युग बीते
वे केवल जीतेहम केवल हारे
उलझे अपनों में
भटके सागर में
पर नहीं किया समुद्रमंथन
नहीं हो सका अपकेन्द्रण
चरमसान्द्रित अपद्रव्यों का
हहराते कालकूट का।
चलो
एक Centrifuge यंत्र बनायें
विराट
मंदराचल से भी विराट।
असुर तो पहले से ही हैं समक्ष
पर
सुर भी तो त्यागें अपने-अपने
सुविधा कक्ष
है समर प्रत्यक्ष।
अब
करना ही होगा पृथक
अमृत और विष
अब और न होगा
देश विभक्त
खण्ड समाज के
और न होंगे
साधु-संत के
शिविर पृथक।
चार्वाक हैं खड़े बहुत
मौन रहे क्यों वैशेषिकादि
आओ खींचें रेखा
पहचानें वे असत्य सभी
सत्य ओढ़कर डटे हुये जो,
पहचानें छल सारे
भेद
छीनने और त्यागने में
साधु और दस्यु में
भली-भाँति स्वीकारें।
बहुत सो लिए
अब तो जागें!
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.