रविवार, 26 जुलाई 2026

त्यागपत्र

 उसने त्यागपत्र दिया 

सत्य के लिए नहीं, असत्य के लिए

न्याय के लिए नहीं, अन्याय के लिए

और स्थापित कर दिया

कि "जयते सर्वदा असत्यमेव"

उसने बनाये 

अकीर्ति के नये सोपान

प्रोत्साहित करने 

असभ्यता और पतन को 

अश्लील गालियों और अराजकता को 

अन्याय और अत्याचार को

ताकि हो सके 

एक और विभाजन

धरती का

समाज का। 

विजयोन्माद में 

अश्लीलता नाच रही है

एल.जी.बी.टी. नाच रहे हैं

ढपली बजने लगी है

नारे गीत बन गये है

भारत तेरे टुकड़े होंगे...

फलाने को मुक्त करो...

ढिमाके को सम्मानित करो...

इसे पद्मश्री दो

उससे छीन लो।

हिंदू भगाओ देश बचाओ...

राजा हर्षित है

प्रजा मूर्छित है 

भारत 

हर दिन नया विश्वगुरु बनता है

चलो 

हम कहीं और चलें

गुरु तो हर कोई है

हम अच्छे छात्र ही बन जायें। 

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

क्योंकि

 दूर से लगा

मानव हैं,

पास जाकर देखा

तो सब भेड़िये निकले।

बिल्लियों ने भी

सीख लिया है

भौंकना

क्योंकि कुत्ते

मिमियाने लगे हैं।

सौंपी थी पतवार

बड़े भरोसे से जिन्हें

डुबो दी नाव उन्होंने ही 

पहुँचते ही बीच धार ।

सीता

कहाँ-कहाँ

और किस-किस से बचेगी

तब एक रावण था

आज साधु के वेश में 

न जाने कितने रावण निकले ।

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

ब्राह्मण की हत्या

जनता की माँग पर

माँ की आह पर... 

खेला जाने लगा है

एक और नाटक...

नहीं, 

नाटकों की शृंखला।

लिखी जा चुकी है पटकथा 

अन्यायपूर्ण न्याय की  

मिटाये जा रहे हैं

हत्या के साक्ष्य। 

राजा ने 

लोकतंत्र को 

आज फिर लटका दिया है

फाँसी पर 

आओ, हम सब उत्सव मनायें

अपने स्वाभिमान 

और अधिकारों की अर्थी सजायें

क्योंकि

मीलाॅर्ड ने झिड़क दिया 

डाँट कर चुप कर दिया  

साक्ष्य देती 

भोजपुर की स्त्रियों को  

...इस आश्वासन के साथ

कि बिना सुने साक्ष्य

वे कर देंगे ऐसा न्याय

जो नहीं होगा न्याय।

जानकर भी

देखकर भी

हम नहीं मानना चाहते 

कि हत्यायें 

हमारी नियति हो गई हैं 

न्यायालय के बाहर 

शरीर की 

और न्यायालय के भीतर 

सत्य की। 

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

लिखवाल

 ग्वालियर में हेड पोस्ट आॅफिस की सीढ़ियों के पास लोगों को आते-जाते थोड़ी सी आशा, बहुत सी निराशा और विवशता के विशाल पर्वत पर थक कर बैठे हुये एक मैले-कुचैले वयोवृद्ध "लिखवाल" को प्रायः देखा करता था। मैं सोचता, नगरों में भी कुछ लोग हैं जो चिठ्ठी नहीं लिख सकते, न पढ़ सकते हैं, उनके लिए यह काम करने वाले उपलब्ध लोग विकास को हर पल थप्पड़ मारते से नहीं लगते क्या! 

ग्वालियर वाले लिखवाल केवल चिठ्ठी ही नहीं लिखा करते, आवेदन पत्र भी लिख दिया करते थे, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में। 

बी.एससी. में प्रवेश लेने से पहले तक अपने पड़ोसी के लिए यही काम मैं भी किया करता था, कहीं से आई चिठ्ठी पढ़ कर सुनाना, फिर उसका उत्तर लिखना। दाई कहतीं-" जो शुरू में लिखा जाता है वह सब लिख दो"। ...यानी ...को आशीर्वाद, ...को चरण छू कर पायलागन, ....को बहुत-बहुत प्यार, ...। मैं लिखता, "सबको यथायोग्य", फिर लिखता "अत्र कुशलं तत्रास्तु"। 

कभी-कभी किसी चिठ्ठी के अंत में दाई यह भी लिखवातीं -"थोड़ा लिखा बहुत समझना"। किसी को बुलाना होता तो वे लिखवाया करतीं -"खाना वहाँ खाना तो पानी यहाँ आकर पीना"। 

यह सत्तर का दशक था। एक दिन देखा, सीढ़ियाँ थीं पर वे वयोवृद्ध नहीं थे। उस दिन एक उदासी मेरे पास आकर जो बैठी ...तो रात में सोने के बाद ही उठकर जा सकी।

यह सन् १९४७ के बाद का भारत था। आज सोचता हूँ, हमारे देश में पढ़े-लिखे लोगों का कितना सम्मान होता है! 

रविवार, 21 जून 2026

भोजपुर माटी

 भारत भूषण तिवारी का खुला और साफ-सुथरा चरित्र एक शोध का विषय है।

पुलिस ने कई बार उन्हें सम्मानित किया, अपमानित भी किया, फिर एक दिन घेरकर हत्या कर दी। मुख्यमंत्री और मैथिली ठाकुर ने उन्हें अपराधी कहा, पुलिस ने पागल तो पिता ने विक्षिप्त भी कहा। भारत भूषण तिवारी जैसे लोगों को समझ पाना इतना सरल नहीं है  

वे कलियुग में जन्मे चंद सतजुगियों में से एक हैं। पुस्तकीय ज्ञान को जब जीवन का आदर्श बनाया जाता है तो पूरी दुनिया उसे ही शत्रु मानने लगती है, और सरकार आतंकवादी या राष्ट्रद्रोही मानकर हत्या कर देती है। चंद्रशेखरआजाद और भगत सिंह जैसे न जाने कितने आदर्शवादी युवक सत्ताओं की भेंट चढ़ गये, आगे भी चढ़ते रहेंगे। इन सबको पता है कि यथार्थ का धरातल बहुत ऊबड़-खाबड़ और पथरीला होता है फिर भी वे उसी पथ के दावेदार होते हैं। यह भी एक नशा है, सात्विकता का नशा, जिसके सामने  कालकूट का विष भी हल्का लगता है। भारत भूषण तिवारी कलयुग में सतयुगी बनकर आये, एक संदेश दिया और चलते बने। ऐसे चरित्रों को समझना हर किसी के लिए शक्य नहीं होता। मैं उस लड़के के लिए बहुत व्यथित हूँ.... और गौरवान्वित भी। 

बक्सर जिले के अधिवक्ताओं, जिनमें एक मुसलमान भी सम्मिलित हैं, को मेरा साधुवाद ! सोमवार को यह दल भारत भूषण  तिवारी के हत्यारों के विरुद्ध न्यायालय में वाद प्रस्तुत करने जा रहा है। बिहार की धरती को नमन! बिहार के लोगों को नमन!        

शनिवार, 20 जून 2026

रक्तरंजित

भोजपुर के युवा लोकक्रांतिकारी भारत भूषण तिवारी अब नहीं हैं। बिहार सरकार और उसकी पुलिस ने उनकी हत्या कर दी। पुलिस ने भीड़ के अनुरोध को ठुकराकर युवा क्रान्तिकारी की हत्या की, इसे पूरे देश ने देखा, सरकार ने नहीं। यह तो कुछ भी नहीं है, स्वतंत्र भारत की पुलिस ने बस्तर के महाराजा प्रवीरचंद्र भंज देव को उनके राजमहल में घुस कर गोलियों से छलनी कर दिया था। महाराजा निहत्थे थे और तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उन्हें केवल इसलिए मरवा दिया क्योंकि आदिवासी उन्हें अपना देवता मानते थे, और महाराजा उनके जल-जंगल-जमीन के अधिकार को बनाये रखने के पक्ष में थे। शासन-प्रशासन ने महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव को भी पागल और विक्षिप्त घोषित कर दिया था।अर्थात् जो पागल है, विक्षिप्त है उसे जीने का अधिकार नहीं है। जो चालाक और धूर्त है उसे सम्मान और प्रतिष्ठापूर्वक जीने का अधिकार है, ...यही लिखा है न संविधान में?

बिहार की जनता पुलिस से अनुरोध करती रही "गोली मत चलाइये"। पर पुलिस ने एक ऐसे युवक को मार डाला जिसे जनता ज़िंदा रहने देना चाहती थी। मदांध सत्ता ने भारत के लोकतंत्र को उस स्थिति में पहुँचा दिया है जहाँ लोक को अपनी भी चिंता करने का कोई आधिकार नहीं।

लोकनिर्माण के कार्यों में भ्रष्टाचार, घटिया निर्माण और झूठे आश्वासनों के विरुद्ध सरकार को ललकारने वाले भारत भूषण तिवारी को क्या पागल कहा जा सकता है? जनता जिसे अपना भगवान मानने लगी थी वह युवक सरकार को विक्षिप्त लगता है! क्या इस युवक की लड़ाई किसी को आतंकित करने के लिए है या भ्रष्टतंत्र को सुधर जाने की चेतावनी! सरकार तो आज तक सुभाषचंद्र बोस और सरदार भगतसिंह जैसों को भी आतंकवादी ही मानती है। 

....नहीं, यह देश सरकार की इस निरंकुशता को स्वीकार नहीं करेगा। हम सब भारत भूषण के लोकसुधार अभियान के संघर्ष को आगे ले जाएँगे। बिहार में निर्माणाधीन सेतु कब तक गिरते रहेंगे? बाढ़ में कब तक लोग बेघर होते रहेंगे?                              

पुलिस इनकाउंटर की जाँच की माँग होने लगी है, उससे क्या होगा????

एक और सच्चा क्रांतिकारी चला गया। चंद्रशेखर, भगतसिंह, सुभाष....और भारत भूषण तिवारी रोज नहीं जन्म लेते। बिहार में जो बिजली कड़की और उजाला हुआ वह रुकना नहीं चाहिए। दिख भी रहा है... यह रुकेगा नहीं, रुकना चाहिए भी नहीं।

हमें ही नहीं, पूरे देश को भारत भूषण तिवारी पर गर्व है। बिहार के भोजपुर की धरती पर गर्व है जहाँ पहले भी कुँवर वीरसिंह जैसे क्रांतिकारी जन्म लेते रहे हैं। वास्तव में यह लड़का जाते-जाते अपने नाम को सार्थक कर गया। 

गुरुवार, 18 जून 2026

कुप्रथा

 माँग कर रहे हैं लोग

कि सरकार बनाये 

एक विधान ऐसा

कुछ जजिया कर जैसा

कि ब्राह्मणों को ब्याहनी होगी 

अपनी बेटी 

किसी दलित के साथ।

अंबेडकर ने भी तो ब्याही थी 

अपनी बेटी सावित्री

भीमराव सकपाल के साथ

बनाये बिना कोई विधान

और दिया अपना उपनाम

अंबेडकर भी।

कितनी निभी, पता नहीं!

क्या क्रांति हुयी, पता नहीं!

क्या शिक्षा मिली, पता नहीं!

बाध्यकारी विधान बनेगा 

तो कदाचित्

भारत विश्वगुरु बनेगा

और कार्यकारी होगा यह विधान

पूरे विश्व में।

बन गया विधान 

तब एक दिन

महेश मणि के घर आई

एक नन्हीं परी

घर-परिवार डूबा 

मनाने उत्सव

फिर उसी रात्रि 

गला दबा दिया महेश मणि ने

नन्हीं परी का। 

सब अचंभित!

ऐसा क्यों किया महेश मणि ने!

प्रश्नों का अंत नहीं।

न्यायालय में बताया

महेश मणि ने

अब मेरी कोई बेटी 

नहीं ब्याही जाएगी 

किसी दलित के साथ।

समय चलता रहा

फिर...

यह परंपरा बन गयी

एक नई कुप्रथा

तो दलितों ने कहा

ब्राह्मण होते हैं 

स्त्री विरोधी

जन्म से हत्यारे        

राक्षस

नरपिशाच...                            

इन्हें नहीं मिलना चाहिए               

जीने का अधिकार।

होना ही चाहिए इनका

"सर तन से जुदा"

जब मिलें 

तभी

जहाँ दिखाई दे जाएँ

वहीं। 


निर्बल का विवश समाधान

जब बनती है कुप्रथा

तब भी 

मौन रहते हैं

राजसिंहासन

उनसे नहीं पूछा जाना चाहिए

कोई प्रश्न।

बस

तुम बने रहो

विनम्र सेवक

राजसिंहासन के

कुचलकर अपनी आत्मा।



शनिवार, 13 जून 2026

युगपरिवर्तन

सतयुगी लोग सत्य के अधिक समीप हुआ करते थे इसलिए अधिक सुखी थे। कालांतर में जब धर्म का एक स्तंभ ध्वस्त हुआ तो सतयुग समाप्त हुआ। त्रेतायुग में धर्म का और भी क्षरण हुआ जिसने द्वापर को आमंत्रित किया। द्वापर में धर्म के तीन स्तंभों का पतन हुआ तो कलियुग को संसार की सत्ता प्राप्त हुयी। अब कलियुग धर्म के शेष रहे एकमात्र स्तंभ पर डोल रहा है। जिस दिन इस अंतिम स्तंभ का पतन होगा तब..., तब क्या होगा! यह भौतिक विज्ञान और तत्वदर्शन का विषय है, इस पर फिर कभी चर्चा होगी।

त्रेतायुग में टिश्यू कल्चर, आई.वी.एफ़, जेनेटिक स्टडी, कैटारेक्ट की शल्यक्रिया और प्लास्टिक सर्जरी जैसी अनेक उपलब्धियाँ अविश्वसनीय सी लगती हैं, पर सत्य हैं। वहीं त्रेतायुग और कलियुग में राक्षसों के उत्पात, वैज्ञानिकों की तप-साधना में विघ्न, नरमांस भक्षण, नारी अपहरण और यौनोत्पीड़न जैसी कुछ नकारात्मक घटनाओं को लेकर अद्भुत समानतायें पढ़ने को मिलती हैं।
आज हमें एपस्टीन फ़ाइल की पैशाचिक घटनायें और विश्वस्तरीय आभिजात्य वर्ग के लोगों की उसमें संलिप्तता व्यथित करती है।
ऐसी न्यूनाधिक घटनायें सभी कालखंडों में होती रही हैं। तब अंतर क्या है इन युगों में! यह एक विचारणीय विषय होना चाहिए।
अंतर है अन्याय का समर्थन और प्रतिकार करने वालों एवं संस्कार विरोधियों और अपसंस्कृति के शोधन के लिए संघर्ष करने वाले लोगों के अनुपात में ह्रास या वृद्धि।
त्रेत्रायुग से लेकर इस युग तक उत्कृष्टता के क्षरण और निकृष्टता के उत्कर्ष में निरंतर वृद्धि देखी गयी है।
एक अंतर और भी है, कलियुग में प्रवंचकों की भीड़ है जिसमें आम जनता से लेकर राजनेताओं, अभिनेताओं, संतों और वैज्ञानिकों में आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा है।
विषाणु आयुधों के निर्माता कौन हैं! मिथ्या और भ्रामक शोधपत्र प्रकाशित करवाने वाले शोधकर्ता और वैज्ञानिक कौन हैं! खाद्य और पेय पदार्थों में मिलावट के व्यापार में सम्मिलित लोग कौन हैं! इतिहास और विज्ञान की कूटरचित व्याख्यायें करने वाले लोग कौन हैं! देश के टुकड़े-टुकड़े करने की प्रतिज्ञा करने वाले लोग कौन हैं!
कलियुग की सबसे बड़ी विशेषता है ऋत में अनृत और अनृत में ऋत की प्रतीति। यह प्रतीति तक ही सीमित नहीं, यह हठ की पराकाष्ठा को स्पर्श करने की उद्दंड घोषणा भी है जो सत्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

डीएनए की ऐसी तैसी

सुना है, मीलाॅर्ड ने हुक्म दिया है कि पेट में बच्चा किसी का भी हो, पर बच्चे का बाप वही माना जाएगा जो महिला का पति होगा।

मीलाॅर्ड जी को साष्टांग दंडवत! यही न्याय है और यही है असली वाला मानवाधिकार! पेट में बच्चे होंगे प्रेमी के, पालनकर्ता होगा जोरु का दासानुदास। अब पितृत्व को लेकर कोई विवाद नहीं होगा, न्यायालयों से भीड़ कम हो जायेगी, डीएनए औचित्यहीन हो जाएगा


यह व्यवस्था शानदार, प्रगतिवादी और सर्वहारा के लिए कल्याणकारी है। हजारों जातियों के स्थान पर पूरा देश केवल दो जातियों में वर्गीकृत किया जाएगा - एक जाति कोयल, दूसरी जाति कागा। एक जन्म देने वाला, दूसरा पालने वाला। गंगाराम कोयल, रामबरन कागा।

विवाहगीत में बड़ी-बूढ़ियाँ गायेंगी - "एक डाल पर कोयल बैठा, उसी डाल पर कागा... दाना लाने कोई गया, कोई बीज डाल के भागा... बोलो है ना! है ना है  ना...

शुक्रवार, 12 जून 2026

ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन (HbA1c)

पिछले तीन महीनों में मधुमेही के रक्त में ग्लूकोज की औसत स्थिति जानने के लिए किये जाने वाले परीक्षण के मानदंड अब पहले वाले नहीं रहे। यह पहले से डेढ़ अंक बढ़त की छूट देता है, यानी साढ़े छह से साढ़े सात प्रतिशत तक अब कोई डायबिटीज नहीं। आयु के आधार पर इसमें और भी वैरिएशन्स हैं जो यूएसए के शोधकर्ताओं ने प्रकाशित किये हैं।

मोतीहारी वाले मिसिर जी मानते हैं कि-
"महाकलियुग की इस महाबेला में किसी भी देश में, किसी भी विषय पर किए गये शोध के निष्कर्ष विश्वसनीय नहीं माने जा सकते।"
राखी गढ़ी से लेकर दुनिया भर के स्थानीय लोकसमूहों के डीएनए जेनोम्स को ब्राह्मणों की देह में खोजने को लेकर किये जा रहे शोध भी विश्वसनीय हैं क्या! जब किसी सामान्य सीबीसी की जाँच ही विश्वसनीय नहीं हो पाती तो डीएनए जेनोम्स में किसी को कल्प्रिट मान कर की जाने वाली पूर्वाग्रही जाँच कितनी विश्वसनीय हो सकती है!

अमेरिकी शोधकर्ताओं के निष्कर्षों पर विभिन्न देशों के स्थानीय परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाना अपेक्षित है।

१. कोई भी शोध उद्योगपतियों और सरकार की मिलीभगत से आंशिक या पूरी तरह प्रभावित हो सकता है।
२. वैज्ञानिक अपने प्रायोजकों और सरकारों के दबाव में कार्य करते हैं, जिससे वही परिणाम निकाले जा सकते हैं जो उद्योग के लिए लाभकारी हों न कि आमजनता के लिए!
३. किसी भी महाद्वीप, देश और उसके विभिन्न विस्तारित क्षेत्रों की परिस्थितियाँ, वहाँ के निवासियों की एनाटाॅमिकल और फिजियोलाॅजिकल स्थितियों और उसमें होने वाली पैथोलाॅजिकल प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करती हैं जिसके परिणाम स्वरूप बहुत से वैरिएशन्स सामने आते हैं। इनका सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता। दो सगे भाइयों में से एक सैनिक है तो उसके रक्तचाप में दूसरे भाई की अपेक्षा भिन्नता का स्तर अधिक होगा।
४. फ्रांस और उसके ठीक पड़ोसी जर्मनी की भोजनशैली में भिन्नता के कारण वहाँ के लोगों में हृदयरोग की प्रायिकतायें अचंभित करती हैं। उन लोगों में ही ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन का प्रतिशत एक समान संकेत और सूचनाएँ नहीं दे सकता।
५. WHO, CHINA और USA बहुत बड़े खिलाड़ी हैं। कोरोना काल में दुनिया ने सीख लिया कि इन पर भरोसा करना अपने विनाश को आमंत्रित करना है।
६. बेचारा ह्यूमन पैपिलोमा वायरस सर्वाइकल कैंसर का एक बहुत छोटा सा घटक है जिसको इतना बड़ा कल्प्रिट बनाकर जनरलाइज कर दिया गया। सर्वाइकल कैंसर के लिए वही एक मात्र उत्तरदायी नहीं है जिसे टीका लगाकर इरेडीकेट कर दिया जाएगा, गोया राजा की छाती पर बैठी मक्खी को दंड देने के लिए तलवार का नहीं अपितु सीधे न्यूक्लियर बम का प्रहार।
७. तऽ रउवा लो ...चिंता झन करीं, मस्त रहीं, सुअस्थ रहीं, जब तक आपन देहिंया से कवनो एडभर्स संकेत नऽई खे मिलत तब तक कवनो टेस्ट-फेस्ट के झंझट मऽ मत परीं।

गुरुवार, 11 जून 2026

भारतीय संविधान की मौलिकता

संविधान निर्माता का श्रेय किसे मिलना चाहिए, इस विवाद से पहले तो यह भी एक स्वाभाविक जिज्ञासा होनी चाहिए कि हमारा संविधान मौलिक है या संकलन, या संकलन में किंचित मौलिकता के साथ संशोधन!

किसी भी देश का संविधान उस भौगोलिक क्षेत्र के देश-काल-परिवेश-प्रकृति-संसाधन-सभ्यता-संस्कृति और वहाँ के नागरिकों के निर्बाध एवं समग्र कल्याण को केंद्रित कर सुयोजित किया जाना चाहिए। सुधीजन विचार करें, क्या हमारा संविधान इन सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करने में सक्षम है? यदि सक्षम है तो देश और संविधान से पहले कुरआन को प्रमुखता देने वाले लोगों के लिए इस देश की नागरिकता बनाये रखने का क्या औचित्य, इसे समाप्त क्यों नहीं कर दिया जाना चाहिए?
जो संविधान - १. अपने निर्माण के समय से ही विवादित हो (यदि कभी संविधान को जलाने की बात आई तो उसे जलाने वाला मैं पहला व्यक्ति होऊँगा -भीमराव अंबेडकर), २.एक बहुत बड़े समुदाय द्वारा उसे राष्ट्रीयव्यवस्था के लिए 
सर्वोपरि न मानते हुए शरीया को सर्वोपरि माना जाता हो, और ३.विदेशी संविधानों के संकलन पर आधारित हो ...उसके औचित्य पर गंभीर मंथन क्यों नहीं होना चाहिए!

ऐसा क्या हुआ, क्यों हुआ कि श्रेष्ठता ही नहीं, मिथ्या महानता की भी खरपतवार उगती रही, पल्लवित-पोषित होती रही और पूरा देश आत्ममुग्धता में डूबा रहा?

आठ दशकों के बाद अचानक पहली बार संविधान निर्माता का एक और नाम देश में प्रकट हुआ। यह नाम अभी तक क्यों छिपाया जाता रहा? कौन था जो सत्य को छिपाकर झूठ को परोसता रहा, और क्यों?
जब सत्य उद्घाटित हुआ तो एक टिप्पणी उछाल दी गई -
"संविधान के मूल निर्माता वी. एन. राव थे, बी.आर. अंबेडकर नहीं, उन्होंने तो केवल उसकी भाषा में कुछ परिवर्तन किये थे" -यह कहना बाबा साहब का अपमान है।

भीमराव का अपमान?
प्रचण्ड वामसेफियों और भीमवादियों के रहते ऐसा दुस्साहस कौन कर सकता है भला!   

तात्विक चिंतन का संकेत है कि सत्य को प्रकाशित करने से झूठ का अपमान होना स्वाभाविक है। प्रकाश के प्रकट होने से अंधकार और झूठ, दोनों स्वयं ही अपमानित होते हैं, अन्यथा फिर "तमसोमा ज्योतिर्गमय" की कामना ही
क्यों की जाती!

रविवार, 7 जून 2026

मूलनिवासी

मूलनिवासी हैं

हम भी
उतने ही
जितने कि तुम
और उतने ही विदेशी भी
जितने कि तुम।
नहीं पता, कब हुआ यह विवाह
हमारे जेनोम्स का
जाग्रोस के जेनोम्स से
और तुम्हारे जेनोम्स का
अफ्रीकी जेनोम्स से।
हम इतना ही जानते हैं
कि हम देते रहे हैं
अपना उत्कृष्ट
अपनी मातृभूमि को
जहाँ भी लेते रहे हम जन्म
क्योंकि
संपूर्ण धरती को ही
भोगते नहीं
पूजते रहे हैं हम
इसीलिए
हम करते रहे हैं सदा
सार्वभौमिक
और सर्वकल्याण की मंगलकामनाएँ।
तुम
हमें विदेशी कहने लगे
हम
"वसुधैव" को
कुटुंबकम्" मानते रहे।
मत भूलिए
देश से अधिक स्थायी होते हैं
मांगलिक विचार
और उसकी साधना।

कब तक

 तुमने हमें कहा

आदिवासी
हम हो गये आदिवासी
तुमने हमें कहा
वंचित
हम हो गये वंचित
तुमने हमें कहा अविकसित
हम हो गये अविकसित
तुमने हमें कहा "जो-जो"
हम होते गये "वो-वो"।
पता नहीं
अभी आप हमें कहेंगे
और "क्या-क्या"
और हम होते रहेंगे
न जाने "क्या-क्या"
कभी तो छोड़ो हमें
स्वतंत्र
कि हो सकें हम "वो"
हम हैं
सचमुच में "जो"
कब तक आप बनाते रहेंगे हमें
सत्ता की सीढ़ियाँ
रौंदते हुये हमें
अपने विचारों की पादुकाओं से!
कब तक?

बुधवार, 3 जून 2026

चिकित्सा और मानव धर्म

वर्षों पहले यूरोप में एक सोशियोपोलिटिकल तूफान आया जिसने मानव व्यवहार के अन्य सभी क्षेत्रों से धर्म के हस्तक्षेप को समाप्त कर दिया। चर्चों से सारे अधिकार छीन कर उन्हें पंगु बना दिया गया। यह आँधी पूरे विश्व में एक फैशन बन गयी तो भारत भी अछूता कैसे रहता जबकि भारत में यूरोप जैसी कोई परिस्थिति थी ही नहीं। तत्कालीन यूरोप के चर्च अत्याचार और भ्रष्टाचार में डूबे हुए थे ! इसलिये वहाँ एक धार्मिक परिवर्तन की आवश्यकता थी किंतु भारत में तो इस्लामिक और फिर ब्रिटिश शासन था, यहाँ सनातन धर्म जनता तक ही सीमित रहा। मनुस्मृति का स्वर्णिम युग तो छठी शताब्दी के अंत तक पूरी तरह समाप्त हो चुका था। पर यूरोप का अनुसरण करते हुये यहाँ भी धर्म का शिकार किया गया वह भी केवल सनातन धर्म का। परिणामस्वरूप भारत में भी धर्म को केवल पूजा-पाठ तक सीमित कर दिया गया। धर्म का राजनीति, शिक्षा, चिकित्सा, उद्योग... आदि जीवन के सभी क्षेत्रों से अंकुश समाप्त कर दिया गया। धर्म का स्थान नेतावाणी ने ले लिया। भारतीयों के जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ नेतावाणी का अंकुश और हस्तक्षेप नहीं है।

भारत के राजनेता सत्ता पाते ही तत्क्षण  न केवल राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ हो जाते हैं अपितु अर्थशास्त्री, शिक्षाविद, वैज्ञानिक, इंजीनियर, चिकित्सक, परमाणु विशेषज्ञ, गणितज्ञ, कलाकार, संगीतज्ञ अध्यात्मविशेषज्ञ, योगाचार्य आदि सब कुछ हो जाते हैं।
आज भारत का राजनेता बताता है कि हमें अपनी बच्चियों को एंटी ह्यूमन पैपिलोमा वायरस का टीका लगवाना चाहिए जिससे उन्हें गर्भाशय के कैंसर से बचाया जा सके।
मैं समझ नहीं पाता हूँ कि वायरोलाॅजी और इम्यूनोलाॅजी पढ़ने वाले डाक्टर भी वैक्सीनेशन का समर्थन करने के लिए अपनी चेतना की हत्या करने के लिए तैयार क्यों हो जाते हैं? मैं अपने सभी डाॅक्टर्स से निवेदन करूँगा कि वे इन दोनों विषयों का पुनः अध्ययन करें और माइक्रोब्स के वैरिएशन्स की प्रक्रिया में वैक्सीनेशन की महत्वपूर्ण भूमिका को समझने का प्रयास करें। आप लोगों ने एंटीबायोटिक्स का अंधाधुंध दुरुपयोग करके लोगों को रजिस्टेंट कर दिया है, डायक्लोफीनेक का दुरुपयोग करके गिद्धों को समाप्त कर दिया है। सावधान!स्मरण रहे कि आप स्वास्थ्य रक्षक हैं, रोगवर्द्धक नहीं। अपने चिकित्सक धर्म की उपेक्षा से आप पूरी मनुष्य प्रजाति के अस्तित्व को संकट में डाल सकते हैं।

मंगलवार, 2 जून 2026

भाजपा, गाय और मुसलमान

गोमाता को लेकर रुदन करने वाली भाजपा ने गाय के नाम पर वोट तो खूब बटोरे पर अब जबकि मुसलमानों ने ही गोवध को प्रतिबंधित करने की माँग कर दी है तो भाजपा राम और लक्ष्मण से विवाह के लिए ठुकराए जाने से क्रुद्ध हुई सूर्पनखा की तरह अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गयी है।

इस मानसिक आघात से उभरते ही भाजपा नेताओं की आई प्रतिक्रियाओं ने पूरे सनातनी समाज को अचंभित और आक्रोशित कर दिया है।

किंबहुना, यदि कोई मौलाना माँग करेगा कि हर हिंदू को प्रतिदिन मंदिर जाना चाहिए, या उसे शिखा रखनी चाहिए, या भारत को हिंदूराष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए तब भी हम उनकी माँग नहीं मानेंगे, क्योंकि यह कांग्रेस की चाल है। हम मुसलमानों को हिंदुओं के अधिकार छीन कर मुसलमानों को हर तरह के लाभ तो देते रहेंगे पर उनकी हर बात का विरोध भी करते ही रहेंगे चाहे वह माँग लोककल्याणकारी ही क्यों न हो।
वाह जी वाह! क्या बात है! कितने उत्तम विचार हैं योगी आदित्यनाथ जी के! देश धन्य हुआ, गोमाता भी धन्य हुयी।
रावण होता तो भाजपा नेताओं के ऐसे उपदेश सुनने के बाद समुद्र में सेतु निर्माण के लिए राम का पुरोहित बन कर कभी नहीं जाता और न राम को मनोरथ पूर्ण होने का आशीर्वाद देता।

गुरुवार, 28 मई 2026

बस्तर से अल्मोड़ा

जल, जंगल, जमीन...

उन्होंने कहा जल, जंगल, जमीन हमारी है, इसके उपभोग का अधिकार हमें है, हम तुम्हें यह सब छीनने नहीं देंगे।
ढपली वाले आये, खूब गीत गाये... "किरांती" वाले गीत, प्रकृति के संरक्षण वाले गीत!
नारे लगते रहे, ढपलियाँ बजाई जाती रहीं...
इस बीच 'चार' (चिरौंजी) और 'आँवला' के वृक्ष लुप्त होते रहे, जल पहुँच से दूर होता गया, और जंगल की जमीन पर पहले कुछ झोपड़ियाँ और फिर पक्के मकान उगते रहे। आमचो बस्तर की ऐसी दुर्गति के लिए उत्तरदायी कौन है?

कल अल्मोड़ा वाले मार्ग पर पैदल चलते-चलते देखा- एक स्थान पर एक बूढ़ी नानी अपने नन्हें से नाती को लेकर एक गाछ के पास गयीं और हँसिये से उसकी डालियाँ काटने लगी। मुझे उत्सुकता हुयी, पास जा कर देखा, अरे! यह तो 'काफल' है।
बूढ़ी नानी के नाती को 'काफल' खाना है, इसलिए माई डालियाँ काट रही थीं। डालियों में कुछ पके, कुछ अधपके और कुछ कच्चे काफल व्यथित हो उठे, मानो कह रहे हों - "आप पके काफल चुन लीजिए, पर डालियों को मत काटिये!"

विज्ञानद्वय (भौतिकशास्त्र और वनस्पतिशास्त्र) के महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस ने सिद्ध किया था कि प्राणियों की तरह वनस्पतियों में भी चेतना होती है और वे बाहरी प्रभावों से प्रभावित होकर अपनी प्रतिक्रियायें देती हैं।
बूढ़ी नानी का हँसिया जैसे ही पहली डाल पर पड़ा, काफल का गाछ पीड़ा से चीख पड़ा.... जिसे देवभूमि की बूढ़ी नानी सुन नहीं सकीं। बस्तर में भी तो भीमा राजू कहाँ कभी सुन पाया पीड़ित-शोषित चार और आमला का रुदन!
बस्तर में चार और आँवला दुर्लभ हो गये..., देवभूमि में काफल दुर्लभ होता जा रहा है। तभी तो एक दोना काफल अब एक सौ रुपये का हो गया है।
मैं उदास हूँ, इसलिए नहीं कि चार वर्ष पहले तक पचास रुपये प्रति दोना मिलने वाला काफल अब एक सौ रुपये का हो गया है, अपितु इसलिए कि कुछ समय बाद यही काफल एक हजार रुपये में भी नहीं मिलेगा।
राजा ने राजसेवकों से राजमार्ग के किनारे पड़े पत्थरों के वक्ष पर लिखवा दिया है -
"वन से जल, जल से जीवन"।

राजसेवकों ने राजाज्ञा का पालन किया पर इसी बीच शब्दों का उनके अर्थों से तलाक करवा दिया गया। यहाँ हलाला की कोई व्यवस्था नहीं है और प्रेरणादायक नारे भी अब गूँगे हो गये हैं। 

ब्राह्मण कितने विदेशी!

नृवंशों के पलायन और ईरानियन नियोलिथिक फार्मर, मिडिल एशियाई स्टेपी और जाग्रोस आदि कई प्रकार के जेनोम की बहुलता की कहानी में एक जिज्ञासा उभरती है, जब सभी मनुष्य किसी एक ही आदिम स्त्री-पुरुष की संतान हैं तो भौगोलिक आधार पर उनके जेनोम्स में इतनी बहुलतायें क्यों और कैसे उत्पन्न हुई होंगी, और क्या बहुलता की यह शृंखला आज भी बढ़ती ही जा रही है!

यह एक रोचक जिज्ञासा है। यह सत्य है कि देश-काल-वातावरण के अनुसार लोगों को अपनी जीवनशैली में यथोचित परिवर्तन करने होते हैं जो जीवित रहने के लिए आवश्यक है। यह एक तरह का सूक्ष्म और अपेक्षाकृत स्थायी अनुकूलन है जो अंततः किसी क्षेत्र विशेष के लोगों की शारीरिक-मानसिक संरचना पर दीर्घकालीन प्रभाव डालता है। नृवंशों के पलायन और बसावट की यह एक अंतहीन स्थिति है जो सदा से होती आई है, सदा होती रहेगी।
हम सभी के पूर्वज घुमंतू से कबीलों, फिर गांवों, पुरों और नगरों से होते हुये राज्यों और देशों में बसते रहे हैं। यह उसी तरह है जैसे भारत के कुछ वनवासी क्षेत्रों में झूमकृषि परंपरा वाली सभ्यता।
जीवनशैली में दीर्घकालीन परिवर्तन अंततः शरीर और जेनोम्स की संरचना में एनाटाॅमिकल परिवर्तन करते हैं जो उनकी फिजियोलाॅजिकल स्थिति को भी किंचित परिवर्तित करते ही हैं। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण सिकलिंग के प्रभावितों में मलेरिया की प्रतिरोधी क्षमता के रूप में देखा जा सकता है। सिकलिंग के रोगियों को मलेरिया नहीं होता। उनमें पाई जाने वाली हीमोग्लोबिनोपैथी का अस्तित्व ही मलेरियारोधी होने के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ है।
अब हम ब्राह्मणों के विदेशी होने की सत्यता पर विचार करेंगे। जेनेटिक विश्लेषण बताते हैं कि वास्तव में हर देश का हर नागरिक विदेशी नृवंशों का मिश्रण होता है। जंबूद्वीप निवासी ब्राह्मणों में भी मिश्रित जेनोम्स पाये जाते हैं। एक समय जंबूद्वीपीय सभ्यता अपने किंचित स्थानीय अनुकूलनों के साथ एशिया के एक विस्तृत भूभाग पर कुछ साम्यताओं के साथ प्रचलित हुआ करती थी, जिसमें यव (जौं) एवं तंडुल प्रधान कृषि का बड़ा योगदान था। लैंडलाॅक क्षेत्र के निवासियों के विपरीत समुद्रतटीय क्षेत्रों के निवासियों की जीवन शैली में जलीय जीवजंतुओं और वानस्पतिक उपलब्धताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। इसी तरह की अन्य भिन्नताओं ने भी कई प्रकार के जेनोम्स को जन्म देकर कई नृवंशों को जन्म दिया। तो हम ब्राह्मणों के जेनोम्स का विकास जाग्रोस पर्वत (वर्तमान ईरान) से लेकर सिंधुघाटी तक के क्षेत्र एवं बहुत थोड़ी मात्रा में वर्तमान एशिया और वर्तमान यूरोप के एशियाई सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों के मिश्रण से माना जाता है। जेनोम्स में परिवर्तन एक दीर्घकालीन प्रक्रिया का परिणाम है।
एक समय तो भारत का सीमा विस्तार तिब्बत से लेकर पश्चिम में बैक्ट्रिया और जाग्रोस तक था ही। क्या तब के अफ़ग़ानिस्तान और जाग्रोस के आसपास बसे लोग भारतीय नहीं थे! क्या आज के पाकिस्तानियों को भारतीय नृवंशों का वंशज नहीं माना जायेगा!
जाग्रोस पर्वत शृंखला से निकलने वाली कारुन, करखेह और देज नदियों के उपजाऊ क्षेत्रों में बसे "जाग्रोस जेनोम युक्त" लोगों का सिंधु नदी घाटी के लोगों से मेल-मिलाप स्वाभाविक है, इसे तत्कालीन परिस्थितियों की दृष्टि से देखिये, कौन विदेशी है!
मैं हिंदी पट्टी की जनजातीय सहित सभी समुदायों और अफ्रीकी जनजातीय लोगों की जीवनशैली, परंपराओं, गीतशैली, और उच्चारण में अद्भुत समानता से सदा अचंभित होता रहा हूँ। हमारे उच्चारण और जीवनशैली में अफ्रीका हमारे बहुत समीप है जबकि यूरोप से हमारा कुछ भी साम्य नहीं मिलता।
मनुस्मृति की सुनी सुनाई एक-दो बातों को लेकर मनुस्मृति के प्रति घृणा और तिरस्कार की तरह ही जेनेटिक्स जैसे क्लिष्ट विषय का मात्र एक वाक्य पढ़कर और शेष संदर्भ को छिपाकर कोई नया सत्य नहीं गढ़ा जा सकता।

गुणांतरण

राजा

अपराधी मानता है
विद्यालय में
प्रवेश लेने के पहले से ही
हर उस विद्यार्थी को
जिसने लिया है जन्म
किसी ब्राह्मण
या क्षत्रिय
या वैश्य कुल में,
बस, इतना ही पर्याप्त है
चलाने के लिए उस पर
कई गंभीर अभियोग
कई काल्पनिक अपराधों के लिए।
दंड का भागी है वह विद्यार्थी
किसी भी काल्पनिक आरोप में,
यह न्यायालय का नहीं
राजा का निर्णय है
उन पूर्वाग्रहों पर आधारित
जिनका नहीं मिलता
कोई प्रमाण।
प्रजा ने याचना की
खीझकर
दुःखी होकर
निराश होकर
मिथ्यारोपों से व्यथित होकर
कि पद
और राजसेवायें तो कर ही दी हैं पृथक
अब
पृथक कर दो
हमारे विद्यालय भी
हमारे विश्वविद्यालय भी
हमारे चिकित्सालय भी
हमारे न्यायालय भी
और
हमारी पुलिस भी।
"स-वर्णों के लिए स-वर्ण
अ-वर्णों के लिए अ-वर्ण"।

यद्यपि
कोई सुदामा
न खड़ा, न लड़ा
तथापि
राजा रहा अड़ा
उसे चाहिए
केवल व्यवधान
समाधान नहीं
इसलिए उसने प्रारंभ करवा दिये हैं
देश भर में हिंदूकुश...
केवल हिंदूकुश,
क्योंकि वह स्वप्न देखता है
विश्वगुरु बनने के
दादा ईदी अमीन बनने के
रावण बनने के
और ईश्वर बनने के भी।
उसने पढ़ा था बचपन में
"सर्वाइवल आॅफ़ द फिटेस्ट" से ही
होता है स्थापित
पहले वर्चस्व
और फिर
विकास...
एक कोषीय से बहुकोषीय
अमीबा से वानर
फिर वानर से मानव।
राजा प्रगतिशील है
वह विकास करेगा
नीम को आम बनायेगा
बेर को केला
पैरों को मस्तिष्क
और
गुदाद्वार को मुँह
करके विच्छेद
मस्तिष्क और मुँह का,
समूल उच्छेदित कर
आम और केला।
राजा
नान-बायोलाॅजिकल है
देना चाहता है "अ-वर्णों" को
सारे अधिकार
छीनकर स-वर्णों से,
देना चाहता है नीम और बेर को
आम और केले के गुण।
यही है राजा का अभियान
"गुणांतरण"
ठीक
जैसे "धर्मांतरण"।

मंगलवार, 12 मई 2026

ग्लानिर्भवति भारत

हमने विश्वास किया 

उस पर

स्वयं से भी अधिक
और सम्मोहित हो
देखते रहे वही
उतना ही
जो 
और जितना
दिखाता रहा वह ।
हम नहीं देख सके वह सत्य
जो वह छिपाता रहा सबसे
यह चमत्कार ही था
काला जादू सा
कि हम देख पाते हैं
केवल वही
और केवल उतना ही
जो 
और जितना
दिखाना चाहता है वह
सामने खड़ी
सम्मोहित भीड़ को।
फिर एक दिन अनायास
एक तीव्र चक्रवात ने
रख दिया उधेड़ कर
और दिखा दिया वह भी
जो नहीं देख सके हम
अपनी खुली आँखों से कभी।
वह प्रवंचक
संत का वेश धर
पल-पल करता रहा सीताहरण
और अब
जबकि लुट चुकी हैं
सभी सीतायें
उसने उलट दी है
हमारी झोली
जिसे लेकर
इतने वर्षों से
वह दिखाता रहा था काला जादू
लूटता रहा था हम सबको
दिखा-दिखा कर कूट चमत्कार
लुटाता रहा था रेवड़ियाँ
शत्रुओं को हमारे
छीनकर हमसे ।
आज उसने फिर फेका है जाल
कि फिर बचायें हम 
बहुत सा धन
काटें
अपना पेट और तन
कि वह फिर लुटा सके रेवड़ियाँ
हमारे शत्रुओं को।

रविवार, 3 मई 2026

हो रहा शत्रुबोध

तुम "प्रतिभा" को

"सामान्य" कहते हो
क्या सचमुच
प्रतिभा "विशिष्ट" नहीं होती?
तुम जिन्हें विशिष्ट मानते हो
उन्हें आरक्षण देते हो
क्योंकि
तुम जानते हो
उनमें प्रतिभा होती
तो यह शिथिलता नहीं होती
तब
तुम उन्हें भी नष्ट करने के
षड्यंत्र करते।
तुम्हारा शत्रु
न अगड़ा है, न पिछड़ा
न दलित, न कोई और
केवल वह है
जिसमें प्रतिभा है
मैं इसे
संज्ञाओं से बलात्कार कहता हूँ
अर्थ को अनर्थ
और अनर्थ को अर्थ करने का
षड्यंत्र कहता हूँ।
तुम इसी तरह
सदा से नष्ट करते रहे हो प्रतिभायें
मूर्खों को दास बनाने
और प्रतिभाओं को
कुंठित करने के लिए,
तुम हत्यारे हो
प्रतिभाओं के ही नहीं
मानवता के भी।
तुम
कभी गोरे अंग्रेज होते हो
कभी काले अंग्रेज होते हो
वास्तव में
तुम मानवता के
सबसे बड़े शत्रु होते हो। ।