बुधवार, 16 सितंबर 2026

तो और कौन

अंधभक्ति में नीरक्षीर विवेक का कोई स्थान नहीं होता, एक धारणा होती है, जिसके लिए हठ होता है, और यह सब सर्वोपरि माना जाता है। 

वैचारिक परिमार्जन होता है पर हर किसी में हो, यह आवश्यक नहीं। यह संस्कारों और सत्यनिष्ठा पर निर्भर करता है। मैं संघसाहित्य से प्रभावित रहा इसीलिए संघियों की कई अक्षम्य दुर्बलताओं के बाद भी संघ से जुड़ा रहा पर अंततः एक घटना के कारण संघ को सदा के लिए नमस्कार कर लिया। यही स्थिति भाजपा के संबंध में भी रही। अब ग्लानि हो रही है कि जीवन के सत्तरवें दशक तक भाजपा का भक्त क्यों बना रहा! यदि आप स्वाभिमानी, और सच्चे सनातनी हैं तो सदा चिंतनशील रहेंगे और यही वह तत्व है जो आपको हर विकृत व्यवस्था के विरुद्ध क्रांति के लिए प्रोत्साहित करेगा। आज संघ और भाजपा के वर्तमान स्वरूपों में इन दोनों ही तत्वों का अकाल पड़ गया है। 

कुछ एकांगी सोच के लोग उत्तेजित हो रहे हैं, मोदी नहीं तो और कौन? क्या राहुल को बना दें प्रधानमंत्री! देश को हजारों साल बाद मिला है कोहनूर, इसे खो दिया तो हिंदुत्व की पहचान तक मिट जाएगी। 

श्रीराम और श्रीकृष्ण के बाद भी भारत रहा, आज भी है, आगे भी रहेगा। मोदी भले ही नानबायोलाॅजिकल और विष्णु के अवतार हों पर वह अमर नहीं हैं। एक दिन सबकी तरह उन्हें भी मरना है, तब क्या भारत समाप्त हो जाएगा? 

अंधभक्तों के कुतर्क नितांत मूर्खता के परिचायक हैं। यह न तो राष्ट्रभक्ति है और न सनातनभक्ति । इस सबके विरुद्ध स्वर तो उठने ही चाहिए।

सोमवार, 14 सितंबर 2026

कालनेमि कभी नहीं मरता

प्रतिकूल स्थितियों में कालनेमि छिप जाते हैं, मरते नहीं। यही प्रवृत्ति माइक्रोब्स की भी होती है। हम सदा माइक्रोब्स से घिरे रहते हैं। इनकी सही पहचान या इन्हें पहचानने की भूल ही हमारा भविष्य तय करती है। 

भाजपा अपने जन्म से ही श्रापित है, जब सत्ता के लिए जनसंघ को नेपथ्य में धकेलकर कांग्रेसीकरण के सिद्धांत के साथ कुछ चालाक लोगों ने हिंदुओं पर मोहिनी डालने की कमान सँभाली थी। हिंदूराष्ट्र का सपना दिखाकर भाजपा ने हिंदुओं के साथ विश्वासघात का नया कीर्तिमान स्थापित करने में सफलता पाई है। देश के बुद्धिजीवी भी भाजपा के भँवरजाल में फँसते गये और अपने सर्वनाश को आमंत्रित करते रहे। पर अब भलीभाँति घायल होने के बाद हिंदुओं का नीरक्षीर विवेक जाग्रत हो गया है और भाजपा एवं कांग्रेस मुक्त भारत का रुझान स्पष्ट होने लगा है।

स्मरण कीजिए, आपातकाल के बाद चुनाव में कांग्रेस के विरुद्ध जो भी खड़ा हुआ वही जीत गया। तब सुपात्र और कुपात्र का भेद समाप्त हो गया था। माना कि वह विरोध और घृणा के चरम का परिणाम था पर उसका परिणाम भी ठीक अगले चुनाव में दिखाई पड़ गया। इंदिरा ने वापस सत्ता सँभाली। अब वैसा ही इतिहास किंचित और परिशोधन के साथ दोहराए जाने के लिए तैयार है। न कांग्रेस, न भाजपा, इस बार नया प्रयोग भारतीय मतदाता की परिपक्वता का परिचय देने की दिशा में प्रवृत्त हो चुका है जो नया विकल्प बनेगा। 

जय हिंदूराष्ट्र !

ब्राह्मण की बेटी गोया गेहूँ की लेवी

ब्राह्मणों को अपनी बेटियों का विवाह दलितों से करने की बाध्यता का विधान। 

एक समय ऐसा भी था जब गेहूँ पर किसानों को लेवी देनी होती थी। लेवी यानी गेहूँ की कुल उपज का एक निश्चित भाग सरकार को सरकारी मूल्य पर बेचने की बाध्यता। बाजार मूल्य उससे कुछ अधिक होता था। अब ब्राह्मणों की बेटियों पर वैवाहिक लेवी की माँग उठ रही है। ब्राह्मण की बेटी न हुई, गेहूँ की उपज हो गई। 

जो ब्राह्मण इस माँग से व्यथित और अपमानित अनुभव कर रहे हैं उन्हें सोशल मीडिया पर गोलीबारी दी जा रही हैं और उन्हें यूरेशिया भगाने की धमनियाँ भी दी जा रही हैं। यह कश्मीरी पंडितों वाला प्रारूप है। 

लोग मानते हैं कि देश में बढ़ते हर पाप के लिए वर्तमान सत्ता नहीं, बल्कि केवल विपक्ष ही दोषी है। विघ्नसंतोषी लोग नहीं चाहते कि मोदी को विष्णु के अवतार के रूप में भगवान मानकर सुस्थापित किया जाए। 

ब्राह्मणों और दलितों के बीच वैवाहिक संबंधों के विषय में मैं प्रायः वैज्ञानिक तथ्यों के साथ लिखता रहा हूँ। विचारणीय है कि अंतर्धार्मिक और अंतर्जातीय विवाह के लिए सरकारें क्यों प्रयासरत हैं? जबकि धर्मांतरण और जातीय व्यवस्था के पीछे सरकारों की ही चालें रहती हैं। कुछ-कुछ समयान्तराल पर नये वर्ग और नयी जातियों का सृजन करने वाली सरकारें सारा दोष ब्राह्मणों पर थोपकर जाति उन्मूलन का सपना दिखाने में भी सबसे आगे रहती हैं? यह शुद्ध डायलिमा है, यानी लोकतांत्रिक व्यभिचार।

पहली बात तो यह कि जातियाँ किसी ने नहीं बनाईं, न पंडितों ने, जैसा कि मोहन भागवत ने दुष्प्रचार किया है, और न ईश्वर ने, जैसी कि लोगों में धारणा है। जातियाँ राजा तय करते रहे हैं, और वे लोग भी जिन्हें व्यावसायिक वर्चस्व की इच्छा रही है, यथा केरल के कन्नाड़ी निर्माता, जिन्होंने व्यावसायिक वर्चस्व के लिए गोपनीयता बनाये रखी। व्यवसाय हमारी जीवनशैली को प्रभावित करते हैं। और जीवनशैली कुछ अन्य घटकों के साथ मिलकर जेनेटिक परिवर्तन के कारण बन जाते हैं, यही कारण है कि सवर्णेतर समुदाय की कई जातियों में हीमोग्लोबिनोपैथी विकसित हुई जो अचिकित्स्य है। वंश परंपरा से चलने वाली इन व्याधियों की विश्व में कहीं कोई सफल चिकित्सा नहीं है। सरकारों से प्रभावित मेडिकल साइंस ने इसका दीर्घकालीन उपाय बताया है "अंतर्जातीय विवाह", जो मेरी समझ में आज तक नहीं आया। यह वैसा ही जैसे किसी की दारू छुड़वाने के लिए ख़ुद भी उसके साथ बैठकर दारु पीने लगना। सवर्ण द्वेषी और सनातन (हिंदू) विरोधी सरकारें चाहती हैं कि सवर्ण भी इस व्याधि से पीड़ित हों जिससे कुछ नहीं तो समाज में व्याधिक समानता ही लाई जा सके। यानी, मूर्ख को विद्वान नहीं बना सकते तो विद्वान की भ्रूणहत्या तो कर ही सकते हैं जिससे सामाजिक श्रेष्ठता की सारी प्रायिकतायें और संभावनाएँ समाप्त की जा सकें।

अब जिज्ञासु लोग गूगल बाबा से भारत और शेष विश्व में हीमोग्लोबिनोपैथी से प्रभावित होने वाली जातियों के बारे में पूछ सकते हैं। 

सारांश यह कि समाज में हर तरह की विषमताओं के लिए विभिन्न घटक उत्तरदायी होते हैं जिसमें परिस्थितिजन्य समझौते और जीवनशैली महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह सत्य है जिसे झुठलाने का कोई दुष्ट प्रयोजन ही हो सकता है। 

कुछ आरक्षित लोगों ने तो माँग कर दी है कि उन्हें ब्राह्मणों की बेटियों से विवाह में आरक्षण दिया जाय। यानी आरक्षित विधानसभा/लोकसभा सीट की तरह ब्राह्मणों को अपनी बेटी आरक्षित कोटे से ब्याहने की बाध्यता। यह भी एक तरह का जजिया कर है। "मोदी द ग्रेट विष्णु अवतारम्" उनकी यह माँग पूरी कर सकते हैं, उन्हें ऐसा करके एक और महानता के आत्मबोध में डुबकियाँ लगाने का सौभाग्य प्राप्त होगा। वे तो चाहते हैं कि भारत से सवर्णों का उन्मूलन होना ही चाहिए। 

रविवार, 13 सितंबर 2026

कृत्रिम बौद्धिकता और जातीय संघर्ष

कृत्रिम बौद्धिकता कितनी बौद्धिक?

एलन मस्क और सैम आल्टमैन ही नहीं, एआई शोधकर्ता जैकब काॅक्सन और एआई चीफ़ डारियो अमोदेई भी एआई की उल्लेखनीय सफलता के बढ़ते परिणामों के प्रति सशंकित हैं। अब यह शिक्षित युवकों के स्वावलम्बन को छीनने तक ही सीमित नहीं है, अपितु उससे कहीं बहुत आगे बढ़कर मानव सभ्यता के एक बार फिर प्रलयलीन हो जाने की आशंकाओं में परिवर्तित होता जा रहा है। 

हाँ! यह हो सकता है, जब महापंडित रावण अविवेकी हो सकता है तो एआई क्यों नहीं! एआई पर काम करते समय वैज्ञानिकों ने बौद्धिकता और विवेकशीलता में तालमेल का कोई प्रयास नहीं किया। वास्तव में कृत्रिम बौद्धिकता के आगे विवेकशीलता को कोई भाव ही नहीं दिया गया। अब यही चूक, या कहिये मदांधता भारी पड़ रही है। 

अब स्थिति यह है कि हम बड़ी द्रुति गति से मानव सभ्यता के वर्तमान स्वरूप को समाप्त करने की दिशा में बढ़ चुके हैं।

जातीय संघर्ष की भेंट चढ़ता भारत!

जातीय गालियाँ, घृणा और असहिष्णुता की पराकाष्ठा की भारत में बाढ़ आई हुई है। यही सब देखने के लिए उड़न खटोले पर आरुढ़ हवा में तैरता "मोगैम्बो ख़ुश ही नहीं, बहुत ख़ुश" हो रहा है।

नैतिकता और नैष्ठिकता के पराभव का लक्ष्य ही आसुरी स्वप्न है, और इसके लिए आवश्यक है अराजकता को हर तरह से प्रश्रय देना। वही हो रहा है। दूर-दूर तक कहीं कोई विश्वामित्र और संदीपन दिखाई नहीं देता, कोई राम और कृष्ण भी नहीं दिखाई देते, राक्षसी शक्तियाँ प्रचंड होती जा रही हैं, और मीलाॅर्ड मौन के दीर्घकालीन हाइबरनेशन में चले गये हैं। अब जो करना है वह गिलहरियों को ही करना होगा।

मित्र-शत्रु बोध

न मित्र, न शत्रु केवल अवसर की ताक।

कोई किसी का मित्र नहीं, कोई किसी का शत्रु नहीं, हर कोई हर किसी का मित्र है, हर कोई हर किसी का शत्रु है। महत्वपूर्ण है अवसर और उसके नेपथ्य में पल रही साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा। यही धरातलीय सत्य है।

अमेरिका ही नहीं, कोई भी देश, न किसी का मित्र है, न शत्रु। हर कोई अपने वर्चस्व के लिए अवसर की ताक में घात लगाये बैठा है। हर कोई ओट्टोमन साम्राज्य और ब्रिटिश साम्राज्य की तरह वैश्विक साम्राज्य बनाना चाहता है। 

अरब चाहता है कि हूतियों पर अंकुश लगाने में अमेरिका सहयोग करे पर ट्रंप ऐसा नहीं चाहता।                    अमेरिका और इज्रेल के सपने बहुत बड़े हैं। इस्लाम विभिन्न देशों में घुस कर फैला हुआ अपने आप में एक "साम्राज्य" है। घात-प्रतिघात चल रहे हैं। कोई अस्तित्व छीन रहा है, कोई अस्तित्व बचा रहा है।   

इस सबमें भारत कहाँ है??? 

भारत और भारत की सरकार जातीय और धार्मिक स्वयंभू ठेकेदारों के हाथों में खेल कर ही आत्ममुग्ध है। हम तो ठहरे व्यापारी, विश्वगुरु बनने के सपने बेचते रहे, 

...जबकि सचमुच ऐसा कोई सपना कभी था ही नहीं।

शनिवार, 12 सितंबर 2026

लाठी

अँगुली उठा सकते हैं 

एक मीलाॅर्ड

दूसरे मीलाॅर्ड पर

पर इस अधिकार पर 

नहीं है कोई अधिकार 

जनता का ।

कटुतम आलोचना कर सकते हैं

एक माननीय

दूसरे माननीय की 

पर इस अधिकार पर भी 

नहीं है कोई अधिकार 

जनता का ।


पोर्न गालियों की बौछार से 

कर सकता है सराबोर

एक स्वेच्छाचारी

दूसरे स्वेच्छाचारी को

और इस अधिकार पर भी 

नहीं है कोई आधिकार

जनता का

क्योंकि जनता सब जानती है

और जो सब जानता है

वह बना रहता है 

आँख की किरकिरी

हर किसी की

लोकतंत्र का यही धरातलीय सत्य

अपराध होता है

जब-जब

बनता है सम्राट

कोई नितांत बायोलाॅजिकल

अचानक नानबायोलाॅजिकल। 

अधिकार

नहीं होते समान

होते हैं

तेरे-मेरे 

अलग-अलग

बस, लंबी होनी चाहिए

लाठी। 


 


बुधवार, 9 सितंबर 2026

छुआछूत

निर्धन सदा सामाजिक दुर्बल

ऐश्वर्यशाली सदा सबल

सबल में प्रभुता 

निर्बल में दीनता

यही है 

लोकव्यवहार का कठोर धरातल

जो किसी आदर्श से 

नहीं होता भयभीत

दिखाता है ठेंगा

हर युग के सुदामा को।


तुम 

होकर भी सबल

करते रहे ईर्ष्या

और खोदते रहे खाइयाँ

अपने और सुदामा के बीच।

सुदामा बचता रहा

दूर भागता रहा

तुम्हारे अत्याचारों से

तुम्हारी परछाई से

तुमसे 

तुमने इसे छुआछूत कहा 

जातीय घृणा कहा 

और फिर मढ़ दिया 

एक और आरोप।

क्या सचमुच जातीय आरोप

या तुम्हारे अत्याचारों से बचने का 

एकमात्र 

विवश उपाय भर !

मंगलवार, 8 सितंबर 2026

राजहठ

आदेश है

कि लोग सोचें

केवल तुम्हारी तरह

रहें 

केवल तुम्हारी तरह

जियें भी

तो केवल तुम्हारी तरह

क्योंकि तुम बनाना चाहते हो 

विश्वगुरु

पता नहीं 

स्वयं को 

या पूरे देश को!

किंतु मैं

नहीं बनना चाहता विश्वगुरु

बनकर

तुम्हारा वैचारिक दास।

संभव ही नहीं है 

सच हो पाना 

तुम्हारा हठ।

तुम इसे ही कहते हो

लोकतंत्र

मैं इसे ही कहता हूँ

आॅब्सेसिव कंपल्सिव बिहैवियर

जिसके लिए जाना होगा तुम्हें

किसी मनोरोग विशेषज्ञ के पास

हाँ!

तुम रुग्ण हो

जान चुका है पूरा देश।

सोमवार, 7 सितंबर 2026

निसर्ग में

निसर्ग में देखी है किसी ने 
कोई व्यवस्था
किसी आरक्षण की!
 
नहीं उगता धान
किसी मरुस्थल में
वह चिल्लाया-
हम पाँच करोड़ साल से प्यासे हैं
हमें देना ही होगा 
शस्य श्यामला का आरक्षण।
बबूल भी बोले-
इतने सुंदर सुरभित पुष्प
तरुणी को ही क्यों
हमें क्यों नहीं?
काँटों भरी तन्वंगी 
छुईमुई क्यों रहती पीछे
वह भी भुनभुनाई-
हमारे साथ भेदभाव होता है
हमें तो कोई छूता भी नहीं
हम दलित हैं
हमें सुकोमलता और सौंदर्य का
आरक्षण दो कमल सा।
मादा तिलचट्टी क्यों रहती पीछे
उसने माँग की- 
हमें तो शिव के नंदी से ब्याह करना है।
दादर रेलवे स्टेशन पर घूमते 
मोटे धूँस ने भाषण दिया-
जब तक नहीं होगा 
हमारा पाणिग्रहण
स्वर्ग की कामधेनु से
समानता नहीं आ सकती ब्रह्माण्ड में। 
सारी सुविधाएँ स्वर्ग में क्यों
नर्क में भी क्यों नहीं!
उधर दहाड़ा
अंतरिक्ष में विचरता
धूमकेतु आवारा-
हमें भी चाहिए आरक्षण
जैवविविधता का
सारी विविधता पर
धरती का ही आरक्षण क्यों?
पूरे ब्रह्माण्ड में 
होड़ लगी थी 
कुछ न कुछ माँगने की
कृष्णविवर ने भी माँग की
जिसकी जितनी शक्ति भारी
उसकी उतनी हिस्सेदारी 
हमारा गुरुत्वाकर्षण सर्वाधिक है
हमें भी मिलना चाहिए
सूर्य सा सम्मान
और सृष्टि का अधिकार।

ब्रह्मा जी बोले-
जिस दिन मिल जाएँगे सबको
सारे अनधिकृत अधिकार
ब्रह्माण्ड बन जायेगा
लोकतांत्रिक भारत के
सरकारी प्रकल्पों सा
और तब 
रौद्र नृत्य करना होगा
नटराज को, 
देखना चाहोगे !

रविवार, 6 सितंबर 2026

स्वर्णमूर्ति

आगे बढ़ना
हिमालय पर चढ़ना होता है
जिसके लिए उतारने होते हैं
एक-एक कर अपने सारे बोझ।
आगे की यात्रा 
शून्य की यात्रा है
संकुचित से विराट की यात्रा 
जहाँ सब कुछ 
छोड़ देना होता है एक-एक कर
और तुम 
मंदिर बनवा रहे हो
ताकि स्थापित हो सके 
तुम्हारी स्वर्णमूर्ति!
भगवान बनने का 
ऐसा ही अदम्य दुस्साहस
हिरण्यकश्यप ने भी किया
दशानन ने भी किया
और अब तुम भी कर रहे हो
उपेक्षा कर इस सत्य की भी
कि प्रतिपल बनते इतिहास में
लिखा जा रहा है सब कुछ।

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

राजा सड़ा क्यों

यदा यदा हि धर्यस्य ग्लानिर्भवति भारत!

पढ़ा था 

गुना नहीं

रोटी जली क्यों...

घोड़ा अड़ा क्यों...

सुनी थी कहावतें

कभी गुनी नहीं

इसीलिए कभी सीखा नहीं

कि जो बात-बात पर अड़ता है 

वह कभी चलता नहीं

इसलिए फेरना आवश्यक है

रोटी, घोड़ा 

और राजा भी।  


हवायें ऐसी बहीं

कि बोझ बढ़ता गया 

सूचनाओं का

मस्तिष्क की तंत्रिकाओं पर

इतना... कि

वह नहीं रख सका संबंध

विवेक और हृदय से...

मन तो पहले ही उड़ा ले गई थीं

उष्ण

पछुआ हवायें।


तिवारी परिवार जी उठा है फिर

मरा नहीं कोई

नीलमणि तिवारी का बेटा

चाय बेचने लगा है

और बेटी

पकौड़े तलने लगी है

गर्व है योजनाकारों को 

कि देश की प्रति व्यक्ति आय 

बढ़ने लगी है।

अपराधी से सारथी बने लोग

देश के स्वामी बन गये हैं

और उनके नौनिहाल 

पढ़ने लगे हैं

सात समंदर पार

गोरों के देश में, 

लौट कर आएँगे जब

शिक्षा मंत्री बनेंगे भारत के 

और कहेंगे

बाबा साहब के दिए अधिकार से 

पढ़ सका बाहर जाकर

वरना तुमने तो पीने नहीं दिया पानी

पाँच हजार साल से।


बधाई हो!

नीलमणि तिवारी को भी 

मिल गई है नौकरी

दानापुर के सुलभ शौचालय में

सुदामा!

और कितनी प्रगति चाहिए तुम्हें!


बुधवार, 2 सितंबर 2026

विदाई

जो आया है सो जाएगा

तुम्हें भी जाना है

पर नहीं सोचा था

इस तरह जाना चाहते हो तुम 

अपनी दुर्गति के साथ

गालियों, तिरस्कार और अपमान के साथ।

तुम नहीं झुके

जहाँ झुकना था

तुम झुकते रहे

जहाँ कभी नहीं झुकना था।


तुमने 

सम्मान किया पोर्नगालियों का

तिरस्कार किया सम्मान का

भंजन किया भरोसे का

इसलिए 

हमारे लिए तो 

हर पल मरते रहे हो तुम।


थाली के बैंगन से

तुम लुढ़कते रहे 

इधर से उधर और उधर से इधर।

निष्प्रभावी रहे 

हमारे अनुनय, विनय, 

अनुरोध और प्रशंसा...

तुम 

स्वेच्छा से पिछड़ते गये

बड़े गर्व से गिरते गये 

सामान्य से अतिदलित तक,

और घिरते गये

अपने ही शब्दों से

अपनी ही परिभाषाओं से।

ओढ़ते रहे खोखली रजाइयाँ

होते रहे आत्ममुग्ध

अपनी ही बनी उपाधियों से। 


जन्मना हो तुम भी 

हमारी तरह

अजन्मा 

कैसे हो गये?

जाओ

हम विदा देते हैं तुम्हें

अब मत आना कभी

लौटकर

इस धरती पर।

शनिवार, 29 अगस्त 2026

सत्ता और संविधान

व्यापारी ने व्यापारी से युद्ध किया

व्यापारिक, 

व्यापारी हारा, व्यापारी जीता

व्यापार की मृत्यु हुई।

व्यापारी ने दास बनाया

पूरे देश को

व्यापारी ने सत्ता संभाली 

पूरे देश की

नाम रखा "ब्रिटिश इंडिया"।

फिर क्रांति के लिए बजी

रणभेरी

हिंसा हुयी

कुछ मारे गये

कुछ ताक में थे

अवसर की,

नाटक किया स्वतंत्रता संग्राम का

लिख लिया अपना संविधान

करते हुये अनुकरण

विदेशी संविधानों का

जिसमें नहीं होता कुछ भी 

देशी।

सत्ता गई, सत्ता आई 

पर क्रांति नहीं हुई

सत्ता परिवर्तन हुआ। 

गोरों के चाबुक 

ले लिए कालों ने, 

पहले देश परतंत्र था

फिर प्रजा परतंत्र हुई। 

व्यापार आज भी रहता है

सत्ता के केंद्र में।

सारी नीतियाँ

सारे विधान

सारी व्यवस्था

रहती है

व्यापार केंद्रित।

तुमसे छीने गये 

तुम्हारे कुटीर उद्योग

छीना गया व्यापार

और थमा दिये गए

व्यापारिक दक्षता के नाम

बना कर जातियाँ

जो पिछड़ती गईं

खोती गईं अपना अस्तित्व

होते हुये रूपांतरित

वैश्य और शूद्र से

दलित

अतिदलित

और महादलित तक। 

व्यापार 

आज भी है

सत्ता के केंद्र में।

बड़े-बड़े प्रधानमंत्री

होते हैं नतमस्तक 

सम्राट 

रोटे शील्ड और 

व्यापारी

वास्को द गामा और  

शी जिन पिंग के समक्ष।

संविधान 

लिखे जाते हैं

इन्हीं के लिए।

राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ और हिंदू

 मोहन भागवत कहते नहीं थकते कि "हिंदू कोई धर्म नहीं, जीवनशैली है"। 

बृहस्पति आगम के अनुसार "हिमालय से हिंदमहासागर तक का भूभाग हिंदु-स्थान है"। 

इस भूभाग के निवासी "हिंदुओं" की जीवनशैली, जीवनमूल्यों, आदर्शों और मान्यताओं में मौलिक समानतायें होनी चाहिए। क्या सचमुच समानतायें हैं?

माना कि रिलीजन "धर्म" का पर्याय नहीं, और "हिंदू धर्म" जैसी कोई अवधारणा वेदों में नहीं है। पर "वैदिक धर्म" तो है न! कालांतर में यही वैदिक धर्म "सनातन धर्म" और "हिंदू धर्म" के नाम से लोकव्यवहार में जाना जाता रहा है। संघ धर्म को लेकर इतना हठी और अविवेकी क्यों है? हिंदू को यदि आप भौगोलिक परिचय मानते हैं तो स्पष्ट है कि भारत में केवल हिंदू समुदाय ही रहता है जिनमें से कई लोग वैदिक धर्म को नहीं मानते। तब वे क्या मानते हैं? वे "जो" मानते हैं उसे तात्विक दृष्टिकोण से धर्म नहीं, रिलीजन कहा जाता है। रिलीजन और धर्म के इस अंतर से स्पष्ट है कि विश्व में केवल दो ही समुदाय हो सकते हैं, एक धर्मपरायण और दूसरा रिलीजनपरायण। इन दोनों में कई असमानतायें हैं जिसके कारण उपद्रव दिखाई देते हैं। क्या  हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध आदि जीवनशैलियाँ भारत में व्यवहृत नहीं हैं? तब "हिंदू" भौगोलिक परिचय और "हिंदू जीवनशैली" में समानता होनी चाहिए जो कि नहीं है। अर्थात भारत के कुछ लोग धार्मिक हैं और कुछ लोग धार्मिक न होकर रिलीजियस हैं, और इनमें परस्पर विद्वेष एवं प्रतिकूलताएँ भी हैं जिनके हिंसक परिणाम हम सब देखते और भोगते रहते हैं। 

संघ और भाजपा के पास  समावेशिता और समानता जैसे कुछ शब्द हैं जो एक नया बखेड़ा खड़ा करते हैं और हम अंततः समाज को असमाधान की स्थिति में ही पाते हैं। 

संघ और भाजपा सत्य से भागकर एक स्वैच्छिक कल्पना को सत्य बनाकर प्रस्तुत करते रहे हैं जिसने समाज में असमानता और गृहयुद्ध जैसी स्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं। इन्हें स्वीकार करना होगा कि असमानता पूरे विश्व का सत्य है जिसे समाप्त नहीं, नियंत्रित और संतुलित किया जा सकता है।

गुरुवार, 27 अगस्त 2026

पुराकथा भवितव्यता

पुराकथा यह है कि जब-जब धर्म की हानि (धर्म के अनुयायियों की संख्यात्मक और गुणात्मक न्यूनता) होती है तब-तब समाज में क्रूरता, अत्याचार और अपराधों की वृद्धि होती है। छोटे अत्याचारी भी बड़े अत्याचारियों से त्रस्त होने लगते हैं। हर कोई अभिमानी और स्वयं को ईश्वर मानने लगता है, ठीक हिरण्यकश्यप की तरह, नानबायोलाॅजिकल सा। यह वैचारिक और सामाजिक असंतुलन की पराकाष्ठा है जिसका अंत सुनिश्चत है। जगत के संचालन का यही कालक्रम (क्रोनोलाॅजिकल आॅर्डर) है, द सो काल्ड न्यू वर्ल्ड आॅर्डर। भारत सहित विश्व भर में व्याप्त इन सभी व्याधियों की यही प्रोग्नोसिस है।

रावण तो अपने काल का प्रकाण्ड विद्वान था, कई विषयों में पंडित, आविष्कारक और शोधकर्ता भी। किंतु उसके अहंकार ने उसे धर्मच्युत किया और फिर उसका अंत भी किया। रावण, दुर्योधन, ओट्टोमन साम्राज्य के सुल्तान आदि से लेकर ओसामा बिन लादेन तक हर अधर्मी का अंत होता रहा और हर युग का कुशासन अपने उत्तरकालीन सुशासन से स्थानापन्न किया जाता रहा। इस बार भी यही पुरानी कहानी अपनी पुनरावृत्ति के लिए नेपथ्य के गहन अंधकार में तैयार हो रही है। धर्म, जाति, वर्ग,भाषा आदि के आधार पर समाज को बाँटने और सत्ता हथियाने वालों का भी अंत होना ही है। परमशक्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ भी स्थाई और अंतिम नहीं होता। तुम्हारा संविधान तो कदापि नहीं। 

बड़े गर्व से तुम जो संविधान रचते हो, उसका उल्लंघन भी तुम्हीं करते हो, फिर छल करके उसमें संशोधन भी करते हो। जो सच्चे लोग तुम्हारे रचे संविधान के अनुरूप चलते हैं वे कष्ट भोगते हैं, जो तुम्हारे संविधान की प्रतिपल धज्जियाँ उड़ाते हैं वे ऐश्वर्य भोगते हैं। किंतु प्रकृति रचित अलिखित संविधान में कोई संशोधन नहीं होता, वह निर्दुष्ट है इसलिए अपरिवर्तनीय है। उसे हर किसी को मानना ही होगा। 

प्रकृति और समाज का अपना पृथक धर्म होता है, जिसका पालन अनिवार्य है। कालक्रम से इसमें शिथिलता आती है पर वह स्थाई नहीं होती। जो प्रतिलोम हो जाता है उसे अनुलोम होना ही होता है। यह तुम्हारा रचित संविधान नहीं, प्रकृति का निर्दुष्ट और अक्षुण्ण संविधान है जो वैश्विक है, सनातन है, हर किसी के लिए सर्वोपरि है।

जिन्होंने हर तरह के पाप और क्रूरता को ईश्वर का आदेश प्रचारित कर निरंकुशता और स्वेच्छाचारिता को ही धर्म कहना प्रारंभ कर दिया है, वे सब भी अपने अंत की ओर बढ़ते जा रहे हैं। प्रकृति भी संतुलन साधने में लगी हुई है। 

...तो क्या अनुकूल काल की प्रतीक्षा करें! नहीं, यह भी नहीं, कर्म करना भी प्राकृतिक धर्म का अपरिहार्य अंग है। हम गहन तिमिर में छटपटा रहे हैं, भोर होने तक प्रतीक्षा करनी होगी। तमस से ज्योति की ओर... ! यजन तो करना ही होगा न!

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

जातीय समीकरण और सत्ता

 -जातिवाद मुर्दाबाद! जातीय जनगणना जिंदाबाद

-जिसकी जितनी संख्या भारी (अंकसूची छोड़कर), उतनी उसकी भागीदारी (सत्ता और शासकीय सेवाओं में)!

-तिलक, तराजू और तलवार को चार जूते मारने के लिए उनकी पहचान और संख्या का पता होना आवश्यक है, इसलिए जातीय जनगणना आवश्यक है। 

-सत्ता और शासकीय सेवाओं में भागीदारी के लिए, गुणवत्ता नहीं संख्याबल चाहिए इसलिए जातिवाद का स्थायी होना आवश्यक है। 

-ब्राह्मणों और क्षत्रियों की बेटियों का शुद्धिकरण (यौनप्रक्षालन) करने और उनसे विवाह करने के लिए जातिवाद का होना आवश्यक है।

-तिलक-तराजू-तलवार को गालियाँ देने, उन्हें मारने-पीटने, उनकी हत्या करने और उन पर एस.सी. एस.टी. अपमान का आरोप लगाकर सरकार से क्षतिपूर्ति राशि लेने और उन्हें यूरेशिया भगाने की धमकी देने के लिए जातिवाद की खाइयाँ और भी गहरी करना आवश्यक है।

-ये सब समाज की नहीं, दूषित और भ्रष्ट सत्ता की आवश्यकतायें हैं। इसीलिए क्षतिपूर्ति राशि के आकर्षण को इस तरह परोसा जाने लगा कि एस.सी.एस.टी. एक्ट भारतीय जनता के लिए अफीम बन गया। उसकी पिन्नक सिर चढ़ कर ध्वजारोहण करती है। आरक्षित वर्ग के अपमान को तौलकर उसका मूल्य तय किया जाने लगा, ताकि धन से उसकी क्षतिपूर्ति की जा सके।

-अपमान की क्षतिपूर्ति! यह एक नयी अवधारणा है, नैतिकमूल्यों का मूल्यांकन धनराशि की संख्या पर आकर ठहर जाता है। उसकी इतनी ही गति है।

-सिंहासन तक पहुँचने और फिर उसे दृढ़ता से पकड़े रहने के लिए जातीय समीकरण का गणित लगाते रहना कूटनीतिज्ञों के लिए सरलतम मार्ग होता है।

-कूट/छल नीति का राजनीति से नहीं, अराजकता से संबंध होता है। यह बात उनकी समझ में अच्छी तरह आती है जिन्होंने सम्राट विक्रमादित्य और श्रीराम के आदर्शों को सत्ता और समाज दोनों से निरंतर दूर रखा। 

गालीप्रेमी भजनद्वेषी

जेन-जी लड़कियों ने मोदी और उनकी माँ को पोर्नगालियाँ दीं तो सरकार प्रसन्न होकर उनके सामने नतमस्तक हो गई, स्वयं प्रधानमंत्री ने गालीबाजों को गले से लगाने की इच्छा प्रकट की। इसके कुछ ही दिन बाद हनुमान चालीसा का भजन करती युवाओं की भीड़ से रामभक्त होने का पाखंड करने वाली सरकार इतनी कुपित हुई कि गृहमंत्रालय के अधीन दिल्ली पुलिस को हिंसा के लिए आदेशित कर दिया गया। 

देश ही नहीं विश्व भर में विश्वगुरु के इस संदेश ने लोगों को हतप्रभ कर दिया। आपातकाल की घोषणा किये बिना दिल्ली में आपातकाल लगा दिया गया। इस अघोषित आपातकाल के लिए भाजपा और मोदी को इतिहास में सदैव स्मरण किया जाएगा। 

जातिगतआरक्षण, अत्याचारमूलक यूजीसी बिल और जातीय उत्पीड़न को समाप्त करने की याचना के साथ पूरे देश से उमड़ी भीड़ स्वतंत्र भारत का सच्चा मुक्तिआंदोलन है जिसके दमन के लिए संघ के वैचारिक आक्रमणों और भाजपा के हिंसक दमन ने देश भर को हतप्रभ कर दिया है। 

जंतर-मंतर पर युवाओं के शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हनुमान चालीसा का भजन करती भीड़ पर पुलिस की लाठियों के प्रहार ने घोषित कर दिया है कि राममंदिर और हिंदुत्व की बातें भाजपा और संघ के अलतकिया से अधिक और कुछ नहीं था। 

सत्य और नैसर्गिक न्याय की याचना करते भूलुंठित युवाओं पर मोदी सरकार की पुलिस के क्रूर प्रहारों, प्रदर्शनकारी पंडित पंकज धावरिया को बंदी बनाने के बाद चलती गाड़ी से नीचे फेंककर जातिसूचक गालियाँ देते हुये दिल्ली पुलिस की यातनाओं से भयभीत हो गये भय ने धीरे से फुसफुसाकर बता दिया कि भारत में संघ और भाजपा के फासीवाद की घोषणा हो चुकी है जो मोदी के प्रिय "न्यू वर्ल्ड  आॅर्डर" का एक अंश भर है। 

रविवार, 23 अगस्त 2026

आरक्षण का अधिकार

हर किसी को अपने पतन या उत्थान का अधिकार प्राप्त है । यह अधिकार सदा से आरक्षित रहा है, संविधान निर्माण के पहले से ही। 

आज मेरी बात आपको प्रतिकूल दिशा में जाती सी प्रतीत होगी। मैं सदा आरक्षण के विरोध में लिखता रहा हूँ। आज मैं इसके दूसरे स्वरूप को देख पा रहा हूँ। 

आज, अभी थोड़ी देर पहले तक मैं लिखता रहा कि आरक्षण नैसर्गिक सिद्धांतों के विरुद्ध है, अन्याय है, अमानवीय है और अप्राकृतिक है। अब मैं समझ पा रहा हूँ कि आरक्षण पहले भी था, आज भी है, आगे भी रहेगा, क्योंकि आरक्षण प्रकृति की व्यवस्था है। 

अपनी प्रतिक्रिया देने से पहले तनिक ठहरकर, बहुत अधिक नहीं, मात्र शरीर रचना विज्ञान, परमाणु संरचना, सृष्टि की प्रक्रिया, ब्रह्मांडीय विन्यास और गणित के कुछ व्यावहारिक अनुबंधों पर दृष्टि अवश्य डाल लीजिए। 

इन सभी में एक सैद्धांतिक समानता है, अ-समानता और विरुद्धता की समानता। दाहिने और बायें अंगों की संरचनाओं एवं कार्यों में अ-समानता, परमाणु की संरचना में परस्पर विरोधी गुणों की अनिवार्यता, सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया में अ-समान गुण-कर्मों की अनिवार्यता, ब्रह्मांड की अवस्थिति में तो अ-समानता और विरुद्धता की भरमार है, और गणित में मूल संख्याओं का योग भी अ-समान ही होता है।  

अ-समानता प्राकृतिक है, समानता का हठ अप्राकृतिक है। परिवार और समाज में अ-समानता देखी जाती है, उसका होना अपरिहार्य है। उसकी संरचना और अवस्थिति का आधार भी अ-समान है, और यही अ-समानता का गुण प्रकृति का आरक्षण है। इस आरक्षण को समाप्त कौन कर सकता है! इसीलिए फ़िजिक्स के विद्वान ने दहाड़ते हुए कहा- "किसी माई के लाल ने अपनी माँ का दूध नहीं पिया जो इस आरक्षण को समाप्त कर दे"। (वैसे जिस भी बच्चे की माँ जन्म देते ही मर नहीं गयी, उसने अपने बच्चों को दूध तो पिलाया ही है। बहुत कम दुर्भाग्यशाली बच्चे होते हैं जो माँ के दूध से वंचित रहते हैं)

...तो सिद्ध हुआ कि अ-समानता प्रकृति का अपरिहार्य गुण-कर्म है, और इस संदर्भ में प्रकृति ने अपनी व्यवस्था में शतप्रतिशत आरक्षण बना कर रखा है। 

...तो यह भी सिद्ध हुआ कि सामाजिक समानता की कल्पना और उसकी माँग एक अव्यावहारिक हठ है। प्रकृति की व्यवस्था में अ-समानता का आरक्षण है, समानता का नहीं।

वैक्सीन, वायरस और व्यापार

आग पर रोटी पकती है तो क्या सूरज पर पका लें! माइक्रोब्स रोग उत्पन्न करते हैं और इम्युनिटी भी, तो क्या उनका स्वागत करें और उन्हें अपने शरीर में निर्बाध प्रवेश करने दें? 

माइक्रोब्स और शरीर के बीच में आती है हाइजीन की अवधारणा और म्यूटेशन एवं वैरिएन्ट्स के रहस्य। 

मैं अपने छात्र जीवन से ही वैक्सीनेशन के विरोध में खड़ा होता रहा, लोग उपहास करते रहे, शिक्षक भी और सहपाठी भी, पर मैं खड़ा रहा। और अब जबकि anti HIV वैक्सीन की चर्चा हो रही है तो एंटी कोरोना वैक्सीन का भूत भी एक बार पुनः झाँकने लगा है। न्यू वर्ल्ड आॅर्डर के लिए जाॅर्ज सोरोस से लेकर मोदी तक पुष्पमाला लेकर खड़े हैं। उद्योगपति हर्षित हैं... बकरे स्वयं आगे आ रहे हैं कटने के लिए। न्यू वर्ल्ड आॅर्डर के लिए और क्या चाहिए!

हम कुछ नहीं कहेंगे, जनसंख्या भी तो कम होनी चाहिए न! प्रकृति संतुलन करती है, यहाँ अतिज्ञानी लोग प्रकृति का अधिकार स्वयं ले चुके हैं। एपस्टीन एक बार पुनः चर्चा में है, ...कि कोविड पूर्वनियोजित था, WHO की भूमिका भी पूर्वनियोजित थी। सबका साथ था...स्वास्थ्य के विरुद्ध विष बाँट कर अपने विकास का। लाॅकडाउन हुआ, थाली बजी, वैक्सीन लगा, ...और अब हो रहा है हृदयाघात, आकालमृत्यु। योजना सफल हो रही है। जनसंख्या कम हो रही है, उद्योग विस्तारित हो रहे हैं। कल क्या होने वाला है? ....छोड़िये, बाद में सोचेंगे, अभी तो अपनी बच्चियों को एंटीकैंसर वैक्सीन (Anti HIV) लगवाना है... ताकि इस बार उनकी देह में कैंसर की फसल अच्छी हो।

शनिवार, 22 अगस्त 2026

बीजिंग से अहमदाबाद

मुँह खुला ही रहता है 

चिर बुभुक्षित

ड्रैगन का

निगलने को कुछ भी

किसी भी दिशा में

मिल जाए जो भी

जहाँ भी।

चौकन्ने

मंथर गति से चलते

ड्रैगन की तीक्ष्ण दृष्टि से

बचेगा नहीं

असावधान रहेगा जो भी

और 

नहीं होगी दूरदृष्टि

जिसमें भी।


तुम तो गाते रहे 

हिंदी-चीनी भाई-भाई

और उधर बासठ हो गया।

तुमने कहा कुछ नहीं हुआ

डोकलाम में 

और उधर बनती रहीं 

सैन्य अधोसंरचनायें ताक्सिन में,

बनते रहे दो सैन्यमार्ग 

अरुणाचल में

साठ किलोमीटर भीतर तक।

तुम झूठ बोलते रहे  

पल-पल

आत्मविश्वासपूर्ण अभिनय के साथ।

कौन हो तुम?

चौकीदार तो नहीं हो सकते

नायक भी नहीं हो सकते

बंधु भी नहीं, सखा भी नहीं

ओह ! अब समझा 

तुम जो हो

वह बताएगा कौन!

सुनने के बाद

अपना सही परिचय 

मृत्युदंड निश्चित है

इसलिए सत्यवादी मौन है

गूँजता है तो केवल तुम्हारा ही 

अट्टहास दिग्दिगंत में

पर अब और नहीं

तैयार हो गये हैं कुछ लोग

करने अनावृत सारे रहस्य

भले ही मिले

क्यों न मृत्युदंड

और तुम!

तुम तो मरते ही रहते हो पल-पल

तुम्हें क्या पड़ता है 

कोई अंतर 

किसी के मरने से!

बेताल बेसुर

गाते रहे वर्षों से 

मन की बात

केवल अपनी

बिना सुने 

किसी और के मन की 

बेताल जो ठहरे!