वह खड़ा था
अकड़ता हुआ
अड़ा था
हर किसी की राह में
फिर एक दिन पसर गया
भरभराकर ढह गया
तुमने कहा
भूस्खलन हुआ
हमने कहा
अहंकार का अंत हुआ
सुना तुमने!
वर्जित है
अति
सर्वत्र ।
टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.
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