रविवार, 18 अक्टूबर 2026

सत्तापरिवर्तन की आग ही आग

क्या हम सचमुच सभ्य हैं?

इटली जल रहा है, फ़्रांस जल रहा है, और अब अन्य भी कई देशों को जलाने की धमकियाँ दी जा रही हैं । कौन हैं ये लोग? क्यों जला देना देना चाहते हैं सब कुछ?

यह वामपंथ और इस्लाम की युति है जो पूरे विश्व में इस्लाम का शासन चाहती है। वामपंथ और इस्लाम में धार्मिक तत्वों को लेकर कहीं कोई समानता नहीं फिर भी वे एक साथ हैं, क्योंकि दोनों के पथ अराजकता से होकर आगे बढ़ते हैं।

संपत्ति को आग लगाकर, दुकानों में तोड़फोड़ कर, सामान को लूटकर ये लोग हर्ष से कितने उन्मादित हो रहे हैं। इस समय इटली और फ़ांस में यही हो रहा है। क्या ये सभ्य लोग हैं? इन दोनों ही देशों के साथ भारत के सम्बंधों का इतिहास अच्छा नहीं रहा है पर यह प्रतिशोध का समय नहीं है, हमें सच को सच और झूठ को झूठ कहना होगा। हमें इटली और फ़्रांस के मूल नागरिकों के साथ खड़े होना होगा। यह मानवता की रक्षा का विषय है, और सबसे ज्वलंत विषय भी।

फ़्रांस और इटली के शासकीय भवनों, प्राचीन स्थापत्य कलाओं, दुकानों और पार्क में खड़ी कारों को तोड़कर और उनमें आग लगाकर नष्ट किया जा रहा है, भीड़ में उन्माद है क्योंकि वे निर्भीक हैं। वे निर्भीक हैं क्योंकि शासन तंत्र निर्बल है और उसमें किसी अच्छे संकल्प का अभाव है। यद्यपि जॉर्जिया मेलोनी पहले से ही जॉर्ज सोरोस की रक्तरंजित चालों का अनुमान लगाती रही हैं, फिर भी वे कुछ नहीं कर पा रही हैं। इधर भारत में मोदी भी कुछ नहीं कर पा रहे है।  

यह भीड़ धरती की सबसे क्रूर विचारधारा वाले असभ्य लोगों की भीड़ है। पहले ये आपस में झगड़ा करते हैं, फिर दयनीय बनकर दूसरे देशों में शरण माँगते हैं, फिर उसी देश, वहाँ के समाज, वहाँ की सभ्यता और संस्कृति पर आक्रमण करते हैं। यह सब इसलिए होता है क्योंकि देश के सत्ताधीश अच्छाई और बुराई, शत्रु और मित्र, न्याय और अन्याय में भेद नहीं कर पाते, उनमें दूरदर्शिता का अभाव होता है और वे अपने पूर्वजों के पापों का फल भोगने के ईश्वरी विधान से बँधे हुये होते हैं।

पश्चिमी सेक्युलरिज्म का यह सबसे काला पक्ष है। यद्यपि सनातन दर्शन में सहिष्णुता, समावेशिता और समानता के बीज हैं पर भारतीय उपमहाद्वीप के बाद अब भारत में भी इसी मानसिकता के साथ उपद्रव प्रारम्भ होने लगे हैं। 

 

अभी मैं यू-ट्यूब पर एक वीडियो देख चुकने के बाद लोगों की टिप्प्णियाँ देख रहा हूँ –

“इंशा-अल्लाह, शीघ्र ही हम ब्रूसेल्स में भी आ रहे हैं।“

“हम स्पेन में आ रहे हैं, यूके और नीदरलैंड में भी।“

“इंशा अल्लाह एक दिन यह धरती हमारी होगी।“

“जिस दिन हरी रोशनी हमारे पास होगी, तुम सब समाप्त हो जाओगे।“

“इस समस्या का समाधान फ़्रांस के विभाजन के बाद ही होगा, हमें फ़्रांस में हमारे लिए एक नया देश चाहिये”।

“क्या फ़्रांस में सरकार और सेना नहीं है?”

“”इन पर गोली क्यों क्यों नहीं चलाई जाती?”

2.

भारत में सत्तापरिवर्तन

सत्तापरिवर्तन एक गणतांत्रिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया है किंतु तुम तो सत्ता परिवर्तन चाहते ही नहीं, सत्ता को अनैतिक और अराजक तरीकों से छीनना चाहते हो, उपद्रव करके सत्ता लूटना चाहते हो। सत्ता परिवर्तन और सत्ता लूटने में नैतिकता और उद्देश्यों का अंतर है।  

दुर्बल सत्ताओं को रण छोड़ना पड़ता है, जैसा कि श्रीलंका, अफ़गानिस्तान और बांग्लादेश में हुआ । नेपाल में जो हुआ वह जन क्रांति थी, सत्ता की लूट नहीं। अफ़गानिस्तान में रणनीतिक तरीके से आक्रमण करके तालिबानियों ने अपना शासन स्थापित किया। यह कुछ सौ साल पुरानी परम्परा की पुनरावृत्ति थी।  

बांग्लादेश में विदेशी शक्तियों द्वारा सत्ता को छीना गया और वहाँ एक कठपुतली सरकार स्थापित की गयी । नेहा बोरा ने स्पष्ट  कर दिया है कि वह नेपाल से नहीं, बांग्लादेश से प्रभावित है। वह सत्तापरिवर्तन नहीं चाहती, ज़ॉर्ज़ सोरोस और अन्य विदेशी आसुरी शक्तियों से प्रभावित होकर सत्ता छीनना चाहती है जो भारत में अलोकप्रिय शासक के रहते हुये भी सम्भव नहीं है।

भारत की स्थिति इन सबसे बहुत भिन्न और विचित्र है वर्तमान सरकार ने अपने शत्रुओं और विरोधियों को उत्पन्न करने में अपनी सारी शक्ति लगा दी। विपक्ष देश की जनता को कभी प्रभावित नहीं कर सका। भारत की जनता को प्रभावित करने या आकर्षित करने में तिलचट्टों सहित अन्य विपक्षी दल अभी तक असफल ही रहे हैं। आगे भी वे कुछ अच्छा कर सकेंगे, इसकी दूर-दूर तक कोई सम्भावना नहीं है। यद्यपि विकल्प के रूप में एक क्षीण सी प्रकाश की रेखा निकलती प्रतीत हो रही है तथापि साधु वेश में रावणों की भारत में कभी कमी नहीं रही।  

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