बुधवार, 14 जनवरी 2015

इस्लाम का नया ख़लीफ़ा ...



बोको हरम के आतंकवादी अबू बकर शेख़ू ने ख़ुद को इस्लाम का ख़लीफ़ा घोषित करते हुये पड़ोसी देश कैमरून को अपना संविधान बदल कर इस्लामिक संविधान लागू करने का हुक्म सुनाया है जिसकी उदूली करने पर गम्भीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गयी है । नाइज़ीरिया में बोको हरम के धार्मिक ज़ेहादी कत्ल-ए-आम करने पर आमादा हैं और छोटी-छोटी बच्चियों को फ़िदायीन बना रहे हैं यानी पश्चिमी अफ़्रीका धार्मिक ज़ेहाद की आग में जल रहा है जिसकी लपटें पूरी दुनिया को धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध एकजुट होने के लिये ललकार रही हैं ।
अफ़्रीका के आतंकियों की धार्मिक आग ने एक नयी शंका को जन्म दे दिया है कि इस्लाम और आतंक का चोली-दामन का सम्बन्ध जोड़े जाने का आरोप कहीं सही तो नहीं । आख़िर अबू बकर जैसे लोगों ने ही आज से लगभग एक हजार चार सौ छत्तीस साल पहले अरब से एशिया में घुसकर ईरान के ज़ोरोअस्ट्रियंस को तलवार की बदौलत इस्लाम के चोंगे में क़ैद कर दिया था ।  शांतस्वभाव वाले ज़ोरोअस्ट्रियंस को अपनी मातृभूमि ईरान से भागकर भारत जैसे देशों में शरण लेने के लिये बाध्य होना पड़ा था । आज स्वतंत्र भारत और पाकिस्तान में भी स्वयं को इस्लाम का ख़लीफ़ा समझने वाले कुछ लोग सारी दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़-ओ-ज़िन्दगी के तौर-तरीके को अपने तरीके से चलाने के लिये ज़िद पर आमादा हैं । यह ज़िद इतनी संक्रामक होती जा रही है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के किसी स्कूल की शिक्षिकायें पाँच-छह साल के नादान बच्चों को बड़े गौरव से आतंकवाद का पाठ पढ़ाते हुये इसका वीडिओ दुनिया के सामने ज़ाहिर कर रही हैं । पूरी दुनिया के लोगों में फूलों, स्त्रियों और बच्चों के प्रति जो डिवाइन भाव रहा है उसे न जाने किस शैतान की नज़र लग गयी है जिसे उतारने के लिये ईश्वरीय शक्ति भी कमतर पड़ गयी सी लगती है । यहाँ हम जानबूझकर और पूरे होश-ओ-हवास के साथ “अल्लाह की ताकत” के स्थान पर “ईश्वरीय शक्ति” पद का प्रयोग कर रहे हैं क्योंकि हम नहीं चाहते कि ज़रा-ज़रा सी बात पर किसी का इस्लाम ख़तरे में पड़ जाय ।  
इस बीच एक नयी ख़बर यह भी आयी है कि फ़्रांस की स्त्रियों ने पुरुषों की बराबरी करते हुये इस्लामिक ज़ेहाद के लिये अपने मुल्क से बेरुख़ी करते हुये पलायन करना शुरू कर दिया है । अभी तक यही समझा जा रहा था कि फ़्रांस में हयात जैसी सिरफिरी सिर्फ़ एक ही स्त्री होगी किंतु यह अनुमान अब पूरी तरह ग़लत साबित हो चुका है । इसका अर्थ यह भी है कि योरोप में व्यवस्था के विरुद्ध उठने वाली आवाज़ नकारात्मक सोच के हवाले होना शुरू हो चुकी है । यह योरोप के साथ-साथ पूरे विश्व के लिये भी एक गम्भीर चेतावनी है ।   

इधर भारत के उत्तरप्रदेश में एक संतसांसद ने हिंदू स्त्रियों को चार-चार बच्चे पैदा करने वाले अपने संताबंता स्टाइल आह्वान पर खेद प्रकट करते हुये भविष्य में ऐसी पुनरावृत्ति न करने का वचन दिया है । संत को यह आत्मबोध पार्टी के अध्यक्ष द्वारा निर्देश दिये जाने के बाद प्राप्त हुआ जिससे हम यह विचार करने के लिये बाध्य हुये हैं कि संत से भले तो वे हैं जो संत नहीं हैं । भारतीय समाज में संतो का स्थान बहुत उच्च रहा है, दुर्भाग्य से उस स्थान को विगत कुछ दशकों से राजनीति के खटमल ने बहुत क्षति पहुँचाई है । हमारा एक स्पष्ट मत है कि राजनीति में आने से पूर्व संतों को थोड़ा नीचे खिसककर दुनियादारी वाला मात्र एक सामान्य मनुष्य बन जाना चाहिये । संतई करते हुये राजनीति करना दोधारी तलवार पर चलना है । संत और सत्ता की जुगलबन्दी का कल्चर कल्टीवेट किये जाने के लिये अभी उपयुक्त और उर्वर भूमि भारत के समाज में नहीं है । आख़िर हर व्यक्ति जयप्रकाश नारायण नहीं बन सकता न !   

पतित होते विद्यालय


सोलहवीं शताब्दी तक भारत में शिक्षा की स्थिति और सोच बहुत अच्छी हुआ करती थी । शिक्षा अधिक व्यावहारिक और गुणवत्तायुक्त तो थी ही सस्ती भी थी जिसके कारण भारतीय गुरुकुलों और विश्वविद्यालयों ने पूरे विश्व के ज्ञानपिपासुओं को अपनी ओर आकर्षित करने में स्वर्णिम सफलता प्राप्त की थी । विश्वविद्यालय परम्परा के जनक रहे भारत में स्वाधीनता के पश्चात् हुयी शैक्षणिक दुर्गति ने भारत को बहुत पीछे धकेल दिया है । आज विश्व के शीर्ष दो सौ विश्वविद्यालयों की सूची में भारत का नाम न होना हमारे पतन का सबसे बड़ा प्रमाण है जो चीख-चीख कर आत्मविश्लेषण और शिक्षा में आमूल परिवर्तन की माँग करता है । 

अब से लगभग चार दशक पूर्व विद्यार्थियों के साथ परीक्षा में भेदभाव और भ्रष्टाचार की यदाकदा घटनायें हुआ करती थीं जो अब भारतीय गुरु-शिष्य संबन्धों में रच-बस गयी सी प्रतीत होती हैं । तब यौनशोषण की एक्का-दुक्का घटनायें ही हुआ करती थीं जो अब आम हो चली हैं ।

भारतीय विद्यालयों में किशोरवय छात्र-छात्राओं द्वारा आत्मदाह के प्रयास और पश्चिमी देशों में प्राथमिकशाला के बच्चों द्वारा शाला में गोलियाँ चलाने की घटनाओं ने सभ्यता और संस्कृति की वर्तमान स्थितियों को बारम्बार रेखांकित किया है । शिक्षकों द्वारा मद्यसेवन कर विद्यालयों में आने की घटनाओं के लिये बस्तर संभाग कुख्यात होता जा रहा है । जिस समाज में शराब और लड़कियाँ शिक्षकों की कमज़ोरी बन जायें उस समाज का उत्थान कर सकने का दम किसमें है ? कई विद्यालयों की स्थिति इतनी शोचनीय है कि उनके शिक्षक भाषा और गणित जैसे विषयों में कक्षा पाँच की ही परीक्षा पास करने की योग्यता नहीं रखते । हायरसेकेण्ड्री स्तर के भी कई विद्यालयों में हिंदी के शिक्षकों का हिंदीव्याकरण दयनीय है ।  

चालू दशक में कांकेर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित कुछ विद्यालयों के यौनशोषक शिक्षकों के विरुद्ध जन-आन्दोलन किये गये जिनका सर्वाधिक दयनीय पक्ष यह था कि यौनशोषण करने वाले शिक्षकों के विरुद्ध दण्डात्मक कार्यवाही के रूप में मात्र उनके स्थानांतरण करने की माँग की जाती रही ।  स्थानीय ग्रामीणों की इस माँग का सामाजिक-मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाय तो हमारे सामने एक भयानक चित्र उपस्थित होता है ।

वर्ष 2014 के उत्तरार्ध में कांकेर के भंडारीपारा स्थित प्राथमिक शाला की एक शिक्षिका द्वारा बच्चों को गन्दी-गन्दी गालियाँ दी गयीं जिसकी शिकायत कलेक्टर से की गयी । बस्तर के कई छात्रावासों और शालाओं में बच्चियों का यौनशोषण शाला परिवार के ही ज़िम्मेदार लोगों द्वारा किये जाने की घटनाओं ने गुरु-शिष्य सम्बन्धों को कलंकित किया है । कर्नाटक में भी इस प्रकार की घटनायें थमने का नाम नहीं ले रहीं हैं । यही स्थिति लगभग पूरे देश की है जो निश्चित ही एक गम्भीर चिंता का विषय है ।

मेरे देखते-देखते गुरु-शिष्य परम्परा में नैतिक पतन ने अपना वर्चस्व स्थापित करने में निर्लज्ज सफलता प्राप्त की है । शिक्षकों की एक बड़ी संख्या अपना सम्मान खो चुकी है और वे समाजिक हिकारत के पात्र होते जा रहे हैं । मेरा व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि कई निजीस्कूल पालकों के साथ भी दुर्व्यवहार करते हैं जिसके परिणामस्वरूप शिक्षक और पालक के बीच संवादहीनता की सी स्थिति बनती जा रही है ।  कई बार शिक्षकों का सामान्य आचरण भी पालकों को अपमानित और तनावग्रस्त कर देता है ।

शाला प्रबन्धन के लिये यह विचार करने का विषय ही नहीं है कि होमवर्क का दबाव और शिक्षकों की प्रताड़ना बच्चों को कितना तनावग्रस्त कर देती है । पढ़ायी में कमज़ोर बच्चों के लिये शालाओं द्वारा कोई ठोस प्रयास नहीं किये जाते जिसके कारण शिक्षा और भी व्यापारिक होती जा रही है । शराब, यौनशोषण, छात्र-छात्राओं को दी जाने वाली शारीरिक प्रताड़ना और शिक्षकों की योग्यता हमारे समाज की ऐसी समस्यायें हैं जिनके कारण पूरा समाज मुँह दिखाने लायक नहीं रहा ।  कुछ घटनाओं में तो छात्राओं के यौनशोषण में शाला की शिक्षिकायें भी न केवल लिप्त रही हैं अपितु उनके द्वारा इस कार्य में अपने पति या मित्रों को भी सहयोग किया गया है । ऐसी निष्ठुर संवेदनहीनता के लिये क्या शासन-प्रसासन और समाज तीनो ही उत्तरदायी नहीं हैं ?  


फ़िलहाल,  समर्थ वर्ग द्वारा किये जा रहे उपायों में विदेशपलायन प्रमुख है जो भारतीय समाज के स्वास्थ्य के लिये एक और दुर्भाग्यजनक संकेत है ।  

मंगलवार, 13 जनवरी 2015

शत्रुवत मित्र



26 जनवरी 2015 के दिन
लाल किले के समारोह में आमंत्रित है
एक विशिष्ट अतिथि
जिसका आचरण
निन्दनीय ही नहीं
भर्त्सना के योग्य भी है ।
पूरा विश्व देखता रहा है
उसके आर्थिक वरदानों को 
बरसते हुये
एक आतंकी की झोली में
जो संकल्पित है
अपनी सम्पूर्ण शत्रुता और दुष्टता के साथ
छिन्न-भिन्न कर देने के लिये
भारत के गणतंत्र को ।
भारत के गणतंत्र पर्व पर
आमंत्रित अतिथि
स्वयं को

मुसलमान कहता है ।  

सोमवार, 12 जनवरी 2015

जनकल्याणकारी योजनायें


राज्यों को होने वाली आय के लिये क्या हमारे पास अच्छी और जनकल्याणकारी योजनाओं का अभाव है ?

जब हम सुशासन और जनकल्याणकारी योजनाओं की बात करते हैं तो मन में यह विचार आना स्वाभाविक है कि मांसाहार के लिये गो-हत्या, मद्य और तम्बाकू के विभिन्न उत्पादों का निर्माण क्या किसी सुसंस्कृत और सभ्य समाज के विकास, समृद्धि, सुखीजीवन और कल्याण के लिये उपयुक्त योजनायें हैं ?

मेरे जैसे लोग यह समझ पाने में असमर्थ रहते हैं कि इस प्रकार की प्रकृतिविरुद्ध, स्वास्थ्यघातक, परिवारखण्डक और अपराधमूलक योजनाओं के साथ किस प्रकार के सुशासन और जनकल्याण की आशा की जा सकती है ?

इन योजनाओं को प्रतिबन्धित न करके क्या हम एक स्वेच्छाचारी, कुटैवयुक्त, अनियंत्रित और पाशविक अभ्यास वाले समाज की रचना में अपनी भूमिका को निभाकर समाज- विशेषकर स्त्रियों, बच्चों और किशोरों के साथ न्याय का छल नहीं कर रहे हैं ?

मुझे लगता है कि छलावों के इस जंगल में हमें नैतिक मूल्यों की बात करने का अनैतिक अधिकार भी नहीं है । 

अर्थ


हर साल आता है नया साल
किंतु नहीं होता है कुछ भी नया
सिवाय
कुछ और नये
पापों ......
और घोटालों के ।
समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बनते रहते हैं
दुःखद समाचार
कि .....
फिर हुये कुछ यौनदुष्कर्म
फिर चटक कर टूट गयीं कुछ लड़कियाँ
फिर हुयीं कुछ आतंकी घटनायें
फिर आरोप मुक्त हो गये कुछ निर्लज्ज अपराधी
फिर वारिश में भीग कर सड़ गया
करोड़ों रुपये का धान .....
राजा
कभी नहीं सोच पाता ....
कि प्रबन्धन की उपेक्षा और अकर्मण्यता से
जब-जब सड़ता है अनाज का एक भी दाना
तब-तब होता है बलात्कार
किसान की आत्मा से ।
जब-जब चीख-चीख कर पथराती हैं लड़कियाँ
तब-तब विदीर्ण होती है मानवता
वही मानवता
जिसके कोई अर्थ नहीं होते

भेड़ियों के गाँवों में । 

शनिवार, 10 जनवरी 2015

अवतार


वह निराकार है ....
अनादि और अखण्ड है ।
उसके अस्तित्व का आभास भर हो पाता है हमें ...
कभी कम ...कभी अधिक ।
यह आभास
जिसे हो पाता है अधिक
वही हमारे लिये अवतार हो जाता है ईश्वर का ।
उसकी लीलायें
पथ प्रशस्त करती हैं
हमारे जीवन का ।
उसके कर्म
हो जाते हैं स्तुत्य और अनुकरणीय
बन जाते हैं बिम्ब
और हो जाते हैं धर्म ।
अवतार
कई हो सकते हैं
किंतु ईश्वर !
वह तो एक ही है पूरे ब्रह्माण्ड का ।

जब-जब
त्रस्त होती है मानवता 
दुःख
हो जाते हैं पर्वत से भी ऊँचे
तब-तब अवतरित होता है कोई
मानवता की रक्षा और पुनर्स्थापना के लिये ।
कभी मथुरा में .....
कभी अयोध्या में ......
कभी लुम्बिनी में ..........
कभी येरुशलम में .......
कभी ...........
कहीं भी अवतरित हो सकता है वह
धरती के किसी भी कोने में,
देने के लिये ... हमें सम्बल
करने के लिये ... हमारे हिस्से के संघर्ष
और सहने के लिये ... हमारे हिस्से की पीड़ाओं को ।
वह पहचानता है परपीड़ाओं को
हो जाता है द्रवित
और कूद पड़ता है मुक्ति के संघर्ष में ।
तब
बह निकलती है एक धारा
उसके पवित्र संदेशों की ......
किंतु कितने लोग
समझ पाते हैं
उन संदेशों को ?
पहचान पाते हैं
अपने उद्धारकर्ता को ?
कभी मारा जाता है वह
बेहेलिये के तीर से
कभी भटकता है वनों-पर्वतों में
कभी लटकाया जाता है क्रूस पर
तब
इस नश्वर काया से निकल कर
समा जाता है वह
सबकी आत्माओं में
और हो जाता है व्याप्त । 
उसके पवित्र संदेश
आज भी प्रकाशित करते हैं
प्रकाशित करते रहेंगे
इस विश्व को
और

पीड़ित मानवता को । 

बुधवार, 31 दिसंबर 2014

धर्म और संस्कृति का आपसी रिश्ता



इंडोनेशिया के मुसलमान भारतीय संस्कृति के अनुकरण में कुछ बुरायी नहीं देखते । उनके आदर्श चरित्रों में राम और हनुमान भी हैं । संस्कृति मनुष्य जीवन की परिष्कृत चर्या है ...इसे पाने के लिये प्रयत्न करना पड़ता है ...तप करना पड़ता है ...निरंतर अभ्यास करना पड़ता है ...और आवश्यकता पड़ने पर अपने हितों का त्याग भी करना पड़ता है । संस्कृति एक जीवनशैली है जो निरंतर उत्कृष्ट और उदात्त मानवीय गुणों के अभ्यास की संस्तुति करती है । संस्कृति से हमें धर्म को समझने की वैचारिकभूमि उपलब्ध होती है जबकि धर्म हमें अपसंस्कृति से बचाता है । 

भारत में धर्म और संस्कृति के बीच एक धुंधली सी रेखा है जिसे देखने के लिये व्यापक दृष्टि की आवश्यकता है । भारतीयों का धर्म “धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं, शौचमिन्द्रिय निग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्म लक्षणम्” से अनुशासित होता है । धर्म के ये दस लक्षण आदर्श व्यक्तित्व के लक्षण हैं जिनका अनुशीलन मानवमात्र के लिये अभिप्रेत है । ऐसा धर्म व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व की समृद्धि, सुख और शांति के लिये आवश्यक है । यही कारण है कि जैन, बुद्ध और सिख मत के लोग भी सनातन धर्म की इस मुख्य धारा का गुणगान करते हैं । क्या इन सिद्धांतों का किसी से कोई विरोध हो सकता है ? मुझे नहीं लगता कि अन्य मतों के लोग इससे सहमत नहीं होंगे । फिर समस्या कहाँ है ?

चरक संहिता में उपदिष्ट वाक्य - “संस्कारो हि गुणंतराधानमुच्यते” स्पष्टरूप से गुणों के अंतराधान का मंत्र देता है । यह अंतराधान किस तरह होता है ? इसे सीखने के लिये कृषक के पास जाकर कृषि की प्रक्रिया देखनी होगी, कुम्भकार के पास जाकर मृत्तिका भांड बनाने की पूरी प्रक्रिया देखनी होगी, किसी शिल्पी के पास जाकर उसकी शिल्पसाधना को देखना होगा, किसी जुलाहे के पास जाकर वस्त्र बुनने की प्रक्रिया जाननी होगी ....। संस्कार व्यक्तिगत अर्जन और साधना का परिणाम है किंतु जब यही समूह में भी व्याप्त होकर प्रगट होता है तो उस समूह की संस्कृति बन जाता है । किसी कार्य या आचरण को निरंतर अच्छा और शुभ बनाने के लिये बारम्बार किये जाने वाले प्रयास संस्कार की प्रक्रिया का एक कार्मिक भाग है । शास्त्र उपदेश देते हैं – “संस्करणं सम्यक् करणं वा संस्कारः” । पुस्तकों के अगले संस्करण में सुधार या संशोधन की परम्परा से हम सभी परिचित हैं । भारतीय संस्कार निरंतर परिमार्जन करते हुये आगे बढ़ने की साधना है । यहाँ वैचारिक जड़ता का अभाव है । यहाँ किसी एक विचार या एक दिशा से प्रभावित होकर रूढ़ हो जाने का अभाव है । यहाँ मण्डन है ....और खण्डन भी । यहाँ एक सरोवर नहीं बल्कि महासागर की बात है, घटाकाश की नहीं अनंताकाश की बात है । 
        संस्कार तो त्रुटियों और चरित्र की शिथिलताओं की पुनरावृत्ति रोकने का अनुभूत योग है । ‘संस्कार’
अपने आचार और विचार में निरंतर परिमार्जन की प्रक्रिया है । ‘संस्कार’ अपने जीवन में उत्कृष्ट गुणों का अभ्यास है । ‘संस्कार’ मानव जीवन को पवित्र, उत्कृष्ट और लोकहितकारी बनाने वाला आध्यात्मिक उपचार है । ‘संस्कार’ चेतना और संवेदना की वह सात्विक प्रक्रिया है जो मनुष्य के आचरण को सामाजिक एवं व्यावहारिक जीवन में ग्राह्य और अनुकरणीय बनाती है । ‘संस्कार’ सभ्यता का प्रथम सोपान है और संस्कृति का मूल आधार भी ।   
भारत में धर्मांतरण रोकने के लिये एक निषेधात्मक कानून बनाने की चर्चा हो रही है । सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर यह एक क्रांतिकारी पहल है जिसका बुद्धिजीवियों द्वारा स्वागत किया जाना चाहिये । भारतीय राजनीति और भारतीय समाज को अपनी प्राथमिकतायें तय करनी होंगी । हम अपने प्राचीन गौरव को खो चुके हैं इसलिये अभी तो हमें संस्कारित होने की आवश्यकता है, सामाजिक होने और मनुष्य होने की आवश्यकता है । प्रकृति और मातृशक्ति को पुनः प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता है । जघन्य और पैशाचिक यौन दुष्कर्मों से समाज को पूर्ण मुक्ति दिलाने के लिये कटिबद्ध होने की आवश्यकता है । धर्म नहीं आचरण बदलने की आवश्यकता है ।