Physics of the reservation
तुम्हें मिला
आरक्षण का त्वरणगति तीव्र हुयी तुम्हारी
और उड़ चले तुम
जहाँ-तहाँ
अंतरिक्ष में।
तुमने खो दी धरती
दिक्-काल विजय की चाह में
हो त्वरणाधीन
उड़ने लगे यत्र-तत्र-सर्वत्र
यह जाने बिना
कि होते ही विस्फारित
द्रव्यमान
कम हो जाता है गुरुत्वबल
जो थाम लेता है त्वरण
और रुक जाती है उड़ान।
बड़े से बड़ा पिंड भी
कितना भी सयाना हो
कितना भी उग्र हो
या हो निरंकुश प्रचंड
धूमकेतु सा
उसे टकराना ही होता है
कभी न कभी
किसी न किसी धरती से
जो सहती सब मौन हो
सतत आघात
बिना परिवाद,
यही तो है मनुस्मृति का
यथार्थ संवाद!
पढ़ा तो होगा ही
कि ज्यामितीय परिणमन है
गुरुत्वाकर्षण बल
दिक् और काल का,
जो हैं तो
अदृश्य
पर प्रभावी उतने ही
कि निगल लें जो भी मिले
स्थूल भी
सूक्ष्म भी
द्रव्य भी
रश्मि भी।
भटकते हुये धूमकेतु
ठौर कब पाते हैं!
ठौर किसे देते हैं!
वे तो टकराते हैं केवल
किसी भी
शस्य श्यामला थरती से
हो जाते हैं नष्ट फिर
कंपित कर धरती।
पर धरती भी
रुकती है कहीं भला!
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