शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

अछूत कन्या

"यह ब्राह्मण है, इसे पकड़ो, इसे नंगी करके परेड निकालेंगे आज"।

यह उस तहर्रुश गेमिया की उन्मादी हुंकार थी जो दिल्ली विश्वविद्यालय में घटित हुयी। पिछले कुछ दिनों से भारत में जातीय घृणा अपने चरम की ओर बढ़ती जा रही है। 

स्वयं को "निर्बल, शोषित, उत्पीड़ित और दलित" प्रचारित करने वाली भीड़ ने जिस पत्रकार लड़की पर आक्रमण किया उसे कैसे "सबल, शोषक, उत्पीड़क और अत्याचारी" सिद्ध किया जा सकता है! 

....पर ऐसा हुआ और बिना कुछ सिद्ध किये यह भी "सिद्ध हुआ" मान लिया गया कि लड़की ब्राह्मण है तो वह निश्चित ही अपराधी है, ...इसलिए उस पर आरोप लगाने और किसी न्यायालय में खड़े होकर कुछ भी सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं होती।

"भीड़ का अपना संविधान होता है और अपनी ही दंड संहिता भी, जो विभिन्न कालखंडों में सभी मान्य संविधानों और दण्ड संहिताओं से श्रेष्ठ मान ली जाती है।"

आम्बेडकरवादियों के भगवान भीमराव को कन्यादान करते समय उस ब्राह्मण ने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि एक दिन उसके ही दामाद के अनुयायी भीमवाद की ढाल लेकर ब्राह्मणों को अपना शत्रु और अछूत मानकर उनका उत्पीड़न करने लगेंगे। 

अतिउच्चशिक्षित भीमराव के अतिउच्चशिक्षित अनुयायियों ने दशकों तक प्रचारित किया कि ब्राह्मण यूरेशिया से आये विदेशी आक्रमणकारी हैं, जिन्होंने न केवल भारत के मूलनिवासियों (???) को सहस्रों वर्षों तक शिक्षा से वंचित रखा, उनका शोषण किया, उन पर अमानवीय अत्याचार किये, जातियाँ बनायीं, मनुवाद (???) फैलाया, प्रत्युत उनके महादेव को चुराकर अपने वेदों में भी लिख दिया। उच्चशिक्षित भीमवादी "ब्राह्मणों" को अपना पारंपरिक शत्रु मानने लगे हैं। माओवादियों की समानान्तर "जनताना सरकार" की तरह भीमवादियों ने भी अपना एक सर्वथा भिन्न समानान्तर इतिहास और संसार निर्मित कर लिया है। उन्होंने सुनियोजित तरीके से एक-एक कर कई झूठ गढ़े और उन्हें सत्य की तरह स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने अपना नया परिचय गढ़ा और स्वयं को "हम हिन्दू नहीं,भीम वाले हैं" या "आम्बेडकरवादी" कहना प्रारंभ किया। उन्होंने ब्राह्मणों को लक्ष्यकर कुछ संज्ञायें स्थापित कीं, यथा- ब्राह्मणवाद, मनुवाद और हिन्दूवाद इत्यादि। यद्यपि ये संज्ञायें कभी अस्तित्व में नहीं रहीं, किंतु घृणा का विषाक्त धुआँ वायु में तिरता रहा जो अब संघनित भी होने लगा है।

सत्ता और वर्चस्व की लिप्सा किसी से कुछ भी करवा सकती है। यहाँ किसी आदर्श या नैतिक मूल्यों का कोई मूल्य नहीं होता।

विक्रम संवत् २०८२ की महाशिवरात्रि से कुछ ही दिन पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय के समीप हुये तहर्रुश गेमिया में एक युवती को ज्ञान के स्नातकों-परास्नातकों-पंडितों (डाॅक्टर्स) की उग्र भीड़ ने घेर लिया। फिर जो हुआ उसे तहर्रुश गेमिया के नाम से दुनिया भर में जाना जाता है और उसका दृश्यवर्णन करना किसी भी सभ्यसमाज में अनुचित कृत्य माना जाता है। 

इस भीड़ में सम्मिलित उच्चशिक्षित युवक-युवतियाँ स्वयं को वामपंथी, आम्बेडकरवादी और सेक्युलर होने का परिचय देकर गौरवान्वित होते हैं। क्या हमें अपनी शिक्षाव्यवस्था में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है!  क्या शिक्षा सर्वकल्याणकारी नहीं होनी चाहिए? क्या शिक्षा में सुपात्रता और योग्यता के मानदण्डों को पुनः रेखांकित नहीं किया जाना चाहिए? 

भारत के उच्चशिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने निष्पक्षता और समानता की आड़ में एक पक्षपातपूर्ण और  सर्वथा विषमतामूलक  विधान-प्रस्ताव का पक्ष लेते हुये आश्वासन दिया कि इस तरह के पक्षपातपूर्ण विधान के होते हुये भी सवर्णों के साथ अत्याचार नहीं किया जायेगा, ...पर ऐसा नहीं हुआ, प्रत्युत पहले से ही हो रहे अत्याचारों में अनायास तीव्रता आ गयी। दिन-प्रतिदिन बढ़ता हुआ अत्याचार एक दिन तहर्रुश गेमिया बनकर प्रकट हुआ जो सभ्य समाज का सर्वाधिक असभ्य और क्रूरष्ट मनोरंजन माना जाता है। हो सकता है कि शिक्षामंत्री तहर्रुश गेमिया जैसे लिंगभेदी उत्पीड़न को अरबी मनोरंजन का एक अंश मानकर हर्षित और उत्साहित हो रहे हों।

विरोध के अभाव में, हाँ! विरोध के अभाव में ही... आम्बेडकरवादी यह स्थापित करने में सफल होते रहे हैं कि "ब्राह्मण अछूत और निंदनीय" होते हैं, उनकी कन्याओं को  तहर्रुश गेमिया का खिलौना बनाया जाना आम्बेडकरवादियों का मौलिक अधिकार है जो उन्हें उनके भगवान भीमराव ने संविधान के माध्यम से वरदान स्वरूप प्रदान किया है। इसी अधिकार का उपभोग करते हुये एक तकनीकीविद्यालय में आम्बेडकरवादियों की तथाकथित शोषित-पीड़ित-वंचित-दलित भीड़ ने एक तथाकथितरूप से घोषित शोषक-उत्पीड़क-अत्याचारी-सवर्ण शिक्षक को भगवान भीमराव की ईशनिंदा के आरोप में पूर्ण धृष्टता और कृतघ्नता के साथ अपमानित किया और उन्हें भूलुंठित हो भीमराव के चित्र और भीड़ से क्षमायाचना के लिए बाध्य कर दिया। यह सत्य पर असत्य की विजय है। 

एक अन्य विद्यालय में वसंतपंचमी के दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के साथ अहर्निश स्मरणीय भगवान भीमराव के चित्र की पूजा की हिंसक बाध्यता ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि भीमराव अवतारी देवात्मा हैं, जिनका स्थान देवी सरस्वती के समकक्ष है इसलिए ब्राह्मण शिक्षिका को भीड़ का हर आदेश मानना ही होगा।

हे परमपूज्य असहिष्णु आम्बेडकरवादियो! कलियुग के इस कालखण्ड में हमने स्वीकार कर लिया है कि निरपराध ब्राह्मण भी अपराधी होता है, वह दलित और अछूत भी होता है, ब्राह्मणों की बेटियाँ अछूत कन्या होती हैं। कृपा कर अब और मत करना तहर्रुश गेमिया, हमें हमारे उन सभी अपराधों के लिए क्षमा करें जो हमने करना तो दूर, कभी सोचे भी नहीं। 

"नेतृत्व जब-जब निर्बल होता है, भीड़ तब-तब सबल होती है... और तब शासन भी सत्ता का नहीं, भीड़ का होता है।"

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