गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

यौनशिक्षा

 यौनशिक्षा में क्या?


यौनविज्ञान की शिक्षा या यौनसंबंधों की शिक्षा!

यौनविज्ञान चिकित्सा का विषय है, जबकि यौनसंबंधों की शिक्षा कामशास्त्र और यौनव्यापार से संबंधित विषय है। 

प्रोफ़ेसर आनंदी बेन पटेल मुक्त यौनसंबंधों के पक्ष में पहले भी वक्तव्य देती रही हैं, इस बार केवल इस अनुबंध के साथ कि मुक्तयौनसंबंधों के परिणामस्वरूप यदि कभी गर्भधारण हो जाए तो लड़की को छोड़ न दिया जाए।

भारतीय समाज जीवन और सांस्कृतिक मूल्यों की दृष्टि से यह विषय विचारणीय है। लड़की को न त्यागने का अनुबंध स्वागतेय है, किंतु हमारे सामाजिक मूल्य यह मानते रहे हैं कि ऐसा तो केवल विशेष स्थितियों में ही होना चाहिए। मुक्यतयौनसंबंध नित्य जीवन का अभ्यास नहीं होना चाहिए अन्यथा भ्रष्टाचार की तरह यह भी एक नया आदर्श बन जाएगा। प्रोफ़ेसर आनंदी बेन पटेल ने यह नहीं बताया कि इस अनुबंध का विस्तार विवाह तक होना चाहिए या केवल बच्चे के पालन-पोषण के दायित्व तक ही! जैसा कि लिव-इन-रिलेशनशिप में होता है। 

गर्भधारणोपरांत लड़की का त्याग न करना एक सामाजिक दायित्व एवं सामाजिक चिकित्सा है, ... मुक्त यौनसंबंधजनित उस अवांछित मनोदैहिक स्थिति की चिकित्सा... जिसके मूलकारण को हमारे ऋषि-मुनि चारित्रिक विचलन बताकर निंदनीय कहते रहे हैं। इस Social treatment से पहले क्या हमें इस स्थिति के preventive measures पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए!

भारतीय ही नहीं, अन्य भी सुसंस्कृत समाजों में मुक्तयौन संबंधों को हेय दृष्टि से ही देखा जाता रहा है, आज भी देखा जाता है। मुक्यतयौनसंबंधों वाले समाज कितने विकसित और सुसंस्कृत हो सके हैं, यह देखा जा सकता है। बात फिर पलट कर सामाजिक ताना-बाना, उसका शिल्प और उच्च जीवन मूल्यों पर आकर ठहर जाती है। योग दर्शन और अध्यात्मिक मूल्यों का ध्वज लेकर चलने वाले देश का आदर्श पश्चिमी समाज का भौतिक विचलन होना चाहिए या भारतीय सांस्कृतिक मूल्य! अच्छा हो यदि प्रोफ़ेसर आनंदी बेन पटेल इस विषय पर और प्रकाश डाल सकें। 

यौनशिक्षा की बात करते समय हमें शिक्षा प्रक्रिया और उसके परिणामों पर भी विचार करना चाहिए। 

सीखने की आदर्श प्रक्रिया में मान्य स्रोतों से गृहण की हुयी सूचना और उसके व्यावहारिक सदुपयोग का सुयोग होता है, जो गुरुकुल प्रणाली में ही संभव है। बिना सदुपयोग के हम सीखते कुछ नहीं, केवल सूचनाओं का निष्क्रिय संग्रहण भर करते हैं, जिसका सदुपयोग न्यूनतम किंतु दुरुपयोग ही अधिक देखा जाता रहा है। यही कारण है कि सचिव जैसे उच्चपद पर पहुँचे बहुत कम लोग ही भ्रष्टाचार से स्वयं को अछूता रख पाते हैं।

मुक्तयौन संबंध होंगे, तो गर्भनिरोधकों का भी प्रयोग होगा, कदाचित् असफल होने पर गर्भधारण होगा... और इस विवश एवं अवांछनीय स्थिति में लड़की को बेचारी न बनाया जाए, पुरुष उस पर अपने संरक्षण की कृपा बनाये रखे। क्या इससे स्त्री स्वाभिमानी हो पायेगी? 

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