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शनिवार, 11 सितंबर 2021

इतने सभ्य लोग “इतने असभ्य” क्यों होते हैं

अभी-अभी ब्रिक्स सम्मेलन हुआ, भारत के प्रधानमंत्री ने उसकी अध्यक्षता की । अन्य देशों की तरह रूस ने भी तालिबान के रूप-स्वरूप और अफ़गानिस्तान की स्थिति पर चिंता व्यक्त की । चीन ने इस प्रकरण पर चौकन्ने बने रहने की बात दोहरायी । ...और आज अभी-अभी रूस ने तालिबान सरकार को मान्यता देने की घोषणा कर दी है जबकि चीन तो पहले से ही तैयार बैठा था । योरोपीय देश भी धीरे-धीरे अपनी केचुल उतारने लगे हैं, तालिबान सरकार को मान्यता देने के लिये ज़र्मनी ने भी घोषणा कर दी है । एक-एक कर दुनिया भर के सभ्य देश तालिबान के समर्थन में खुल कर सामने आने लगे हैं अर्थात “एक-एक कर दुनिया भर के सभ्य देश असभ्यता को सुख-शांति, विकास और आर्थिक समृद्धि के लिये आवश्यक मानने लगे हैं”। दुनिया का आम आदमी हैरान है कि ये पढ़े-लिखे और इतने सभ्य लोग “इतने असभ्य” क्यों होते हैं?

पिछली बार तालिबान सरकार को मान्यता देने वाले तीन देशों में पाकिस्तान के अतिरिक्त सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी सम्मिलित थे । इस सूची में चीन, कतर, ईरान, तुर्की, रूस और ज़र्मनी जैसे और भी कई नाम जुड़ते जा रहे हैं, सूची लम्बी होती जा रही है । यदि आने वाले दो-चार दिनों में इस सूची में अमेरिका, ब्रिटेन और जापान के नाम भी सम्मिलित हो जायँ तो किसी को आश्चर्य नहीं होना होना चाहिये । सभ्य लोगों के लिये बर्बरता अब वर्ज्य नहीं रही, शायद “सभ्यता” अब अव्यावहारिक जीवन मूल्य के रूप में स्वीकृत होकर हमारे जीवन से निष्कासित होने जा रही है ।   

उभरती हुयी अर्थव्यवस्था वाले ब्रिक्स देशों - ब्राज़ील, रसिया, भारत, चीन, और दक्षिण अफ़्रीका की विश्व व्यापार में संयुक्त भागीदारी पंद्रह प्रतिशत है । “उभरती हुयी अर्थव्यवस्था” वाले देशों में चीन और रूस के नाम देखकर लगता है जैसे कि कलेवा कर रहे हल जोतने वाले किसान के सामने पिज्जा और बर्गर फ़ैक्ट्री का मालिक आ कर खड़ा हो गया हो । पता नहीं, शहर के दो गुण्डों को कविसम्मेलन में आमंत्रित करने की विवशता क्या रही होगी!

..तो ये उभरते हुये व्यापारी हैं जो दुनिया भर में अपनी व्यापारिक गतिविधियाँ बढ़ाने के लिये समय-समय पर एक मंच पर आकर बैठकें करते हैं और अपने लाभ की कुछ योजनायें बनाते हैं । अफ़गानिस्तान की धरती में ताँबा, सोना, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, यूरेनियम, बॉक्साइट, कोयला, लोहा, लीथियम, क्रोमियम, लेड, ज़िंक, जेम-स्टोन, टैल्क, सल्फर, ट्रैवर्टीन, जिप्सम और मार्बल जैसी मूल्यवान सम्पदाओं का ख़ज़ाना है । पाकिस्तान की निगाहें अफगानिस्तान के यूरेनियम पर हैं तो रूस और चीन की निगाहें अफगानिस्तान के लीथियम और अन्य खनिजों पर जमी हुयी हैं । सारे ब्रिक्स देश लीथियम निकालने अफगानिस्तान नहीं जा सकते, ओवम को फ़र्टीलाइज़ करने की दौड़ में सम्मिलित हर स्पर्म एड़ी-चोटी का जोर लगाएगा लेकिन सफल होगा केवल एक ही । मुझे लगता है कि परस्पर प्रतिस्पर्धी लोगों की बैठकों का उद्देश्य दूसरे प्रतिस्पर्धी का पत्ता साफ करना होता है । प्रश्न यह है कि तालिबान की मौज़ूदगी में अफ़गानिस्तान से लीथियम का खजाना कौन लूटेगा?

राष्ट्रपति अशरफ़ गनी देश छोड़कर भाग गये । अफ़गानी कबीलों की दादुरवृत्ति का अर्थ है कौवों को आमंत्रित करना । कौवे आ गये हैं, भेड़िए भी आ गये हैं, लीथियम की लूट मचने वाली है, तालिबान को पटाये बिना यह सम्भव नहीं है । भाड़ में गयी सभ्यता, भाड़ में गयी इंसानियत, भाड़ में गयी अफ़गानी औरतों की इज़्ज़त, भाड़ में गये मानवीय मूल्य । लीथियम और यूरेनियम है तो दम है, दम है तो व्यापार और दबंगई पर बादशाहत है । चलो लीथियम और यूरेनियम लूट लें, चलो मनुष्यता और मानवीय मूल्यों को फाँसी पर लटका दें ।   

  

सोमवार, 6 सितंबर 2021

अफ़गानिस्तान में आधी दुनिया की हार

 

तालिबान मेरी माँ को उठा ले गये और अब उनके साथ बुरा-बुरा काम भी करते हैं  

अस्लहा थामे हाथ तर्क नहीं सुन सकते, न्याय नहीं देख सकते, उन्हें संवेदना और करुणा जैसे साहित्यिक शब्दों की अनुभूति नहीं होती, वे सिर्फ़ गोलियाँ चला सकते हैं जिनसे चीखें निकलती हैं और ख़ून बहता है ।

बुद्धिमान व्यक्ति तर्क करते हैं, आगे-पीछे की स्थितियों पर मंथन करते हैं और एक दिन उन लोगों द्वारा अचानक गोलियों से भून दिये जाते हैं जिन्हें लोग बुद्धिमान नहीं मानते । धरती के एक भूखण्ड पर राज करने के लिये बचते हैं केवल कुछ अराजक तत्व । कलियुग की दुनिया इसी तरह चल रही है ।

समाज कभी पूरी तरह सभ्य नहीं होता, उसका एक हिस्सा हमेशा असभ्य बना रहता है, ठीक वैसे ही जैसे कोई सभ्य व्यक्ति भी अंदर से थोड़ा सा असभ्य बना रहता है । असंतुलन की स्थिति में सभ्यता ही असभ्यता को प्रश्रय देने लगती है । सभ्य और असभ्य दोनों ही लोग दुनिया की आँखों में धूल झोंकते हुये लुका-छिपी खेलते रहते हैं । फिर एक दिन सब नंगे होकर मार-काट मचा देते हैं । मैं इसे युद्ध नहीं, मृगया (शिकार) कहूँगा । इसमें पुरुष हारते नहीं, मारे जाते हैं, हारती है तो केवल आधी दुनिया और उनके मासूम बच्चे ।

हमने बर्बर युग के उस कालखण्ड को भी भोगा है जब शक्ति के स्वच्छंद प्रयोग और रक्तपात को ही तत्कालीन समाज के लिये बाध्यकारी न्याय माना जाने लगा था । सत्य और न्याय की सार्वभौमिक और सार्वकालिक परिभाषाओं, मान्यताओं और मूल्यों को नकार दिया गया था । युद्ध के स्थापित नियमों को उखाड़ फेका गया था और कुछ घुड़सवार लुटेरे कहीं भी मारकाट और लूटमार करते हुये किसी भी भूखण्ड के अधिपति बन जाया करते थे । सभ्य समाज में इस तरह की आसुरी प्रवृत्ति को कभी स्वीकारा नहीं गया किंतु सारी निंदाओं को नकारते हुये समय-समय पर समय अपने आप को दोहराता रहा है । आज हम एक बार फिर इतिहास को साक्षात होता हुआ देख रहे हैं ।

 प्रथम विश्वयुद्ध के बाद दुनिया को लगा था कि अब शांति स्थापित हो जायेगी किंतु दुनिया को द्वितीय विश्वयुद्ध का भी सामना करना पड़ा । कोई भी सभ्यता कितनी भी विकसित क्यों न हो जाय वह अभी तक युद्ध और हिंसा को रोक सकने में असफल ही रही है । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भी हिंसा और युद्ध की श्रंखलायें लम्बी, और लम्बी होती ही रहीं ।

हमारे देखते-देखते सीरिया आदि के बाद अब अफ़गानिस्तान में भी युद्ध हो रहा है । स्वेच्छाचारी मानव समूहों के निरंकुश आचरण के आतंक से भयभीत लगभग एक लाख अफ़गानी अपनी मातृभूमि से पलायन करने के प्रयास में हैं । वहाँ की सांसद अनारकली कौर ने रोते हुये विश्वसमुदाय से विनती की है – “अफ़गानियों को इस तरह मरने के लिये मत छोड़ दीजिये” । अधेड़ और बूढ़े तालिबान द्वारा यौनशोषण के लिये उठा लिये जाने के भय से रोती हुयी अफ़गानी बच्चियाँ पूरी दुनिया से दया की भीख माँग रही हैं – “हमें बचा लो”।

भारत और पाकिस्तान के बहुत से लोग उन्हीं तालिबान को आज के सर्वाधिक सभ्य मनुष्य मानते हुये उनका स्वागत कर रहे हैं । ये लोग भारत और पाकिस्तान में तालिबान के निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा क़ायम किए जाने की प्रतीक्षा में उत्साहित हैं । सभ्य कभी पूरी तरह सभ्य नहीं हो पाता, विशेषकर तब जब कि उनके पास एक अद्भुत किताब का हवाला भी हो ।     

अमेरिका, रूस, चीन और टर्की जैसे देशों को अफ़गानिस्तान की निर्बल जनता की अथाह पीड़ा से कोई सरोकार नहीं । यह गृद्धों का झुण्ड है जो अवसर की तलाश में है, अवसर मिलते ही यह झुण्ड अर्धजीवित मनुष्यों के समूह पर टूट पड़ने के लिये तैयार है ।

अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान में भी कुछ इंसान रहते हैं ठीक उसी तरह जिस तरह भारत में भी कुछ शैतान रहते हैं । मेरी चिंता इंसानों के लिए है, दुनिया भर के इंसानों के लिए । मेरी परिभाषा के इंसानों का कोई पारम्परिक धर्म नहीं होता किंतु वे सच्चे धार्मिक हुआ करते हैं ।  

भारत और पाकिस्तान के कुछ लोग ऐसी तस्वीरों के सत्य को स्वीकार करने से मना कर देते हैं 




रविवार, 22 अगस्त 2021

धारदार तारों के पार जीवन की आशा

काबुल हवाई अड्डे की ऊँची दीवाल पर शरीर को चीर देने वाले धारदार तारों की बाड़ है जिसके एक ओर अफ़गान नागरिकों की भीड़ है और दूसरी ओर अमरीकी सैनिक जो मदद के लिये उठे हाथों को थामने की कोशिश कर रहे हैं । अमेरिकी राष्ट्रपति जो वाइडन ने उस वक़्त तवे पर रोटी डालने से मना कर दिया जब कि तवा ग़र्म हो चुका था । यह किसी सत्ताधीश की दगाबाज़ी और क्रूरता हो सकती है लेकिन कोई सैनिक आम आदमी की उस भीड़ का हिस्सा होता है जो अपने जीवन में न जाने कितनी बार दर्द के थपेड़ों से जूझता रहा होता है ।  

आज टीवी चैनल्स पर उस दृश्य को देखर कलेजे में हूक उठने लगी है जिसमें काबुल हवाई अड्डे के बाहर खड़ी भीड़ के उठे हुये हाथ एक टोडलर बच्ची को हवा में ऊपर ही ऊपर उठाकर एक-दूसरे को सौंपते हुये आगे की ओर बढ़ाते जा रहे हैं, जहाँ अंतिम आदमी बच्ची को हवा में उछाल कर दीवाल पर खड़े किसी अनजान विदेशी सैनिक को सौंप देगा । यह भीड़ है जहाँ कोई किसी को नहीं जानता फिर भी भीड़ के हाथ सब कुछ जानते हैं कि आज उन्हें क्या करना है । हवाई अड्डे के बाहर खड़ी भीड़ पर बीच-बीच में तालिबानियों की गोलियाँ बरसने लगती हैं । बच्ची की दहशतज़दा माँ को उम्मीद है कि विदेशी सैनिक अंदर से एक इंसान होगा और उसकी बच्ची को अपने देश ले जाकर अपने परिवार का सदस्य बना लेगा । बहुत गहरे अँधेरे में यह रोशनी की एक बहुत तेज किरण है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक पॉज़िटिव थॉट से उत्पन्न हुयी है । मैं कुछ क्षणों के लिये ख़ुद को उस बच्ची की माँ की भूमिका में देखने का प्रयास करता हूँ तो अंदर से बुरी तरह टूट जाता हूँ, नहीं ... इतनी शक्ति तो ईश्वर ने सिर्फ़ माँ को ही दी है किसी पुरुष को नहीं । शायद यही वज़ह है कि भारत और पाकिस्तान के बहुत से पुरुष उस माँ की अनंत पीड़ा का अनुभव ही नहीं करना चाहते और तालिबान को अल्लाह का कानून लाने वाले निज़ाम के रूप में ही देखने की ज़िद किए बैठे हैं ।

अमरीकी सेना का जहाज हवाई पट्टी पर कुछ दूर दौड़ने के बाद अब हवा में ऊपर उठ गया है जिसे देखते ही बच्ची की माँ पहले तो जमीन पर बैठी और फिर बेहोश होकर लुढ़क गयी । बेहद ख़ुशी और बेहद दर्द को एक साथ भोगती माँ होश में कैसे रह सकती है भला!

आक्रमणकारी तालिबान के आने के बाद अफ़गानिस्तान की हर माँ चाहती है कि उनकी बच्चियाँ तालिबानियों के ज़ुल्मो-ओ-सितम से किसी तरह सुरक्षित बच जायँ भले ही उन्हें अनजान हाथों में क्यों न सौंपना पड़े । कोई नहीं जानता कि वे माएँ अपनी बच्चियों से जीवन में दोबारा कभी मिल भी सकेंग़ी या नहीं । अफ़गान माँओं के कलेजे के टुकड़ों की यह कहानी, पता नहीं इतिहास में दर्ज़ होगी भी या नहीं ।

..और यह सब हिंदुस्तान के किसी शायर को बिल्कुल भी दिखायी नहीं देता । मुझे हैरत है कि इतने क्रूरहृदय, संवेदनहीन, ज़िद्दी, पूर्वाग्रही और मानवताविरोधी लोग भी शायर कैसे हो सकते हैं! निश्चित ही यह शायरी एक खोखला आवरण है जिसे पहनकर रावण ने सीता का अपहरण किया था । हमें ऐसे आवरणों को पहचानना होगा । और आज मैं उन सभी शायरों को अपने हृदय से हमेशा के लिये ख़ारिज़ करने की घोषणा करने के लिये बाध्य हुआ हूँ जिन्हें तालिबान इंसान ही नहीं बल्कि देवता नज़र आने लगे हैं ।



गुरुवार, 19 अगस्त 2021

अफ़गानियों की ग़ुलामी की जंजीर

 जब इमरान ख़ान जैसा महान आदमी यह कहता है कि तलिबान ने अफगानिस्तान की जनता को अफगानिस्तान की गुलामी की जंजीरों से आज़ाद करके महान कार्य किया है तो इमरान को संयुक्त राष्ट्र संघ का आजीवन मालिक बना देने का मन होता है । अफगानिस्तान में तालिबानियों ने जिस “शांतिप्रिय तरीके से” रॉकेट लॉन्चर और गन से तबाही मचाते हुये अफ़गानिस्तान को अफगानिस्तान से आज़ाद कर दिया वह बेशक काबिल-ए-तारीफ़ है । काबुल हवाई हड्डे के रन-वे पर भागते अमेरिकी हवाई जहाज पर लटके हुये लोग अफगानिस्तान की आज़ादी की ख़ुशी में ज़श्न मनाने अमेरिका भाग जाने की हड़बड़ाहट में हैं । काबुल के घरों में अधेड़ तालिबानियों ने शरीया का पालन करते हुये शांतिप्रिय तरीके से तलाशी में बरामद होने वाली बच्चियों को उनकी अम्मियों से छिना कर उठा लिया है, शांति के इस आलम में ख़ुशी के मारे किशोर बच्चियाँ और उनकी अम्मियाँ चीख-चीख कर रो रही हैं जिससे काबुल में ज़न्नत जैसा माहौल बन गया है ।  

इस बीच यूएई से अशरफ़ गनी का वक्तव्य आया है कि वे अपनी “जान बचाने के लिये भागे” ...अपने देश की रहनुमाई की ज़िम्मेदारियों को छोड़कर अपनी जान बचाने के लिये पूरे देश के लोगों की जान को भाड़ में झोंककर भागे । इसलिये भागे कि काबुल में तालिबानी ख़ून-ख़राबा न करें, अपनी प्रजा की जान बचाने के लिये भागे । युद्ध के मैदान से राजा और सेनापति पीठ दिखाकर भाग खड़े हों तो सेना का क्या हश्र होता है, यह जानने के लिये इतिहास के मात्र एक-दो पृष्ठ पलटना ही पर्याप्त है । किसी देश का राष्ट्रपति इतना कमजोर होता है कि उसकी उपस्थिति के कारण उसकी जनता का कत्ले-आम शुरू हो जाय! सरदार की उपस्थिति के अभाव में तालिबानी ख़ून-ख़राबा नहीं करेंगे, यह बहुत ही क़माल का तर्क है !

भारत के लोगों को इस बात पर बिल्कुल भी शर्मिंदा नहीं होना चाहिये कि किसी समय इमरान ख़ान जैसा महान आदमी हमारे देश की धरती पर क्रिकेट खेलने आया करता था । इमरान से चार कदम आगे चलते हुये भारत के इस्लामिक स्कॉलर्स, एक्टिविस्ट, चिंतक और नेता मानते हैं कि शांतिप्रिय तालिबानियों को बदनाम करने के लिये बुरकानशीन औरतों को कोड़े लगाते हुये, बच्चियों को ज़बरन उनकी अम्मियों से छीन कर घसीटते हुये अपने साथ ले जाने, और काबुल हवाई अड्डे पर निहत्थे लोगों पर एके सैंतालीस से गोलियाँ बरसाने जैसे दृश्यों वाले नकली वीडियो प्रसारित किये जा रहे हैं, ऐसे वीडियोज़ की कोई प्रामाणिकता नहीं है । सपा के शफ़ीकुर्रहमान और पीस पार्टी के टर्मोइल पसंद नेता शादाब चौहान का मानना है कि “तालिबानी फ़ाइटर्स ऑफ़ फ़्रीडम” हैं जिन्होंने “अफ़गानिस्तान को अफ़गानियों की गुलामी” से आज़ाद करवा दिया है और अब वहाँ एहकाम-ए-इलाही निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा का राज क़ायम होगा । कश्मीरी एक्टीविस्ट वकार भट्टी ने तालिबान को स्वीकार करते हुये बधाई दी है । आल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के असदुद्दीन ओवेसी जैसे न जाने कितने चर्चित (और दिल्ली, बंगाल एवं यूपी आदि के छिपे हुये बेशुमार) चेहरे मानते हैं कि भारत सरकार को तालिबानियों से बात करनी चाहिये । असदुद्दीन तो धमकी के अंदाज़ में कहते हैं कि “मोदी को तालिबान से बात करनी होगी”। इण्डिया के वकार भट्टी ने उत्साहित होकर भविष्यवाणी कर दी है कि अब पूरी दुनिया में गुलाम-ए-मुस्तफ़ा का राज आयेगा । ज़मात-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सदातुल्लाह हुसैनी ने भी तालिबानियों को अफगानिस्तान की हुकूमत पर काबिज़ होने को जायज़ ठहराया है । कुल मिलाकर भारत के बहुत से नामचीन मुसलमानों को टीवी पर आने वाली ख़ौफ़नाक तस्वीरों पर यकीन नहीं है और वे इन तस्वीरों और हालातों को सिरे से नकार दे रहे हैं ।  

तालिबानी शांतिप्रिय हैं – इतना बड़ा सच बोलने का दुस्साहस केवल भारत और पाकिस्तान के कुछ मुसलमान ही कर सकते हैं । आज जबकि पूरी दुनिया में अफगानिस्तान को लेकर लोगों में तालिबानियों के विरुद्ध गुस्सा है, भारत और पाकिस्तान के मुसलमानों के वक्तव्य इस बात की सूचना देते हैं कि वे भारत में गज़वा-ए-हिंद का समर्थन ही नहीं करते बल्कि समय आने पर तालिबानियों की तरह हथियार उठाकर शांतिप्रिय बन जाने के लिये भी तैयार हैं ।

टीवी चैनल्स पर वकार भट्टी जैसे लोगों के अमृतबुझे इरादों से दुनिया को रू-ब-रू करवाया जा रहा है लेकिन कश्मीर की याना मीर, पाकिस्तान की मोना आलम और आरजू काज़मी जैसे लोगों के वक्तव्यों की उतनी चर्चा नहीं होती जितनी होनी चाहिये, यही कारण है कि हिंदुओं के मन में भारतीय मुसलमान दहशत के पर्याय बनते जा रहे हैं । एक सवाल अक्सर उठता है कि जब मुस्लिम नेता और चिंतक टीवी पर ज़हर उगलते हैं तो आम मुसलमान ख़ामोश क्यों रहता है? सीएए और एनआरसी के विरोध में मुखर रहने वाली ज़ामिया मिलिया इस्लामिया की छात्रायें आज अफ़गानिस्तान की लड़कियों की दुर्दशा पर ख़ामोश क्यों हैं? भारत का मुसलमान अफगानिस्तान के मुसलमानों की त्रासदी पर ख़ामोश क्यों है? जो मुसलमान मुसलमानों के न हुये वे हिंदुओं के कैसे हो सकते हैं?

बस्तर की रानू शील नाग इस बात से बेहद अ-चिंतित हैं कि यदि भारत के तालिबान समर्थक इस्लामपरस्त कट्टर मुसलमान, जो कि तालिबानियों को मुबारकवाद देते नहीं थक रहे हैं, हिंदुओं के ख़िलाफ़ गज़वा-ए-हिंद के लिये हथियार लेकर उठ खड़े हुये तो क्या भारत भी अगला अफ़गानिस्तान बन जायेगा? उनकी अ-चिंता इसलिये भी है कि जब विश्व की महाशक्तियाँ तालिबानियों को हैवानियत करने से नहीं रोक सकीं और अफगानिस्तान को अकेला छोड़ दिया गया तो इस बात की क्या गारण्टी कि भारत एक साथ तालिबानियों, पाकिस्तानियों और अपने भीतर के कट्टरवादियों का सामना कर सकेगा जबकि हमारे सांसद भी राष्ट्रीय मुद्दों पर कभी एकमत नहीं हो पाते?   

यह अ-चिंता केवल रानू शील नाग की ही नहीं है बल्कि देश भर में, विशेषकर पश्चिम बंगाल, यूपी और दिल्ली में हिंदू-मुस्लिम दंगों के लम्बे इतिहास ने भारत के लोगों को अ-चिंतित कर दिया है । भारत में जहाँ-तहाँ होने वाले वैचारिक बलात्कारों और तालिबानियों के स्वागत वाले बयानों से हिंदू समाज अ-भयभीत है । दुनिया भर के अ-शांतिप्रिय आम नागरिक अफ़गानिस्तान की घटनाओं से अ-चिंतित और अ-दहशत में हैं । किसी को नहीं पता कि ऐसी स्थितियों से निपटने के लिये भारत सरकार के पास क्या उपाय हैं! उधर मोतीहारी वाले मिसिर जी भी इस बात से बेहद अ-नाराज हैं कि भारत के साहित्यकार और बुद्धिजीवी अफ़गान समस्या पर आश्चर्यजनकरूप से अ-ख़ामोश क्यों हैं । हिंदी के साहित्यकार को समसामयिक घटनाओं, और समाज में तेजी से फैलते बौद्धिक प्रदूषण से कोई सरोकार दिखाई नहीं देता । यह ख़ामोशी नहीं शुतुर्मुर्गियाना हरकत है और लेखकीय प्रतिबद्धता से वादा-ख़िलाफ़ी भी जो कालजयी लेखन के लिये अत्यंत प्रशंसनीय और अनुकरणीय है । रानू शील जैसे करोड़ों भारतीयों को वर्तमान हालातों और गज़वा-ए-हिंद जैसी शांतिप्रियता से मुक्ति का कोई समाधान चाहिये तो यह उनकी मर्ज़ी, हम तो फ़िलहाल तालिबानियों के ख़ैर-मक़्दम की बात करने और उनका इस्तक़बाल करने की तैयारियों में व्यस्त हैं । औरतों की आज़ादी की बात करने वाली अरुंधती, स्वरा, बरखा और शेहला जैसी औरतें कहीं दिखाई नहीं दे रहीं, वे दिखतीं तो अफगानी बच्चियों की ख़ुशी में चार चाँद लग जाते ।

चलते-चलते यह बताना आवश्यक है कि यदि मैं रविश कुमार होता तो लिखता – “मोदी ने अफ़गानिस्तान में तीन बिलियन डॉलर खर्च करके भारत के साथ विश्वासघात ही नहीं किया बल्कि मोदी की नीतियों के कारण अफगान सेना ने तालिबानियों के सामने सरेण्डर कर दिया”।  

बुधवार, 18 अगस्त 2021

स्त्री की आवाज़

सहरा करीमी अफ़गानिस्तान की फ़िल्म निर्देशक और नामचीन अभिनेत्री हैं जो काबुल में तालिबानियों के वहशी इरादों से ख़ौफज़दा हैं । तालिबानी लड़ाके अफगानी लड़कियों को शादी करने के लिये ज़बरन उठा रहे हैं । बारह साल की बच्चियों के साथ उनकी उम्र से पाँच गुना अधिक उम्र वाले जवान तालिबानियों के जोड़े की कल्पना हमें एक पाशविक युग में खींच कर ले जाती है । नीले या काले रंग के मोटे कपड़े के तम्बू जैसे बुरके में किसी चलते-फिरते या लुढ़कते हुये ढेर की तरह दिखने वाली स्त्रियों के जीवन की सही-सही कल्पना करने के लिये कम से कम एक हफ़्ते उसी स्थिति में रहकर अनुभव करना होगा । उधर शरीया कानून को अल्लाह का हुक्म मानने वाले तालिबानी ज़ुल्म-ओ-सितम की सारी हदें पार कर दिया करते हैं, इधर भारत के देवबंदियों को अफगानिस्तान में अमन-ओ-चैन का आलम दिखायी देने लगा है । ज़ाहिर है कि देवबंदियों के सपनों में भारत के लिये भी वैसे ही अमन-ओ-चैन के आलम की तस्वीरें बड़ी हिफ़ाजत से सुरक्षित हैं । जो सेकुलर यह कहते नहीं थकते कि दुनिया के सभी धर्म इंसानियत का पाठ पढ़ाते हैं उन्हें एक बार अफगानिस्तान, यमन, सीरिया और पाकिस्तान जैसे देशों में कुछ दिन ज़रूर गुजारने ही चाहिये ।   

अफ़गानी नेताओं की नामर्दगी, गद्दारी और चीन-पाकिस्तान एवं अमेरिका के काकटेली षड्यंत्रों के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुये नर्क को भोगने के लिये विवश अफ़गानी नागरिकों की सहायता के लिये जिन्हें सामने आना चाहिये वे नेपथ्य में पीछे चले गये हैं । उधर पाकिस्तान में उनकी आज़ादी के दिन तहर्रुश गेमिया हो गया । लगभग चार सौ लोगों की भीड़ ने एक स्त्री को तहर्रुश गेमिया का शिकार बना लिया । तहर्रुश गेमिया अरब का एक वहशी खेल है जिसमें “नामर्द-मर्दों” की भीड़ एक महिला को किसी सार्वजनिक स्थान में घेर कर उसे फ़ुटबाल की तरह इधर से उधर धक्के देती और हवा में उछालती हुयी खेलती है । उसके कपड़े धीरे-धीरे नोच कर फेक दिये जाते हैं फिर भीड़ उसके ज़िस्म को ज़िबह की तरह धीरे-धीरे नोचती है और वह सब कुछ करती है जिसे न तो कोई देख सकता है और न कोई उसका वर्णन कर सकता है । अल्लाहू अकबर के नारे लगाती भीड़ का वहशीपन धीरे-धीरे चरम की ओर बढ़ता है । यह भीड़ उस निरीह प्राणी की मालिक होती है जिसे लोग स्त्री कहते हैं । और कमाल की बात यह है कि दुनिया में बर्बरता को “सभ्यता” कहने वालों की कमी नहीं है ।

इधर भारत में देवबंदी मौलवियों, नेताओं और गज़वा-ए-हिंद के सपने देखने वाले कट्टरवादियों ने अफ़गानिस्तान में तालिबानियों के कुकर्मों को “अल्लाह की हुकूमत एवं शांति और अमन की व्यवस्था की शुरुआत” बताते हुये तालिबानियों की तारीफ़ में कसीदे पढ़ना शुरू कर दिये हैं । भारत की आधुनिक और उच्च शिक्षित हिंदू जनता गंगा-जमुनी तहज़ीब, ईश्वर अल्लाह तेरो नाम और धर्मनिरपेक्षता के पालने में झूलती हुयी मीठी-मीठी नींद ले रही है ।

सहरा करीमी ने फ़िल्म, कला और आधुनिकता की हवा में साँस लेने के जो सपने देखे थे वे उन्हें टूटते से दिखायी देने लगे हैं । वे चाहें तो दुनिया के किसी भी देश में उनके हुनर के लिये उनका स्वागत किया जा सकता है और वे चैन से अपनी ज़िंदगी गुजार सकती हैं किंतु वे अपनी मातृभूमि छोड़कर भाग रहे अफगानियों और राष्ट्रपति अब्दुल गनी की तरह नामर्द नहीं हैं, बल्कि दहशत में होने और सिर पर मँडराते आसन्न संकटों के बावज़ूद वे अफ़गानिस्तान छोड़ने के लिये तैयार नहीं हैं । दुनिया को ऐसी मर्दानी नारीशक्ति पर गर्व होना चाहिये ।

अफ़गानिस्तान में तालिबानियों को अल्लाह का कानून लागू करने की बेताबी है और इसके लिये वे इंसानियत के कानून का क़त्ल करने पर आमादा हैं । अफ़गानी मर्दों ने जहाँ अपने बच्चों और स्त्रियों को ज़हन्नुम में मरने के लिये छोड़ने का निर्णय लेकर इंसानियत को शर्मसार किया, वहीं सहरा करीमी और गवर्नर सलमा जैसी नारी शक्तियों ने अफगानिस्तान की मिट्टी को गौरवान्वित किया है । जो ख़ुद को इंसान मानते हैं उन्हें अफगानिस्तान की नारी शक्ति पर शरीया के नाम पर ढाये जा रहे ज़ुल्म-ओ-सितम के ख़िलाफ़ अफगानिस्तान की आवाज़ बन कर खड़े होना ही होगा वरना मातृशक्ति की चीखें धरती से इंसानी युग को हमेशा के लिये ख़त्म कर देंगी ।

इन पंक्तियों को लिखे जाने तक अफगानी मर्दों ने भी भूल सुधार करते हुये अपनी मर्दानगी को पहचानना शुरू कर दिया है । भारत को अफ़गानी नागरिकों को शरण देते वक़्त छिपकर आये हुये तालिबानियों से सावधान रहना होगा । ध्यान रहे हमारे आसपास अब कोई डाकू खडग सिंह नहीं है जो घोड़ा वापस कर देगा बल्कि केवल और केवल रावण हैं जो सीता को मरते दम तक वापस नहीं करेंगे ।