शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

"वर्ण" - एक वैज्ञानिक अवधारणा

भारतीय मानते हैं कि वरण करने से वर्ण की उपलब्धि होती है। 

वरण, अर्थात् चयन और अनुकूलन की प्रक्रिया। 'वर्ण' एक वर्गीकृत स्थिति की उपलब्धि है जिसे व्यक्तिगत प्रयासों से प्राप्त किया जा सकता है। यह वंशानुगत गुणों के विकास और विशिष्ट स्थिति को प्राप्त करने के लिए अनुकूलन की एक जटिल प्रक्रिया है जिसे समझने की दृष्टि से चतुर्वर्ण के रूप में वर्गीकृत किया गया है। देश-काल से निस्पृह, संपूर्ण मानव समाज जैविक रूप से (शारीरिक-मनोवैज्ञानिक रूप से) इन विशिष्ट स्थितिगत समूहों में विभाजित है। यह एक नैसर्गिक व्यवस्था है, मनुस्ममृति की नहीं। प्रकृति हमें बनाती है, हम प्रकृति को नहीं बनाते।

दुर्भाग्य से शूद्र संज्ञा को विवादास्पद और विघटन का कारण बना दिया गया, पर शूद्रों में न केवल किसान और शारीरिक श्रमिक सम्मिलित हैं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों और उद्योगों में तकनीकी कौशल और विशेषज्ञता रखने वाले तकनीकी व्यक्ति भी सम्मिलित हैं। संपूर्ण मानवीय गतिविधियाँ या तो 1. बौद्धिक गतिविधियों, 2. शारीरिक-मनोवैज्ञानिक गतिविधियों, 3. उद्योग और व्यवसाय से संबंधित गतिविधियों, या 4. कृषि और विभिन्न प्रौद्योगिकी से संबंधित गतिविधियों के आसपास घूमती हैं। संपूर्ण विश्व इन्हीं गतिविधियों के समूह के अनुसार संचालित होता है। इसलिए वैश्विक समाज भी इसी के अनुरूप व्यवहार करता है, भले ही अन्य सभ्यताओं में इसे इस तरह वर्गीकृत न किया गया हो। ईश्वर प्रदत्त क्षमताओं के आधार पर मनुष्यों का पूर्ण वर्गीकरण भारतीय मनीषियों की विशिष्ट उपलब्धि है।

अस्सी (गतांक से आगे)

पश्चिम की खिड़की

स्वतंत्रता सभी प्राणियों का नैसर्गिक अधिकार है किंतु स्वतंत्रता में यदि आत्मानुशासन न हो तो वह स्वच्छंदता हो जाती है जो अंततः अव्यवस्था और कालांतर में परतंत्रता का कारण बनती है।
पश्चिमी समाज की पारिवारिक संरचना के संबंधों में आत्मानुशासन की जो शिथिलता है उसके परिणाम अब वहाँ के लोगों को त्रस्त करने लगे हैं। अब उन्हें पूरब की खिड़की से आने वाली प्रत्यग्र वायु आकर्षित करने लगी है।
भारत में कौमार्यत्व की पवित्रता को पुरुष वर्चस्व और उसकी दासता का उपकरण मानने वाली स्त्रियों के वैचारिक आंदोलन किशोरियों को आकर्षित करते हैं। इसे क्रांति की प्रचंड लहर माना जाने लगा है। परिणामतः नूतन बयार की उत्कट लालसा उन्हें अविवाहित संबंधों की ओर ले कर उड़ चली है। पश्चिम में असमय मातृत्व का बोझ किशोरियों को ही झेलना पड़ रहा है, किशोरों को नहीं। नारीमुक्ति आंदोलनकारियों के पास इस समस्या का कोई स्पष्ट समाधान दिखाई नहीं देता।
नारीमुक्ति आंदोलन स्त्री-पुरुष साहचर्यता की नैसर्गिक व्यवस्था को विवाहमुक्त संबंधों में तो परिवर्तित कर सकते हैं पर उसकी आवश्यकता को नकार नहीं सकते।
पश्चिम में गृहविहीन किशोरों-किशोरियों की स्थिति सरकारी सहयोगों के बाद भी सुधर नहीं पा रही है। उन्मुक्त सहवास के अवांछित परिणामों और अनिश्चित भविष्य ने उन्हें घातक द्रव्यों के सेवन की ओर धकेल दिया है।
नारीमुक्ति आंदोलन वाली स्त्रियों के एक वर्ग ने तो पुरुष से प्रतिशोध लेने की ठान ली है। अच्छे पदों पर कार्यरत ये उच्चशिक्षित नारियाँ पुरुषों के प्रति अभद्र शब्दों, वाचिकहिंसा और अपमानजनक टिप्पणियों को स्त्रीशौर्य का आवश्यक उपकरण मानती हैं। उनकी तीक्ष्ण गालियों के स्तर नें समकक्ष शिक्षित पुरुषों को तो छोड़िये अशिक्षित और अपराधीवृत्ति के पुरुषों को भी बहुत पीछे छोड़ दिया है।
आश्चर्यजनक तो यह है कि उनकी गालियों में यौनक्रिया के विद्रूप शब्दचित्र तो होते ही हैं, पुरुष की माँ-बहन को भी नहीं छोड़ा जाता। यह कैसी नारीमुक्ति है जिसके प्रतिशोध के लक्ष्य से नारी भी मुक्त नहीं!
नयी बयार के लिए उमड़ती भीड़ में हेरोइन और कोकीन जैसे द्रव्यों से भी अधिक घातक मदकारी द्रव्यों का प्रचलन  अमेरिका के लिए तो चुनौती है ही, अब भारत के लिए भी चुनौती बनता जा रहा है। अमेरिका का यह शोधपत्र सभी देशों के लिए गंभीर चेतावनी है -
For years, students in middle and high schools across the country were urged to “just say no” to drugs and alcohol. But it’s no secret that the Drug Abuse Resistance Education (D.A.R.E.) program, which was typically delivered by police officers who urged total abstinence, didn’t work. A meta-analysis found the program largely ineffective and one study even showed that kids who completed D.A.R.E. were more likely than their peers to take drugs (Ennett, S. T., et al., American Journal of Public Health, Vol. 84, No. 9, 1994Rosenbaum, D. P., & Hanson, G. S., Journal of Research in Crime and Delinquency, Vol. 35, No. 4, 1998)


शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

अस्सी

देश में यौनोत्पीड़न की कम से कम अस्सी विदित घटनायें प्रतिदिन हो रही हैं, अविदित घटनाएँ तो इतनी अधिक हैं कि उनका अनुमान भी लगा सकना आसान नहीं है। अस्सी की पटकथा में छह वर्ष की बच्चियाँ और दस वर्ष के बालक भी सम्मिलित हैं जो तापसी पन्नू को व्यथित करते हैं। आज से देश भर में "अस्सी" का प्रदर्शन हो रहा है। तापसी चाहती हैं कि दर्शक इसे न्यायाधीश की तरह देखें।

"अस्सी" की व्यथा से भिन्न इसी युग की स्त्री की एक और व्यथा है जो स्त्रीमुक्ति की छटपटाहट से परिपूर्ण है। दोनों व्यथाओं में दो तत्व उभय हैं -यौनोत्पीड़न और पुरुष वर्चस्व।

आधुनिक समय में पुरुषवर्चस्व के विरुद्ध नारी-मुक्ति, नारी-सशक्तिकरण और नारी-उत्थान जैसे तत्व स्त्रीविमर्श के प्रमुख विषय रहे हैं जिन पर चर्चाओं-परिर्चाओं से लेकर शोध और साहित्यसृजन तक की यात्रायें होती रही हैं। 

आज की उच्चशिक्षित स्त्रियों के एक वर्ग ने प्रत्यग्र वायु के लिए पूरब की खिड़की बंद कर पश्चिम की खिड़की खोल ली है। 

वे मानती हैं कि स्त्री की स्वतंत्रता और उत्थान में बाधक 'कौमार्य सुरक्षाकेंद्रित' एक ऐसा तंत्र है जिसे पुरुष ने स्त्री को अपनी यौनदासी बनाये रखने के लिए स्थापित किया है।

कुछ परिवारिकेंद्रित अपवादों को छोड़ दिया जाय तो भारत में नारी शिक्षा कभी प्रतिबंधित नहीं रही, प्राचीन भारत में तो कदापि नहीं। जिन परिवारों में प्रतिबंध रहा भी है तो उसका कारण कौमार्यत्वमूलक पवित्रता को ही मानने के उदाहरण विरले ही रहे होंगे।

नारी उत्थान के लिए पुरूष वर्चस्व से स्त्री की स्वतंत्रता की पक्षधर स्त्रियों में से एक वर्ग की विचारनेत्रियों को अपने कौमार्यत्व विषयक क्रांतिकारी विचारों के लिए जाना जाता है। क्रांतिकारी इसलिए कि उन्हें पूर्व के गवाक्ष की अपेक्षा पश्चिम के गवाक्ष से आने वाली हवा में नारी शक्ति की ऊर्जा का प्रवाह अधिक दिखाई देता है। 

आज एक लेखिका के विचार पढ़ने को मिले। उनके लेखन का सार यह है कि स्त्री गुह्यांग की अक्षुणता को नैतिक या धार्मिक मूल्यों से जोड़कर देखना स्त्री को व्यक्तिविशेष की यौनदासी बनाने का कुचक्र है जिससे स्त्री के उत्थान में बाधायें आती हैं। एक स्थान पर उन्होंने लिखा है- A part of the human body can not be considered as a matter of moral values.

लेखिका के उच्चशिक्षित होने के कारण उनके विचारों की पूरी तरह उपेक्षा भी नहीं की जा सकती, ऐसा करना समाज के लिए घातक हो सकता है। भारतीय समाज व्यवस्था में स्त्री और पुरुष के संबंध पूरकता और समानता के साथ अन्योन्याश्रित माने जाते रहे हैं ।

स्त्रीकौमार्यत्व को लेकर दो शब्द प्रक्षेपित किये जाते रहे हैं, एक है पवित्रता और दूसरा है सुरक्षा। दोनों के अंतर को भी समझा जाना चाहिए। पवित्रता के लिए सुरक्षा या सुरक्षा के लिए पवित्रता? 

कौमार्यत्व की स्वतंत्रता के परिणाम नौ माह तक सतत प्रतिफलित होने वाली दैहिक परतंत्रता को आमंत्रित करते हैं। यह स्त्रीदेह की अनिवार्य परिणति है। इससे बचने के लिए उपलब्ध आधुनिक सहज निरोधक उपाय अधिक विश्वसनीय नहीं हैं। दूसरा उपाय गर्भपात हो सकता है जिसकी पीड़ा भी स्त्री को ही भोगनी होती है।

स्त्री स्वतंत्रता, मुक्ति और उत्थान के मार्ग में कौमार्यत्व कहाँ बाधक है? कौमार्यत्व की शिथिलता स्त्री उत्थान के लिए इतनी महत्वपूर्ण और निर्णायक कैसे हो सकती है? वैदिक और वैदिकोत्तरकाल में भी बेटियों की शिक्षा या आत्मोत्थान के लिए कौमार्यत्व की स्वच्छंदता को आधार नहीं बनाया गया, आज भी नहीं है।

सतत नूतनता की चाह लिए स्त्री की दृष्टि में पश्चिम से आने वाली वायु में प्रत्यग्रता का प्रतिशत कोई अर्थ नहीं रखता। पूरब से आने वाली वायु में प्रत्यग्रता के साथ उगते सूर्य के प्रकाश का एक तत्व और भी है जो पश्चिम से आने वाली वायु में नहीं होता, जो प्रकाश है भी वह अस्ताचलगामी सूर्य का है, जिसके बाद अंधकार अनिवार्य होता है।

क्रमशः... 

विरोध की अंतरधाराएँ-४

भीमाकोरेगाँव दोहराने की धमकियाँ

*महारों को गर्व है कि उन्होंने सन् १८१८ में ०१ जनवरी को अपने ब्राह्मणराजा के विरुद्ध हुये युद्ध में एक विदेशी ब्रिटिश व्यापारिक कंपनी का साथ दिया और पेशवा को पूना छोड़कर बिठूर भागने के लिए विवश कर दिया था।*

पेशवा की सेना में मराठवाड़ा के हिंदू सैनिकों के साथ-साथ अरब सैनिक भी थे जिन्होंने इस युद्ध में भाग लिया किंतु महार इसे ब्राह्मण विरुद्ध दलित युद्ध के रूप में देखते रहे हैं जबकि १८१८ में 'दलित' जैसा कोई शब्द किसी के लिए भी प्रयुक्त ही नहीं होता था। राजाओं की सेना में महार योद्धाओं का होना और बाद में यूरोपियन्स द्वारा 'महार रेजिमेंट' का निर्माण उनके युद्धकौशल, दक्षता और उनके क्षत्रियत्व गुणों के मूल्यांकन का ही तो परिणाम था। महार रेजिमेंट आज भी है जिसमें अन्य जाति के लोग भी सम्मिलित हैं। क्या यह सब उनके साथ जातीय भेदभाव का परिणाम था? सनातन परंपरा में तो योद्धाओं को क्षत्रिय माना जाता रहा है।

छत्रपति शिवाजी की सेना में भी महार योद्धा हुआ करते थे। उनके साथ भेदभाव कब हुआ, किसने किया?

भीमाकोरेगाँव युद्ध में ब्रिटिशर्स का साथ देने वाले महारों के उत्तराधिकारी अब एक बार फिर ब्राह्मणों के विरुद्ध ताल ठोंकने लगे हैं, कारण तब भी अज्ञात था, आज भी अज्ञात है।

आपने भीमाकोरेगाँव में अंग्रेजों के साथ मिलकर अपने ही राजा के अरब और हिन्दू सैनिकों (जिनमें से कुछ आपके गाँव के पड़ोसी पूर्वज भी रहे होंगे) का नरसंहार किया जो महारों के लिए कितना गर्व का विषय है, यह तो आप ही तय कर सकेंगे। एक ओर तो आप वैसा ही नरसंहार पुनः दोहराने की धमकी दे रहे हैं वहीं दूसरी ओर आपका यह भी आरोप है कि ब्राह्मणों ने मंदिरों में पूजा करने और शिक्षा से आपको हजारों-लाखों वर्षों तक वंचित रखा ...और इसीलिए अब आप ब्राह्मणों से उनका सब कुछ छीन लेने की आभासी संचार माध्यमों पर और जनसभाएँ कर धमकियाँ देने लगे हैं। आप ब्राह्मणों से छीन लेना चाहते हैं उनके प्रतीक, उनके मौलिक अधिकार, उनकी स्वतंत्रता और यहाँ तक कि उनकी बेटियाँ भी... फिर भी आप स्वयं को ही वंचित, शोषित और पीड़ित कहते हैं! इतना बड़ा झूठ बोलने का दुस्साहस कहाँ से लाते हैं आप लोग!

आप तो यह भी कहते हैं कि भारत कभी मंदिरों का देश नहीं रहा, यहाँ जो हैं वे सब बौद्ध मठ हैं। हम पुरातात्त्विक तथ्यों में गये बिना आपसे पूछते हैं कि मंदिर थे नहीं फिर भी हजारों सालों तक ब्राह्मणों ने आपको मंदिरों में जाने से रोका? आपको शिक्षा से वंचित रखा किंतु आश्चर्य यह कि फिर भी आप सैन्यप्रशिक्षण प्राप्त करते रहे! 

विरोधाभासों और मनगढंत आरोप गढ़ने की सारी सीमायें तोड़कर आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।

इतिहास यह है कि भीमाकोरेगाँव युद्ध ईस्ट इंडिया कंपनी और पेशवा के मध्य भीमा नदी के किनारे १ जनवरी १८१८ में लड़ा गया। कंपनी सेना की ओर से महार रेजिमेंट के ८३४ सैनिकों और पेशवा की ओर से २८००० सैनिकों ने युद्ध लड़ा था जो अनिर्णीत रहा किंतु उसके बाद पेशवा को अंग्रेजों से कुछ पेंशन लेकर संधि करनी पड़ी और पुणे से बिठूर जाना पड़ा। 

ब्रिटिशकंपनी ने इस संधि के उपलक्ष्य में कोरेगाँव में एक विजय स्तंभ बनवाया और प्रतिवर्ष ०१ जनवरी को वहाँ शौर्यदिवस मनाया जाने लगा। 

यद्यपि यह युद्ध ईस्ट इंडिया कंपनी और पेशवा के मध्य हुआ पर महारों ने १९४७ के बाद इसे ब्राह्मणों पर महारों की विजय के रूप में मनाना प्रारंभ किया। महार आज भी इसे इसी रूप में मना कर भी जातिवाद का आरोप ब्राह्मणों पर लगाते नहीं थकते।  

भीमाकोरेगाँव इतिहास के संदर्भ में आपकी पूर्व एवं वर्तमान भूमिकाओं को किस तरह देशभक्ति और तथाकथित मनुवाद एवं ब्राह्मणवाद का प्रमाण माना सकता है, यह विचार भी आप ही कर सकते हैंं। 

क्रमशः...

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

विरोध की अंतरधाराएँ- ३

(वैज्ञानिक की निष्ठा)

ब्राह्मणीय चरित्र और निष्ठा पर वामसेफियों के निरंतर प्रहारों के बीच एक युवा ब्राह्मण ने पूरे विश्व को झकझोर कर रख दिया है। ब्राह्मणों की ऐसी दाधीचि परंपरा हमारे लिए गर्व का विषय है। 

मानव मस्तिष्क पर यांत्रिकीय नियंत्रण के गंभीर दुष्परिणामों की आशंकाओं के कारण विश्वविख्यात ए.आई. प्रतिष्ठान एंथ्रोपिक के वैज्ञानिक मृणांक शर्मा त्यागपत्र दे चुके हैं और अब वे कविताएँ लिखेंगे। 

युवा वैज्ञानिक मृणांक आॅक्सफोर्ड विवि से मशीन लर्निंग में पीएच.डी. करने के बाद एंथ्रोपिक में सेफगार्ड टीम के प्रमुख नियुक्त हुये थे। मानव मस्तिष्क पर मशीन का नियंत्रण बौद्धिक जगत में चिंतन और मंथन का विषय रहा है। मृणांक ने मानव मस्तिष्क की स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता पर मशीनी नियंत्रण के बढ़ते प्रभागों को नैतिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में देखा और एंथ्रोपिक को राम-राम कहकर साहित्य की ओर मुड़ गये। मृणांक शर्मा के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में वामन मेश्राम और चंद्रशेखर रावण जैसे वामसेफियों के अखण्डमौन पर भीमवादियों को विचार करना चाहिए जो यह दुष्प्रचार करते नहीं थकते कि ब्राह्मणों में नैतिकता, निष्ठा और चरित्र का पूरी तरह अभाव होता है।

क्रमशः...

विरोध की अंतरधाराएँ- २

बौद्धभिक्खु सुमित रत्न उवाच-  

"१.सनातन शब्द बौद्ध धर्म का है जिसे हिंदुओं ने ले लिया। बौद्ध ही सनातन है। हिंदू धर्म तो यूरेशिया से आये विदेशी आक्रमणकारियों का धर्म है। २. भारत में सभी हिंदूमंदिर बौद्ध मठों को तोड़कर बनाये गये हैं। ३. हमारे पास ऐसे ८४ हजार मंदिरों के प्रमाण हैं जो बौद्धमठों को तोड़कर बनाये गये हैं। ४. अयोध्या के राममंदिर और तिरुपतिमंदिर सहित  भारत के सभी प्रमुख मंदिर बौद्धमठ थे जिनपर मनुवादियों ने अधिकार कर लिया।"

बौद्ध और भीमभक्त यह प्रचारित और स्थापित करने में सफल हुये हैं कि धर्म और सभ्यता का प्रारम्भ बुद्धयुग से ही हुआ है और भीमराव आंबेडकर ने भारत के मूलनिवासियों की महिलाओं को स्तन ढकने व पुरुषों को शिक्षा का अधिकार दिया। जब उच्चशिक्षित और शासन के उच्चपदाधिकारी लोग आमजनता के सामने दहाड़ते हुये ऐसे निराधार वक्तव्य देते हैं तो सुनने वालों के मन में तर्क-वितर्क का कोई स्थान नहीं रह जाता। वे वही मानते हैं जो उन्हें बताया जाता है। इन छद्म विद्वानों ने बौद्धरामायण जैसी पुस्तकें लिखकर ऐतिहासिक तथ्यों के साथ बलात्कार ही नहीं किया है प्रत्युत भारत विभाजन की एक और आधारशिला रख दी है। 

सुमितरत्न ही नहीं, बहुत से उच्चशिक्षित लोग भी यही मानते और प्रचारित करते हैं कि हिन्दू लोग यूरेशिया से आये अत्याचारी विदेशी आक्रमणकारी हैं । ऐसे लोगों में जज, कलेक्टर, कमिश्नर, डाॅक्टर, आईपीएस अधिकारी और मंत्री लोग भी सम्मिलित हैं। 

इन लोगों ने अपने विचारों की प्रामाणिकता के लिए मनगढ़ंत अत्याचारों, मिथ्या इतिहास और निराधार   किस्सों को गढ़कर बड़ी-बड़ी पुस्तकों को प्रकाशित किया है। 

यह विडंबना है कि उनका गढ़ा शतप्रतिशत झूठ स्थापित-मंडित होता जा रहा है और हम न तो उसका सशक्त खंडन कर पा रहे हैं और न भारतीय सभ्यता के सत्य को सामने ला पा हे हैं। हम इतने असमर्थ और निर्बल क्यों हैं?खंडन-मंडन के लिए हमारे पास कोई सुदृढ़ और परिपक्व योजना क्यों नहीं है? सावधान! हिन्दूविरोध अब केवल विचार तक ही सीमित नहीं रहा, हिंसक घटनाओं में रूपांतरित हो चुका है।

क्रमशः... 

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

घर वापसी

परमज्ञानी ने बताया

तो पता चला
भारत में रहने वाले
सभी लोग हिंदू हैं
अरब से नहीं आया
कोई मुसलमान या रोहिंग्या
कोई बौद्ध या बांग्लादेशी घुसपैठिया
ईसाई भी नहीं आया कोई
येरुशलम से
सब एक हैं, सब हिंदू हैं
सब भारतीय हैं
और...
कोई भी भारतीय हो सकता है
हिंदुओं का ठेकेदार।

जी! समझ गया
त्रेता और द्वापर में
यक्ष, राक्षस
दैत्य और असुर भी
भारतीय थे
नहीं आये थे अन्य ग्रह से।
पर नहीं समझा
कि क्यों होते रहे युद्ध
उन सबके मध्य
और असुरों के वध पर
क्यों मनाते रहे उत्सव
आप सब ?

और हाँ!
भारत का प्रथम शिक्षा मंत्री
भारतीय नहीं
अरबमूल का था
करता रहा हत्या
हिंदुओं के इतिहास की
करता रहा महिमा मंडन
विदेशी लुटेरों का
क्योंकि तुम्हारे जैसे छद्माचारी
लेते रहे हैं जन्म
हर युग में।

वह तो बताया
यह क्यों नहीं बताया
कि धरती का हर वासी
मनुष्य है केवल
संतान हैं सभी
मनु-सतरूपा की।
होनी चाहिए सबकी
घर वापसी
बनाना चाहिये सबको
केवल मनुष्य।

घर वापसी!
किसका घर? कैसा घर?
किसकी वापसी?
जिन्हें तुम रखना चाहते हो
बुलाकर अपने घर
वे तैयार बैठे हैं
करने हमें बेघर।

जब बता ही रहे हो
तो यह भी बता देते
कि रावण भी तो हिंदू था
जिसका करते हो प्रतिवर्ष
वध और दहन
मनाते हो विजयादशमी
करते हो गर्व।

हिंदू के दहन का गर्व!
लज्जा नहीं आती तुम्हें?
क्यों नहीं की रावण की
प्रतीकात्मक घर वापसी ?

बहुत उपदेश देते रहे हो
बुराई पर अच्छाई की विजय का
असत्य पर सत्य की विजय का
पर क्यों खड़े हो गये
बुराई के साथ ?
असत्य के साथ ?
परमपूज्य जी!
इतने बुड़बक भी नहीं हैं हम
जितना बूझे हो तुम।

आरक्षण की भौतिकी

Physics of the reservation

तुम्हें मिला

आरक्षण का त्वरण
गति तीव्र हुयी तुम्हारी
और उड़ चले तुम
जहाँ-तहाँ
अंतरिक्ष में।
तुमने खो दी धरती
दिक्-काल विजय की चाह में
हो त्वरणाधीन
उड़ने लगे यत्र-तत्र-सर्वत्र
यह जाने बिना
कि होते ही विस्फारित
द्रव्यमान
कम हो जाता है गुरुत्वबल
जो थाम लेता है त्वरण
और रुक जाती है उड़ान।

बड़े से बड़ा पिंड भी
कितना भी सयाना हो
कितना भी उग्र हो
या हो निरंकुश प्रचंड
धूमकेतु सा
उसे टकराना ही होता है
कभी न कभी
किसी न किसी धरती से
जो सहती सब मौन हो
सतत आघात
बिना परिवाद,
यही तो है मनुस्मृति का
यथार्थ संवाद!

पढ़ा तो होगा ही
कि ज्यामितीय परिणमन है 
गुरुत्वाकर्षण बल
दिक् और काल का,
जो हैं तो
अदृश्य
पर प्रभावी उतने ही
कि निगल लें जो भी मिले
स्थूल भी
सूक्ष्म भी
द्रव्य भी
रश्मि भी।

भटकते हुये धूमकेतु
ठौर कब पाते हैं!
ठौर किसे देते हैं!
वे तो टकराते हैं केवल
किसी भी
शस्य श्यामला थरती से
हो जाते हैं नष्ट फिर
कंपित कर धरती।
पर धरती भी
रुकती है कहीं भला!

पूर्वाग्रहों से परे

आरक्षण का वैज्ञानिक विश्लेषण

शिथिलता को सक्रियता के पतन की अपेक्षा होती है, तब जो स्थिति प्राप्त होती है वह हमें सतत निष्क्रियता की ओर ले जाती है।
इसे इस तरह भी समझा जा सकता है, शिखर से उतरने की प्रक्रिया में पीछे जो छूटता जाता है वह शृङ्ग होता है।
गतिज भौतिकी का यही नियम है, -संयोग और वियोग की तरह संकुचन और विमोचन की प्रक्रियायें परस्पर विरोधी होती हैं और एक साथ घटित होती हैं।
भीमराव आंबेडकर ने ब्राह्मण कन्या से विवाह किया, उनकी बहनों के विवाह भी ब्राह्मण युवकों के साथ हुये। यह क्या प्रदर्शित करता है, घृणा या श्रेष्ठता का वरण? दूसरी ओर उन्होंने तत्कालीन तथाकथित जातियों के आधार पर गुणात्मक अवमूल्यन के आरक्षण की संस्तुति करना उचित समझा। इस तरह गतिज भौतिकी के सिद्धांतों के विरुद्ध एक वर्ग विशेष को आगे बढ़ने के लिए अनुलोम गति की अपेक्षा प्रतिलोम गति सुनिश्चित की गयी। मानव सभ्यता के इतिहास में यह अभूतपूर्व घटना थी जिस पर पूरा विश्व आज भी आश्चर्यचकित होता है। तत्कालीन राष्ट्रनायकों में यदि वास्तव में दलितों के उत्थान के प्रति सच्ची निष्ठा होती तो वे बौद्धिक और गुणात्मक शिथिलता की बात सोचते भी नहीं। यह तो प्रकृति का विधान है कि हम शरीर के जिस अंग को सक्रिय नहीं रखते वह कुछ समय के पश्चात निष्क्रिय हो जाता है। तो क्या आरक्षण की आड़ में, भारतीय समाज को पंगु बनाने का यह कोई षड्यंत्र था?
इस विधान के स्थूल और सूक्ष्म परिणामों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि आरक्षण से आर्थिक विकास तो हुआ पर बौद्धिक और नैतिक स्तर पर समाज का एक वर्ग आगे नहीं बढ़ सका। आगे बढ़ा होता तो अब तक आत्मनिर्भर होकर सामान्य प्रतिस्पर्धा में सम्मिलित हो चुका होता। इसके विपरीत इस वर्ग ने आरक्षण को अपना स्थाई अधिकार मान लिया। इस बीच राजनैतिक कुचक्रों ने जातीय विद्वेष को निरंतर प्रोत्साहित किया। स्मरण रखिये, यह कलियुग है, शासक अपना लाभ देखते हैं, शासित का नहीं। यह सिद्धांत हर किसी के लिए समझना आवश्यक है।

प्रतियोगिता परीक्षा का दर्शन

शिक्षा के लिए विद्यार्थी की पात्रता परीक्षा प्राचीन काल से रही है; तब भी, जब हमारे यहाँ गुरुकुल हुआ करते थे। उसका स्वरूप आज के स्वरूप से पूरी तरह भिन्न हुआ करता था जिसमें नैतिक मूल्यों का परीक्षण सर्वोपरि हुआ करता था। यही कारण है कि प्राचीन काल के भारत में विद्यार्थीजीवनोपरांत बने राजसेवकों, विद्वानों और शिक्षकों आदि में भ्रष्टाचार का स्थान लगभग नगण्य था। आज तो मंत्रालयों के सचिव जैसे उच्चाधिकारियों के भी जीवन से नैतिक शुचिता लगभग समाप्त होती जा रही है।
सारांश यह कि विकृत ग्राह्यता के कारण कुपात्रों को दी गयी विद्या "ज्ञान" में परिणमित नहीं होती, "सूचना" भर होकर रह जाती है जिसके परिणाम केवल अशिव ही होते हैं।

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

विरोध की अंतरधाराएँ -१

(जातीयविभाजन की गहरी होती खाइयाँ)

विक्रम संवत् २०८२, का फाल्गुन माह भारतीय समाज के लिए दुःखद होता जा रहा है। यूजीसी के समर्थन और विरोध की आग अब सांस्कृतिक युद्ध में रूपांतरित होती जा रही है। महाशिवरात्रि के दिन पुजारी की हत्या और इससे पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय में रुचि तिवारी के साथ तहर्रुश गेमिया की क्रूर घटना एवं पश्चिमी भारत में ब्राह्मण पत्रकारों पर हिंसक आक्रमण की घटनाओं पर विराम नहीं लग पा रहा है। ब्राह्मणों को खुलकर अश्लील गालियाँ देने और भारत छोड़ने की धमकियों की प्रतिस्पर्धा में अब बौद्धपुजारी भी सामने आ चुके हैं। 

देश-विदेश में भारतीय संस्कृति और आर्ष परंपराओं के विरुद्ध कई वैचारिक अंतरधाराएँ पहले से ही प्रवाहित होती रही हैं। 

बौद्धसमाज ने भीमराव आंबेडकर को संविधाननिर्माण के एकमात्र योद्धा के रूप में श्रेय देते-देते भगवान के अवतार के रूप में स्थापित करने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त कर ली है जिससे एक ओर तो भीमराव की मानवीय प्रतिभा नेपथ्य में बहुत पीछे चली गयी तो दूसरी ओर श्रीराम, श्रीकृष्ण, महावीर और सिद्धार्थ गौतम जैसी विभूतियों के अवतारत्व पर भी प्रश्न खड़े हो गये हैं। क्या हमारे समाज में स्वार्थों और षड्यंत्रों की एक ऐसी अंतरधारा सदा से विद्यमान रही है जो मानवेतर शक्तियों को अनुकूल अवसर पाते ही अपनी आवश्यकताओं के अनुसार गढ़ने और थोपने में समर्थ होती रही है? कहीं इसीलिए तो नहीं इन अंतरधाराओं की विषाक्तता को समझकर धर्म को अफीम माना जाने लगा? 

मानवीय प्रतिभाओं की हत्या कर देने में सक्षम होने से कोई भी अतिवादी विचार किसी भी तरह समाज के लिए शुभ नहीं हो सकता। इस अशुभता को प्रोत्साहित और संरक्षित करने में जहाँ शासन-प्रशासन बड़ी रुचि के साथ अपनी भूमिका निभाता रहा है वहीं  आम जनता भी वैचारिकअतिवाद के जनकों और प्रचारकों के षड्यंत्रों को समझने में असफल होती रही है। 

सावधान! इतिहास, पुरातात्त्विक तथ्यों और वैज्ञानिक सत्य को पूरी तरह उलट कर एक सर्वथा नवीन और विकृत इतिहास को गढ़ने की दक्षता किसी भी सभ्यता की हत्या कर देने में सक्षम है।

क्रमशः...

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

महाशिवरात्रि

 शिवशक्ति (Cosmic energy) के तीनों स्वरूपों-  सृजन (Creation, Evolution), लय (Harmony) और विलय (Disappearance, Envolution) में असंतुलन का चरमकाल है कलियुग। अब संतुलन की साधना अपरिहार्य है।

चेतना जागरण और शक्ति संतुलन की रात्रि "महाशिवरात्रि" प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी हो! इसी ऐषणा के साथ, जय महाकाल!


हे शिव! हे महाकाल!

त्रयंबकेश्वर विराट! 

चेतन ! अब जाग-जाग 

हो रहा प्रतिकूल काल ।

अ-शिव हुआ जग

कर असंतुलन

धरती का दोहन ।

कर्मविरत तृष्णा महान

धर्मविरत ले शक्तिपाश

निकले बनने सब रावण महान!

पोषण से द्वेष लिए

शोषण की चाह लिए

ध्वंस का मान लिए

चल पड़े करने 'सृजन'!

किसका सृजन? कैसा सृजन?

है राजदण्ड भी खड़ा 

अट्टहास कर रहा 

विध्वंस ही तो है 'सृजन' ! 

गा रहे 'समानता'

बाँटकर 'असमानता'

निकल पड़े रावण सब

धारण कर साधुवेश

निर्बल निरुपाय हुयीं

देश की वैदेहियाँ सब। 

पोषण की चाह नहीं

शिव की यह राह नहीं

पर

शोषण अधिकार मान

"निर्बल हूँ" चीख-चीख

छीन रहे सब आरक्षण

क्या सचमुच ये निर्बल हैं?

कर छिन्न-भिन्न मर्यादा

लाँघ-लाँघ लक्ष्मण रेखा

छीन रहा वह शक्तिस्रोत

कर अनधिकृत आधिपत्य, 

हों न क्यों शिव कुपित! 

हो रही

छीना-झपटी

कंपित हैं दिग् दिगंत।

घुमड़ रहे कृष्णमेघ

गरज-गरज युद्धघोष

निरंकुश लोभ

विस्तृत हो सुरसा बन 

हो जाए जब प्रचण्ड

करना ही होगा तब 

शक्ति का संतुलन

रोकना होगा उन्हें

युद्ध को उद्यत हुये जो।

कैसे हो नव सृजन!

साधी क्या कभी ताल?

अस्थिर है लय

विकराल है विलय

किंतु अब कर विराम,

थिर ! थिर ! थिर !

चल उठ

संकल्प ले

शिवसाधना ! शिवसाधना !

शिव की महारात्रि

जागृत कर चेतना

संतुलित अब शक्ति कर 

विनाश का विनाश कर

सृष्टि का विकास कर।

अछूत कन्या

"यह ब्राह्मण है, इसे पकड़ो, इसे नंगी करके परेड निकालेंगे आज"।

यह उस तहर्रुश गेमिया की उन्मादी हुंकार थी जो दिल्ली विश्वविद्यालय में घटित हुयी। पिछले कुछ दिनों से भारत में जातीय घृणा अपने चरम की ओर बढ़ती जा रही है। 

स्वयं को "निर्बल, शोषित, उत्पीड़ित और दलित" प्रचारित करने वाली भीड़ ने जिस पत्रकार लड़की पर आक्रमण किया उसे कैसे "सबल, शोषक, उत्पीड़क और अत्याचारी" सिद्ध किया जा सकता है! 

....पर ऐसा हुआ और बिना कुछ सिद्ध किये यह भी "सिद्ध हुआ" मान लिया गया कि लड़की ब्राह्मण है तो वह निश्चित ही अपराधी है, ...इसलिए उस पर आरोप लगाने और किसी न्यायालय में खड़े होकर कुछ भी सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं होती।

"भीड़ का अपना संविधान होता है और अपनी ही दंड संहिता भी, जो विभिन्न कालखंडों में सभी मान्य संविधानों और दण्ड संहिताओं से श्रेष्ठ मान ली जाती है।"

आम्बेडकरवादियों के भगवान भीमराव को कन्यादान करते समय उस ब्राह्मण ने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि एक दिन उसके ही दामाद के अनुयायी भीमवाद की ढाल लेकर ब्राह्मणों को अपना शत्रु और अछूत मानकर उनका उत्पीड़न करने लगेंगे। 

अतिउच्चशिक्षित भीमराव के अतिउच्चशिक्षित अनुयायियों ने दशकों तक प्रचारित किया कि ब्राह्मण यूरेशिया से आये विदेशी आक्रमणकारी हैं, जिन्होंने न केवल भारत के मूलनिवासियों (???) को सहस्रों वर्षों तक शिक्षा से वंचित रखा, उनका शोषण किया, उन पर अमानवीय अत्याचार किये, जातियाँ बनायीं, मनुवाद (???) फैलाया, प्रत्युत उनके महादेव को चुराकर अपने वेदों में भी लिख दिया। उच्चशिक्षित भीमवादी "ब्राह्मणों" को अपना पारंपरिक शत्रु मानने लगे हैं। माओवादियों की समानान्तर "जनताना सरकार" की तरह भीमवादियों ने भी अपना एक सर्वथा भिन्न समानान्तर इतिहास और संसार निर्मित कर लिया है। उन्होंने सुनियोजित तरीके से एक-एक कर कई झूठ गढ़े और उन्हें सत्य की तरह स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने अपना नया परिचय गढ़ा और स्वयं को "हम हिन्दू नहीं,भीम वाले हैं" या "आम्बेडकरवादी" कहना प्रारंभ किया। उन्होंने ब्राह्मणों को लक्ष्यकर कुछ संज्ञायें स्थापित कीं, यथा- ब्राह्मणवाद, मनुवाद और हिन्दूवाद इत्यादि। यद्यपि ये संज्ञायें कभी अस्तित्व में नहीं रहीं, किंतु घृणा का विषाक्त धुआँ वायु में तिरता रहा जो अब संघनित भी होने लगा है।

सत्ता और वर्चस्व की लिप्सा किसी से कुछ भी करवा सकती है। यहाँ किसी आदर्श या नैतिक मूल्यों का कोई मूल्य नहीं होता।

विक्रम संवत् २०८२ की महाशिवरात्रि से कुछ ही दिन पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय के समीप हुये तहर्रुश गेमिया में एक युवती को ज्ञान के स्नातकों-परास्नातकों-पंडितों (डाॅक्टर्स) की उग्र भीड़ ने घेर लिया। फिर जो हुआ उसे तहर्रुश गेमिया के नाम से दुनिया भर में जाना जाता है और उसका दृश्यवर्णन करना किसी भी सभ्यसमाज में अनुचित कृत्य माना जाता है। 

इस भीड़ में सम्मिलित उच्चशिक्षित युवक-युवतियाँ स्वयं को वामपंथी, आम्बेडकरवादी और सेक्युलर होने का परिचय देकर गौरवान्वित होते हैं। क्या हमें अपनी शिक्षाव्यवस्था में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है!  क्या शिक्षा सर्वकल्याणकारी नहीं होनी चाहिए? क्या शिक्षा में सुपात्रता और योग्यता के मानदण्डों को पुनः रेखांकित नहीं किया जाना चाहिए? 

भारत के उच्चशिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने निष्पक्षता और समानता की आड़ में एक पक्षपातपूर्ण और  सर्वथा विषमतामूलक  विधान-प्रस्ताव का पक्ष लेते हुये आश्वासन दिया कि इस तरह के पक्षपातपूर्ण विधान के होते हुये भी सवर्णों के साथ अत्याचार नहीं किया जायेगा, ...पर ऐसा नहीं हुआ, प्रत्युत पहले से ही हो रहे अत्याचारों में अनायास तीव्रता आ गयी। दिन-प्रतिदिन बढ़ता हुआ अत्याचार एक दिन तहर्रुश गेमिया बनकर प्रकट हुआ जो सभ्य समाज का सर्वाधिक असभ्य और क्रूरष्ट मनोरंजन माना जाता है। हो सकता है कि शिक्षामंत्री तहर्रुश गेमिया जैसे लिंगभेदी उत्पीड़न को अरबी मनोरंजन का एक अंश मानकर हर्षित और उत्साहित हो रहे हों।

विरोध के अभाव में, हाँ! विरोध के अभाव में ही... आम्बेडकरवादी यह स्थापित करने में सफल होते रहे हैं कि "ब्राह्मण अछूत और निंदनीय" होते हैं, उनकी कन्याओं को  तहर्रुश गेमिया का खिलौना बनाया जाना आम्बेडकरवादियों का मौलिक अधिकार है जो उन्हें उनके भगवान भीमराव ने संविधान के माध्यम से वरदान स्वरूप प्रदान किया है। इसी अधिकार का उपभोग करते हुये एक तकनीकीविद्यालय में आम्बेडकरवादियों की तथाकथित शोषित-पीड़ित-वंचित-दलित भीड़ ने एक तथाकथितरूप से घोषित शोषक-उत्पीड़क-अत्याचारी-सवर्ण शिक्षक को भगवान भीमराव की ईशनिंदा के आरोप में पूर्ण धृष्टता और कृतघ्नता के साथ अपमानित किया और उन्हें भूलुंठित हो भीमराव के चित्र और भीड़ से क्षमायाचना के लिए बाध्य कर दिया। यह सत्य पर असत्य की विजय है। 

एक अन्य विद्यालय में वसंतपंचमी के दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के साथ अहर्निश स्मरणीय भगवान भीमराव के चित्र की पूजा की हिंसक बाध्यता ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि भीमराव अवतारी देवात्मा हैं, जिनका स्थान देवी सरस्वती के समकक्ष है इसलिए ब्राह्मण शिक्षिका को भीड़ का हर आदेश मानना ही होगा।

हे परमपूज्य असहिष्णु आम्बेडकरवादियो! कलियुग के इस कालखण्ड में हमने स्वीकार कर लिया है कि निरपराध ब्राह्मण भी अपराधी होता है, वह दलित और अछूत भी होता है, ब्राह्मणों की बेटियाँ अछूत कन्या होती हैं। कृपा कर अब और मत करना तहर्रुश गेमिया, हमें हमारे उन सभी अपराधों के लिए क्षमा करें जो हमने करना तो दूर, कभी सोचे भी नहीं। 

"नेतृत्व जब-जब निर्बल होता है, भीड़ तब-तब सबल होती है... और तब शासन भी सत्ता का नहीं, भीड़ का होता है।"

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

अपकेन्द्रण

युग बीते

वे केवल जीते
हम केवल हारे
उलझे अपनों में
भटके सागर में
पर नहीं किया समुद्रमंथन
नहीं हो सका अपकेन्द्रण
चरमसान्द्रित अपद्रव्यों का
हहराते कालकूट का।

चलो
एक Centrifuge यंत्र बनायें
विराट
मंदराचल से भी विराट।
असुर तो पहले से ही हैं समक्ष
पर
सुर भी तो त्यागें अपने-अपने
सुविधा कक्ष
है समर प्रत्यक्ष।
अब
करना ही होगा पृथक
अमृत और विष
अब और न होगा
देश विभक्त
खण्ड समाज के
और न होंगे
साधु-संत के
शिविर पृथक।
चार्वाक हैं खड़े बहुत
मौन रहे क्यों वैशेषिकादि
आओ खींचें रेखा
पहचानें वे असत्य सभी
सत्य ओढ़कर डटे हुये जो,
पहचानें छल सारे
भेद
छीनने और त्यागने में
साधु और दस्यु में
भली-भाँति स्वीकारें।
बहुत सो लिए
अब तो जागें!

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

शुद्धिकरण

बड़ी उदारता से

स्वीकार किया था पंक
धँसते चले गये जिसमें
हम सब
नहीं भेद सके
Friedrich Max Muller के
चक्रव्यूह को।
करते रहे पोषित पल्लवित
उसके रोपित वृक्ष को
जिसमें लगते रहे
विषाक्त फल
Aaryan invesion theory की शाखाओं में।
राजा और मंत्री
संरक्षित करते रहे अयोग्यता
दुत्कारते रहे योग्यता
बनाते रहे
जातियाँ, उपजातियाँ
खोदते रहे खाइयाँ
गहरी ...और भी गहरी
करते रहे आरोपित
ब्राह्मणों को
अपने हर अपराध के लिए।
बढ़ता ही जा रहा है
संताप
प्रारंभ हो गया है
क्वथन
दूषित जल में
अब करना ही होगा
पलायन
शुद्धजल को
होकर ऊर्ध्वमुखी
त्यागकर
बहुत भारी पड़ चुका
दूषित पंक।
अब नहीं रुकेगा भारत
हुये बिना
पंकमुक्त ।

बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

किये बिना अनुसंधान

राजा रहे आप
महाराजा रहे आप
सम्राट रहे आप
और शासन
हम करते रहे आप पर?

शक्तिशाली रहे आप
बलशाली रहे आप
और शोषण
होकर भी सुदामा
हम करते रहे आपका?

दण्डाधिकारी रहे आप 
नीतिनिर्माता रहे आप 
और अत्याचार
हम करते रहे आप पर?

विधान निर्माता रहे आप
व्यवस्था और सत्ता रही
आपकी
और जातियाँ
हमने बना दीं?

हम तो वो हैं
जो होकर भी दथीचि
देते ही रहे सदा
अपना अर्जित सब कुछ
ज्ञान और विज्ञान
करते रहे तप और शोध
माँग कर मात्र भिक्षा
और तुम कहते हो
कि शिक्षा से तुम्हें
वंचित रखा हमने?

माँग-माँग कर भिक्षा
एक ब्राह्मण ने बनाया
हिंदूविश्वविद्यालय
क्या केवल
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए?

ज्ञान
संचित किया होता
तुम्हें वंचित किया होता
तो बचता ही नहीं अब तक,
नष्ट हो गया होता संपूर्ण ज्ञान
संचित ज्ञान बचा सकता है कोई?

जलाकर भी नालंदा
बचा है जो कुछ
विस्तारित ही होता रहा
प्रकीर्णित ही होता रहा
क्योंकि हम
बाँटते ही रहे सदा
शोधित अर्जित ज्ञान।
और तुमने क्या किया!
हठ कर ठान लिया 
भगाने की हमें यूरेशिया
लेकर हमसे
हमारी बेटियाँ
जिनमें हैं गुणसूत्र
हमारे ही,
गुणसूत्रों को
कैसे भगा पाओगे ?
जबकि क्षरित हो चुके हैं
९७ प्रतिशत तक
तुम्हारे
पुरुषगुणसूत्र।

ऋण ४० अंक पाकर भी
विशेषज्ञ चिकित्सक बनने की
शिथिलता का अधिकार
अंनतकाल तक बनाये रखने को
मान चुके
न्याय का पर्याय 
हे राजाधिराज!
सच जानने की इच्छा हो
तो पढ़ लेना
कथा
जेनेटिक सेग्रीगेशन
और डायवर्सिटी की भी
जिसे सुनाया है मैक्स मूलर के ही
उन वंशजों ने
सुनकर
जिनकी कथा-
"आर्यन इन्वेजन"
इतने बड़े हुये हैं आप
किये बिना अनुसंधान
सत्य का ।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

प्रमाण

बिना कोई प्रमाण

मानना ही होगा तुम्हें
कि "भगवान ने नहीं
पंडितों ने बनाईं जातियाँ"
और तोड़ दिया समाज
खोद डाली खाइयाँ
इसलिए तोड़ देंगे हम
बंधन जात-पात के
बनवाकर प्रमाणपत्र
दलित, अतिदलित, महादलित
अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति
और पिछड़े होने का
अपना, अपने बच्चों का
कि वे आज जो हैं
वही बने रहना चाहते हैं
अनंतकाल तक
लेते रहेंगे आरक्षण
कोसते रहेंगे पंडितों को
देते रहेंगे गालियाँ
मारते रहेंगे चार जूते
प्रतिदिन
तिलक तराजू और तलवार को
क्योंकि भगवान ने नहीं
पंडितों ने बनाईं हैं जातियाँ।

हम लिपिबद्ध करेंगे यह इतिहास
कि पंडितों ने बनाईं हैं जातियाँ
करके जातिगणना
लिख डालेंगे ग्रंथ
और हो जाएगें अमर
बनकर आरक्षित और उत्पीड़ित
करते रहेंगे उत्पीड़न
तिलक, तराजू और तलवार का।

हम दलित हैं
विश्वविद्यालय के शोधार्थी हैं
इसलिए
हम साफ करायेंगे अपने जूते
ब्राह्मणों से
और करेंगे विवाह
उनकी बेटियों से
भगा देंगे ब्राह्मणों को
भारत से बाहर
क्योंकि हम
दलित, शोषित और उत्पीड़ित हैं।
इतिहास
परिभाषित करेगा हमें
धरती के सर्वाधिक
"डरे हुये, शोषित लोग"।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

शक्ति, शोषण और अत्याचार

यूजीसी रेगुलेशन पर पूरे देश में उबाल है। दो ध्रुव एक बार फिर आमने-सामने हैं। संचार माध्यम पारस्परिक घृणा से विषाक्त हो रहे हैं। एक-दूसरे को चुनौतियाँ दी जा रही हैं। कंचना यादव ने सवर्णों को फंसाये जाने की आवश्यकता बताते हुये अपने लोगों को प्रोत्साहित किया। इस बीच एक और आरोप हवा में उछाल दिया गया है -

"ब्राह्मणों ने तीन हजार साल तक हमारा शोषण किया और हमें शिक्षा से वंचित रखा। यदि यूजीसी रेगुलेशन वापस लिया गया तो हम सवर्णों को देश से बाहर खदेड़ देंगे।"

यह आरोप बहुत गंभीर है, प्रायः ऐसे आरोपों पर ब्राह्मणों  को कम ही उद्वेलित होते हुये देखा गया है। किंतु जेएनयू जैसी संस्था में भी जब "ब्राह्मण-बनिया भारत छोड़ो" के नारे लगने लगें तो समझा जाना चाहिए कि बात अब आगे बढ़ चुकी है और उत्तर दिया जाना आवश्यक है। 

१. शिक्षा और गुरुकुल सदा से राज्य (सत्ता) के अधीन और उसके द्वारा पोषित व संरक्षित रहे हैं न कि ब्राह्मणों के एकाधिकार में। 

२. पिछले तीन हजार वर्षों में कितने ब्राह्मण राजा हुये हैं जिन्होंने किसी को भी शिक्षा से वंचित रखा? गुरुकुलों में प्रवेशपात्रता का विधान था, आज की शैक्षणिक संस्थानों में भी है। 

३. बाबा भीमराव के पिता ब्रिटिश सेना में सूबेदार के पद पर थे, क्या कोई अशिक्षित व्यक्ति सूबेदार हो सकता है?

४. वैदिक मंत्रदृष्टा ऋषियों में स्त्रियों सहित सभी वर्ण के ऋषियों की सहभागिता क्या सिद्ध करती है?आज भी संतों में हर वर्ण के लोगों का सम्माननीय स्थान है।

५. यदि ब्राह्मणों से इतनी शत्रुता और घृणा है तो सतनामी एवं अन्य आरक्षित समूहों के लोग ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों के उपनाम यथा- तिवारी, उपाध्याय, चतुर्वेदी, जोशी, पाठक, व्यास, भदौरिया, बघेल, तोमर, चौहान... आदि क्यों लिख रहे हैं?

६. जातियाँ कौन बनाता है, ब्राह्मण या सरकारें? किस ग्रंथ या सरकारी अभिलेख में ब्राह्मणों द्वारा जाति बनाये जाने का उल्लेख है? कृपया बतायें।

७. वर्ष १९६७ में उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) के भोटिया, जौनसारी, थारू, बुक्सा और राजी लोगों को अनुसूचित जनजाति में किसने सम्मिलित किया, तत्कालीन सत्ता ने या ब्राह्मणों ने?

८. समय-समय पर स्वयं को आरक्षित श्रेणी में सम्मिलित किये जाने के लिए किये जाने वाले उग्र आंदोलन किसने किये, पटेलों और गुर्जरों... आदि ने या ब्राह्मणों ने?

९. धर्मांतरण के बाद भी आपको अपनी जातियों से चिपके रहने के लिए किसने बाध्य किया, क्या ब्राह्मणों ने?

१०. जाति से विरोध है तो जातीय जनगणना रोकने और जातियाँ समाप्त करने के लिए आंदोलन क्यों नहीं करते, तब कोई ब्राह्मण आपका विरोध करे तो उसे आप कोई भी दंड दे सकते हैं, हम आपके साथ होंगे। 

११. शूद्र शब्द आपके लिए इतना घृणित क्यों है? जबकि तकनीकी ज्ञान में दक्ष और रचनात्मक कार्य में कुशल हर व्यक्ति शूद्र हुआ करता था। आधुनिक संदर्भ में इंजीनियर और डाॅक्टर आदि को भी आप शूद्र मान सकते हैं जो कि बुद्धि और कर्मठता के समन्वय की स्थिति है। अपनी रचनात्मक दक्षता से कृषि एवं उद्योग आदि के माध्यम से अर्थतंत्र की रीढ़ बनकर समर्पित रहने वाले कर्मठ लोग शूद्र हुआ करते थे, इतने महत्वपूर्ण और सम्माननीय शब्द को घृणित बना दिये जाने के षड्यंत्रों पर भी चिंतन करने की आवश्यकता है।

१२. साधु, संत, बाबा... केवल ब्राह्मण ही नहीं हर वर्ग के लोग होते हैं, सबको सम्मानित माना जाता है, कोई भी व्यक्ति उनकी जाति पूछे बिना उनके चरण स्पर्श, प्रणाम या ॐनमोनारायण करता है, हिंदू समाज की यही व्यवस्था रही है। साधु, संत ऋषि-मुनि, शिक्षक और आचार्य जातियों से ऊपर माने जाते रहे हैं। 

१३. धर्मपाल ने बहुत शोध और अथक परिश्रम से बारह खंडों में एक पुस्तक लिखी है "The Beautiful Tree: Indigenous Indian Education in the Eighteenth Century" जिसमें धर्मपाल जी ने अठारहवीं शताब्दी के भारत में शिक्षा की तत्कालीन स्थिति का वह विवरण दिया है जो ब्रिटिश अधिकारियों ने अपने अभिलेखों में किया था। जो लोग यह मानते हैं कि ब्राह्मणों ने कुछ लोगों को तीन हजार साल तक शिक्षा से वंचित रखा, उन्हें यह पुस्तक पढ़ना चाहिए।

१४. मन से हीन भावनाओं और ब्राह्मणों के प्रति आधारहीन विद्वेष को समाप्त कर हिंदू समाज की गौरवपूर्ण पुनर्स्थापना के लिए संकल्प लेना हर भारतीय का दायित्व है जिसमें आप सबका स्वागत है। समाज का कोई भी वर्ग त्याज्य नहीं, स्वीकार्य होता है तभी कोई देश समृद्ध हो पाता है।

१५. रही बात प्रताड़ना की, तो प्रताड़ना करने वाला स्वयं मे पतित और दुष्टबुद्धि होता है, वह कोई भी हो सकता है...पंथ, समुदाय, जाति निरपेक्ष। दुष्टों को जब भी अवसर मिलता है वे अपने से निर्बल का शोषण करते हैं, और ऐसे दुष्ट हर जाति एवं समूहों में रहे हैं, आज भी हैं। जब अहंकार, शक्ति और दुष्टता का मिलन होता है तब शोषण की स्थितियाँ उत्पन्न होती है। जिसके पास सत्ता, या सत्ता में सहभागिता या किसी कुपात्र को प्राप्त अधिकार हैं और वह शक्तिशाली भी हो तो दुष्टता करेगा। ब्राह्मण का इतिहास तो प्रायः कोपीनधारी और भिक्षाजीवी होने का रहा है। शूद्र और क्षत्रिय ही प्रायः राजा रहे हैं। वैश्य किसी झंझट में नहीं पड़ते, और प्रायः समझौतावादी और सहनशील प्रवृत्ति के होते हैं। अब विचार करिये किसके द्वारा किसका शोषण किये जा सकने की प्रायिकता हो सकती है! तीन हजार साल से शोषण और उत्पीड़न की बात काल्पनिक और निराधार है। हाँ, पिछली कुछ शताब्दियों में नैतिक पतन के कारण ऐसी घटनायें हुयी है, किंतु वह ब्राह्मण की प्रकृति नहीं है, ब्राह्मण की परंपरा नहीं है, वह अपवाद है और ऐसी घटनाओं की निंदा करने में ब्राह्मण ही आगे भी रहे हैं।