शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

गोमाता पूजकों के देश में

             जिस देश में पशुपतिनाथ शिव के साथ नंदी को स्थान दिया गया हो और उनके बिना शिवालय अधूरे से लगते हों, जिस देश में गाय को माता की तरह पूजा जाता हो उसी देश में गोवंश की कारुणिक स्थिति मन और हृदय को विचलित करती है । एक समय था जब गोवंश के कारण ही भारत की कृषिपरम्परा समृद्ध हुयी और हम “शतं जीवेत्” एवं “दूधों नहाओ, पूतों फलो” जैसे आशीर्वाद के साथ श्रेष्ठसभ्यता के वाहक बने । आज हमने अपनी उसी समृद्ध विरासत की धज्जियाँ उड़ा दी हैं ।

हम दूध दुहने के बाद गायों को सड़क पर फेक दी गयीं सड़ी हुयी सब्जियाँ और पॉलीथिन में लिपटी चीजें खाने के लिये छोड़ देते हैं, बैलों को ट्रैक्टर्स ने अनुपयोगी प्राणी बना दिया है और साँड़ों को हमने अवांछनीय प्राणी मान लिया है । गोवंश के प्रति हमारे आचरण से यह सब प्रतिदिन प्रमाणित हो रहा है । एक ओर तो हम गोमांस को प्रतिबंधित करने की माँग करते हैं तो दूसरी ओर गायों और साँड़ों की क्रूरता की सीमा तक उपेक्षा करते हैं । सड़क पर छोड़ दिये जाने वाले इस गोवंश में से न जाने कितनी गायों और साँड़ों की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है । वे लावारिस की तरह तड़प-तड़प कर सड़क पर पड़े-पड़े मर जाते हैं, आसपास से गुजरने वाले सभ्य लोगों में से किसी को इतनी फुरसत नहीं होती कि वह इन घायल प्राणियों की आँखों में भरी पीड़ा को देख भी सकें ।

नंदी की आँख में किसी नुकीली चीज से किये गये क्रूर प्रहार के बाद इलाहाबाद में सड़क पर लावारिस खड़े नंदी

गोवंश के प्रति सड़क दुर्घटना से भी अधिक क्रूरता उन लोगों द्वारा की जाती है जो इन प्राणियों पर घातक आक्रमण कर उन्हें घायल कर देते हैं । तब्बल, कुल्हाड़ी, भाला, छाते की नोक, उबलता पानी और एसिड जैसी चीजों से बड़ी क्रूरतापूर्वक इन प्राणियों को बुरी घायल कर देना आम बात हो गयी है । सभ्यता का दम भरने वाले मनुष्य के दिये घाव के कारण मूक पशु चल नहीं पाते, घाव में प्यूट्रीफ़ेक्शन हो जाता है और उसमें मैगेट्स पड़ जाते हैं । चलने-फिरने में असमर्थता के कारण उन्हें भूखे रहना पड़ता है । घाव से उठने वाली दुर्गंध के कारण कोई भी इन्हें अपने घर या दुकान के सामने खड़ा तक नहीं होने देता । इन घायल और मूक प्राणियों को एक कौर खाने की किसी चीज के लिये लोगों की भीख पर निर्भर होना पड़ता है । लाखों वर्षों से मनुष्य के लिये उपयोगी रहे इन प्राणियों को भीख माँगना नहीं आता और हम अपनी दुकान या घर के सामने इनके खड़े होने से ही क्रुद्ध हो जाते हैं

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शरीर में धँसी कुल्हाड़ी की पीड़ा लिए नंदी को देख जब काँप उठती है क्रूरता, अवाक हो जाते हैं शब्द और शून्य हो जाती है अभिव्यक्ति तब उठ खड़े होते हैं अनंत प्रश्न

यह कैसी गोपूजा है, यह कैसी सभ्यता जो केवल गोवंश का दोहन करके ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती है? सावधान! गाय की प्रशंसा में गीत गाने और मंदिर में जाकर नंदी की मूर्ति की पूजा अर्चना करने का पाखण्ड एक दिन हमारी हिंदू सभ्यता का काल बनेगा । 

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

सरकारी विद्यालय में धार्मिक घृणा का बीजारोपण


श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर उपवास रहने और भगवान में आस्था रखने को दण्डनीय अपराध मानते हुये सरकारी विद्यालय के शिक्षक ने विद्यार्थियों को पीटा 

भारतीय विद्यालयों में हिंदुओं के विरुद्ध धार्मिक घृणा फैलाने के लिये एन.सी.ई.आर.टी. के माध्यम से शिक्षाविदों द्वारा वर्षों से षड्यंत्र किये जाते रहे हैं । इस षड्यंत्र के सुदृढ़ धागे पूरे देश में फैले हुये हैं । ईसाई मिशनरी स्कूलों की छोड़िये, सरकारी विद्यालयों में भी यह सब धड़ल्ले से होता रहा है, अभी भी हो रहा है । हिंदू अन्य धर्मावलम्बियों को उनके धर्म के विरुद्ध कभी कोई आपत्तिजनक शिक्षा नहीं देता किंतु ईसाइयों और मुसलमानों द्वारा ही नहीं बल्कि वामपंथी हिंदुओं और दिग्भ्रमित वनवासियों द्वारा भी सनातनधर्म के विरुद्ध घृणा का बीजारोपण विद्यालयों में आज भी किया जा रहा है जबकि जे.एन.यू. वालों को लगता है कि भारत में उन्हें आज़ादी नहीं मिल सकी है जिसे वे छीन कर ले लेंगे ।  

बस्तर सम्भाग के कोण्डागाँव जिले में गिरोला विकासखण्ड के बुंदापारा ग्राम स्थित शासकीय उच्चतर प्राथमिकशाला के शिक्षक श्रीचरण मरकाम ने श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाने और उपवास करने पर छात्रों को पीट दिया । गुरु जी सनातनधर्म के सिद्धांतों, मान्यताओं और परम्पराओं के विरोधी हैं इसलिए छात्रों को भी अपने जैसा ही बना देना चाहते हैं जिसके लिए वे बालमन में धार्मिक-घृणा का बीजारोपण करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते । विद्यालय के छात्रों के अनुसार गुरु जी ने ज्ञान प्रदान करते हुये अपने छात्रों को बताया कि “हिंदुओं की गायत्री काल्पनिक है, सरस्वती अशिक्षित है वह किसी को क्या ज्ञान देगी । मैं तुम्हारे भगवान को खूँदूँगा (कुचल दूँगा) । तुम लोग भी भगवान को मत मानो । श्रीकृष्ण की सात गर्ल-फ़्रेण्ड थी, वे लड़कियों को स्नान करते समय देखते थे और उनके कपड़े छुपाते थे...”।

भारत का कदाचित ही कोई ऐसा प्रांत होगा जहाँ के अधिकांश ईसाई मिशनरी स्कूलों और कुछ सरकारी विद्यालयों में इस तरह की घटनायें न होती हों, स्थानीय स्तर पर बच्चों के अभिभावक बच्चों के भविष्य को संकट में नहीं डालना चाहते और चुप रहते हैं । कुछ विद्यालयों में तो हिंदी बोलने पर भी बच्चों को प्रताड़ित करने की घटनायें प्रकाश में आती रही हैं । प्रांतीय मातृभाषाओं, सनातन सांस्कृतिक और धार्मिक परम्पराओं के प्रति विद्वेष का यह षड्यंत्र स्वतंत्र भारत में आज भी रचा जा रहा है । उस पर तुर्रा यह कि हमें असहिष्णु बताते हुये हमारे विरुद्ध असहिष्णुता का आरोप भी लगाया जाता रहा है । इतना ही नहीं, अपनी भाषाओं, धार्मिकपरम्पराओं और अध्यात्मिक मूल्यों की रक्षा के लिये यदि हम भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की बात भी करते हैं तो भारत से लेकर योरोप और अमेरिका तक के वामपंथी विश्वविद्यालयों में तूफ़ान आ जाता है । हम भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का स्वप्न भी नहीं देख सकते, अपनी सुरक्षा का कोई उपाय भी नहीं कर सकते, न हिंदी बोल सकते हैं और न सनातनधर्म का अनुशीलन कर सकते हैं । क्या ये स्थितियाँ हमारे मौलिक अधिकारों और स्वाभिमान के विरुद्ध नहीं हैं? क्या ये स्थितियाँ हमें हमारी स्वतंत्रता की लेश भी अनुभूति करा सकने में समर्थ हैं?

हमारे देश में एक सुदृढ़ लॉबी है जो वनवासियों को हिंदू नहीं मानती; वनवासियों को भड़काया जा रहा है कि वे ही इस देश के मूलनिवासी हैं जबकि हिंदू लोग बाहर से आये हुये आक्रमणकारी हैं । मूलनिवासी एवं बाहरी आक्रमणकारी के कुतर्कों के साथ वनवासी ही नहीं, बौद्ध, सिख एवं जैन आदि परम्पराओं को भी हिंदूधर्म से पृथक करने के षड्यंत्र को समझना होगा । हम कबीलों में बँटे हुये अफगानी नहीं हैं, हमारी गौरवमयी सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत रही है, जब तक हम इस विरासत को सहेजे रहेंगे तब तक भारत अखण्ड, समृद्ध और शांत बना रहेगा ।  

हम शिक्षक को गुरु और आचार्य भी मानते हैं, आचार्य बह है जिसका आचरण अनुकरणीय हो । इस घटना से स्पष्ट है कि शासकीय विद्यालय के शिक्षक श्रीचरण मरकाम की शिक्षाओं और उनके आचरण का अनुकरण किया जाय तो भारत की नयी पीढ़ी घृणा के विष से भर उठेगी । अपने विषाक्त आचरण से शिक्षक की मर्यादाओं को तार-तार कर देने वाला कोई व्यक्ति क्या शिक्षक के पवित्र दायित्वों का निर्वहन कर सकने योग्य है ? जिलाधीश ने ग्रामीणों की लिखित शिकायत, जिसमें वीडियो और ऑडियो प्रमाण भी संलग्न किये गये हैं, पर शिक्षक को निलम्बित कर दिया है किंतु क्या यह पर्याप्त है? ज्ञान के मंदिर में घृणा की खेती करने वाले व्यक्ति को शिक्षक के गरिमामय पद बने रहने का क्या औचित्य है?

सोमवार, 30 अगस्त 2021

भाजपाशासित राज्यों में तालिबान हुकूमत की खुसुर-फुसुर

Quora पर एक व्यक्ति ने पूछा है कि क्या यह कहना उचित होगा कि उत्तरप्रदेश में तालिबान राज्य है?

इस तरह के पश्न पूछे जाने का आशय केवल एक creation of misleading thought हुआ करता है । अपवादस्वरूप कहीं कोई अराजक घटना हो जाय तो उसे तालिबानी हुकूमत कहना कितना उचित होगा, विशेषकर तब जबकि घटना की उसी के समाज द्वारा निंदा की जा रही हो!

तालिबान जिस शरीया को लागू करने की बात करते हैं अफ़गानिस्तान ही नहीं पाकिस्तान की भी बहुसंख्य जनता उससे दहशत में हैं । यदि आप हिंदूराज की बात करते हैं तो उससे पूरी दुनिया में कभी कोई भयभीत नहीं रहा । योगीराज की पुलिस तालिबान की तरह हर घर से 12 लोगों का ख़ाना वसूल नहीं करती । योगी पुलिस किसी स्कूल में घुसकर निर्दोष बच्चों को कत्ल नहीं करती । योगी पुलिस लड़कियों को उनकी माओं की गोद से छीन कर नहीं ले जाती । योगी जी तालिबान की तरह अपने सैनिकों से शादी करने के लिये 12 से 40 साल तक की स्त्रियों की सूची नहीं माँगते । और अंतिम बात यह कि अँधेरों की तुलना रोशनी से किए जाने का कोई औचित्य नहीं होता ।

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो प्रसारित हो रहा है, इंदौर में कुछ युवकों ने एक मुस्लिम कबाड़ी वाले को जय श्रीराम बोलने के लिए बाध्य किया । निश्चित ही यह एक अराजक घटना है जो निंदनीय ही नहीं दण्डयोग्य भी है । दूसरे धर्म के लोगों को हिंदूधार्मिक प्रतीकों या आदर्शों को स्वीकार करने या पालन करने के लिये बाध्य करना सनातन धर्म के सिद्धांतों के विरुद्ध है । यह एक षड्यंत्र भी हो सकता है, जो भी हो फ़िलहाल तो हिंदू-विरोधियों को बैठे ठाले हिंदू आतंकवाद प्रमाणित करने का एक अवसर मिल गया ।

अब्दुल समद याकूब पीटीआई के प्रवक्ता हैं और गज़ब के आदमी हैं । पाकिस्तान के रक्षा विशेषज्ञ कमर चीमा तो कभी-कभार दबी ज़ुबान से पाकिस्तान की ग़ुस्ताख़ियों को व्यंग्य में मुस्कराते हुये स्वीकार भी कर लेते हैं लेकिन अब्दुल समद तो सूरज को भी सूरज कहने से साफ़ नकार देते हैं । आज एक टीवी चैनल पर अब्दुल समद ने फरमाया कि अफ़गानिस्तान में तालिबान पर लगाये गये सारे इल्ज़ाम बेबुनियाद और इस्लाम को बदनाम करने के लिये हैं, वहाँ न तो कोई हत्या हुयी है और न किसी लड़की को उसके घर से ज़बरन उठाया गया है । यह सब कहने की ग़ुस्ताख़ी अब्दुल समद ने तब की जब टीवी चैनल पर अफ़गानिस्तान की एक लड़की मुस्कान भी मौज़ूद थी । पाकिस्तान के अब्दुल समद ने अफगानिस्तान की मुस्कान की बातों को भी नकार दिया । यानी अब्दुल समद याकूब ने टीवी मीडिया पर सरे-आम उस मुंसिफ़ की तरह व्यवहार किया जो विक्टिम को एक्यूज़्ड मान लेने का फ़ैसला पहले से ही कर चुका हो ।

जब मैं पढ़े-लिखे लोगों के ऐसे चरित्र को देखता हूँ तो लगता है कि शायद ऐसे ही लोगों की वज़ह से तालिबान ने शिक्षा का विरोध करना शुरू किया होगा, उन्हें लगा होगा कि ऐसे आचरण के लिए पढ़ायी-लिखायी में पैसे बरबाद करने की क्या ज़रूरत जो बिना पढ़े-लिखे ही आराम से किया जा सकता है । जो भी हो, ब्रिटेन के मुस्लिम उपदेशक अंजुम चौधरी ने जजिया कर को काफ़िरों पर लगाया जाने वाला टैक्स मानते हुये तालिबान को सलाह दी है कि वे अफ़गानिस्तान में रहने वाले ग़ैरमुस्लिमों पर उनकी सुरक्षा के बदले में जजिया कर लागू कर दें । अर्थात जो ग़ैरमुस्लिम जजियाकर नहीं देगा उसकी ज़िंदग़ी की कोई ग़ारण्टी नहीं । इस्लामिक क़ायदे के अनुसार भारत के भी बहुत से मुसलमान इसे उचित मानते हैं । “हिंदी सत्य” नामक “सच का सामना” करने वाले एक संगठन के अतिबुद्धिमान लोगों का मानना है कि औरंगज़ेब ने जो जजियाकर लगाया था उससे डर कर किसी भी निर्धन हिंदू ने धर्मांतरण नहीं किया था बल्कि वे तो सूफ़ी संतों से प्रभावित हो कर मुसलमान बने थे । मुझे लगता है कि इस थ्योरी के अनुसार तो अफगानिस्तान में रहने वाले ग़ैरमुस्लिम लोग अब तालिबान के इस्लामिक आचरण से प्रभावित होकर ज़ल्दी ही मुसलमान बन जायेंगे ।    

भारत में स्वर्णकाल फिर कब कब आयेगा

शूद्र अपनी राह छोड़ दे तो देश साधनविहीन और दरिद्र हो जाता है, वैश्य अपनी राह छोड़ दे तो संसाधनों का दुरुपयोग होता है और जन-जीवन संकटग्रस्त हो जाता है, क्षत्रिय अपनी राह छोड़ दे तो देश और समाज असुरक्षित हो जाता है, ब्राह्मण अपनी राह छोड़ दे तो अन्याय-अनीति और अनियंत्रित पाप से पूरा समाज पतन के गर्त में चला जाता है । सभी वर्ण के लोग निष्ठापूर्वक अपने-अपने दायित्वों का पालन करते रहें तो देश की समृद्धि, सुरक्षा और प्रतिष्ठा को शिखर तक पहुँचने से कोई रोक नहीं सकता । विदेशियों ने भारत की इस अद्भुत वर्णव्यवस्था के मूल को समझा और सीधे इसी पर प्रहार किया, नये ताने-बाने के साथ विकास की शोषणमूलक परिभाषा गढ़ी गयी, वर्ण-व्यवस्था को पाखण्ड और विकासविरोधी कहा गया, हमें वर्णव्यस्था के विरुद्ध एक हथियार के रूप में स्तेमाल किया जाने लगा, धीरे-धीरे हम स्वयं अपनी श्रेष्ठ व्यवस्था को गालियाँ देने लगे और आज न जाने कितने विकारों से जूझने के लिये बाध्य हो गये ।

शारीरिकश्रम करने वाले हों या मानसिकश्रम करने वाले, आज कोई भी अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान नहीं रहा । वैचारिक प्रदूषण समाज को भ्रमित करने में लगा है, झूठ को प्रतिष्ठित किया जाने लगा है । निर्धन को न्याय नहीं अन्याय मिलने लगा, सेना को सम्मान नहीं अपमान मिलने लगा, व्यापार में छल और पाप का बोलबाला हो गया, राष्ट्रद्रोही राष्ट्रनायक बनने लगे और राष्ट्रनायक इतिहास से लुप्त होने लगे ।

कोई काम संतोषजनक नहीं होता, समय पर नहीं होता, नीतिपूर्वक नहीं होतापुल और बाँध पहली वारिश में ही धराशायी क्यों हो जाते हैं? कोई भी फ़ाइल वर्षों तक आगे क्यों नहीं बढ़ती? बिना रिश्वत लिए कोई बात भी करने के लिए तैयार क्यों नहीं होता? कामगार काम को जैसे-तैसे भुगत कर निपटा देने के अभ्यस्त क्यों हो गये? अराजक तत्व राज्य के मालिक कैसे बनने लगे? साधु-संत भोगविलास के जीवन से विरत क्यों नहीं हो पा रहे? ये वे प्रश्न हैं जो बहुत लोगों के मन में उठते अवश्य हैं किंतु कभी चिनगारी नहीं बनते । ज्वलंत प्रश्न चिनगारी क्यों नहीं बन पाते, यह प्रश्न हर व्यक्ति को अपने आप से पूछना होगा ।

शनिवार, 28 अगस्त 2021

सियासत से तालीम का रिश्ता

अफ़गानिस्तान में आठवीं फेल एक तालिब को शिक्षा मंत्री मनोनीत कर दिया गया है । कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि मौत का खेल खेलने वाले अशिक्षित लोग सियासत कैसे करेंगे? शायद वे पूछना चाहते हैं कि गोली चलाने वाले लोग मंत्रालयों की तकनीकी विशेषज्ञता के अभाव में शासन कैसे कर सकेंगे? यह वर्तमान परिस्थितियों में वर्तमान परम्पराओं की ऐनक से पूछा गया वर्तमान का सवाल है जिसमें दो हजार साल पुरानी परिस्थितियों के पुनरावतरण की कल्पना से उत्पन्न एक हैरत अंगेज़ जिज्ञासा समायी हुयी है । 

मैं पुरानी परिस्थितियों में पुरानी परम्पराओं की ऐनक से अफगानिस्तान के भविष्य को देखने की कोशिश कर रहा हूँ इसलिए मुझे  समयचक्र को पीछे की ओर घुमाते हुये मंगोलिया, उज़बेकिस्तान, सीरिया और फ़िलिस्तीन आदि देशों के उस युग में जाना होगा जहाँ आज की तरह की विश्वविद्यालयीन शिक्षा-परम्परा नहीं थी । हमें सिकंदर, मोहम्मद बिन कासिम, चंगेज ख़ान, तैमूर लंग, ज़हीरुद-दीन मोहम्मद बाबर आदि की शिक्षा-दीक्षा पर भी एक दृष्टि डालनी होगी। ये सब अतिमहत्वाकांक्षी और अतिआक्रामक लोग थे जिनकी प्राथमिकताओं में सत्ता शीर्ष पर हुआ करती थी, शिक्षा नहीं । इन्होंने उन लोगों को लूटा या उन पर शासन किया जो उनकी अपेक्षा कहीं अधिक सभ्य और शिक्षित थे । सामने जब नंगी तलवारें हों, जेब में कानून हो, नैतिक मूल्य अनावश्यक मान लिये गये हों और तलवार वाला अपनी ज़िद में हो तो सभ्यता और शिक्षा का भी कोई मूल्य नहीं हुआ करता । जौहरी न हो तो हीरे का क्या मूल्य!

यूँ, हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि तालिबान लड़ाकों में अशिक्षित ख़ूँख़ार लड़ाके ही नहीं हैं बल्कि उच्चशिक्षित इंजीनियर्स और डॉक्टर्स भी शामिल हैं । अफगानिस्तान ही नहीं पाकिस्तान और भारत सहित दुनिया के दीगर कई देशों में भी बहुत से पढ़े-लिखे काबिल लोग इन्हीं तालिबान की विचारधारा और तौर-तरीकों के प्रशंसक हैं । तालिब का अर्थ अब ज्ञान के लिये जिज्ञासु किसी छात्र की मर्यादाओं को तोड़ कर एक विचारधारा हो गया है जो सत्ता पाने के लिए लाशों को कुचलते हुये आगे बढ़ने में विश्वास रखती है ।  

हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि पढ़े-लिखे जो-वाइडन ने तो अफ़गानिस्तान मामले में बता दिया है कि वे न तो दूरदर्शी हैं और न सही निर्णय ले सकने में सक्षम । पढ़े-लिखे अशरफ़ गनी ने बता दिया है कि वे अपने स्वार्थ के लिये अपने देश की जनता के साथ कितना भी बड़ा विश्वासघात कर सकते हैं । पढ़े-लिखे इमरान ख़ान ने बता दिया है कि वे कितने अजीब और कठपुतली शासक हैं । पढ़े-लिखे देवबंदियों ने अपने मुँह और आचरण से क्या बताया है यह बताने की नहीं गम्भीरतापूर्वक समझने की बात है ।

तालिबान की शासन व्यवस्था आज से दो हजार साल पहले की शासन व्यवस्था से प्रेरित है, यानी वे अफ़गानिस्तान को दो हजार साल पहले के युग में ले जाना चाहते हैं जहाँ आधुनिक तकनीकी ज्ञान और आधुनिक समाज व्यवस्था के लिए कोई स्थान नहीं है । वे उस बर्बर व्यवस्था को लागू करना चाहते हैं जहाँ क़त्ल-ओ-ग़ारत, क्रूरता और ज़ाहिलियत का बोलबाला हो, जहाँ कबीले के सरदार की सोच ही कानून हो और वही अंतिम सत्य भी । ऐसी व्यवस्था के लिए किसी राजनीतिशास्त्र, विधिशास्त्र, अर्थशास्त्र या समाजशास्त्र के ज्ञान का भला क्या औचित्य हो सकता है! वह बात अलग है कि तालिबान को क़त्ल-ओ-ग़ारत से सम्बंधित सारे हथियार और उपकरण अत्याधुनिक ही चाहिये जिनमें अत्याधुनिक तकनीक का स्तेमाल किया जाता है ।

क्रूरता और क़त्ल-ओ-ग़ारत के लिये पढ़ने लिखने की नहीं पोल-पोट, ईदी अमीन और किम-जोंग-उन होने की योग्यता चाहिये । बहरहाल, हम तो अपने प्यारे देश भारत के टीवी चैनल्स पर निहायत असभ्य व्यवहार करते हुये शिक्षित लोगों को दिन भर देखा करते हैं । हमारे गाँव का बउझड़ कहता है – “खेलोगे-कूदोगे बनोगे मंत्री, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे संत्री” ।  

रविवार, 22 अगस्त 2021

धारदार तारों के पार जीवन की आशा

काबुल हवाई अड्डे की ऊँची दीवाल पर शरीर को चीर देने वाले धारदार तारों की बाड़ है जिसके एक ओर अफ़गान नागरिकों की भीड़ है और दूसरी ओर अमरीकी सैनिक जो मदद के लिये उठे हाथों को थामने की कोशिश कर रहे हैं । अमेरिकी राष्ट्रपति जो वाइडन ने उस वक़्त तवे पर रोटी डालने से मना कर दिया जब कि तवा ग़र्म हो चुका था । यह किसी सत्ताधीश की दगाबाज़ी और क्रूरता हो सकती है लेकिन कोई सैनिक आम आदमी की उस भीड़ का हिस्सा होता है जो अपने जीवन में न जाने कितनी बार दर्द के थपेड़ों से जूझता रहा होता है ।  

आज टीवी चैनल्स पर उस दृश्य को देखर कलेजे में हूक उठने लगी है जिसमें काबुल हवाई अड्डे के बाहर खड़ी भीड़ के उठे हुये हाथ एक टोडलर बच्ची को हवा में ऊपर ही ऊपर उठाकर एक-दूसरे को सौंपते हुये आगे की ओर बढ़ाते जा रहे हैं, जहाँ अंतिम आदमी बच्ची को हवा में उछाल कर दीवाल पर खड़े किसी अनजान विदेशी सैनिक को सौंप देगा । यह भीड़ है जहाँ कोई किसी को नहीं जानता फिर भी भीड़ के हाथ सब कुछ जानते हैं कि आज उन्हें क्या करना है । हवाई अड्डे के बाहर खड़ी भीड़ पर बीच-बीच में तालिबानियों की गोलियाँ बरसने लगती हैं । बच्ची की दहशतज़दा माँ को उम्मीद है कि विदेशी सैनिक अंदर से एक इंसान होगा और उसकी बच्ची को अपने देश ले जाकर अपने परिवार का सदस्य बना लेगा । बहुत गहरे अँधेरे में यह रोशनी की एक बहुत तेज किरण है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक पॉज़िटिव थॉट से उत्पन्न हुयी है । मैं कुछ क्षणों के लिये ख़ुद को उस बच्ची की माँ की भूमिका में देखने का प्रयास करता हूँ तो अंदर से बुरी तरह टूट जाता हूँ, नहीं ... इतनी शक्ति तो ईश्वर ने सिर्फ़ माँ को ही दी है किसी पुरुष को नहीं । शायद यही वज़ह है कि भारत और पाकिस्तान के बहुत से पुरुष उस माँ की अनंत पीड़ा का अनुभव ही नहीं करना चाहते और तालिबान को अल्लाह का कानून लाने वाले निज़ाम के रूप में ही देखने की ज़िद किए बैठे हैं ।

अमरीकी सेना का जहाज हवाई पट्टी पर कुछ दूर दौड़ने के बाद अब हवा में ऊपर उठ गया है जिसे देखते ही बच्ची की माँ पहले तो जमीन पर बैठी और फिर बेहोश होकर लुढ़क गयी । बेहद ख़ुशी और बेहद दर्द को एक साथ भोगती माँ होश में कैसे रह सकती है भला!

आक्रमणकारी तालिबान के आने के बाद अफ़गानिस्तान की हर माँ चाहती है कि उनकी बच्चियाँ तालिबानियों के ज़ुल्मो-ओ-सितम से किसी तरह सुरक्षित बच जायँ भले ही उन्हें अनजान हाथों में क्यों न सौंपना पड़े । कोई नहीं जानता कि वे माएँ अपनी बच्चियों से जीवन में दोबारा कभी मिल भी सकेंग़ी या नहीं । अफ़गान माँओं के कलेजे के टुकड़ों की यह कहानी, पता नहीं इतिहास में दर्ज़ होगी भी या नहीं ।

..और यह सब हिंदुस्तान के किसी शायर को बिल्कुल भी दिखायी नहीं देता । मुझे हैरत है कि इतने क्रूरहृदय, संवेदनहीन, ज़िद्दी, पूर्वाग्रही और मानवताविरोधी लोग भी शायर कैसे हो सकते हैं! निश्चित ही यह शायरी एक खोखला आवरण है जिसे पहनकर रावण ने सीता का अपहरण किया था । हमें ऐसे आवरणों को पहचानना होगा । और आज मैं उन सभी शायरों को अपने हृदय से हमेशा के लिये ख़ारिज़ करने की घोषणा करने के लिये बाध्य हुआ हूँ जिन्हें तालिबान इंसान ही नहीं बल्कि देवता नज़र आने लगे हैं ।



हमें मत भूलो - अमाल

 

ज़िंदग़ी की तलाश में खण्डहरों से होते हुये सीरिया की एक शरणार्थी 

गोदनामे की कानूनी प्रक्रिया पूरी होते ही ब्रिटिश नागरिक ने तीन साल के उस अनाथ कुर्दिश बच्चे को गोद में उठाया और शिविर से बाहर निकल गया । बच्चे की बड़ी बहन जो कि अभी मात्र तेरह साल की थी, शरणार्थी शिविर में अपने छोटे भाई से बिछड़ने के दुःख के बाद भी ख़ुश थी । उसकी आँखों में आँसू थे और दिल में एक तसल्ली कि भाई को एक अच्छी ज़िंदगी जीने का अवसर मिल गया था ।  

कोरोना महामारी के समय जब योरोप में लॉक-डाउन किया गया तो फ़्रांस के कलाइस शरणार्थी शिविर में रहने वाले लगभग दो हजार शरणार्थियों और ग्रीस के लेस्बोस द्वीप स्थित मोरिया शरणार्थी शिविर के लगभग बीस हजार शरणार्थियों पर जैसे एक और कहर टूट पड़ा । बाहरी दुनिया से उनका सम्पर्क पूरी तरह कट गया और वे कैदी की तरह शिविर में रहने के लिये बाध्य हो गये । शरणार्थियों की सहायता करने वाली बहुत सी स्वयंसेवी संस्थाओं को भी कोरोना के कारण अपनी गतिविधियाँ बंद करनी पड़ीं जिससे शरणार्थियों की ज़िंदगी और भी बदतर हो गयी ।

मोरिया शिविर के कुल बीस हजार शरणार्थियों में से दस हजार शरणार्थी वे बच्चे हैं जिनमें से अधिकांश ने अपने माता-पिता दोनों को ही खो दिया है । योरोप के किसी देश का कोई नागरिक कभी-कभार इन शरणार्थी शिविरों में बच्चों को गोद लेने के लिये आता है तो कुछ बच्चों के भाग्य करवट लेकर उठ खड़े होते हैं लेकिन ऐसे भाग्यशाली बच्चे अपने पीछे अपने उन भाई-बहनों के लिये एक असहनीय पीड़ा छोड़ जाते हैं जिन्हें अभी तक किसी ने गोद नहीं लिया है । लोगों की प्राथमिकता प्रायः छोटे बच्चों को गोद लेने की होती है, जिसके कारण किशोरवय बच्चे अपने छोटे भाई-बहनों से बिछड़ने की पीड़ा के अथाह समुद्र में डूबने के लिये बाध्य होते हैं ।

इन शिविरों में सीरियन ही नहीं बल्कि इरिट्रियन और ईराकी आदि भी हैं । अमाल नौ साल की एक सीरियन बच्ची है जो शरणार्थी शिविर में अपनी माँ के साथ रहती है । एक दिन अमाल की माँ उसके लिये खाना लाने गयी तो कभी वापस नहीं आयी । एक ज़ियाण्ट पप्पेट गर्ल अमाल के दर्द को लेकर सीरियन तुर्किश सीमा के गाज़ियनपेट से ब्रिटेन के लिये आठ हजार किलोमीटर की पदयात्रा पर निकल चुकी है ।    

पिछले कुछ दशकों से युद्धों और जलवायु परिवर्तन के कारण न जाने कितने लोग पलायन के लिये विवश होते रहे हैं । सभ्य समाज की यह एक ऐसी त्रासदी है जिस पर विचार तो होता है किंतु काम नहीं होता । पलायन करने वाले परिवारों की समस्याओं की कल्पना भी नहीं की जा सकती । वे गम्भीर स्थितियों से होकर किसी तरह जी भर पा रहे हैं जो वास्तव में एक तरह का दण्ड है जो उन्हें चाहे-अनचाहे भोगना पड़ रहा है । उन्हें समाज की मुख्य धारा में आने के लिये जीवन भर संघर्ष करना होता है । दावानल, बाढ़, सूखा और भूस्खलन आदि प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाले पलायन के अतिरिक्त युद्धों और मनुष्यकृत अनेक पापों के कारण कश्मीर, सीरिया, ईराक, इरिट्रिया और अब अफ़गानिस्तान से लोगों का पलायन पूरी दुनिया को झकझोरने वाला है ।

धर्मिक उग्रवादियों को सहयोग करते रहने वाले तुर्की के कुछ चिंतकों और कलाकारों ने मिलकर अमाल को जिस कामना के साथ पदयात्रा पर भेजा है वह कीचड़ में कमल खिलने जैसी घटना है । चेहरे पर छलकते गहरे दर्द के साथ अपनी ख़ामोशी से हर किसी को झकझोरती हुयी आगे बढ़ती जा रही अमाल का एक ही संदेश है – “हमें मत भूलो”।


क्या नहीं भूलना है? यह हमें और आपको सोचना है । हमने प्रकृति को भुला दिया और उसका अनादर किया । सत्ताधीशों ने मानवता को भुला कर अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिये निर्दोष लोगों को युद्ध में झोंक दिया । हमने बेघर हो चुके उन लोगों की त्रासदी को भुला दिया जिसके लिये वे ज़िम्मेदार नहीं थे । समाधान खोजने के लिये हमें अपने सारे पापों को याद रखना होगा ।