रविवार, 28 मार्च 2021

भंग का रंग जमा ले चकाचक...

भाँग की गुझिया, भाँग की बर्फ़ी, भाँग की ठण्डाई... होली में भाँग के दीवानों को जैसे खुली छूट मिल जाया करती है । गोरखपुर वाले ओझा जी को शिवबूटी के नाम पर विजया के लिये ऐसी दीवानगी से सख़्त ऐतराज है । उनका अनुमान है कि ऐसे ही दीवानों के कारण शिवबूटी यानी विजया यानी भाँग यानी कैन्नाबिस सैटाइवा पर भारत में वैधानिक प्रतिबंध लगाया गया होगा । उन्हें किसी बहु उपयोगी एवं अद्भुत औषधि के प्रति सरकार का यह प्रतिबंध न्यायपूर्ण नहीं लगता । यह उसी तरह है जैसे कि तालाब में डूबकर होने वाली मृत्यु को रोकने के लिये तालाबों के निर्माण पर ही प्रतिबंध लगा दिया जाय । ओझा जी को इस बात से कष्ट है कि विजया भारत में प्रतिबंधित और हेय हुयी तो पश्चिम में मेडिकल मारीजुआना बनकर प्रचलित और सम्मानित हुयी । हमने अपनी एक और अद्भुत और महत्वपूर्ण विरासत को खो दिया ।

कला, विज्ञान और दर्शन को एक साथ लेकर चलने वाले अचिंत्य की, मारीज़ुआना को लेकर प्रतिक्रिया कुछ इस तरह है – “हमने विजया को उसके अमृत स्वरूप में स्वीकार करना छोड़ दिया तो पश्चिम ने उसके अमृत स्वरूप को स्वीकार कर लिया । हम पथभ्रष्ट हुये और धीरे-धीरे शिव जी की प्रिय विजया के विष स्वरूप को ही देखने के अभ्यस्त हो गये । मारीज़ुआना एक ऐसी अद्भुत औषधि है जिसके परिणाम, सेवन करने वाले व्यक्ति की मानस प्रकृति के अनुसार परिलक्षित होते हैं । यदि हम तामसी भाव के साथ और अयुक्तिपूर्वक मारीज़ुआना का तामसी सेवन करेंगे तो इसके तामसी प्रभाव प्रकट होंगे । इसी तरह यदि हम सात्विक भाव के साथ और युक्तिपूर्वक मारीज़ुआना का सात्विक सेवन करेंगे तो इसके सात्विक प्रभाव प्रकट होंगे । शिव सदा कल्याणकारक हैं इसलिये उनकी बूटी को शिवत्व के साथ ही ग्रहण करना होगा अन्यथा अशिव होते देर नहीं लगेगी । भाँग हमारे तमोगुण से मिलकर तमोगुणी होती है और हमारे ही सतोगुण से मिलकर सतोगुणी भी । यह किसी को डिप्रेशन से मुक्त करती है तो किसी को डिप्रेशन में डुबो देती है । यह अमृत भी है विष भी । सन् 1876 में सिगरेट बनाने वाली मशीन के बाज़ार में आने के बाद भारत सहित दुनिया के कई देशों में लंग्स कैंसर की बाढ़ आ गयी जिसके कारण भारत में भी भाँग को प्रतिबंधित कर दिया गया जबकि सिगरेट आज तक प्रतिबंधित नहीं की जा सकी”।

हम चिंतन से दूर हुये तो पाखण्ड में जकड़ते चले गये । महाशिवरात्रि के दिन तथाकथित शिवभक्तों को नशे में डूबकर अश्लीलता की सीमायें तोड़ते हुये अनृत्य-नृत्य देखने के बाद मन में कष्ट होता है । शिव का शाब्दिक अर्थ है कल्याण । शिव की साधना दुःखों से मुक्त होने की साधना है । शिवत्व की उपलब्धि कल्याण की उपलब्धि है ।

पीड़ा नाशक द्रव्यों में ओपिऑयड्स के बाद भाँग का ही स्थान है जिसके कारण पश्चिमी देशों ने मारीज़ुआना को सम्मान के साथ स्वीकार किया है । हमने भाँग का असम्मान किया, उसका दुरुपयोग किया और नशे में डूबने लगे इसलिये हमारे यहाँ शिव-बूटी वर्ज्य है, प्रतिबंधित है । विचित्र बात यह है कि भारत में भाँग के ठेके हैं किंतु मेडिकल मारीजुआना की अनुमति नहीं है ।

भारत के ठण्डे और नम क्षेत्रों में पायी जाने वाली उष्ण प्रकृति वाली विजया का शोधन संस्कार करने के बाद ही युक्तियुक्त तरीके से सेवन करने का विधान आयुर्वेद के ग्रंथों में वर्णित है ।

कैसे करें भाँग का शोधन संस्कार?

यह भाँग के औषधीय गुणों के मोडीफ़िकेशन की प्रक्रिया है जिसमें भाँग के तामसी गुण वाले तत्वों को निष्क्रिय करने और सात्विक गुणों वाले तत्वों को सक्रिय करने का यथासम्भव प्रयास किया जाता है । भाँग में लगभग एक सौ प्रकार के रासायनिक तत्व पाये जाते हैं जिन्हें cannabinoids की संज्ञा दी गयी है । चिकित्सक समुदाय में इसके एक सौ कैन्नाबिनॉयड्स में से प्रायः THC (delta 9 tetrahydrocannabinol), CBD (cannabidiol) एवं CBN (cannabinol) की ही अधिक चर्चा की जाती है । कई लोग अच्छे परिणामों को पाने और घातक परिणामों को न्यून करने की दृष्टि से THC और CBD के युक्तियुक्त अनुपात के पक्षधर हैं । आयुर्वेद की वैद्यकीय परम्परा में किये जाने वाले भाँग के शोधन की प्रक्रिया THC और CBD जैसे रसायनों के बेहतर आनुपातिक संयोग की प्रक्रिया है ।

यदि होली में आप भी शिवबूटी का सेवन करना चाहते हैं तो कृपया इसका शोधनपूर्वक सदुपयोग करें, दुरुपयोग नहीं । अस्तु, भाँग के शोधन के लिये किसी वैद्य की देखरेख में दोलायंत्र में भाँग की पत्तियों का गोदुग्ध में एक प्रहर तक स्वेदन करें, तदुपरांत जल से अच्छी तरह धोकर व सुखाकर गोघृत में मंद आँच पर भूनकर रख लें । इस शोधित भाँग का सेवन रोग के अनुसार उचित मात्रा में किया जाना चाहिये, न कि नशे के लिये ।

कल हम चर्चा करेंगे उन रोगों के बारे में जिनकी चिकित्सा में भाँग का उपयोग लाभकारी है । इसके बाद मारीज़ुआना पर लगे वैधानिक प्रतिबंध के औचित्य पर आपको अपनी राय देने का एक वैज्ञानिक और व्यावहारिक आधार मिल जायेगा ।

According to narcotic Drugs and psychotropic Substances Act – चरस, गाँजा and hash oil are banned in India. The international SCND treaty in 1961 has led to a ban on marijuana. 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.