शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

ए.आई. और आई.टी.

कृत्रिम बौद्धिकता ने सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रांति का सूत्रपात कर दिया है। कुछ लोग भयभीत हैं कि कृत्रिम बौद्धिकता हमारी स्वाभाविक नैतिक चेतना को कुंठित कर मस्तिष्क की प्राकृतिक बौद्धिकता को निष्क्रिय कर सकती है। हम यांत्रिकीय नियंत्रण के दास बनकर रह जायेंगे जो अंततः इस सभ्यता के पतन का कारण बनेगा। जबकि कुछ लोग इसे समय की आवश्यकता मान कर इसलिए भी उत्साहित हैं क्योंकि एआई के हस्तक्षेप से सूचना प्रौद्योगिकी और भी सरल एवं तीव्र हो जायेगी, यांत्रिककार्य सुगम और लगभग त्रुटिहीन होंगे, युद्ध में लक्ष्यसंधान और प्रहार सटीक होने लगेंगे, शेयरमंडी  में व्यापार के अनुमान सटीक होंगे... । यह सब तो होगा, पर क्या इससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा न्यूनतम और सत्ता विस्तार की भूख अनियंत्रित और घातक नहीं हो जायेगी! युद्ध में जय-पराजय की क्षीण संभावनाओं के साथ दोनों ही पक्षों के महाविनाश की आशंकायें प्रबल नहीं हो जायेंगी! शेयरमंडी की गति में एकरूपता नहीं हो जाएगी! खेल प्रतिस्पर्धाओं में रोमांच को पलीता नहीं लग जाएगा! ...!!!

तकनीक जब सर्वसुलभ होती है तो वह विशेषज्ञों के नियंत्रण से निकलकर जनसामान्य के हाथों में पहुँच जाती है, तब मनुष्य और यंत्र के मध्य बनने वाले संबंध प्रायः स्वेच्छाचारिता से परिपूर्ण होते हैं। यंत्र के काम करने की अपनी सुनिश्चित पद्धति होती है जबकि उसके उपयोगकर्ता द्वारा यंत्रों-उपकरणों के परिचालन की अनिश्चित।
कंप्यूटर के साथ हमारे विकृत व्यवहार ने तो एर्गोनाॅमिक्स जैसे एक नये ही विषय को जन्म दे दिया है, पर उसे भी कितने लोग जानते हैं, और जो जानते भी हैं उनमें से कितने उसका पालन कर पाते हैं!
आज हम ऐसे विभिन्न उपकरणों से घिरे हुये हैं जिनके अभाव में जीवन की गति थमती हुयी सी लगने लगती है।
अब हमें एआई के मूड को समझना होगा अन्यथा अच्छे और शुभ परिणाम नहीं मिलेंगे। वहाँ विवेक नहीं होता,  सांख्यिकीय गणनायें होती हैं। गणित वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित होता है जबकि सांख्यिकी संभावित परिणामों के साथ चलती है।
आशंका है कि मनुष्य मस्तिष्क की स्वाभाविक गतिविधियाँ भी गंभीररूप से प्रभावित होंगी और तंत्रिकीय शिथिलता अंत में निष्क्रियता की स्थिति को प्राप्त हो सकती है।
एआई के आगमन से कयी उद्योगों में उथल-पुथल की आशंकायें निर्मूल नहीं हैं। जब चलचित्र महीनों के स्थान पर मिनटों में बनने लगेंगे तब क्या रेडियो और टेलिग्राम की तरह चलचित्र का संसार भी सिमट नहीं जायेगा!
चमत्कारी कृत्रिम बौद्धिकता का मूल "कार्यनिष्पादनक्रम समूह का यांत्रिकीय निर्देशन" (अल्गोरिदम) है। आशंका है कि यह तकनीकी सक्रियता का वह चरम है जो सभ्यता के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती होने वाली है।

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