शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

अस्सी (गतांक से आगे)

पश्चिम की खिड़की

स्वतंत्रता सभी प्राणियों का नैसर्गिक अधिकार है किंतु स्वतंत्रता में यदि आत्मानुशासन न हो तो वह स्वच्छंदता हो जाती है जो अंततः अव्यवस्था और कालांतर में परतंत्रता का कारण बनती है।
पश्चिमी समाज की पारिवारिक संरचना के संबंधों में आत्मानुशासन की जो शिथिलता है उसके परिणाम अब वहाँ के लोगों को त्रस्त करने लगे हैं। अब उन्हें पूरब की खिड़की से आने वाली प्रत्यग्र वायु आकर्षित करने लगी है।
भारत में कौमार्यत्व की पवित्रता को पुरुष वर्चस्व और उसकी दासता का उपकरण मानने वाली स्त्रियों के वैचारिक आंदोलन किशोरियों को आकर्षित करते हैं। इसे क्रांति की प्रचंड लहर माना जाने लगा है। परिणामतः नूतन बयार की उत्कट लालसा उन्हें अविवाहित संबंधों की ओर ले कर उड़ चली है। पश्चिम में असमय मातृत्व का बोझ किशोरियों को ही झेलना पड़ रहा है, किशोरों को नहीं। नारीमुक्ति आंदोलनकारियों के पास इस समस्या का कोई स्पष्ट समाधान दिखाई नहीं देता।
नारीमुक्ति आंदोलन स्त्री-पुरुष साहचर्यता की नैसर्गिक व्यवस्था को विवाहमुक्त संबंधों में तो परिवर्तित कर सकते हैं पर उसकी आवश्यकता को नकार नहीं सकते।
पश्चिम में गृहविहीन किशोरों-किशोरियों की स्थिति सरकारी सहयोगों के बाद भी सुधर नहीं पा रही है। उन्मुक्त सहवास के अवांछित परिणामों और अनिश्चित भविष्य ने उन्हें घातक द्रव्यों के सेवन की ओर धकेल दिया है।
नारीमुक्ति आंदोलन वाली स्त्रियों के एक वर्ग ने तो पुरुष से प्रतिशोध लेने की ठान ली है। अच्छे पदों पर कार्यरत ये उच्चशिक्षित नारियाँ पुरुषों के प्रति अभद्र शब्दों, वाचिकहिंसा और अपमानजनक टिप्पणियों को स्त्रीशौर्य का आवश्यक उपकरण मानती हैं। उनकी तीक्ष्ण गालियों के स्तर नें समकक्ष शिक्षित पुरुषों को तो छोड़िये अशिक्षित और अपराधीवृत्ति के पुरुषों को भी बहुत पीछे छोड़ दिया है।
आश्चर्यजनक तो यह है कि उनकी गालियों में यौनक्रिया के विद्रूप शब्दचित्र तो होते ही हैं, पुरुष की माँ-बहन को भी नहीं छोड़ा जाता। यह कैसी नारीमुक्ति है जिसके प्रतिशोध के लक्ष्य से नारी भी मुक्त नहीं!
नयी बयार के लिए उमड़ती भीड़ में हेरोइन और कोकीन जैसे द्रव्यों से भी अधिक घातक मदकारी द्रव्यों का प्रचलन  अमेरिका के लिए तो चुनौती है ही, अब भारत के लिए भी चुनौती बनता जा रहा है। अमेरिका का यह शोधपत्र सभी देशों के लिए गंभीर चेतावनी है -
For years, students in middle and high schools across the country were urged to “just say no” to drugs and alcohol. But it’s no secret that the Drug Abuse Resistance Education (D.A.R.E.) program, which was typically delivered by police officers who urged total abstinence, didn’t work. A meta-analysis found the program largely ineffective and one study even showed that kids who completed D.A.R.E. were more likely than their peers to take drugs (Ennett, S. T., et al., American Journal of Public Health, Vol. 84, No. 9, 1994Rosenbaum, D. P., & Hanson, G. S., Journal of Research in Crime and Delinquency, Vol. 35, No. 4, 1998)


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