कभी-कभी
प्रकाश से अधिक
मुखर हो जाता है
अंधकार
किंतु केवल तभी
जब उसके पीछे हो
प्रकाश का
प्रबल संबल
किंतु
यह मानता ही कब है!
टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.
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