आरक्षण का वैज्ञानिक विश्लेषण
शिथिलता को सक्रियता के पतन की अपेक्षा होती है, तब जो स्थिति प्राप्त होती है वह हमें सतत निष्क्रियता की ओर ले जाती है।इसे इस तरह भी समझा जा सकता है, शिखर से उतरने की प्रक्रिया में पीछे जो छूटता जाता है वह शृङ्ग होता है।
गतिज भौतिकी का यही नियम है, -संयोग और वियोग की तरह संकुचन और विमोचन की प्रक्रियायें परस्पर विरोधी होती हैं और एक साथ घटित होती हैं।
भीमराव आंबेडकर ने ब्राह्मण कन्या से विवाह किया, उनकी बहनों के विवाह भी ब्राह्मण युवकों के साथ हुये। यह क्या प्रदर्शित करता है, घृणा या श्रेष्ठता का वरण? दूसरी ओर उन्होंने तत्कालीन तथाकथित जातियों के आधार पर गुणात्मक अवमूल्यन के आरक्षण की संस्तुति करना उचित समझा। इस तरह गतिज भौतिकी के सिद्धांतों के विरुद्ध एक वर्ग विशेष को आगे बढ़ने के लिए अनुलोम गति की अपेक्षा प्रतिलोम गति सुनिश्चित की गयी। मानव सभ्यता के इतिहास में यह अभूतपूर्व घटना थी जिस पर पूरा विश्व आज भी आश्चर्यचकित होता है। तत्कालीन राष्ट्रनायकों में यदि वास्तव में दलितों के उत्थान के प्रति सच्ची निष्ठा होती तो वे बौद्धिक और गुणात्मक शिथिलता की बात सोचते भी नहीं। यह तो प्रकृति का विधान है कि हम शरीर के जिस अंग को सक्रिय नहीं रखते वह कुछ समय के पश्चात निष्क्रिय हो जाता है। तो क्या आरक्षण की आड़ में, भारतीय समाज को पंगु बनाने का यह कोई षड्यंत्र था?
इस विधान के स्थूल और सूक्ष्म परिणामों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि आरक्षण से आर्थिक विकास तो हुआ पर बौद्धिक और नैतिक स्तर पर समाज का एक वर्ग आगे नहीं बढ़ सका। आगे बढ़ा होता तो अब तक आत्मनिर्भर होकर सामान्य प्रतिस्पर्धा में सम्मिलित हो चुका होता। इसके विपरीत इस वर्ग ने आरक्षण को अपना स्थाई अधिकार मान लिया। इस बीच राजनैतिक कुचक्रों ने जातीय विद्वेष को निरंतर प्रोत्साहित किया। स्मरण रखिये, यह कलियुग है, शासक अपना लाभ देखते हैं, शासित का नहीं। यह सिद्धांत हर किसी के लिए समझना आवश्यक है।
प्रतियोगिता परीक्षा का दर्शन
शिक्षा के लिए विद्यार्थी की पात्रता परीक्षा प्राचीन काल से रही है; तब भी, जब हमारे यहाँ गुरुकुल हुआ करते थे। उसका स्वरूप आज के स्वरूप से पूरी तरह भिन्न हुआ करता था जिसमें नैतिक मूल्यों का परीक्षण सर्वोपरि हुआ करता था। यही कारण है कि प्राचीन काल के भारत में विद्यार्थीजीवनोपरांत बने राजसेवकों, विद्वानों और शिक्षकों आदि में भ्रष्टाचार का स्थान लगभग नगण्य था। आज तो मंत्रालयों के सचिव जैसे उच्चाधिकारियों के भी जीवन से नैतिक शुचिता लगभग समाप्त होती जा रही है।
सारांश यह कि विकृत ग्राह्यता के कारण कुपात्रों को दी गयी विद्या "ज्ञान" में परिणमित नहीं होती, "सूचना" भर होकर रह जाती है जिसके परिणाम केवल अशिव ही होते हैं।
शिक्षा के लिए विद्यार्थी की पात्रता परीक्षा प्राचीन काल से रही है; तब भी, जब हमारे यहाँ गुरुकुल हुआ करते थे। उसका स्वरूप आज के स्वरूप से पूरी तरह भिन्न हुआ करता था जिसमें नैतिक मूल्यों का परीक्षण सर्वोपरि हुआ करता था। यही कारण है कि प्राचीन काल के भारत में विद्यार्थीजीवनोपरांत बने राजसेवकों, विद्वानों और शिक्षकों आदि में भ्रष्टाचार का स्थान लगभग नगण्य था। आज तो मंत्रालयों के सचिव जैसे उच्चाधिकारियों के भी जीवन से नैतिक शुचिता लगभग समाप्त होती जा रही है।
सारांश यह कि विकृत ग्राह्यता के कारण कुपात्रों को दी गयी विद्या "ज्ञान" में परिणमित नहीं होती, "सूचना" भर होकर रह जाती है जिसके परिणाम केवल अशिव ही होते हैं।
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