मंगलवार, 14 जून 2022

ज़ुबान जिनकी सिली हुयी है


हैरान क्यों तुम मिल के मुझसे

हर बार कुछ ना कुछ पूछते हो

जितना पढ़ना हो तुम भी पढ़ लो

किताब मेरी खुली हुयी है॥

आरोप है मुझपे ये सबका

कि बकबक मैं ही करता बहुत हूँ

मैं उनके हिस्से का बोलता हूँ

ज़ुबान जिनकी सिली हुयी है॥

अभी-अभी तो शुरू सफर है

अभी तो मंजिल दूर बहुत है

उतर गये वे सभी मुसाफिर

जिन्हें इजाजत मिली हुयी है॥

ये बात जिसकी समझ में आये

जो भी चढ़ा है उतर के आये

रहोगे उन कंगूरों पे कब तक

नींव जिसकी हिली हुयी है॥

सिला ली तुमने जैसी झोली

मैं भी वैसी सिला न पाया

सौगात में बस बदनामियाँ हैं

सजा ये मुझको मिली हुयी है॥

माँगूँगा जो ना दे सकोगे

ज़िरह भी हमसे ना कर सकोगे

यहाँ रौशनी ही रौशनी है

घर की खिड़की खुली हुयी है॥

सोमवार, 13 जून 2022

जज बनती भीड़

            “ग़ुस्ताख़-ए-नबी की क्या हो सजा, सर तन से जुदा सर तन से जुदा”।

यह देश संविधान या कानून से नहीं बल्कि उस शरीया से चलेगा जो हिंसक भीड़ के दिमाग में चलता है। संविधान और कानून तो काफ़िरों के लिए होता है जिसका पालन करते-करते अब वे इतने भीरु हो चुके हैं कि किसी अन्याय का विरोध करने की उनमें जरा भी शक्ति नहीं बची।

आसमानी किताब और हदीसों में किए गए उल्लेखों के आधार पर साद अशफाक अंसारी ने नूपुर शर्मा का समर्थन किया तो पुलिस उन्हें उठा ले गयी जिससे हिंसक भीड़ ने यह संदेश ग्रहण किया कि भारत में जो भी सत्य का समर्थन करेगा पुलिस उसे उठा लेगी? नूपुर शर्मा से मुजरा करवाने, उनकी जिव्हा काटने, उनके साथ सामूहिक यौनदुष्कर्म करने और उनका सिर काटने की घोषणा करने वाली आक्रामकता पर शासन प्रशासन मौन है। अशफाक अंसारी को जेल में डाला जा सकता है, किंतु इन आक्रामक लोगों को नहीं। अब समझ में आ रहा है कि भारत में इस्लामिक शासन कैसे स्थापित हुआ, हम इतिहास को पहले से भी बुरी स्थिति में वापस आते हुए देख रहे हैं।   

योगी और हिमंता विस्वा शर्मा को छोड़ दें तो मोदी और संघप्रधान मोहन भागवत भी अराजक भीड़ को यह संदेश देने में सफल रहे कि भारत में निरंकुश और क्रूर भीड़ को कानून से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, वहीं ये लोग यह संदेश देने में भी सफल रहे कि भारत में अब हिन्दुओं के लिए कोई स्थान नहीं है। सात दशक के लम्बे विलम्ब के बाद ही सही किंतु अब सनातनी भारतीयों को यह लगने लगा है कि भारत में सत्य और न्याय के लिए भी कोई स्थान नहीं बचा है। ब्रिटिश सेना के सार्जेण्ट मोहनदास करमचंद ने अपने मालिक के प्रति वफ़ादारी दिखाते हुये भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में जो हठजाल फैलाया उससे निर्मित विकृत नीतियों से जर्जर हुए भारत के लोगों को भारतीयता की रक्षा के लिए आज भी यातनाएँ सहनी पड़ रही हैं। भारत का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है!  

कुवैत में किसी भी प्रकार का प्रदर्शन प्रतिबंधित है इसके बाद भी अपनी आदत और प्रवृत्ति के अनुरूप नियम-कानून को धता बताने वाले भारतीय मुसलमानों ने नूपुर शर्मा के विरुद्ध वहाँ प्रदर्शन किया जिससे कुवैत सरकार ने उनके वीसा स्थायीरूप से निरस्त कर उन्हें वापस भारत भेज दिए जाने के आदेश दे दिए हैं। अब कुवैत से आने वाली यह भीड़ भारत में दंगे करने के लिए स्वतंत्र रहेगी। वास्तव में नूपुर शर्मा का नाम केवल उस विरोध के लिए प्तयोग किया जा रहा है जिसका उद्देश्य भारत के सनातनियों के उन्मूलन के लिए प्रतिकूल स्थितियाँ उत्पन्न करना है। यह सीधे-सीधे गजवा-ए-हिन्द है। मोदी और मोहन भागवत बिना युद्ध किए हारने के लिए तैयार हैं। मोदी को दिया गया भारतीय जनता का इतना सशक्त समर्थन किसी काम नहीं आया।

गहरी धुंध में भाषा बदल रही है, पैमाने बदल रहे हैं और यह सब देखने वाले सनातनी भी स्वीकार करने लगे हैं कि नूपुर का बयान विवादास्पद है, नूपुर से माफ़ी मँगवायी गयी जिससे यह संदेश दिया गया कि नूपुर ने अपराध किया है। विभाजन के बाद विभाजन के अधिकांश समर्थक पाकिस्तान नहीं गए और भारत में अपनी इच्छा से ही रह गए। किसी ने नहीं विरोध नहीं किया कि विभाजन के बाद भी उनकी ऐसी इच्छा क्यों है? और अब वे कहने लगे हैं कि जिन्हें उनकी “तहज़ीब पसंद न हो वे कहीं और चले जाएँ”, “हिन्दुओ! भारत छोड़ो”, “हम भारत को हिन्दू राष्ट्र नहीं बनने देंगे”........। पाकिस्तान ले लेने और भारत के एक हिस्से को इस्लामिक मुल्क बना लेने के बाद भी उनकी ऐसी ज़िद क्यों है? इस पर कभी कोई प्रश्न नहीं पूछता बल्कि मोहन भागवत कहते हैं कि कलंक के काले पृष्ठों को दबा ही रहने दो, भारत की उत्कृष्ट सभ्यता और सत्य को दफन ही बना रहने दो, हर मस्ज़िद में भारत को मत तलाशो।

मंदिर और मस्ज़िद वे हथियार हैं जो आम जनता को पकड़ा दिए जाते हैं लड़कर मर जाने के लिए, इसके बाद जो बचता है वह सत्ता का उपभोग करता है। सारे युद्ध गजवा-ए-हिन्द के लिए हैं जिसे लुंज-पुज सत्ता के कारण सनातनी हारते जा रहे हैं। हमारा राजा हमारे शत्रुओं के साथ है।

पुरुषों और बच्चों के बाद अब महिलाएँ भी नूपुर शर्मा के विरोध में (जो वास्तव में भारत का विरोध है) सड़कों पर उतर आयी हैं। यह वह भीड़ है जो जिहाद के लिए कुछ भी कर सकने के लिए रात-दिन तैयार रहती है। यह वह भीड़ है जो हिंसक दंगों में किशोर-किशोरियों और अबोध बच्चों को भी हिंसक दंगों और आक्रामकता वाली कबीलाई सभ्यता के व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए अपने साथ दंगों में ले कर आती है। जब मुस्लिम बच्चे यह प्रशिक्षण पा रहे होते हैं तो मोहन भागवत मंदिर तोड़कर उनपर मस्ज़िद बनाने वाले मुसलमानों को अपना भाई बता रहे होते हैं। 

पहले भीड़ चाहती थी कि नूपुर को ग़िरफ़्तार कर उन्हें सजा दी जाय, अब भीड़ की माँग बढ़ गयी है। निरंकुश भीड़ की नयी माँग है कि नूपुर शर्मा को भीड़ के हवाले कर दिया जाय, वे ख़ुद उन्हें सजा देंगे। शायद वे तहर्रुश गेमिया का ख़्वाब देखने लगे हैं।

भीड़ जब “जज” बन जाती है और जज “मूकश्रोता” तो लोकतंत्र हार जाता है। भारत की हिन्दूविरोधी हिंसक भीड़ जज बन चुकी है, लोकतंत्र बंदी बना लिया गया है और सत्य को जगह-जगह सरे आम फाँसी दी जाने लगी है।

इस समय भारत के किसी भी राजनैतिक दल के पास सत्य का समर्थन करने के लिए समय नहीं है। हर कोई शतरंज खेलने में व्यस्त है।  

शनिवार, 11 जून 2022

झूठ की प्राणप्रतिष्ठा

-       उन्होंने झूठा आरोप लगाया, उसकी पुष्टि में कुछ झूठ और बोले, वे झूठ बोलते ही गये, बोलते ही गये और मात्र कुछ ही घण्टों में उनका झूठ स्थापित हो गया। जो लोग नूपुर शर्मा के पक्ष में खड़े थे उनकी भाषा में भी स्थापित झूठ का प्रतिबिम्ब दिखाई देने लगा। अब भाषा कुछ यूँ होती है- “नूपुर शर्मा के विवादास्पद बयान पर हंगामा थमने का नाम नहीं ले रहा....”, “उन्होंने ग़लती की तो उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया और एफ़आईआर भी दर्ज़ हो गयी है, अब आप और क्या चाहते हैं”?

-       जब हमने अवैध कब्जा किया था उसी समय हमें क्यों नहीं रोका, अब किसी के आशियाने को गिराने का आपको कोई हक नहीं बनता –बड़ा ओवेसी।

-       दंगों के आरोप में जिन्हें जेल में बंद किया गया है उन्हें मुआवज़ा दो –एक गांधीवादी मज़हबी चिंतक

-       दंगाइयों से मुकदमे वापस लो, नूपुर शर्मा को हमारे हवाले करो –अमनचैन वाला

-       नूपुर नचनिया को हमारे सामने पेश करो, हम उससे मुजरा करवाएँगे –नवाब सतवंत, भीमसेना 

-       भाजपा के प्रवक्ता ने हेट-स्पेच की जिससे आपसी सौहार्द्य खराब हुआ और हिंसा हुई, हिंसा और दंगों के लिए भाजपा उत्तरदाई है- ममता

-       सौ-दो सौ साल बाद जब भी हमारी हुकूमत आएगी तब हम सारे मंदिर तोड़ देंगे –ज्ञानी स्कॉलर न. एक

-       नूपुर ने मुल्क में गृहयुद्ध शुरू करवा दिया है – ज्ञानी स्कॉलर न. दो

-       “अँधेरा कायम रहे हमेशा” –मोतीहारी वाले मिसिर जी (उन्होंने यह वाक्य किसी सीरियल से चुराया है)

तैयारी...

-       जब दंगाई तलवारें, हैण्ड ग्रेनेड, पेट्रोल बम और तमंचे लेकर हमारे घर को घेर लेंगे तो हमारे पास आत्मरक्षा का सहारा होगी झाड़ू, जिससे हम बिल्ली भगाते हैं।

-       उनके पास हथियार हैं, हमारे पास दो गाल हैं।

-       हम उनसे कहेंगे कि यदि तमाचे नहीं मारना चाहते तो कोई बात नहीं, हैण्ड ग्रेनेड हमारे पर गाल पर चलाओ, तमंचे की गोली हमारे गाल पर मारो, तलवार का वार हमारे गाल पर करो। ये गाल इसीलिए बनाए गये हैं।  

-       जब तक भारत पर इस्लामिस्तान का परचम नहीं लहराने लगेगा हम नहीं मानेंगे कि गजवा-ए-हिन्द शुरू हो चुका है।    

तुम्हें अभी भी नहीं दिखाई दे रहा कि पश्चिम बंगाल में ममता के जीवित रहते कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता।

यह सरासर झूठ है कि ममता प.बंगाल की मुख्यमंत्री हैं। ममता के पास प.बंगाल के तीन पद हैं - राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सेनापति। सेक्युलर हिन्दू, मज़हबी स्कॉलर, मज़हबी नेता और स्वतंत्र टिप्पणीकार अजेय होते हैं। वें दुनिया की सारी ताकतों से ऊपर होते हैं। महबूबा एक ऐसा दुर्लभ फ़ीमेल प्राणी होता है जिससे भारत की सत्ता बहुत डरती है और जिसके सारे अपराध घटित होते ही तत्क्षण पुण्य में ट्रांसलेट हो जाया करते हैं।  

प्रयाग से एक रिपोर्टिंग, समय- दंगे की अगली सुबह, दिप्रनांक 11.06.2022

सूनी सड़क के किनारे बंद दुकानों के सामने गज़ब की बॉडी कैमिस्ट्री के मालिक स्थानीय दो अधेड़ व्यक्ति पूरी निश्चिंतता के साथ बैठे हैं, एक के मुँह में पान है। दोनों के चेहरों पर कमाल का आत्मविश्वास है। खोजी पत्रकार और दोनों नागरिकों के बीच वार्तालाप प्रारम्भ होता है –

पत्रकार– कल इसी मोहल्ले में दंगा हुआ था, आज कैसा माहौल है?

अधेड़ न.एक – (सड़क पर दूर कुछ देखते हुये) माहौल कइसा है, अच्छा है, अउर कइसा है।

पत्रकार – दंगाई कौन थे, कहाँ से आए थे?

अधेड़ न. दो – (बिना पत्रकार की ओर देखे हुए) हम क्या जानें, हमें नहीं पता।

पत्रकार – आपको डर नहीं लगता?

अधेड़ न.एक – (बिना पत्रकार की ओर देखे हुए) डर काहे का! नाहीं... हमें कोई डर-वर नहीं लगता।

पत्रकार – आप दंगाइयों को पहचानते हैं?

अधेड़ न. दो – (झल्लाते हुये) बताया न! हमें नहीं मालुम, अउर क्या बतावयँ।

प्रयागराज के दोनों अधेड़ों की बॉडी कैमिस्ट्री ने वह सब कुछ बता दिया जिसे उन्होंने बड़ी ग़ुस्ताख़ी और आत्मविश्वास के साथ छिपाने की भरपूर कोशिश की थी। अब आगे का काम पुलिस का होना चाहिए। 

राजनीति का कटु सत्य –

“हे राजन! जो सत्ता दूरदर्शी नहीं होती, जो आसन्न संकट को नहीं पहचान पाती या जो जानबूझकर गंभीर संकटों की उपेक्षा करती है, उसका  पराभव अवश्यम्भावी है। जिस देश के नागरिक अपने ही देश के सुरक्षा बलों पर आक्रमण करते हैं ...बारम्बार करते हैं, करते ही रहते हैं, और जिन्हें कोई रोक नहीं पाता, वे ही एक दिन उस देश के मालिक बनते हैं। जो समाज सत्य का समर्थन नहीं करता, जो अपनी रक्षा करने में असमर्थ होता है उसे या तो दास बनना होता है या फिर सदा के लिए समाप्त होना होता है”।

नकार की प्रचण्डता 

संविधान, कानून, शासन और सत्ता के तंत्र आपको अनुशासित, सभ्य और व्यवस्थित किंतु भीरु बनाते हैं। जब आप इन सभी को को नकार देते हैं तो आप निरंकुश, असभ्य और अनियंत्रित किंतु प्रचण्डरूप से शक्तिशाली हो जाते हैं। आज देश भर में जो आग लगी हुयी है वह इसी नकार को नकारने का परिणाम है। हमने भीमराव आम्बेडकर, सरदार पटेल और सुभाषचंद्र बोस की दूरदर्शिता का सम्मान नहीं किया और 1947 से ही भारतीय समाज को निरंतर भाड़ में जलने के लिए झोंकते रहे। नकार की प्रचण्डता सब कुछ ख़ाक कर देने पर आमादा है।

कानपुर की हिंसा में लगभग पचास सरकारी अधिकारी और पुलिसकर्मी सम्मिलित पाए गये। अभी कुछ दिन पहले सेना के जवानों को ले जा रहे वाहन चालक ने वाहन से कूदकर उसे पहाड़ी रास्ते से गहराई में नीचे गिरा दिया जिससे सेना के कई जवानों की पीड़ादायक मृत्यु हो गयी। जिहाद के इस स्वरूप से जूझने के लिए हमारे पास कौन सी व्यवस्था है?

नमाज और हिंसा

शुक्रवार की नमाज के बाद नमाजियों द्वारा अल्पवय बच्चों को आगे करके पत्थरबाजी की बढ़ती घटनाएँ नमाज के धार्मिक प्रभाव पर प्रश्नचिंह लगाती हैं। इन बच्चों को यह कैसी धार्मिक तालीम दी जा रही है? यह तालीम का प्रभाव इतना विषाक्त और हिंसक क्यों है?

जब धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का दुरुपयोग होने लगे, स्थितियाँ अनियंत्रित होने लगें और देश की सुरक्षा पर गम्भीर संकट मँडराने लगे तो ऐसी धार्मिक आज़ादी को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए। हम इतने मूर्ख नहीं जो यह समझ न सकें कि नमाज के बहाने भीड़ को जुटाने और फिर हिंसक कार्यवाही करते हुये गजवा-ए-हिन्द के रास्ते पर दौड़ने की यह कवायद गैर-मुसलमानों के लिए कितनी विनाशकारी है।

दुर्भाग्य है कि सरकारें धर्म के इस विकृत और विनाशकारी स्वरूप को जानकर भी रोक पाने में असमर्थ हो रही है। जनता जानना चाहती है कि साम्प्रदायिक हिंसा भड़काने वाले लोगों को अपना काम करने के लिए आज़ाद क्यों रखा गया है, क्यों नहीं इन पर कार्यवाही की जाती, जबकि वे खुल कर विनाश और हिंसा की धमकियाँ दे रहे हैं? यह ठीक उसी तरह है जैसे सिगरेट की डिब्बे पर वैधानिक चेतावनी की औपचारिकता पूरी करके सिगरेट का उत्पादन, विक्रय और पीने की खुली छूट। सरकार को समय रहते कड़े निर्णय लेने होंगे अन्यथा भारत को गृहयुद्ध की आग में जला देने की मुस्लिम नेताओं की धमकी को सच होने से रोका नहीं जा सकेगा। यह भी तय है कि हिन्दुओं की सामूहिक हत्या और पूरा हिंदुस्तान छीन लेने के बाद भी ये लोग हिंसा से बाज नहीं आने वाले। पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान के उदाहरण हमारे सामने हैं।    

शुक्रवार, 10 जून 2022

जुम्मे की नमाज और पत्थर

            जुम्मे की नमाज के बाद पत्थरबाजी, हिंसा और आगजनी अब परम्परा बनती जा रही है। यह परम्परा शहर-दर-शहर फैलती जा रही है। ओवेसी बंधु राम, लक्ष्मण, हनुमान और दुर्गा आदि के नाम को भी मनहूस बताते हैं जिसे कभी हेट-स्पीच नहीं माना जाता रहा। पिछले लगभग दो दशकों से भारत की जनता को परोक्ष एवं अपरोक्ष रूप से यह बताया जाता रहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस्लामिक धमकियाँ, निजाम की हुकूमत और हिन्दुओं की सामूहिक हत्या जैसी बातों का ऐलान करना, साथ ही मनुस्मृति को जूतों तले रौंदना संविधान के अनुसार अनुचित नहीं है, यदि अनुचित माना जाता तो उन पर कठोर कार्यवाही की गयी होती और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति थम चुकी होती। यह भी बड़े जोर-शोर से बताया जाता रहा है कि क्रिटिक के नाम पर देवी-देवताओं के बारे में अश्लील टिप्पणियाँ और कला के नाम पर अश्लील चित्रकारी करना गंगा-जमुनी तहज़ीब और विविधता के लिए आपत्तिजनक नहीं है, यदि यह आपत्तिजनक माना गया होता तो इस पर कार्यवाही हुयी होती। पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा यह भी बताया गया कि इस देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला अधिकार है, यदि यह न बताया गया होता तो रेलवे प्लेटफ़ॉर्म, पार्क, सड़क और मंदिर परिसर जैसे सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण कर मजार, दरगाह और मस्ज़िदें नहीं बनायी गयी होतीं।

यह कभी नहीं बताया गया कि इस देश के संसाधनों पर हिन्दुओं का पहला अधिकार क्यों नहीं है? यह कभी नहीं बताया गया कि गाली और अपमानजनक व्यवहार उनके लिए हेट-स्पीच क्यों नहीं है और प्रतिवाद करना हमारे लिए हेट-स्पीच क्यों है? यह कैसा देश है? हम कैसे देश के निवासी हैं?

संविधान की पुस्तक में राम का चित्र है, जिनका नाम भी लेना विधायक अकबरुद्दीन ओवेसी को मनहूस लगता है। कोई यह नहीं बताता कि राम के नाम को मनहूस कहने का अर्थ संविधान को भी मनहूस बताना है। भारत के सनातनी यह समझ पाने में असमर्थ हैं कि भारत में हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए अलग-अलग पैमाने क्यों हैं?

पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के पैतृक गाँव में धार्मिक सौहार्द्य ख़राब होने की आशंका के कारण दुर्गा पूजा प्रतिबंधित होती है किंतु आये दिन शुक्रवार को नमाज के बाद होने वाली पत्थरवाजी को रोकने के लिए सामूहिक नमाज को प्रतिबंधित करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अराजकता को नियंत्रित करने के लिए सत्ता का यह कैसा प्रबंध है? इसका उत्तर मोदी और मोहन भागवत के पास नहीं, किंतु सनातनियों के पास है जो उचित समय पर बताया जाएगा।

ना ना, इसे अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध नहीं कहते

पश्चिम बंगाल में चुनाव के समय और बाद में बड़े पैमाने पर हुयी हिंसा के बाद भी राष्ट्रपती शासन नहीं लगाए जाने से उत्साहित अराजक तत्वों के हौसले और भी बुलंद हुए हैं। यही कारण है कि हनुमान चालीसा पढ़ने का संकल्प करने पर राणा दम्पति को जेल की सजा काटनी पड़ती है, किंतु नूपुर शर्मा के साथ सामूहिक यौनदुष्कर्म करने का ऐलान करने वाले को पकड़ा भी नहीं जाता। हेट-स्पीच की सिलेक्टिव परिभाषाओं और कानूनी कार्यवाहियों के बाद भारत की सनातनवादी हिन्दू जनता के सामने मौनधारण कर लेने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं बचता। क्या भारत का लोकतंत्र अब इसी तरह चलेगा? एक ब्रिटिश सार्जेण्ट की मनमानी और हठों से हुये परिवर्तनों के परिणाम भारत की जनता को न जाने कितनी सदियों तक भोगना पड़ेगा, और अब हिन्दुत्व के ठेकेदार भारत के वर्तमान बंदी बनाने और भविष्य को पूरी तरह समाप्त कर डालने की राह पर चल पड़े हैं।  

योगी के कठोर शासन के बाद भी आये दिन उत्तर-प्रदेश में नई-नई हिंसक चुनौतियों का सिर उठाना क्या संकेत करता है, इसका यदि सही उत्तर दिया जाय तो उसे हेट-स्पीच मानकर कानूनी कार्यवाही होने का ख़तरा है। तमसोमा ज्योतिर्गमय अब भारत का आदर्श वाक्य नहीं रहा। हमें प्रकाश से अंधकार की ओर चलने के लिए बाध्य किया जा रहा है। भारत की संस्कृति और अस्तित्व को समाप्त करने के लिए हिन्दुओं के स्वयंभू ठेकेदार पूरे जोश में हैं।

भारत में धर्मांतरण की स्वतंत्रता है किंतु घर वापसी पर आपत्ति है। घर वापसी के लिए सहयोग करने वाले स्वामी जीतेंद्रनारायण जैसे संतों को हत्या करने की धमकी दी जा रही है। किसी की हत्या की धमकी और सामूहिक यौनदुष्कर्म करने वाले के लिए करोड़ों के इनाम के घोषणा न तो हेट-स्पीच है और न आपसी सौहार्द्य समाप्त करने का कारण है। घरवापसी करने वाले एक्स मुसलमान युवकों और लड़कियों को खुले आम हत्या की धमकी देने वालों पर कोई कार्यवाही न होना इस बात की घोषणा है कि भारत में मुसलमानों को हर तरह की छूट है जबकि सनातनियों को आत्मसम्मान से जीने का कोई अधिकार नहीं है।

भारत के सनातनियों को भारत की अखण्डता, सम्प्रभुता और सांस्कृतिक सुरक्षा के लिए एक सशक्त राजनीतिक विकल्प का तुरंत निर्माण करना होगा।  

फ़ैक्ट चेक में मिलावट

विषय था ज्ञानवापी परिसर में प्राप्त शिव मंदिर के साक्ष्यों का जिसमें अन्य सारे महत्वपूर्ण साक्ष्यों को पीछे धकेलते हुये सारी चर्चा को केवल शिवलिङ्ग पर ही केंद्रित क्यों किया जाने लगा, हम यह आज तक नहीं समझ सके। टीवी चैनल्स ने सनसनी फैलाने के लिए उद्देश्यहीन डिबेट्स आयोजित करनी प्रारम्भ कीं जिससे पूरे देश में हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण को और हवा मिलने लगी। जिन्हें लिङ्ग का अर्थ भी नहीं पता वे विमर्श में साधिकार सम्मिलित हुये और ताल ठोककर शिवलिंग के बारे में अश्लील एवं अपमानजनक टिप्पणियाँ करनी शुरू कर दीं। दो पीढ़ी पूर्व हिन्दू से मुसलमान बने तसलीम रहमानी ने आग लगायी जिस पर प्रतिक्रिया करते हुए नूपुर शर्मा ने कुरान के तीन उदाहरणों का उल्लेख किया। पहला था छह साल की आयशा से बावन साल के नबी का निकाह और नौ साल में शादी। दूसरा था – धरती का चपटा होना, और तीसरा था- उड़ने वाले घोड़े का उल्लेख। इन तीनों बातों का उल्लेख कुरआन में किया गया है, इसके बाद भी नूपुर पर ईशनिंदा का आरोप लगाकर उनके साथ सामूहिक यौनदुष्कर्म करने, ज़ुबान काटने और सिर काट कर लाने वाले लोगों को कई व्यक्तियों एवं मुस्लिम संगठनों ने एक-एक करोड़ के इनाम का ऐलान कर दिया। एक करोड़ के इनाम का ऐलान करने वालों में अधिवक्ता अली अब्बासी, भीम पार्टी के प्रमुख नवाब सतवंत तंवर और ओवेसी की पार्टी भी सम्मिलित है।

जिहादी वातावरण की घात लगाकर बैठे एक फ़ैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर ने इस विवाद में घुसपैठ की, बहाना किया फ़ैक्ट चेक का और कर दी मिलावट अपने मिशन की। मोहम्मद जुबैर ने बड़ी चतुराई दिखाते हुये नूपुर शर्मा के साथ तसलीम रहमानी की डिबेट के कुछ अंशों को फ़ोर्टीफ़ाइड करते हुये मुस्लिम देशों में हिन्दुओं के विरुद्ध घृणा फैलाने की लॉबिंग की और सफल हुआ। इसके बाद दंगों और धमकियों का एक दौर शुरू हुआ जिसके शोर शराबे में फ़ैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर और आग लगाने वाले तस्लीम रहमानी अद्भुत तरीके से मंच से अदृश्य हो गये जबकि नवीन ज़िंदल नेपथ्य में चले गये और नूपुर शर्मा को खलनायिका बनाकर प्रस्तुत कर दिया गया। भारत सरकार ने नूपुर के प्रतिक्रियात्मक वक्तव्य को हेटस्पीच माना और उन पर पार्टी से निलम्बन की कार्यवाही कर दी, जबकि भीम सेना के चीफ़ सतवंत तंवर द्वारा नूपुर के बारे में कही गयी तमाम आपत्तिजनक और अपमानजनक बातों पर कार्यवाही की अभी तक आवश्यकता नहीं समझी गयी। भारत साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण, हिंसा और विद्वेष की आग में जलने लगा है। कई शहरों में शुक्रवार की नमाज के बाद पथराव होने लगे हैं। नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल के साथ-साथ अन्य कई लोगों पर कार्यवाहियाँ शुरू कर दी गयी हैं, सिवाय उन लोगों के जो इस काण्ड के मुख्य खलनायक हैं। विश्वगुरू बनने का दावा करने वाले भारत को कतर जैसे देशों के सामने झुककर भारत के स्वाभिमान की हत्या कर देने के लिए तैयार होना पड़ा। रण में शौर्य प्रदर्शित करने के आदर्श वाला भारत रणछोड़दास बन गया।

चौथे स्तम्भ की भूमिका

पत्रकारिता के नाम पर वक्ता की रक्षात्मक प्रतिक्रिया को विवादास्पद कहने का चलन भारत में स्थापित हो चुका है। सुलझाने के स्थान पर उलझाने वाले इस मंत्र को जपने वाले पत्रकारों की बल्ले बल्ले।

कई टीवी चैनल्स किसी भी नेता या संत के वक्तव्य को अविवादित होने पर भी विवादित कहने का शौक करते रहे हैं। नूपुर शर्मा का वक्तव्य रक्षात्मक प्रतिक्रिया थी जिसे किसी भी कोण से विवादास्पद नहीं माना जा सकता किंतु कई टीवी चैनल्स यहाँ तक कि जी टीवी के सुधीर चौधरी भी उनके वक्तव्य को “विवादास्पद बयान” बताने में संकोच नहीं करते।

शिव के लिए मुस्लिम स्कॉलर के आपत्तिजनक वक्तव्य पर नूपुर शर्मा के आयशा के निकाह व शादी के उद्धरण के साथ प्रतिक्रियात्मक वक्तव्य को विवादास्पद बताने वाले टीवी चैनल्स, राजनेताओं और मुस्लिम स्कॉलर्स को इस्लामिक जगत में प्रोत्साहित किया जा रहा है। आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड की माँग है कि नूपुर शर्मा का निलम्बन पर्याप्त नहीं, उन पर कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए। कुछ लोग चाहते हैं कि उन्हें तुरंत फाँसी दी जानी चाहिए। कुछ लोग चाहते हैं कि नूपुर शर्मा को उनके दरबार में नाचने के लिए पेश किया जाना चाहिए। कुछ संगठनों और व्यक्तियों ने नूपुर शर्मा को उनके साथ सामूहिक यौनदुष्कर्म करने एवं हत्या कर देने की धमकियाँ दीं जिन पर तत्काल किसी कार्यवाही की आवश्यकता नहीं समझी गयी। आनन-फानन में कतर, कुवैत, ईरान, सऊदी अरब, बहरीन, यूएई, ओमान, इण्डोनेशिया, ईराक, मालदीव, जॉर्डन, लीबिया, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान आदि 57 सदस्यीय इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी ने प्रकरण को जाने- समझे बिना ही भारतीय राजदूतों को बुलाकर अपना विरोध प्रकट किया।  

मुम्बई में रज़ा अकादमी ने नूपुर के विरुद्ध एफ़ आई आर दर्ज़ की। महाराष्ट्र की टीपू सुल्तान पार्टी द्वारा भी एक एफ़आईआर दर्ज़ की गयी। अलकायदा ने दिल्ली और मुम्बई पर आत्मघाती हमले की धमकी दी और दुनिया भर के मुसलमानों द्वारा धमकियों और विरोधों का दौर शुरू हो गया। इस बीच मानवतावादी और पाक-साफ विचारधारा वाली गिनी चुनी मुस्लिम महिलाओं और पुरुषों द्वारा नूपुर शर्मा का जोरदार समर्थन करते हुये उनकी बेगुनाही के पक्ष में तर्क प्रस्तुत किए गये किंतु इस सारे हंगामे के बीच उनकी आवाजें अधिक प्रभावी नहीं हो सकीं। हमें भी लगता है कि अब यह मामला सुनवायी के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना ही चाहिए जिससे सारे फ़ैक्ट्स सामने आ सकें और दोषियों को दंडित किया जा सके। यूँ भारत का मुसलमान इतने से भी संतुष्ट नहीं है वह नूपुर शर्मा को ख़ुद अपने हाथों से फ़ाँसी की सजा देना चाहता है। ये वही मुसलमान हैं जो मोहन भागवत के भाई हैं।   

हामिद अंसारी का कच्चा चिट्ठा – Mission R&AW (लेखक -आरके यादव, पूर्व अधिकारी रा)

दस साल तक भारत के उपराष्ट्रपति रहे, तीन साल तक संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि रहे, कई देशों में भारत के राजदूत और विदेश सेवा के अधिकारी रहे हामिद अंसारी की भारत के प्रति निष्ठा पर प्रश्न नहीं उठाये जा रहे बल्कि भारत के प्रति विश्वासघात के प्रमाणों को सार्वजनिक किया जा रहा है। यह आवश्यक है, भारत के लोगों को यह जानने का अधिकार है कि उनके देश की बागडोर कैसे लोगों के हाथों में रही है। विभिन्न सेवाओं और राजनैतिक दायित्वों से मुक्त होने के बाद हामिद अंसारी भारत विरोधी आतंकी संगठनों के समारोहों में भाग लेने के लिए जाने जाते हैं। ईरान में भारत के राजदूत रहने की अवधि में हामिद अंसारी ने बड़ी क्रूरतापूर्वक भारतीय अधिकारियों को शारीरिक यंत्रणाएँ दिलवाने में ईरान सरकार के प्रतिनिधि की तरह कार्य किया। हामिद का इस्लामिक और पाकिस्तान के प्रति प्रेम के साथ-साथ भारत के प्रति द्वेषभाव अब और भी खुलकर सामने आने लगा है। भारत और भारत के बाहर भी इतने महत्वपूर्ण पदों पर दीर्घकाल तक हामिद अंसारी जैसे भारत विरोधी व्यक्ति का बने रहना भारत की राजनीति में विश्वासघाती तत्वों की मजबूत जड़ों के अस्तित्व का एक नमूना मात्र है।   

अपमान किसका

        ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं जिसे कोई सम्मानित या अपमानित कर सके, ईश्वर तो मान-अपमान जैसे सभी विकारों से परे है। राम-कृष्ण-परशुराम... आदि और हमारे पूर्वज जो परलोक सिधार गए वे भी राग-द्वेष और मानापमान से परे हो गये। माँ दुर्गा, देवी सरस्वती, गौरी, गणेश, शिव, मनुस्मृति, वेद, पुराण, गौ, गंगा आदि को गालियाँ देकर, उनके बारे में अश्लील टिप्पणियाँ करके तुम किसे अपमानित करते हो!

जब तुम सत्य से दूर और तर्कशून्य होते हो तो उन्हें अपमानित करते हो जो हमारे चिंतन में हैं, जो हमारे आदर्श हैं, जो हमारी संस्कृति के प्रतीक हैं, जो हमारी प्रेरणा के स्रोत हैं और जो हमारे नित्य समीप हैं। राम-कृष्ण-दुर्गा... आदि को माध्यम बनाकर तुम हमारी आस्था पर आघात करते हो, हमारे चिंतन को निकृष्ट और अपने चिंतन को उत्कृष्ट सिद्ध करने का प्रयास करते हो। सभ्यताओं का आपस में टकराव नहीं होता, असभ्यता का सभ्यता से टकराव होता है। अपसंस्कृति का संस्कृति से टकराव होता है। दुर्जन का सज्जन से टकराव होता है।

हम आहत होते हैं जब तुम विज्ञान को हटाकर अविज्ञान को प्रतिष्ठित करने का हठ करते हो। हम आहत होते हैं जब तुम प्रकृति पर विकृति को थोपने का हठ करते हो। हम आहत होते हैं जब तुम उत्कृष्ट को निकृष्ट और निकृष्ट को उत्कृष्ट ठहराने का हठ करते हो। हम आहत होते हैं जब तुम अपने विचार हम पर थोप कर हमारी संस्कृति और सभ्यता पर आक्रमण करते हो। हम आहत होते हैं तुम्हारी उस स्वेच्छाचारिता से जो समूची धरती को कृष्ण विवर में ले जाने के हठ पर अड़ी हुयी है। हम आहत होते हैं उन अँधेरों से जो प्रकाश की किरणों को निगल जाने के लिए हर पल तैयार रहती हैं। हमारा विरोध तुम्हारी स्वेच्छाचारिता से उत्पन्न होने वाली उन स्थितियों से है जो हमारे जीवन को निकृष्ट बनाने के लिए सदा उद्यत रहती है। हमारा संघर्ष अपनी संस्कृति को बचाने का संघर्ष है, और हम यह संघर्ष करते रहेंगे।

 धर्मयुद्ध

धर्म तो प्रकृति का विज्ञान है। धर्म के प्रतिकूल आचरण करना अधर्म है जो विकृतियों का कारण होता है। इसीलिए महर्षि चरक अधर्म की गणना रोगों के इटियोलॉजिकल फ़ैक्टर्स में करते हैं। All the pathological conditions are initiated only in the absence of धर्म. All the conditions unfavorable to our body and mind lie under अधर्म. The same conditions are applied with all the activities of life, society, politics, industries and even cosmos too.

शरीर में उत्पन्न होने वाले फ़्री रेडिकल्स को निष्क्रिय करने के लिए एण्टी-ऑक्सीडेण्ट्स को सतत संघर्ष करते रहना होता है। यह धर्म और अधर्म के बीच का युद्ध है। इस संघर्ष में न्यूनता व्याधि को जन्म देती है और संघर्ष का अभाव मृत्यु को आमंत्रित करता है। इसलिए धर्म और अधर्म के बीच सतत युद्ध अनिवार्य है। हम इससे न तो पीछे हट सकते हैं और न बच सकते हैं।

हमें अपने भौतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए धर्मयुद्ध करना ही होगा। हम अस्तित्व की बात करते हैं, वर्चस्व की नहीं। जबकि तुमने अपने अस्तित्व को वर्चस्व से जोड़ दिया है।

गुरुवार, 9 जून 2022

हम नूपुर शर्मा के साथ हैं

            भाजपा प्रवक्ताओं के लिए निर्मित आचार संहिता में धर्म पर टिप्पणी करना प्रतिबंधित कर दिया गया है। कई लोगों के भाषणों को “हेट-स्पीच” के रूप में चिन्हित किया गया है। अब भाजपा को धर्मनिरपेक्षता का हिज़ाब ओढ़कर ही आगे बढ़ना होगा। यह उस राजनीतिक दल की आचार संहिता है जिसकी केंद्र में सत्ता है। क्या यह आचार संहिता अन्य लोगों के लिए भी बाध्यकारी नहीं होनी चाहिए! और फिर यह जागरण आज अनायास क्यों? एक-दो प्रवक्ताओं को छोड़ दें तो टीवी डिबेट्स में उमड़ी रहने वाली भीड़ में हेट-स्पीच के अतिरिक्त और होता ही क्या है!

भारत के लोगों को नहीं मालूम कि दुर्गा, सरस्वती, शिव, पार्वती और गणेश आदि आराध्य देवी-देवताओं पर अश्लील टिप्पणियों की सालों से चली आ रही बौछारों, पंद्रह मिनट में हिन्दुओं को काट डालने, हिन्दुओं को भारत से कहीं और चले जाने, और भारत को इस्लामिक मुल्क बनाने की सार्वजनिक घोषणाओं जैसी भयभीत करने वाली अनेक धमकियों को ईशनिंदा और हेट-स्पीच से मुक्त क्यों रखा गया है?

ईशनिंदा के बिना ईशनिंदा के आरोप का सामना करने वाली नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल का भाजपा से निष्कासन भारतीय आदर्शों, सनातन सभ्यता, आर्य संस्कृति, मानवीय मूल्यों, सत्य और नैतिकता का निष्कासन है। उनका निष्कासन उस भीरुता का परिणाम है जो कभी सत्य का सामना नहीं कर पाती। उनका निष्कासन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बंदी बनाना है। उनका निष्कासन भाजपा के लिए आत्मघाती निर्णय है।      

भारत में नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल के निष्कासन के बाद अब उन्हें दंडित किए जाने की भी माँग होने लगी है, जबकि उनके समर्थन में कई मुस्लिम विद्वानों, सनातनी मुसलमानों और विश्व के कई देशों ने खड़े होना प्रारम्भ कर दिया है। नूपुर शर्मा का समर्थन करना सत्य का समर्थन है, उनका समर्थन उस मूर्खतापूर्ण हठ का विरोध करना है जो किसी न्याय या तर्क में विश्वास ही नहीं रखता। इस तरह के हठी विश्वासों से दुनिया नहीं चलती, हाँ! संहार अवश्य होता है। नूपुर शर्मा का समर्थन करना उन विदेशियों की विवशता भी है जो ऐसी घटनाओं से अपने देश को बचाना चाहते हैं, अन्यथा इस तरह बे-बात के तूफान हर देश में आने में देर नहीं लगेगी।

मुस्लिम तुष्टिकरण के व्यामोह में मोदी ने भारत का कद अंगोला के सामने बहुत बौना कर दिया है। अंगोला ने अपने देश की सम्प्रभुता और संस्कृति पर विदेशी संस्कृति के आक्रमण से सुरक्षित रखने के लिए इस्लाम पर प्रतिबंध लगा दिया तो अंगोला समाप्त नहीं हो गया। दूसरी ओर भारत प्रतिबंधों के भय से मुस्लिम देशों के आगे दंडवत हो गया। पश्चिमी देशों ने रूस पर भी प्रतिबंध लगाए, बहुत जोर-शोर से लगाए, रूस तो समाप्त नहीं हुआ, हमने रूस से क्या सीखा?

सनातन हिन्दू राष्ट्र

            धर्मांतरण और घरवापसी की घटनाओं ने प्रमाणित किया है कि हिन्दू जब मूर्ख, चिंतनशून्य और पाखण्डी हो जाता है तब वह इस्लाम की ओर देखने लगता है और जब कोई मुसलमान तर्क, चिंतन, मंथन और सत्य की खोज में आगे बढ़ना प्रारम्भ करता है तब वह सनातन की ओर देखना प्रारम्भ कर देता है।

भारत और दुनिया भर में हो रही हिंसक घटनाएँ यह प्रमाणित करती हैं कि सेक्युलरिज़्म उन सभी देशों के लिए घातक सिद्ध हुआ है जिनमें बाहर से आने वाले अन्य धर्म के लोगों ने शरण ली है।

भारत में हिन्दुत्व और सनातन की बात क्यों नहीं होना चाहिए? विश्व की जिस सबसे प्राचीन जीवनपद्धति, संस्कृति और सभ्यता को निरंतर परिमार्जन और विमर्शों के लिए मुक्त रखा गया है, जहाँ स्थिरता नहीं गति है, जहाँ बहिष्कार नहीं समावेश है उसका अपना कोई घोषित देश क्यों नहीं होना चाहिए? जिन्होंने भारत को हमसे छीन लिया है हमें उनसे अपना देश वापस क्यों नहीं लेना चाहिए? भारत के संसाधनों पर पहला अधिकार उन लोगों का क्यों होना चाहिए जो भारतीय संस्कृति को अपनी संस्कृति नहीं मानते और अरबी संस्कृति को भारत पर थोपना चाहते हैं? भारत के बारम्बार विखण्डन और विघटन के कारणों पर प्रहार क्यों नहीं होना चाहिए? भारत में शरीयत और इस्लाम के वर्चस्व की बात क्यों होना चाहिए? भारत को भारत के तरीके से नहीं अरबी तरीके से चलाने का हठ क्यों होना चाहिए? भारत में रामराज्य क्यों नहीं और निजाम की हुकूमत क्यों होनी चाहिए?

भारत की आत्मा को पुनर्जीवित करने के मार्ग में जो भी बाधाएँ हैं उन्हें पहचानकर समाप्त करना होगा। संविधान यदि आड़े आता है तो उसे बदल दिया जाना चाहिए, संविधान भारत के लिए है, भारत संविधान के लिए नहीं है। भारत का संविधान सनातन भारतीयों के हित के लिए होना चाहिए न कि विदेशी आक्रमणकारियों और उनके समर्थकों के हित के लिए? जो संविधान, जो कानून भारत के सनातनियों के हितों की रक्षा कर सकने मे असमर्थ हैं उन्हें सबके कल्याण के लिए अनुकूल क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए?