहे हैं, फिर आज उन्हें किसी आरक्षण की क्या आवश्यकता? यदि वे मानते हैं कि वे शोषित हैं, तो किसने किया उन शक्तिशालियों और राजवंश के लोगों का शोषण?  

आरक्षण करना ही है तो बदलती डेमोग्राफ़ी और वर्तमान समीकरणों के दूरगामी परिणामों को देखते हुये विदेशियों और अवैध घुसपैठियों के अतिरिक्त भारत के हर व्यक्ति का आरक्षण होना चाहिये । शिक्षा और शासन से मिलने वाली अन्य सुविधाओं के लिये केवल और केवल भारतीयों को ही पात्र माना जाना चाहिये । कर सकेंगे ऐसा आरक्षण!