शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

आर्मीनिया में भी है एक जम्मू-कश्मीर

टर्की एक धर्मनिरपेक्ष देश है

...जहाँ चौहत्तर फ़ीसदी लोग सुन्नी मुसलमान हैं,

...जहाँ की शीर्ष अदालत एक बहुत पुरानी चर्च को मस्ज़िद में तब्दील कर देने का हुक़्म देती है ।

...जहाँ की सेना और हथियार ईसाई बहुल आर्मीनिया पर कहर ढाने के लिये अज़रबैज़ान के लिए उपलब्ध हैं ।

अफ़ीम की खेती...

अफ़ीम की खेती करने के लिए गांधारी के मायके जाने की आवश्यकता नहीं है । दुनिया भर के इंसानों के उपजाऊ दिमाग अफ़ीम से भी अधिक नशीली अफ़ीम पैदा कर सकते हैं । धर्म को अफ़ीम की संज्ञा देने से परेशान होने वाले लोगों को यह समझना होगा कि मानवधर्म के अतिरिक्त अन्य जितने भी मानवरचित धर्म हैं वे वास्तव में राजनीतिक षड्यंत्र के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं ।

धर्मनिरपेक्षता की म्यान में धर्मांतरण  की तलवार...

भारतीयों को वर्षों से यह समझाया जाता रहा है कि दुनिया के सारे धर्म बहुत अच्छे हैं इसलिए धर्मांतरण एक बहुत पुण्य का काम है । भारतीय यह मान लेते हैं कि सभी धर्म अच्छे हैं इसलिए अपना पारम्परिक धर्म त्याग कर किसी विदेशी धर्म को स्वीकार कर लेना ही धर्मनिरपेक्षता और आधुनिकता का प्रमाण है ।

टर्की एक धर्मनिरपेक्ष देश है जो ईसाई बहुल आर्मीनिया के विरुद्ध ईसाइयों को तबाह करने के लिए अज़रबैज़ान जैसी इस्लामिक शक्तियों के पक्ष में खड़ा दिखायी देता है । अज़रबैज़ान की ओर से आर्मीनिया के विरुद्ध लड़ने के लिए जंग में कूद पड़ी ईरानी सेना ने दुनिया को एक संदेश दे दिया है कि युद्ध यदि ग़ैर इस्लामिक मुल्कों से हो तो शिया और सुन्नी अपनी सारी दुश्मनी भूलकर एक हो जाया करते हैं ।

1917 से 1923 तक चली बोल्शेविक क्रांति के बाद नव ग़ठित कम्युनिस्ट सोवियत यूनियन में भी केवल एक ही पॉलिटिकल धर्म माना गया । ध्यान देने की बात यह है कि क्रिश्चियन और इस्लाम जैसे धर्मों को सोवियत यूनियन की सरकार भी समाप्त नहीं कर सकी । कम्युनिस्ट शासन के दौर में भी मानव निर्मित सभी धर्म बने रहे और सोवियत यूनियन के टूटते ही दबे-ढके रहे धार्मिक विद्वेष का नशा अपने चरम पर आ गया जो नागोर्नो-क़ाराबाख़ के रूप में आज भी सुलग रहा है । धर्म को अफीम यूँ ही नहीं कहा गया । अज़रबैजान की सेना पिछले तेरह दिनों से आर्मीनिया के चर्चों पर हमले करके उन्हें नेस्तनाबूद कर रही है, ...और हम कहते हैं कि सभी धर्म अच्छे होते हैं, …जबकि दुनिया में सर्वाधिक ख़ून-ख़राना धर्म के कारण ही होते रहे हैं ।       

आर्मीनिया में भी है एक जम्मू-कश्मीर...      

आर्मीनिया के नागोर्नो-काराबाख़ और भारत के जम्मू-कश्मीर का दर्द बहुत कुछ एक जैसा है । अज़रबैजान का एक हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान की तरह आर्मीनिया की सीमाओं के अंदर एक छोर पर ईरान और टर्की की सीमाओं को स्पर्श करता है जबकि नागोर्नो-क़ाराबाख़ की स्थिति ठीक जम्मू-कश्मीर जैसी है जिसका कुछ हिस्सा अज़रबैजान ने कब्ज़ा करके रखा हुआ है और कुछ हिस्सा आर्मीनिया के साथ है ।    

            एक समय था जब सोवियत-आर्मीनिया(ईसाई बहुल), सोवियत-अज़रबैजान (मुस्लिम बहुल) और नागोर्नो-क़ाराबाख़ (ईसाई बहुल क्षेत्र जो सोवियत-अज़रबेजान प्रांत द्वारा शासित हुआ करता था) आदि सभी क्षेत्र सोवियत यूनियन के अंतर्गत हुआ करते थे । सोवियत यूनियन के बिखराव के समय जब आर्मीनिया और अज़रबैजान दो स्वतंत्र देश बने तो ईसाई बहुल क्षेत्र नागोर्नो-क़ाराबाख़ ने आर्मीनिया के साथ जाने का फ़ैसला किया किंतु अवसर देखकर मुस्लिम बहुल अज़रबैजान ने नागोर्नो-क़ाराबाख़ के एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर उसे पीओके बना लिया जबकि नागोर्नो-क़ाराबाख़ का शेष हिस्सा आर्मीनिया के साथ जाने में सफल हो गया जिसे अज़रबैजान ने मानने से इंकार कर दिया । तबसे यह विवाद आर्मीनिया का एक नया जम्मू-कश्मीर हो गया है । आर्मीनिया भारत की भूमिका में है जबकि अज़रबैजान पाकिस्तान की भूमिका में । इसीलिये कश्मीर न ले पाने के मलाल से दुःखी पाकिस्तान ने अज़रबैजान के पक्ष में खड़े होकर आर्मीनिया को नेस्त-नाबूद करने के लिए अपनी सेना भेज दी ।   

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

मोतीहारी वाले मिसिर जी की डायरी का एक पन्ना...

राष्ट्रीय परिदृश्य...

बद-तमीज़ हम तब भी थे जब लाखों साल पहले पूर्ण गँवार थे, बद-तमीज़ हम आज भी हैं जब पूर्ण शिक्षित हो गये हैं ।

अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य...

ख़ून बहाने के लिए हम तब भी आमादा रहा करते थे जब असभ्य थे, ख़ून बहाने के लिए हम आज भी आमादा रहते हैं जब सभ्यता के शिखर पर हैं ।

टीवी डिबेट्स...

आदमी आदमी को देखते ही कितना बेशऊर और वैचारिक रूप से हिंसक हो उठता है, यह जानने के लिए आप देख सकते हैं भारतीय टीवी चैनल्स पर सम्भाषा परिषदों में होने वाली डिबेट्स ।

टीवी डिबेट्स का एकमात्र सिद्धांत...

न श्रुणुतव्यं न मंतव्यं वक्तव्यं तु पुनःपुनः ( मैं न तो तुम्हारी बात सुनूँगा, न किसी बात पर विचार करूँगा बल्कि पुनःपुनः बोलता ही रहूँगा)  

कितनी आशा...

टीवी डिबेट्स के लिये आमंत्रित राजनेताओं, राजनीतिक विश्लेषकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विचारकों, और धार्मिक स्कॉलर्स की अनियंत्रित परिषदों में एक-दूसरे को चीख-चीख कर चुनौती देने वाले आक्रामक वृत्ति से परिपूर्ण स्वयम्भू नायकों को देख कर सोचता हूँ कि आम जनता को ऐसे असामाजिक लोगों से अपने समाज और देश के कल्याण की क्यों और कितनी आशा करनी चाहिये ?

युद्ध के नियम...

आज, जब कि हम सभ्यता के उत्कर्ष पर हैं, युद्ध के सारे नियमों को तोड़ते हुये युद्ध करना ही युद्ध का नया नियम बन गया है । भले ही इस नियम को कोई भी देश मान्यता न दे किंतु परम्पराओं को तोड़ कर परिवर्तन करने वाले कभी किसी मान्यता की परवाह नहीं किया करते, वे इसे ही क्रांति कहकर इतराते और आत्ममुग्ध हो जाया करते हैं । बस्तर में माओवादियों द्वारा एम्बुश लगाकर हत्या करने के बाद शवों के ऊपर कूद-कूद कर नाचने और उन्हें जूतों से ठोकर मारने वाली परम्परा की पुनरावृत्ति आर्मीनिया-अज़रबैज़ान युद्ध में देखने को मिल रही है ।

ग़नीमत है...

सूखी नदी के किनारे खड़े सूखे पेड़ की एक डाल पर बैठे हीरामन तोते ने एक ठण्डी साँस ली फिर अपनी तोती से कहा – “ग़नीमत है कि परिंदों में इंसानों जैसी कई जातियाँ नहीं होतीं, कई धर्म नहीं होते वरना हम भी इंसानों जैसे ही महापापी, महाक्रूर और महादुष्ट हो गये होते” ।     

अँधियारा करने वाले उजियारों के ये ठेकेदार...  

-      एक-दो नहीं बल्कि एक दर्ज़न से अधिक महिलाओं का यौनशोषण करने वाले पत्रकार मोहम्मद ज़ावेद अकबर का हृदय परिवर्तन हुआ, देश के ग़रीबों का शोषण रोकने के लिए उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और विदेश मामलों के मंत्री बन गये । बंद पड़ी पुरानी डायरी के पन्ने एक दिन अचानक फड़फड़ाये । डायरी के पन्नों में दफ़न यौनशोषण के ज़िन्न ने अँगड़ाई ली, मी टू- मी टू हुआ, डिफ़ेमेशन ने कोर्ट में गुर्राहट भरी, लेकिन...

...लेकिन एक महल जो बड़ी मुश्किल से बनाया था और अभी ठीक से अपनी रौनक बिखेर भी नहीं पाया था ...खण्डहर हो गया ।  और अब तो खण्डहर का सारा किस्सा ही ग़ुम हो गया है ।

-      टीवी क्राइम शो इण्डियाज़ मोस्ट वांटेडके प्रोड्यूसर, एंकर और ब्यूरोक्रेसी टुडेके सम्पादक सुहैब इलियासी दूसरों के क्राइम उजागर करते-करते एक दिन ख़ुद भी क्राइम कर बैठे और अपनी पत्नी अंजू इलियासी की हत्या कर डाली । 

-      तहलका मैग्ज़ीन के मुख्य सम्पादक, पत्रकार, प्रकाशक और उपन्यासकार तरुण तेजपाल सिंह भ्रष्टाचार के विरुद्ध तहलका मचाते-मचाते यौनउत्पीड़न करके एक दिन ख़ुद भी तहलका बन गये । आज उस तहलके का धूमकेतु अंतरीक्ष में दूर कहीं ओझल हो चुका है ।

-      एक और यक्ष प्रश्न...

गरीब-गुरबा की भलाई और न्याय के लिए लड़ते-लड़ते मूक पशुओं का चारा खा जाने वाले के चेहरे पर शर्म की एक भी रेखा किसी ने देखी है आज तक?  


रविवार, 4 अक्टूबर 2020

हिंदी की हत्या में हम भी सहभागी हैं...

निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्वै है सोय ।

लाख उपाय अनेक यों, भले करे किन कोय ॥ - भारतेंदु हरिश्चंद्र

भारतेंदु हरिश्चंद्र हम भारतीयों के लिए हिंदी दिवसको छोड़कर शेष दिनों के लिए अब पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुके हैं ? इसीलिए हमने उनकी “निज भाषा उन्नति अहै” वाली कविता को भी विद्यालयीन पाठ्यक्रम से दशकों पहले हटा दिया था । नई पीढ़ी के लोगों को तो इस कविता के बारे में पता भी नहीं है ।   

अधिकांश योरोपीय देशों में अंग्रेज़ी को घास नहीं डाली जाती तब भारतीय राज्यों में शिक्षा के माध्यम के लिए अंग्रेज़ी इतनी आवश्यक क्यों है? क्या हम भारतीयभाषाओं की सुनियोजित हत्या में पाप के सहभागी नहीं हैं! भाषा वह शरीर है जिसमें उस देश की संस्कृति आत्मा की तरह व्याप् रहती है । भाषा की मृत्यु संस्कृति की मृत्यु है, इसे हम भारतवासी उतनी ही अच्छी तरह जानते हैं जितनी अच्छी तरह योरोपीय देश जानते हैं । इस सत्य को अच्छी तरह जानते हुये भी हम मानने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं । मेडिकल और इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने वाले छात्रों में सर्वाधिक संख्या उन छात्रों की होती है जिनकी शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी नहीं है । हम फिर भी अंग्रेज़ी के पीछे पड़े रहना चाहते हैं ।

हम साल में एक बार हिंदी की प्रशंसा और उसे बढ़ावा देने के उपायों की झूठी और छलावा भरी योजनायें बनाते हैं जो उसी दिन कार्यक्रम की समाप्ति के साथ ही दम तोड़ दिया करती हैं । योरोप के कई देश अंग्रेज़ी को नापसंद करते हैं । चीन के चेयरमैन भारत आते हैं तो चीनी बोलते हैं, हम चीन जाते हैं तो अंग्रेज़ी बोलते हैं ।

           कोई भाषा यूँ ही नहीं विकसित हो जाया करती । पीढ़ियाँ लग जाया करती हैं किसी भाषा के विकास में और उसकी सांस्कृतिक यात्रा को आगे ले जाने में । एक पीढ़ी के तौर पर हम अपनी भाषा यात्रा को कितना आगे ले जा पा रहे हैं ? भाषा के विकास में स्थानीय परम्पराओं, सांस्कृतिक गतिविधियों और भौगोलिक वातावरण का महत्वपूर्ण योगदान हुआ करता है । जब हम किसी विदेशी भाषा को अपने दैनिक व्यवहार में अपना लेते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि हमने विदेशी परम्पराओं, विदेशी सांस्कृतिक गतिविधियों और विदेशी भौगोलिक वातावरण के एक काल्पनिक संसार को अपना लिया है । हम एक अवैज्ञानिक और प्रकृतिविरुद्ध प्रक्रिया का पालन कर रहे हैं ।

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

रायपुर की रेव पार्टीज़ में कोकीन...

मुम्बई ही नहीं जगदलपुर और रायपुर जैसे शहर भी वर्षों से नशे की ग़िरफ़्त में हैं । रेव पार्टीज़ के आयोजन की लत छत्तीसगढ़ के शहरों में भी अपनी जड़ें जमाती जा रही है । कुलीन घरों की लड़कियाँ और उच्च शिक्षित लोग भी कोकीन के शौक़ीन हैं । मामले का खुलासा किया है पुलिस या नार्कोटिक्स के अधिकारियों ने नहीं बल्कि एक पत्रकार ने । मामला उजागर होने के बाद कोकीन के दो पेडलर्स पकड़े गये हैं । मामला हाईप्रोफ़ाइल लोगों का है, कोकीन जैसे महंगे नशे से छत्तीसगढ़ की सम्पन्नता समझ में आती है जो आतंकवादियों के लिए एक आमंत्रण है । सही तरह से जाँच हो तो छत्तीसगढ़ के कई शहरों में कोकीन के कहर से युवाओं को बर्बाद होने से बचाया जा सकता है ।

कोकीन और हशीश के मामले में रायपुर के तार नागपुर और मुम्बई से जुड़े हुये हैं जबकि मारीज़ुआना का धंधा उड़ीसा से होता रहा है । आये दिन समाचार पत्रों में राष्ट्रीयराजमार्ग पर मारीज़ुआना पकड़े जाने के समाचार वर्षों से प्रकाशित होते रहे हैं, किंतु आजतक इस धंधे पर लगाम नहीं लगाई जा सकी है ।

मामला कोकीन और हशीश का ही नहीं है । सही तफ़्तीश हो तो नशे के व्यापार के सूत्र हाईप्रोफ़ाइल देहव्यापार और आतंकवादियों से भी जुड़े हुये मिल जायेंगे ।

हमारा केवल एक ही प्रश्न है –इतना हाईप्रोफ़ाइल धंधा आज तक किसी ज़िम्मेदार अधिकारी की नज़र से कैसे बचा रहा

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

एक और चीनी वायरस...

फ़ेफड़ों पर हमला करने वाले चीनी कोरोना वायरस के बाद अब मस्तिष्क की तंत्रिकाओं पर हमला करने वाले चीनी सीक्यू वायरस ने भी भारत में दस्तक दे दी है ।  

छिप कर हमला करने और दुश्मन के सचेत होते ही भाग जाने वाली निकृष्ट युद्धकला को गुरिल्ला युद्ध कहते हैं जिसका जन्मदाता देश चीन है । एशिया में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए चीन ने अब विषाणु युद्ध का सहारा लिया है जो गुरिल्ला युद्ध से भी अधिक निकृष्ट और क्रूर तरीका है । बायो-वीपन मनुष्य सभ्यता को व्यापक रूप से समाप्त करने का एक ऐसा उपाय है जिसमें किसी देश की जनसंख्या को समाप्त करने और वहाँ की अर्थव्यवस्था को कुचल देने की कुचेष्टा की जाती है । कोरोना वायरस इसका सबसे ताजा उदाहरण है जिसने पूरी दुनिया की अर्थव्यव्स्था को उलट-पुलट कर रख दिया है ।

कोरोना वायरस के बाद अब चीन से आये Cat Que Virus नाम के एक और घातक वायरस ने वियतनाम और भारत में दस्तक दे दी है । भारत में यह नया चीनी वायरस मच्छरों में जबकि वियतनाम में सुअरों में पाया गया है । सुअर इसका प्राथमिक स्रोत है और मच्छर सेकेण्ड्री । सुअर और मनुष्य के बीच इस वायरस के संवहन का काम मच्छर की कुछ प्रजातियों का है । पूना की सीरोलॉज़िकल लैब में जून 2020 में एक जाँच के अनंतर रक्त के 883 नमूनों में से दो लोगों के सीरम में इस वायरस के प्रति एण्टीबॉडीज़ की उपस्थिति के प्रमाण मिले हैं । मनुष्य के सीरम में सीक्यू वायरस के एण्टीबॉडीज़ की उपस्थिति हमें एक्व्यार्ड इम्म्यूनिटी के प्रति आश्वस्त करती है किंतु यदि किसी व्यक्ति को कोरोना और सीक्यू वायरस का एक साथ संक्रमण हो तो स्थिति गम्भीर हो सकती है । अभी हमें यह नहीं मालुम है कि इन दोनों वायरसों में आपसी जुगलबंदी है या नहीं, है तो इसने अभी तक कितना कहर ढाया है । मच्छर के काटने से फैलने वाला कैट क्यू वायरस तीव्र ज्वर, मेनिन्ज़ाइटिस और पीडियाट्रिक इनसेफ़ेलाइटिस के लिए उत्तरदायी हो सकता है ।

यानी चीन कैट क्यू वायरस से अपने शत्रुओं पर हमला करने के लिए मच्छरों को प्रक्षेपास्त्र की तरह स्तेमाल कर रहा है । अब हमें मच्छरों से और भी सावधान रहने की आवश्यकता है, विशेष तौर से क्यूलेक्स प्रजाति से । एडिस इज़िप्टी  सामान्यतः डेंगू, चिकनगुनिया, ज़ीका फ़ीवर, मायारो और पीला बुख़ार के लिए; क्यूलेक्स क्वीनक्वेफ़ासियाटस सामान्यतः मलेरिया, सेण्ट लुइस इनसेफ़ेलाइटिस, ज़ीका,और वेस्ट नील के लिए जबकि क्यूलेक्स ट्राइटीनियोरिंकस नामक मच्छर जापानी इनसिफ़ेलाइटिस के लिए कुख्यात हैं । मच्छरों की तीनों ही प्रजातियाँ भारत में पायी जाती हैं और सीक्यू वायरस की संवाहक हैं ।

और अंत में खरी बात यह कि रोग तो बहुत हैं हम किस-किस से कहाँ तक लड़ेंगे, सबसे उत्तम उपाय है रोग के कारणों से बचाव ।        


मंगलवार, 29 सितंबर 2020

सरकारीकरण से निजीकरण की ओर...

समाचार है कि बस्तर में एन.एम.डी.सी. के कर्मचारियों ने निजीकरण का सशक्त विरोध प्रारम्भ कर दिया है ।

सरकार एनएमडीसी में अपनी भागीदारी सेठों को बेचना चाहती है । रेलवे में जनभागीदारी के नाम पर सेठों की भागीदारी शुरू हो चुकी है । ज़ल्दी ही बहुत सी सरकारी कम्पनियाँ अब सेठों के हाथों में होंगी । धन जुटाने के लिए सरकारी उद्योगों को बेचे जाने का सिलसिला शुरू हो गया है (दोबारा धन की ज़रूरत होगी तो क्या बेचियेगा?) । लोग आशंकित हैं कि रक्षा सामग्रियों और आयुध उत्पादन से सम्बंधित सरकारी उद्योग भी यदि सेठों के हवाले कर दिए गए तो आगे चलकर ये सेठ इतने शक्तिशाली हो सकते हैं कि सरकारें इनके सामने बौनी हो जायेंगी ...इतनी बौनी कि फिर सरकारों को सन्यास लेना पड़ जायेगा और शक्तिशाली सेठ अपना राजतिलक ख़ुद ही कर लेंगे । ईस्ट इण्डिया कम्पनी की तरह इन महाशक्तिशाली सेठों के पास अपनी सेना होगी और अपने उद्योगों को चलाने के लिए अपने क़ानून होंगे । जिसे जनभागीदारी का नाम दिया गया है वह वस्तुतः सेठभागीदारी है जिनके आगे आमजन हमेशा पानी भरता रहा है ।

प्रश्न यह उठता है कि निजीकरण की आवश्यकता हुयी ही क्यों ? मैं इसमें एक प्रश्न और जोड़ना चाहता हूँ और वह यह कि आमजनता की दृष्टि में सरकारी स्कूल, सरकारी अस्पताल, सरकारी एविएशन, सरकारी व्यवस्थायहाँ तक कि सरकारी भाषण की भी विश्वसनीयता निजी संस्थाओं की तुलना में इतनी कम क्यों है ? हर व्यक्ति चाहता है कि उसके बच्चे सरकारी स्कूल में न पढ़ें और उसके घर के किसी बीमार व्यक्ति का इलाज़ सरकारी अस्पताल में न हो । एयर इण्डिया के स्थान पर लोग विस्तारा और इण्डिगो की सेवाओं को प्राथमिकता देना चाहते हैं । सरकारी बैंकों की सेवायें लोगों को संतुष्ट कर पाने में उतनी सफल नहीं हो पातीं जितनी कि निजी बैंकों की सेवायें । शेयर मार्केट में सरकारी कम्पनियों के शेयर किसी को आकर्षित नहीं कर पाते जबकि निजी कम्पनियों के आई.पी.ओ. आते ही ख़रीददारों की इतनी भीड़ टूट पड़ती है कि वे कई गुना अधिक सब्स्क्राइब्ड हो जाया करते हैं । तब लोग सरकारी नौकरी, सरकारी बस सेवा और रेलवे की सेवाओं के पीछे ही इतने दीवाने क्यों हैं ?

हम सरकारी स्कूल में अपने बच्चे नहीं पढ़ाना चाहते किंतु नौकरी सरकारी स्कूल में ही करना चाहते हैं । बहुत से सरकारी उद्योग घाटे में हैं किंतु हम नौकरी उन्हीं उद्योगों में करना चाहते हैं । इस विरोधाभासिक चरित्र के लिए किसे उत्तरदायी ठहराया जाय ?

...और मेरा दावा है कि जो सरकारी इण्डस्ट्रीज़ घाटे में दम तोड़ रही हैं, निजीकरण के बाद वे घाटे से मुनाफ़े में आ जायेंगी और उनमें बहार आ जायेगी । एक समय था जब सरकार ने बैंकों का सरकारीकरण करना शुरू किया ...क्या अब यह समय सरकारी संस्थाओं के निजीकरण का आ गया है ! सरकारी संस्थायें दम क्यों तोड़ती हैं और निजी संस्थायें दिनदूनी रात चौगुनी उन्नति क्यों करती हैं ...ऐसा कोई नहीं जिसके पास इन प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं ।

...वहीं हम यह भी स्वीकार करते हैं कि छत्तीसगढ़ में राज्य परिवहन को अपदस्थ कर आयी निजी परिवहन सेवाओं ने जिस तरह किराये की दरों और सेवाओं में स्वेच्छाचारिता की कीमत पर सरकार को भरपूर रिवेन्यू देना शुरू किया है उससे जनभागीदारी की विश्वसनीयता और इरादों पर उठते रहे सवालों पर छाये मौन ने आम आदमी को दीन-हीन प्रजा बना दिया है । क्या हम एक राजतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं ?


रविवार, 27 सितंबर 2020

सीबीडी ऑयल की वैधता पर उठ रहे हैं सवाल...

बेतवा एक्सप्रेस और मेरा उपन्यास...

बड़े भइया (आदरणीय अशोक चतुर्वेदी जी) ने एक उपन्यास लिखने के लिए कहा था । लिखना शुरू किया, किंतु कभी बिगड़ा मूड तो कभी जंगल-झाड़ियों और ऊँची-नीची पहाड़ियों के अवरोध बाधा उत्पन्न करते रहे । कुल मिलाकर उपन्यास लेखन की गति बेतवा एक्सप्रेस की तरह हो गयी है जो कानपुर सेण्टृल स्टेशन से 15-20 किलोमीटर पहले से ही किसी गब्बर बैल की तरह जगह-जगह अड़ कर खड़ी हो जाती है । फ़िलहाल इतना बता दूँ कि लिखे जा रहे उपन्यास की कथायात्रा बिहार के गाँवों, कस्बों और ग़रीब-गुरबा लोगों की त्रासदियों से होता हुआ हज़रत निज़ामुद्दीन और फिर वहाँ से वापस बिहार के बीच बिखरी घटनाओं पर आधारत है । बेतवा एक्सप्रेस अभी भीमसेन स्टेशन पर खड़ी है, देखते हैं कानपुर कब पहुँचती है।

 

सीबीडी ऑयल की वैधता पर उठ रहे हैं सवाल...

मायानगरी के गंधर्वलोक में मारीज़ुआना के बाद आजकल सीबीडी ऑयल की चर्चा होने लगी है । टीवी पर होने वाली बहस कम काँव-काँव में सीबीडी ऑयल के निर्माण और बिक्री की वैधता पर सवाल उठने लगे हैं । सीबीडी ऑयल याने कैनाबिडियॉल और टीएचसी याने टेट्राहाइड्रोकैनाबिनॉल ये दो तेल हैं जो भाँग की पत्तियों से निकाले जाते हैं । सदियों से भाँग के पौधे के विभिन्न भागों का प्रयोग दुनिया के कई देशों में टेक्सटाइल और चिकित्सा उद्देश्यों से किया जाता रहा है । एपीलेप्सी, एंज़ाइटी, हीमोरॉयड्स और कैंसर जैसी बीमारियों में इसका उपयोग किया जाता रहा है । उत्तराखण्ड में भाँग के बीजों की स्वादिष्ट चटनी और बिच्छू घास की भाजी वहाँ की पारम्परिक खाद्य वस्तुओं में से है जिनके बिना उत्तराखण्ड की पहचान अधूरी सी लगती है । ख़ैर मैं यह बता दूँ कि ड्रग एण्ड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 के अनुसार सीबीडी ऑयल का निर्माण एवं चिकित्सकीय उपयोग अपराध की श्रेणी में नहीं है । यूँ भी इस तेल का कोई नशीला प्रभाव नहीं होता है ।

और हाँ! यह भी बता दूँ कि खसखस के बीज जो कि अफीम के फल का एक हिस्सा हैं, नशीले नहीं होते ।