अंधभक्ति में नीरक्षीर विवेक का कोई स्थान नहीं होता, एक धारणा होती है, जिसके लिए हठ होता है, और यह सब सर्वोपरि माना जाता है।
वैचारिक परिमार्जन होता है पर हर किसी में हो, यह आवश्यक नहीं। यह संस्कारों और सत्यनिष्ठा पर निर्भर करता है। मैं संघसाहित्य से प्रभावित रहा इसीलिए संघियों की कई अक्षम्य दुर्बलताओं के बाद भी संघ से जुड़ा रहा पर अंततः एक घटना के कारण संघ को सदा के लिए नमस्कार कर लिया। यही स्थिति भाजपा के संबंध में भी रही। अब ग्लानि हो रही है कि जीवन के सत्तरवें दशक तक भाजपा का भक्त क्यों बना रहा! यदि आप स्वाभिमानी, और सच्चे सनातनी हैं तो सदा चिंतनशील रहेंगे और यही वह तत्व है जो आपको हर विकृत व्यवस्था के विरुद्ध क्रांति के लिए प्रोत्साहित करेगा। आज संघ और भाजपा के वर्तमान स्वरूपों में इन दोनों ही तत्वों का अकाल पड़ गया है।
कुछ एकांगी सोच के लोग उत्तेजित हो रहे हैं, मोदी नहीं तो और कौन? क्या राहुल को बना दें प्रधानमंत्री! देश को हजारों साल बाद मिला है कोहनूर, इसे खो दिया तो हिंदुत्व की पहचान तक मिट जाएगी।
श्रीराम और श्रीकृष्ण के बाद भी भारत रहा, आज भी है, आगे भी रहेगा। मोदी भले ही नानबायोलाॅजिकल और विष्णु के अवतार हों पर वह अमर नहीं हैं। एक दिन सबकी तरह उन्हें भी मरना है, तब क्या भारत समाप्त हो जाएगा?
अंधभक्तों के कुतर्क नितांत मूर्खता के परिचायक हैं। यह न तो राष्ट्रभक्ति है और न सनातनभक्ति । इस सबके विरुद्ध स्वर तो उठने ही चाहिए।