बुधवार, 23 सितंबर 2026

केवल उसके लिए

वह लिखता है
न्याय की 
कई परिभाषायें
अलग-अलग रंग के अक्षरों से
जिसकी जैसी जाति
उसके लिए वैसी परिभाषा।
ईश्वर का श्राप 
लगे तो लगे
कैसे भी करके
राजसिंहासन तो मिले।

अचंभित हैं जातियाँ
कोई हँसती हुयी
कोई रोती हुयी
अचंभित सभी हैं।   
उन्हें इस्तीफा चाहिए
क्योंकि एक ने 
नकल होने दी
उन्हें फिर इस्तीफा चाहिए
क्योंकि दूसरे ने 
नकल नहीं होने दी
उन्हें अधिकार है 
इस्तीफा माँगने का
क्योंकि यह अधिकार 
उन्हें दिया है
उनके बाबा ने 
और वे हैं
अपने बाबा के 
अपने नानबायोलाॅजिकल के
अपने परमपूज्य मोहन के
दुलारे
और नकचढ़े
तिलचट्टे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.