बुधवार, 31 अक्टूबर 2018

ब्राह्मण का सच – स्वामी धर्मबंधु


पराधीन भारत में विदेशी आक्रमणकारियों के लक्ष्य पर ब्राह्मण ही अधिक रहे हैं । स्वाधीन भारत में तो ब्राह्मण होना एक अभिषाप मान लिया गया है । भारतीय समाज में जो ब्राह्मण अपनी अध्यात्मिक चेतना और निस्पृह सामाजिक आराधना के कारण सर्व सनातन समाज में अनुकरणीय और पूज्य माना जाता था वही ब्राह्मण अब घोर तिरस्कार का पात्र हो गया है । लोकसेवा और लोककल्याणकारी अनुसंधानों में अपना जीवन समर्पित कर देने वाला कोपीनधारी अकिंचन ब्राह्मण उपेक्षित हुआ तो भारतीय समाज छिन्न-भिन्न होता चला गया । भारत की विभिन्न शक्तियों में समन्वय और संतुलन बनाकर चलने वाला लोकसेवक ब्राह्मण आज दुर्दशा और उपेक्षा का शिकार है । भारत की दुर्दशा के लिए इतिहासकारों से लेकर आम जनता तक हर कोई ब्राह्मणों को ही उत्तरदायी मानकर उसके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार करने लगा है । उसे ब्राह्मणेतर जातियों के शोषण, उन पर अत्याचार और सामाजिक वर्गभेद के लिए उत्तरदायी होने के अपराध से लांछित किया जाने लगा । यह सब आरोपित करते समय लोग शोषण के मूल सिद्धांत की उपेक्षा कर कुतर्कों से अपनी बात सिद्ध करने का प्रयास करते देखे जाते हैं । भिक्षावृत्ति वाला अकिंचन ब्राह्मण किसी का क्या शोषण करेगा ? शोषण वे करते हैं जो सत्ता में होते हैं या धन और बाहुबल से युक्त होते हैं । आम जनता का शोषण राजा कर सकता है, पूँजीपति कर सकता है, या फिर दबंग लोग कर सकते हैं । इतिहास साक्षी है कि भारत पर अधिकांश समय तक ब्राह्मणेतर जातियों ने ही शासन किया है, पूँजीपति या उद्योगपति वे कभी रहे नहीं, और भिक्षाटन करने वाला दबंग तो हो ही नहीं सकता । ब्राह्मणेतर राजाओं के आगे सदा सिर झुकाने वाला, उन्हें मंत्रणा देने वाला, कुटिया में रहने वाला, ब्राह्मणेतर लोगों को अवतार मानकर उनकी स्तुति करने वाला ब्राह्मण आततायी कैसे हो सकता है भला ! किंतु इन तर्कों पर विचार किए बिना ही उसे चिर अपराधी मान लिया गया । समाज के किसी वर्ग को अपराध किए बिना ही अपराधी घोषित कर देना बहुत बड़ा अत्याचार है । स्वामी धर्मबंधु जी ने इस विषय पर अपनी लेखनी चलायी है जो स्वागतेय है । स्वागतेय इसलिए भी क्योंकि यह वह समय है जब ब्राह्मण हीन भावना से ग्रस्त होकर कुंठित होता जा रहा है । ब्राह्मण को ही नहीं पूरे भारतीय समाज को ब्राह्मणों का सच जानना ही चाहिए । प्रस्तुत है, स्वामी धर्मबंधु जी का अविकल आलेख । - कौशलेंद्र    

क्या आधुनिक भारत में ब्राह्मणों की दुर्दशा तर्कसंगत है...?

 में जिन लोगों ने भारत को लूटा, तोड़ा, नष्ट किया, वे आज इस देश में ‘अतीत भुला दो’ के नाम पर सम्मानित हैं और एक अच्छा जीवन जी रहे हैं।
जिन्होंने भारत की मर्यादा को खंडित किया, उसके विश्विद्यालयों का विध्वंस किया, उसके विश्वज्ञान के भंडार पुस्तकालयों को जला कर राख किया, उन्हें आज के भारत में सब सुविधाओं से युक्त सुखी जीवन मिल रहा है । किंतु ब्राह्मण जिन्होंने सदैव अपना जीवन देश, धर्म और समाज की उन्नति के लिए अर्पित किया, वे आधुनिक भारत में "काल्पनिक" पुराने पापों के लिए दोषी मान लिए गए हैं ।
आधुनिक इतिहासकार हमें सिखाते हैं कि भारत के ब्राह्मण सदा से दलितों का शोषण करते आये हैं जो घृणित वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तक भी हैं । ब्राह्मण-विरोध का यह काम पिछले दो शतकों में कार्यान्वित किया गया।

वे कहते हैं कि ब्राह्मणों ने कभी किसी अन्य जाति के लोगों को पढ़ने-लिखने का अवसर नहीं दिया । बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों के बड़े-बड़े शोधकर्ता यह सिद्ध करने में लगे रहते हैं कि ब्राह्मण सदा से समाज का शोषण करते आये हैं और आज भी कर रहे हैं, कि उन्होंने हिन्दू ग्रन्थों की रचना केवल इसीलिए की कि वे समाज में अपना स्थान सबसे ऊपर घोषित कर सकें ।
किंतु यह सारे तर्क खोखले और बेमानी हैं, इनके पीछे एक भी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है । एक झूठ को सौ बार बोला जाए और उसका किसी के द्वारा सशक्त विरोध न किया जाय तो वह अंततः सत्य प्रतीत होने लगता, इसी भांति इस झूठ को भी आधुनिक भारत में सत्य का स्थान मिल चुका है ।
आइये आज हम बिना किसी पूर्व प्रभाव के और बिना किसी पक्षपात के न्याय बुद्धि से इसके बारे सोचें, सत्य घटनायों पर टिके हुए सत्य को देखें । क्योंकि अपने विचार हमें सत्य के आधार पर ही खड़े करने चाहिये, न कि किसी दूसरे के कहने मात्र से । खुले दिमाग से सोचने से आप पायेंगे कि ९५ % ब्राह्मण सरल हैं, सज्जन हैं, निर्दोष हैं । आश्चर्य है कि कैसे समय के साथ-साथ काल्पनिक कहानियाँ भी सत्य का रूप धारण कर लेती हैं ।
यह जानने के लिए बहुत अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं कि ब्राह्मण-विरोधी यह विचारधारा विधर्मी घुसपैठियों, साम्राज्यवादियों, ईसाई मिशनरियों और बेईमान नेताओं के द्वारा बनाई गयी और आरोपित की गयी, ताकि वे भारतीय समाज के टुकड़े-टुकड़े करके उसे आराम से लूट सकें ।
सच तो यह है कि इतिहास के किसी भी काल में ब्राह्मण न तो धनवान थे और न ही शक्तिशाली ।
        ब्राह्मण भारत के समुराई नहीं हैं । वन का प्रत्येक जन्तु मृग का शिकार करना चाहता है, उसे खा जाना चाहता है, और भारत का ब्राह्मण वही मृग है । आज के ब्राह्मण की वह स्थिति है जो कि नाजियों के राज्य में यहूदियों की थी । क्या यह स्थिति स्वीकार्य है ? ब्राह्मणों की इस दुर्दशा से किसी को भी सरोकार नहीं, जो राजनीतिक दल हिन्दू समर्थक माने गए हैं, उन्हें भी नहीं; सब ने ब्राह्मणों के साथ सिर्फ छलावा ही किया है ।
ब्राह्मण सदा से निर्धन वर्ग में रहे हैं ! क्या आप ऐसा एक भी उदाहरण दे सकते हैं जब ब्राह्मणों ने पूरे भारत पर शासन किया हो ?
        शुंग, कण्व, सातवाहन आदि द्वारा किया गया अल्पकालीन शासन सभी विजातियों और विधर्मियों को क्यों कचोटता है ? चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य की सहायता की थी एक अखण्ड भारत की स्थापना करने में ।
        भारत का सम्राट बनने के बाद, चन्द्रगुप्त, चाणक्य के चरणों में गिर गया और उसने उसे अपना राजगुरु बनकर महलों की सुविधाएँ भोगते हुए, अपने पास बने रहने को कहा । चाणक्य का उत्तर था – ‘मैं तो ब्राह्मण हूँ, मेरा कर्म है शिष्यों को शिक्षा देना और भिक्षा से जीवनयापन करना । क्या आप किसी भी इतिहास अथवा पुराण में धनवान ब्राह्मण का एक भी उदाहरण बता सकते हैं ?
श्री कृष्ण की कथा में भी निर्धन ब्राह्मण सुदामा ही प्रसिद्ध है ।
संयोगवश, श्रीकृष्ण जो कि भारत के सबसे प्रिय आराध्य देव हैं, यादव-वंश के थे, जो कि आजकल OBC के अंतर्गत आरक्षित जाति मानी गयी है ।
यदि ब्राह्मण वैसे ही घमंडी थे जैसा कि उन्हें बताया जाता है, तो यह कैसे सम्भव है कि उन्होंने अपने से नीची जातियों के व्यक्तियों को भगवान् की उपाधि दी और उनकी अर्चना पूजा की स्वीकृति भी ? (उस सन्दर्भ में यदि ब्राह्मण ईश्वर की कृति हैं जैसा कि कुछ मूर्ख कहते हैं) देवों के देव महादेव शिव को पुराणों के अनुसार किराट जाति का कहा गया है, जो कि आधुनिक व्यवस्था में ST की श्रेणी में पाए जाते हैं
दूसरों का शोषण करने के लिए शक्तिशाली स्थान की, अधिकार-सम्पन्न पदवी की आवश्यकता होती है । जबकि ब्राह्मणों का काम रहा है या तो मन्दिरों में पुजारी का और, या धार्मिक कार्य में पुरोहित का और, या एक वेतनहीन गुरु(अध्यापक) का । उनके धनार्जन का एकमात्र साधन रहा है भिक्षाटन । क्या ये सब बहुत ऊंची पदवियां हैं ? इन स्थानों पर रहते हुए वे कैसे दूसरे वर्गों का शोषण करने में समर्थ हो सकते हैं ?
        एक और शब्द जो हर कथा कहानी की पुस्तक में पाया जाता है वह है - ‘निर्धन ब्राह्मण' जो कि उनका एक गुण माना गया है । समाज में सबसे माननीय स्थान संन्यासी ब्राह्मणों का था, और उनके जीवनयापन का साधन भिक्षा ही थी (कुछ विक्षेप अवश्य हो सकते हैं, किंतु हम यहाँ साधारण ब्राह्मण की बात कर रहे हैं।)
ब्राह्मणों से यही अपेक्षा की जाती रही कि वे अपनी जरूरतें कम से कम रखें और अपना जीवन ज्ञान की आराधना में अर्पित करें । इस बारे में एक अमरीकी लेखक आलविन टाफलर ने भी कहा है कि ‘हिंदुत्व में निर्धनता को एक शील माना गया है।’
सत्य तो यह है कि शोषण वही कर सकता है जो समृद्ध हो और जिसके पास अधिकार हों । अब्राह्मण को पढने से किसी ने नहीं रोका । श्रीकृष्ण यदुवंशी थे, उनकी शिक्षा गुरु संदीपनी के आश्रम में हुई, श्रीराम क्षत्रिय थे उनकी शिक्षा पहले ऋषि वशिष्ठ के यहाँ और फिर ऋषि विश्वामित्र के पास हुई । बल्कि ब्राह्मण का तो काम ही था सबको शिक्षा प्रदान करना ।
हाँ ! यह अवश्य है कि दिन-रात अध्ययन व अभ्यास के कारण, वे सबसे अधिक ज्ञानी माने गए, और ज्ञानी होने के कारण प्रभावशाली और आदरणीय भी । इसके कारण कुछ अन्य वर्ग उनसे जलने लगे, किंतु इसमें भी उनका क्या दोष यदि विद्या केवल ब्राह्मणों की पूंजी रही होती तो वाल्मीकि जी रामायण कैसे लिखते और तिरुवलुवर तिरुकुरल कैसे लिखते ?
और अब्राह्मण संतो द्वारा रचित इतना सारा भक्ति-साहित्य कहाँ से आता ? जिन ऋषि व्यास ने महाभारत की रचना की वे भी एक मछुआरन माँ के पुत्र थे । इन सब उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि ब्राह्मणों ने कभी भी विद्या देने से मना नहीं किया ।
जिनकी शिक्षायें हिन्दू धर्म में सर्वोच्च मानी गयी हैं, उनके नाम और जाति यदि देखी जाए, तो वशिष्ठ, वाल्मीकि, कृष्ण, राम, बुद्ध, महावीर, कबीरदास, विवेकानंद आदि, इनमें कोई भी ब्राह्मण नहीं । तो फिर ब्राह्मणों के ज्ञान और विद्या पर एकाधिकार का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता ! यह केवल एक झूठी भ्रान्ति है जिसे गलत तत्वों ने अपने फ़ायदे के लिए फैलाया, और इतना फैलाया कि सब इसे सत्य मानने लगे ।
जिन दो पुस्तकों में वर्ण (जाति नहीं) व्यवस्था का वर्णन आता है उनमें पहली तो है मनुस्मृति जिसके रचियता थे मनु जो कि एक क्षत्रिय थे, और दूसरी है श्रीमदभगवदगीता जिसके रचियता थे व्यास जो कि ब्राह्मणेतर वर्ग की मछुआरन के पुत्र थे । यदि इन दोनों ने ब्राह्मण को उच्च स्थान दिया तो केवल उसके ज्ञान एवं शील के कारण, किसी स्वार्थ के कारण नहीं ।

ब्राह्मण तो अहिंसा के लिए प्रसिद्ध हैं...
पुरातन काल में जब भी कभी ब्राह्मणों पर कोई विपदा आई, उन्होंने शस्त्र नहीं उठाया, क्षत्रियों से सहायता माँगी । बेचारे असहाय ब्राह्मणों को अरब आक्रमणकारियों ने काट डाला, उन्हें गोवा में पुर्तगालियों ने cross पर चढ़ा कर मारा, उन्हें अंग्रेज missionary लोगों ने बदनाम किया, और आज अपने ही भाई-बंधु उनके शील और चरित्र पर कीचड़ उछाल रहे हैं । इस सब पर भी क्या कहीं कोई प्रतिक्रिया दिखाई दी, क्या वे लड़े, क्या उन्होंने आन्दोलन किया ?
औरंगजेब ने बनारस, गंगाघाट और हरिद्वार में १५०,००० ब्राह्मणों और उनके परिवारों की हत्या करवाई, उसने हिन्दू ब्राह्मणों और उनके बच्चों के शीश-मुंडो की इतनी ऊंची मीनार खड़ी की जो कि दस मील से दिखाई देती थी, उसने उनके जनेयुओं के ढेर लगा कर उनकी आग से अपने हाथ सेके । किसलिए, क्योंकि उन्होंने अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम को अपनाने से मना किया । यह सब उन्हीं लोगों के इतिहास में दर्ज़ है। क्या ब्राह्मणों ने शस्त्र उठाया? फिर भी औरंगजेब के वंशज हमें भाई मालूम होते हैं और ब्राह्मण देश के दुश्मन?

यह कैसा तर्क है, कैसा सत्य है?

कोंकण-गोवा में पुर्तगाल के वहशी आक्रमणकारियों ने निर्दयता से लाखों कोंकणी ब्राह्मणों की हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने ईसाई धर्म को मानने से इनकार किया । क्या आप एक भी ऐसा उदाहरण दे सकते हो कि किसी कोंकणी ब्राह्मण ने किसी पुर्तगाली की हत्या की ? फिर भी पुर्तगाल और अन्य यूरोप के देश हमें सभ्य और अनुकरणीय लगते हैं और ब्राह्मण तुच्छ ! यह कैसा सत्य है? यह कैसा न्याय है ? यह कैसी विवेचना है ?
जब पुर्तगाली भारत आये, तब St. Xavier ने पुर्तगाल के राजा को पत्र लिखा “यदि ये ब्राह्मण न होते तो सारे स्थानीय जंगलियों को हम आसानी से अपने धर्म में परिवर्तित कर सकते थे।
“यानि कि ब्राह्मण ही वे वर्ग थे जो कि धर्म परिवर्तन के मार्ग में बलि चढ़े । जिन्होंने अपना धर्म छोड़ने की अपेक्षा मर जाना बेहतर समझा । St. Xavier को ब्राह्मणों से असीम घृणा थी, क्योंकि वे उसके रास्ते का काँटा थे, हजारों की संख्या में गौड़ सारस्वत कोंकणी ब्राह्मण उसके अत्याचारों से तंग हो कर गोवा छोड़ गए, अपना सब कुछ गंवा कर ।
        क्या किसी एक ने भी मुड़ कर वार किया ? फिर भी St. Xavier के नाम पर आज भारत के हर नगर में स्कूल और कॉलेज है और भारतीय अपने बच्चों को वहां पढ़ाने में गर्व अनुभव करते हैं, इनके अतिरिक्त कई हज़ार सारस्वत ब्राह्मण कश्मीर और गांधार के प्रदेशों में विदेशी आक्रमणकारियों के हाथों मारे गए ।
        आज ये प्रदेश अफगानिस्तान और पाकिस्तान कहलाते हैं, और वहाँ अब एक भी सारस्वत ब्राह्मण नहीं बचा है । क्या कोई एक घटना बता सकते हैं कि इन प्रदेशों में किसी ब्राह्मण ने किसी विदेशी की हत्या की ? हत्या की छोड़ये, क्या कोई भी हिंसा का काम किया ?
और आधुनिक समय में भी इस्लामिक आतंकवादियों ने कश्मीर घाटी के मूल निवासी ब्राह्मणों को विवश करके काश्मीर से बाहर निकाल दिया । ५००,००० काश्मीरी पंडित अपना घर छोड़ कर बेघर हो गए, देश के अन्य भागों में शरणार्थी हो गये, और उनमे से ५०,००० तो आज भी जम्मू और दिल्ली के बहुत ही अल्प सुविधायों वाले अवसनीय तम्बुओं में रह रहे हैं।
        आतंकियों ने अनगनित ब्राह्मण पुरुषों को मार डाला और उनकी स्त्रियों का शील भंग किया । क्या एक भी पंडित ने शस्त्र उठाया, क्या एक भी आतंकवादी की हत्या की ? फिर भी आज ब्राह्मण शोषण और अत्याचार का पर्याय माना जाता है और मुसलमान आतंकवादी वह भटका हुआ इंसान जिसे क्षमा करना हम अपना धर्म समझते हैं । यह कैसा तर्क है ?
माननीय भीमराव अंबेडकर जो कि भारत के संविधान के रचियता (प्रारूप समिति के अध्यक्ष) थे, उन्होंने एक मुसलमान इतिहासकार का सन्दर्भ देकर लिखा है कि “धर्म के नशे में पहला काम जो पहले अरब घुसपैठिया मोहम्मद बिन कासिम ने किया, वो था ब्राह्मणों का खतना । किंतु उनके मना करने पर उसने सत्रह वर्ष से अधिक आयु के सभी ब्राह्मणों को मौत के घाट उतार दिया।” मुग़ल काल के प्रत्येक घुसपैठ, प्रत्येक आक्रमण और प्रत्येक धर्म-परिवर्तन में लाखों की संख्या में धर्म-प्रेमी ब्राह्मण मार दिए गए । क्या आप एक भी ऐसी घटना बता सकते हो जिसमें किसी ब्राह्मण ने किसी दूसरे सम्प्रदाय के लोगों की हत्या की हो ?
१९वीं सदी में मेलकोट में दिवाली के दिन टीपू सुलतान की सेना ने चढ़ाई कर दी और वहां के ८०० नागरिकों को मार डाला जो कि अधिकतर मंडयम आयंगर थे । वे सब संस्कृत के उच्च कोटि के विद्वान थे । (आज तक मेलकोट में दिवाली नहीं मनाई जाती।) इस हत्याकाण्ड के कारण यह नगर एक श्मशान बन गया ।
        ये अहिंसावादी ब्राह्मण पूर्ण रूप से शाकाहारी थे, और सात्विक भोजन खाते थे जिसके कारण उनकी वृतियां भी सात्विक थीं और वे किसी के प्रति हिंसा के विषय में सोच भी नहीं सकते थे । उन्होंने तो अपना बचाव तक नहीं किया । फिर भी आज इस देश में टीपू सुलतान की मान्यता है । उसकी वीरता के किस्से कहे-सुने जाते हैं । और उन ब्राह्मणों को कोई स्मरण नहीं करता जो धर्म के कारण मौत के मुंह में चुपचाप चले गए ।

अब जानते हैं आज के ब्राह्मणों की स्थिति । क्या आप जानते हैं कि बनारस के अधिकाँश रिक्शाचालक ब्राह्मण हैं ? क्या आप जानते हैं कि दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर आपको ब्राह्मण कुली का काम करते हुए मिलेंगे ?
दिल्ली के पटेलनगर क्षेत्र में 50 % रिक्शे वाले ब्राह्मण समुदाय के हैं । आंध्र प्रदेश में ७५ % रसोइये और घर की नौकरानियाँ ब्राह्मण हैं । इसी प्रकार देश के दूसरे भागों में भी ब्राह्मणों की ऐसी ही दुर्गति है, इसमें कोई शंका नहीं । गरीबी-रेखा से नीचे बसर करने वाले ब्राह्मणों का आंकड़ा ६०% है ।
हजारों की संख्या में ब्राह्मण युवक अमरीका आदि पाश्चात्य देशों में जाकर बसने लगे हैं क्योंकि उन्हें वहाँ software engineer या scientist का काम मिल जाता है । सहस्राब्दियों से जिस समुदाय के सदस्य अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण समाज के शिक्षक और शोधकर्ता रहे हैं, उनके लिए आज ये सब कर पाना कोई बड़ी बात नहीं । फिर भारत सरकार को उनके सामर्थ्य की आवश्यकता क्यों नहीं ? क्यों भारत में तीव्र मति की अपेक्षा मंद मति को प्राथमिकता दी जा रही है ? और ऐसे में देश का विकास होगा तो कैसे ?
कर्नाटक प्रदेश के सरकारी आँकड़ों के अनुसार वहाँ के वासियों का आर्थिक चित्रण कुछ ऐसा है: ईसाई भारतीय - १५६२ रू/ वोक्कालिग जन - ९१४ रू/ मुसलमान - ७९४ रू/ पिछड़ी जातियों के जन - ६८० रू/ पिछड़ी जनजातियों के जन - ५७७ रू/ और ब्राह्मण - ५३७ रू।

तमिलनाडु में रंगनाथस्वामी मन्दिर के पुजारी का मासिक वेतन ३०० रू और रोज का एक कटोरी चावल है। जबकि उसी मन्दिर के सरकारी कर्मचारियों का वेतन कम से कम २५०० रू है। ये सब ठोस तथ्य हैं लेकिन इन सब तथ्यों के होते हुए, आम आदमी की यही धारणा है कि पुजारी ‘धनवान’ और ‘शोषणकर्ता’ है, क्योंकि देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने अनेक वर्षों तक इसी असत्य को अनेक प्रकार से चिल्ला चिल्ला कर सुनाया है ।

क्या हमने उन विदेशी घुसपैठियों को क्षमा नहीं किया जिन्होंने लाखों-करोड़ों हिंदुओं की हत्या की और देश को हर प्रकार से लूटा? जिनके आने से पूर्व भारत संसार का सबसे धनवान देश था और जिनके आने के बाद आज भारत पिछड़ा हुआ third world country कहलाता है । इनके दोष भूलना सम्भव है तो अहिंसावादी, ज्ञानमूर्ति, धर्मधारी ब्राह्मणों को किस बात का दोष लगते हो कब तक उन्हें दोष देते जाओगे ?
क्या हम भूल गए कि वह ब्राह्मण समुदाय ही था जिसके कारण हमारे देश का बच्चा बच्चा गुरुकुल में बिना किसी भेदभाव के समान रूप से शिक्षा पाकर एक योग्य नागरिक बनता था ? क्या हम भूल गए कि ब्राह्मण ही थे जो ऋषि कहलाते थे, जिन्होंने विज्ञान को अपनी मुट्ठी में कर रखा था?
भारत के स्वर्णिम युग में ब्राह्मण को यथोचित सम्मान दिया जाता था और उसी से समाज में व्यवस्था भी ठीक रहती थी । सदा से विश्व भर में जिन-जिन क्षेत्रों में भारत का नाम सर्वोपरि रहा है और आज भी है वे सब ब्राह्मणों की ही देन हैं, जैसे कि अध्यात्म, योग, प्राणायाम, आयुर्वेद आदि ।
        यदि ब्राह्मण जरा भी स्वार्थी होते तो यह सब अपने या अपने कुल के लिए ही रखते दुनिया में मुफ्त बांटने की बजाए इनकी कीमत वसूलते । वेद-पुराणों के ज्ञान-विज्ञान को अपने मस्तक में धारने वाले व्यक्ति ही ब्राह्मण कहे गए और आज उनके ये सब योगदान भूल कर हम उन्हें दोष देने में लगे हैं ।
जिस ब्राह्मण ने हमें मन्त्र दिया ‘वसुधैव कुटुंबकं’ वह ब्राह्मण विभाजनवादी कैसे हो सकता है? जिस ब्राह्मण ने कहा ‘लोको सकलो सुखिनो भवन्तु' वह किसी को दुःख कैसे पहुंचा सकता है? जो केवल अपनी नहीं , केवल परिवार, जाति, प्रांत या देश की नहीं बल्कि सकल जगत की मंगलकामना करने का उपदेश देता है, वह ब्राह्मण स्वार्थी कैसे हो सकता है?
इन सब प्रश्नों को साफ़ मन से, बिना पक्षपात के विचारने की आवश्यकता है, तभी हम सही उत्तर जान पायेंगे।
आज के युग में ब्राह्मण होना एक दुधारी तलवार पर चलने के समान है। यदि ब्राह्मण अयोग्य है और कुछ अच्छा कर नहीं पाता तो लोग कहते हैं कि देखो हम तो पहले ही जानते थे कि इसे इसके पुरखों के कुकर्मों का फल मिल रहा है । यदि कोई सफलता पाता है तो कहते हैं कि इनके लोग तो सभी हमेशा से ऊँची पदवी पर बैठे रहे हैं, इन्हें किसी प्रकार की सहायता की क्या आवश्यकता?
        अगर किसी ब्राह्मण से कोई अपराध हो जाए फिर तो कहने ही क्या, सब आगे पीछे के सामाजिक पतन का दोष उनके सिर पर मढ़ने का मौका सबको मिल जाता है । कोई श्रीकांत दीक्षित भूख से मर जाता है तो कहते हैं कि बीमारी से मरा । और ब्राह्मण बेचारा इतने दशकों से अपने अपराधों की व्याख्या सुन-सुन कर ग्लानि से इतना झुक चुका है कि वह कोई प्रतिक्रिया भी नहीं करता, बस चुपचाप सुनता है और अपने प्रारब्ध को स्वीकार करता है ।
आज का ब्राह्मण बिना दोष के भी दोषी बना घूमता है । नेताओं के स्वार्थ, समाज के आरोपों, और देशद्रोही ताकतों के षड्यंत्र का शिकार हो कर रह गया है ब्राह्मण । बहुत से ब्राह्मण अपने पूर्वजों के व्यवसाय को छोड़ चुके हैं आज । बहुत से तो संस्कारों को भी भूल चुके हैं । अतीत से कट चुके हैं किंतु वर्तमान से उनको जोड़ने वाला कोई नहीं । ऐसे में भविष्य से क्या आशा.....?

धर्म की जय हो
अधर्म का नाश हो
प्राणियों मे सदभावना हो
विश्व का कल्याण हो ......
इसमे क्या गलत है ?
मानवता का संदेश देने वाला अत्याचारी कैसे हो सकता है ?
चिंतनीय विषय है !

शनिवार, 27 अक्टूबर 2018

दूध में परमिटेड ज़हर मिलाने की आज़ादी है भारत में



मोटी मलाई वाला दूध किसे नहीं लुभाता ! किंतु क्या आपको पता है कि इस मलाई में ज़हरीला Melamine मिला हो सकता है जो शरीर की सामान्य और स्वस्थ कोशिकाओं को कैंसर कोशिकाओं में बदल देने के लिए कुख्यात है । 
...और मज़े की बात यह है कि हमारे देश में फसाई (FSSI) ने इस ज़हर की भी परमिटेड मात्रा तय कर दी है । यानी फसाई द्वारा तयशुदा मात्रा में ज़हर मिला दूध बेचने, ख़रीदने और पीने की आज़ादी है ।
जब फसाई बने कसाई तो अपनी जान बचाने के लिए हमें ख़ुद चिंतित होना चाहिए ।

फसाई की इस कहानी की हक़ीक़त से पूरे भारत को वाक़िफ़ करना अब हमारा और आपका दायित्व है ।



गुरुवार, 25 अक्टूबर 2018

God is afraid of her????

यह इण्डिया का सर्वोच्च न्यायालय था जिसने सबरीमाला स्थित अय्यप्पा मंदिर में हर आयु वर्ग की स्त्रियों के प्रवेश को उनका अधिकार मानते हुए बारह वर्ष पुराने प्रकरण का अंततः 28 सितम्बर 2018 को पटाक्षेप कर दिया । इस तरह अय्यप्पा मंदिर की लगभग डेढ़ हजार साल पुरानी परम्परा स्त्री समानता और आराधना के मौलिक अधिकार के तर्क के साथ समाप्त कर दी गयी ।

प्रगतिशील सभ्य आनंदित हैं और परम्परावादी असभ्य निराश । मामला है सबरीमाला मंदिर का, जारी है बहस सभ्य और असभ्य के बीच ।

सभ्य – सत्य की जीत होनी ही थी, ब्राह्मणों ने मंदिर को अपनी बपौती मान लिया था । ईश्वर की आराधना में भेदभाव करना पंडितों की दादागीरी के अतिरिक्त और क्या हो सकता है ?
असभ्य –ईश्वर आराधना ? वह तो पाखण्ड है आपकी दृष्टि में, फिर उसी पाखण्ड को स्थापित करने के लिए आप स्त्रियों को भी क्यों सम्मिलित करना चाहते हैं ?
सभ्य – हम ईश्वर जैसी किसी चीज को नहीं मानते । ब्रिटिश साइंटिस्ट स्टीफ़ेन हॉकिंग से अधिक ज्ञानी नहीं हो तुम । हमने फ़िज़िक्स में पीएच. डी. की है, तुम धरती को चपटी मानने वाले लोग क्या जानो कि धरती गोल है । हम ईश्वर की आराधना के पाखण्ड के लिए नहीं बल्कि स्त्रियों के साथ होने वाले भेदभाव के विरुद्ध उनके साथ खड़े हुए हैं ।
असभ्य – किंतु जिसे आप पाखण्ड कह कर ईश्वर, कर्मकाण्ड और धर्म आदि का विरोध करते हैं, सबरीमाला प्रकरण में तो आप एक तरह से उसी के समर्थन में खड़े हो गए हैं । क्या यह विरोधाभास नहीं है ? पहले आप तय कर लीजिए कि आप पाखण्ड के विरोधी हैं या उसके समर्थक ?
सभ्य – बेशक ! हम पाखण्ड के विरोधी हैं तभी तो सबरीमाला मंदिर की परम्परा को तोड़ने के समर्थन में हैं । स्त्रियों के अधिकार को अब हम और कुचलने नहीं देंगे ।
असभ्य – अर्थात, आप मंदिर में ईश्वर की आराधना को, जो कि आपकी दृष्टि में पाखण्ड है, स्त्रियों का अधिकार मानते हैं ?
सभ्य – तुम संस्कृताचार्यों के साथ यही दिक्कत है, विज्ञान की ए.बी.सी.डी. जानते नहीं बस केवल वितण्डा करना जानते हो । ईश्वर को लेकर दकियानूसी के सिवाय और क्या है तुम्हारे पास ?
असभ्य – हाइपोथीसिस... जिसके सहारे तुम यहाँ तक पहुँच सके हो । हाइपोथीसिस यदि अवैज्ञानिक है तो आपका तथाकथित विज्ञान भी अवैज्ञानिक है जो इसी की नींव पर खड़ा है ।
सभ्य – बहुत ख़ूब ! अब तुम पंडित जी लोग विज्ञान पर भी हमसे बहस करोगे ?
असभ्य – क्यों ? क्या विज्ञान पर बहस करने का मौलिक अधिकार केवल आपका ही है ?
सभ्य – ठीक है, चलिए बताइए कौन सा वैज्ञानिक तथ्य है आपके पास मंदिर में मेंस्ट्रुएटेड स्त्रियों को प्रवेश न करने देने की परम्परा के पीछे ?
असभ्य – परम्पराओं के साथ आवश्यक नहीं कि वे सदा स्थूल वैज्ञानिक तथ्यों से ही जुड़ी हुयी हों, वे लोकाचारों और स्थानीय आवश्यकताओं की परिणति भी हो सकती हैं । जहाँ तक स्त्रियों के प्रवेश की बात है तो यह पूरे रिप्रोडक्टिव एज़ की बात है केवल मेंस्ट्रुअल स्थिति की ही नहीं ।
सभ्य – कमाल की बात है ! सैनिटरी नेपकिन लगाकर ख़ून में लथपथ स्त्री अंतरिक्ष में जा सकती है, प्लेन उड़ा सकती है, ट्रेन में बैठ सकती है, ऑफ़िस जा सकती है, पार्टी में जा सकती है ...लेकिन आपके अय्यप्पा की पूजा नहीं कर सकती । आपका अय्यप्पा मेंस्ट्रुएटेड स्त्रियों से इतना डरता क्यों है ?
असभ्य – अर्थात, मेंस्टुएटेड स्त्री सब कुछ कर सकती है ....उसे सब कुछ करना चाहिए ?
सभ्य – आपको इसमें क्यों और क्या ऐतराज़ है ?
असभ्य – क्या मेंस्ट्रुएटेड स्त्री को समागम भी करना चाहिए ?
सभ्य – यदि उसकी इच्छा हो तो क्यों नहीं ?
असभ्य – फ़िज़िक्स के विद्वान वैज्ञानिक महोदय ! क्या आपको पता है कि मेंस्ट्रुअल पीरियड में कोई भी स्त्री किसी भी इनफ़ेक्शन के प्रति अधिक सेंसिटिव होती है ? और ऐसी स्थिति में किया गया समागम स्त्री को इनफ़ेक्ट कर सकता है ? क्या यह एक अवैज्ञानिक आचरण नहीं है ? अभी कुछ दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिक सम्बंधों को भी कानूनी मान्यता प्रदान कर दी है जबकि एड्स की कहानी हाइती में समलैंगिक सम्बंधों के साथ ही प्रारम्भ हुई थी । विज्ञान और आधुनिकता की दुहाई देकर विज्ञान के साथ खिलवाड़ करने को प्रगतिशीलता नहीं कहा जा सकता महोदय !
सभ्य – आप वितण्डा कर रहे हैं, मुद्दे की बात कीजिए । पूजा से इसका क्या सम्बंध ?
असभ्य – इसके लिए पहले आपको पूजा की अवधारणा पर चिंतन करना होगा । यह ठीक उसी तरह है जैसे रंगमंच पर उतरने से पहले कलाकार को अपने कैरेक्टर में प्रवेश करना होता है । यदि आप पूजा का सम्बंध मनःस्थिति से जोड़ पा रहे हों तो समझ सकेंगे कि इसके लिए विधान कितना आवश्यक है । गीत गाने से पहले राग, सुर, ताल का अभ्यास आवश्यक नहीं है क्या ?
सभ्य – आप फिर बात को घुमा रहे हैं । मेंस्ट्रुअल पीरियड से पूजा का विरोध कहाँ है यह क्यों नहीं बता रहे हैं आप ?
असभ्य – ऑपरेशन थिएटर, लेबर रूम, आइसोलेटेड वार्ड, बर्न यूनिट और आई.सी.यू. में प्रवेश करने के नियमों और ऐसे स्थानों के प्रति मनुष्य के आचरण को यदि आप समझ सकें तो ही यह भी समझ सकेंगे कि स्थानविशेष का स्थितिविशेष से कोई विशिष्ट सम्बंध होना चाहिए या नहीं !
सभ्य – पूजा ...पूजा पर आइये पोंगा पण्डित जी !
असभ्य – पूजा के साथ पवित्रता और मन की उच्चतम स्थिति का होना आवश्यक है । पूजा को जीवन के अन्य कार्यों की तरह नहीं निपटाया जा सकता । यह स्थितिविशेष में सूक्ष्म में स्थूल की उच्चतम एकाग्रता का उपक्रम है । अय्यप्पा के पूजा विधान में स्त्रियों की अपनी अनिवार्य भूमिका है, पुरुषों के लिए पूजा के उपादानों की व्यवस्था स्त्रियों को ही करनी होती है । रंगमंच पर हर व्यक्ति हर तरह का किरदार नहीं निभा सकता ..और ऐसी ज़िद किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कही जा सकती ।
सभ्य – उचित और अनुचित का निर्णय करने वाले आप कौन होते हैं ? यह अदालत का विषय है, और अदालत निर्णय कर चुकी है ।
असभ्य – कोई भी अदालत सत्य से ऊपर नहीं हो सकती । अदालतें भी सत्य के ही अनुसंधान का प्रयास करती हैं.... किंतु स्थूल प्रमाणों के आधार पर । पूजा के औचित्य को स्थूल प्रमाणों के आधार पर अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती ।
सभ्य – इसे हम पण्डितों की दादागीरी कहते हैं जिसने देश और समाज का बंटाढार कर रखा है ।
असभ्य – बंटाढार तो उस प्रगतिशीलता ने कर रखा है जिसने सामाजिक और व्यक्तिगत आचारों-विचारों की धज्जियाँ उड़ा रखी हैं । अधकचरे विज्ञान का अहंकार बहुत घातक है सभ्यता के लिए ।
सभ्य – तुम पोंगा पंडित हो, पाखण्ड भरी पूजा करते रहो, तुम्हारे मुंह से निकली विज्ञान की बात भी पाखण्डी हो जाती है ।


(यह एक अनंत बहस है, चलती रहेगी ......)              


शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2018

‘मी टू’ के बाद अब ‘मी टू पार्ट टू’ की बारी


एफ़.टी. की दुनिया में चल रही ग़र्म हवा पहली बार नहीं चली है । पहले भी तेज हवाओं से अचानक खुल गई खिड़की से लोगों ने कॉस्टिंग काउच को देखा है । राजनीतिक गलियारों में इस तरह की हवा को “प्रायोजित” और “षड्यंत्र” कह कर तर्कों के साथ कुछ प्रश्न भी उठाए जा रहे हैं । किंतु एफ़.टी. की रंगीन दुनिया में इस ग़र्म हवा को “प्रायोजित” और “षड्यंत्र” स्वीकार करने का कोई उचित कारण नहीं है ।

निश्चित ही एफ़.टी. की महिलाओं के साहस का स्तर हमारी अपेक्षा बहुत उच्च है । मी टू कहने वाली स्त्रियों को एक भी शब्द बोलने से पहले कितने अंतर्द्वंद्वों और आंतरिक झंझावातों से से होकर आगे बढ़ना होता है, इसकी कल्पना ही पसीना ला देने के लिए काफी है । मी टू महिलाओं के अपने अंतर्द्वंद्व से बाहर निकलने का आंदोलन है, यौन अत्याचारों के ख़िलाफ बगावत का ऐलान है, विवश मौन को स्वर देने की क्रांति है । मुझे लगता है कि रिश्वत और भ्रष्टाचार के मामले में अब मी टू पार्ट टू की बारी पुरुषों की होनी चाहिए । आख़िर हम कब तक भ्रष्टाचार के शिकार होते रहेंगे । मैं रिश्वखोरी की बात कर रहा हूँ । क्या हमें मी टू की स्त्रियों की तरह भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के ख़िलाफ भी खुलकर अपनी आवाज़ नहीं उठानी चाहिए ?
        रिश्वतखोरी के मामले में व्याप्त हो चुकी सामाजिक मानसिकता का विश्लेषण हमारे सामने एक भयानक चित्र उपस्थित करता है । विद्यार्थियों को छोड़ दिया जाय (क्योंकि वे अभी किसी जॉब में नहीं हैं) तो शायद ही कोई मिले जो रिश्वतखोरी के समर्थन में तर्क करते हुए जरा भी हिचकता या शर्माता हो । देखिए, रिश्वत के पक्ष में क्या है आम धारणा -
1- रिश्वत एक सुविधा शुल्क है, इसे निगेटिव रूप में नहीं लेना चाहिए ।
2- दूध का धुला कौन है ? पेट तो हमारा भी है न !
3- जो रिश्वत लेते-देते हैं वे सुखी हैं और उन्नति कर रहे हैं, उनके प्रमोशन भी हो रहे हैं और उनके गोपनीय प्रतिवेदन भी बहुत अच्छे लिखे जाते हैं । इसमें बुरा क्या है ?
4- रिश्वत यदि इतनी बुरी चीज है तो सरकार रोक क्यों नहीं पा रही इसे ? कानून बनाने से कुछ नहीं होता । कानून तो बलात्कार के लिए भी है, लेकिन रुक पाया क्या ? जो प्रचलन में है वह बुरा कैसे हो सकता है ?   
5- हम जी-तोड़ मेहनत करते हैं, रिश्वत हमारा हक़ है ।
6- इसे रिश्वत न कहिए, व्यावहारिकता कहिए, सिद्धांत और नैतिकता का औचित्य भाषणों के बाद नहीं होता । यदि मुश्किलों से बचना चाहते हैं तो आपको व्यावहारिक बनना होगा ।
7- समय-समय पर रिश्वत देते रहोगे तो उच्चाधिकारियों से सम्बंध अच्छे बने रहेंगे और कभी कोई परेशानी नहीं होगी ।
8- लेन-देन तो हर कोई करता है । रिश्वत अब समाज में स्वीकृत आचरण है इसे सरकार द्वारा भी मान्यता मिल जानी चाहिए ।
9- क्या कीजिएगा, लेन-देन के बिना कोई काम नहीं होता, जो रिश्वत लेते हुए पकड़े जाते हैं वे रिश्वत दे कर छूट भी जाते हैं । जैसी बहै बयार पीठ तब तैसी दीजै – यही है सफलता का सूत्र ।


शनिवार, 6 अक्टूबर 2018

एक वैज्ञानिक की प्रताड़ना कथा


रामायण में उल्लेख मिलता है कि त्रेतायुग में राक्षसों ने ऋषियों-मुनियों का जीना मुश्किल कर रखा था । किंतु वे तो तपस्वी थे और ज्ञान की साधना में लीन रहते थे फिर ऐसा क्या था कि राक्षस उनकी साधना में आये दिन विघ्न ही नहीं उत्पन्न करते बल्कि उन्हें प्रताड़ित भी करते रहते थे । इस प्रश्न का उदाहरण सहित उत्तर इसरो के वैज्ञानिक एस. नंबी नारायणन की प्रताड़ना कथा में मिल जायेगा । यह प्रताड़ना कथा कलियुग के ईसा वर्ष 1994 में प्रारम्भ हुयी थी जो 24 वर्ष तक निरंतर चलती रही ।

एशिया महाद्वीप के प्राचीन आर्यावर्त्त में कलियुग के प्रभाव से एक देश में दो देश एक साथ अस्तित्व में आ गये जिनमें से एक है भारत और दूसरा है इण्डिया । दूसरा देश यानी इण्डिया प्रबल है, जबकि भारत को अपने अस्तित्व के लिए कड़े संघर्ष से गुजरना पड़ रहा है । इसी इण्डिया ने अपने दबंग स्वभाव के कारण एक दिन भरपूर क्रूरता के साथ भारत की एक शीर्ष वैज्ञानिक प्रतिभा की सामाजिक और चारित्रिक हत्या कर दी । ...क्योंकि इण्डिया के लोगों को यह गवारा नहीं था कि इसरो का एक भारतीय वैज्ञानिक स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन बनाये । केरल की तत्कालीन सरकार ने उन पर झूठे और गम्भीर आरोप लगाकर एक भारतीय प्रतिभा की सामाजिक हत्या कर दी । देशी क्रायोजेनिक इंजन बनाने का काम रुक गया और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत की प्रगति को इण्डिया द्वारा अपूरणीय क्षति पहुँचाई गई ।
यूँ अदालत ने उस प्रतिभा को 24 साल बाद बाइज़्ज़त बरी कर दिया ...सभी आर्थिक लाभों और मुआवज़े की रक़म के साथ, किंतु इस बीच भारत कई सौ साल पीछे चला गया । इसलिए तिरुनेलवेली के वैज्ञानिक एस. नंबी नारायणन की कहानी भारत के युवा वैज्ञानिकों के साथ-साथ देश के हर नागरिक को भी जाननी ही चाहिए ।

वर्ष1970 के प्रारम्भ में ही तरल ईंधन रॉकेट प्रणाली को भारत में विकसित करने वाले और स्वदेशी तकनीक से निर्मित क्रायोजेनिक इंजन “विकास” को विकसित करने में लगे नारायणन को जासूसी करने और तकनीक शत्रु देश को बेचने के झूठे आरोप में वर्ष 1994 में ग़िरफ़्तार कर लिया गया । इण्टेलीजेंस ब्यूरो के अधिकारियों ने नारायणन को इतनी शारीरिक और मानसिक यतानायें दीं कि उन्हें अस्पताल में रखना पड़ा, बाद में उन्हें पचास दिनों तक जेल में भी रखा गया । यह एक ऐसी घटना थी जो भारत के युवा वैज्ञानिकों को बुरी तरह दहशत में लाने और उन्हें हतोत्साहित करने वाली थी । किंतु जब झूठ का साम्राज्य व्यवस्थित हो तो रोशनी की नन्हीं किरण को भी विवश होना पड़ता है । ब्लैक होल से कब कोई फ़ोटॉन जीत सका है !
किंतु नारायणन ने हार नहीं मानी और वे न्याय पाने के लिये चौबीस वर्षों तक निरंतर संघर्ष करते रहे, इस बीच उन्हें सामाजिक और मीडिया की यातनाओं से भी गुजरना पड़ा, किंतु वे रुके नहीं । अंततः नंबी नारायणन को न्यायालय से दोषमुक्त कर दिया गया किंतु उनके जीवन पर चौबीस साल तक लगे रहे ग्रहण को कैसे मुक्त किया जा सकेगा ? 

नंबी नारायणन अदालत से दोषमुक्त तो हो गए किंतु उनके विरुद्ध रचे गये षड्यंत्र के सबूत मिल जाने के बाद भी ज़िम्मेदार अधिकारियों के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही नहीं की गई । हमारे देश में ऐसा ही होता है, पीड़ित को दोषमुक्त होने के लिए अपने जीवन का एक लम्बा हिस्सा स्वाहा करना पड़ता है, दूसरी ओर इस सबके लिए उत्तरदायी लोगों के विरुद्ध कोई दण्डात्मक कार्यवाही न होने से इस तरह की घटनाओं पर आज तक विराम नहीं लग सका है, आगे भी नहीं लग सकेगा । ऐसी पंगु न्याय व्यवस्था निष्ठावान लोगों में प्रतिक्रियात्मक आक्रोश उत्पन्न करती रही है, आगे भी करती रहेगी ।    
वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में यह एक अत्यंत क्रूर और घृणास्पद घटना है जिस पर भारत को चिंतित होना चाहिए था, किंतु भारत चिंतित नहीं हुआ, बिल्कुल भी नहीं हुआ । ट्रक के नीचे किसी जाति विशेष के व्यक्ति की मुर्गी कुचल जाने पर हल्ला करने वाली मीड़िया और तथाकथित मानवाधिकारवादियों ने भी इस पर कोई चिंता व्यक्त नहीं की । क्या हम इसी तरह विश्वगुरु बनने का सपना देख रहे हैं ? यह इण्डिया में होने वाली अत्यंत क्रूर घटनाओं में से एक है ...जिसके लिए भारत सरकार को उनसे और पूरे देश से माफ़ी माँगनी चाहिए । हम इस घटना से दुःखी हैं, और इससे भी अधिक दुःखद यह है कि भारतीय मीडिया ने इस प्रकरण को उतनी गम्भीरता से नहीं लिया जितना लिया जाना चाहिए था । यह घटना देश के युवा वैज्ञानिकों को हतोत्साहित करने वाली है । क़माल है इतनी तेज तूफ़ान आया और देश में एक पत्ता तक नहीं हिला ! यह पूरे भारत के लिए घोर शर्मिंदगी और आत्मग्लानि का विषय है ।

भर्त्सना करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं । मुझे लगता है कि जिस समाज में प्रतिभाओं की क्रूर सामाजिक और चारित्रिक हत्या कर दी जाती हो और समाज कामोश बना रहने का अभ्यस्त हो उस समाज और देश का परित्याग कर देना चाहिए ।


बुधवार, 3 अक्टूबर 2018

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 497 का विस्फोटक अंत


कानून हो गया ग़ैरकानूनी ... 
सवाल, दर-असल सिर्फ़ इतना सा था कि दो व्यक्तियों के विवाहेतर सम्बंधों में दोषी केवल पुरुष ही क्यों, महिला भी क्यों नहीं ? विद्वानों ने मंथन किया और निर्णय दिया कि धारा 497 स्वयं ही लैङ्गिक असमानता की शिकार है ।
यौन सम्बंध यदि पारस्परिक सहमति से नहीं बनाए गए हैं तो निश्चित्त ही यह किसी एक पक्ष द्वारा किया गया बलात्कार ही माना जाना चाहिए किंतु विवाहेतर यौनसम्बंध यदि दोनों पक्षों की सहमति से बनाए गए हैं तब इन्हें व्यभिचार माना जाना चाहिए या नहीं ?
कोई पुरुष अपनी पत्नी के परपुरुष गमन को यदि अपनी सहमति नहीं देता है तो यह परपुरुष के लिए तो अपराध है किंतु पत्नी के लिए नहीं क्योंकि उसने तो इसके लिए अपनी सहमति दे ही दी थी । अर्थात किसी की पत्नी से व्यभिचार के लिए परपुरुष को उसके पति से भी अनुमति लेने की अपेक्षा की जाती रही है जिसे न्यायाधीशों ने लैङ्गिक असमानता स्वीकार किया है । इस मामले में भरतपुर के बेड़िया बड़े दूरदर्शी निकले जहाँ उनकी सामाजिक परम्परा के अनुसार बेड़िनियाँ अपने-अपने पतियों, भाइयों या पिताओं की अनुमति से ही देह-व्यापार करती रही हैं । यद्यपि देह-व्यापार के अपराध में उन्हें जब-तब सजा भी होती रहती है किंतु अब शायद ऐसा नहीं होगा क्योंकि वे तो अपने स्वजन पुरुषों की अनुमति से ही परपुरुष गमन करती आ रही हैं ।  
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयानुसार 27 सितम्बर 2018 के बाद से व्यभिचार नामक आचरण अब शून्य घोषित हो चुका है । नैतिक मूल्यों और संवैधानिक मूल्यों के टकराव का यह एक ऐसा उदाहरण है जो भारतीय समाज की दिशा तय करने वाला है ।  

विवाहेतर यौनसम्बंध नहीं रहा अब व्यभिचार...

सर्वोच्च न्यायालय के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्र, जस्टिस रोहिंगटन नरीमन, जस्टिस ए. एम. ख़ानविलकर, जस्टिस डी. वाय. चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा के एक निर्णय से 158 साल पुरानी धारा 497 हुई कानून की धार से बाहर । सर्वोच्च न्यायालय ने व्यभिचाररोधी कानून को एक पक्षीय और मनमाना घोषित करते हुए लैङ्गिक समानता के अधिकार के विरुद्ध माना है । निर्णय के अनुसार “यह कानून महिला की चाहत और यौन चाहत का असम्मान करता है” ।  
हाँ ! यौन सम्बंधों की सहमति को लेकर लैङ्गिक असमानता नहीं होनी चाहिए किंतु यह बात यहीं तक नहीं रुकी, इसके निहितार्थ की गूँज यौन सम्बंधों के सामाजिक ढाँचे को भी प्रभावित करने वाली है ।  

विवाहेतर यौनसम्बंधों की पारस्परिक सहमति और इसका सामाजिक मूल्य समय की धारा में बहता हुआ तृण है जो कभी डूबता सा लगता है तो कभी उतराता सा । दुनिया भर के विभिन्न देशों और समाजों में इसे लेकर विभिन्न मान्यताएं हैं और तदनुसार ही पाप-पुण्य की परिभाषाएं भी । आज मुझे भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास "चित्रलेखा" की स्मृति हो आई है । कई बार कानून गुलेल की तरह काम करता है जिसे पेड़ पर बैठी चिड़िया कभी स्वीकार नहीं करती । भारतीय समाज में हो रहे पश्चिमी परिवर्तनों के सामाजिक अनुकरण से भारतीय मान्यताओं में परिवर्तन तो होने ही हैं, चाह कर भी इसे रोका नहीं जा सकेगा ।

पाप ‘पाप’ ना रहा पुण्य ‘पुण्य’ ना रहा...
कुछ ही समय पूर्व भारत के सर्वोच्च न्यायालय के वरदान से समलैङ्गिक यौन सम्बंधों को सामाजिक मूल्य प्रदान किए जाने की आकाशवाणी हुई थी । अप्राकृतिक यौन सम्बंधों को प्राकृतिक कृत्य और मौलिक अधिकार मान लिया गया था और अब विवाहेतर यौन सम्बंधों को भी सर्वोच्च न्यायालय का वरदान प्राप्त हो चुका है ।
परस्त्री गमन और परपुरुष गमन अब नहीं रहा अपराध, यौन सम्बंध हुए स्वच्छंद, देहव्यापार की सीमाएं हो गई हैं शिथिल, व्यभिचार मुँह बाए खड़ा है यह जानने को उत्सुक कि अब क्या है उसकी नई परिभाषा ।
एक निर्णय ने ध्वस्त कर दिए भारतीय समाज के सनातन सांस्कृतिक मूल्य, अब हम पश्चिम हो चले हैं और यह माना जा रहा है कि सूर्य को अब कभी पूर्व में नहीं उगना चाहिए ।  

नैतिकता पर प्रभावी हुई संवैधानिकता !
समलैङ्गिक यौनसम्बंधों को अपराध मानने वाली धारा 377 को समाप्त करते हुए विद्वान न्यायाधीशों ने घोषणा कर दी कि अब "सामाजिक नैतिकता नहीं बल्कि संवैधानिकता को ही प्रभावी माना जाएगा।"
प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि नैतिकता का निर्धारण और संवैधानिकता का निरुपण करता कौन है? निश्चित ही दोनों आकाशीय वर्षा के परिणाम नहीं हैं, नैतिकता का निर्धारण समाज के दीर्घकालीन अनुभव करते हैं और संविधान का निर्धारण तात्कालिक परिस्थितियों के आलोक में व्यक्तियों का एक छोटा सा समूह करता है ।

अब हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी समाज के लिए लोककल्याणकारी क्या है, समाज के दीर्घकालीन अनुभवों से उपजे नैतिक मूल्य या तात्कालिक परिस्थितियों के आलोक में मात्र कुछ व्यक्तियों द्वारा निर्धारित संवैधानिक मूल्य?