शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

डीएनए प्रेम की बायोप्सी

अथ सजातीय-विजातीय वास कथा।

महर्षि पुनर्वसु आत्रेय उवाच-
"लोकोऽयं पुरुष संमितः"
शरीर में प्रविष्ट किसी भी विजातीय द्रव्य (Foreign body) को शरीर में तब तक रहने का अधिकार नहीं होता जब तक कि वह पूरी तरह सजातीय (Assimilate) न हो जाय। ग्रहण किए अन्न-जल को शरीरकोशिकाओं का कोई न कोई घटक बनना ही होता है। यह शरीर का अपरिहार्य प्रकृतिधर्म है। विजातीय से सजातीय में रूपांतरित होने की इस प्रक्रिया को आप पाचन के नाम से जानते हैं। जो पच गया वह शरीर का घटक बन कर तुल्य रूप-गुण-धर्म वाला (Assimilated) हो गया, जो नहीं पच सका वह तुल्य रूप-गुण-धर्म वाला न होने के कारण अपशिष्ट के रूप में शरीर द्वारा बाहर फेक दिया जाता है। शरीर का कोई भी अपवर्ज्य द्रव्य अपनी उसी पहचान के साथ वहाँ रहने का हठ नहीं कर सकता और न इसके लिए किसी न्यायालय में जा सकता है, यह नैसर्गिक न्याय के विरुद्ध है। किंतु इसके विपरीत अवैध घुसपैठिये रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों को देश से बाहर निकालने के स्थान पर सर्वोच्च न्यायालय भारत में उनके रहने के अधिकार को विचारणीय मानता है।
शारीरक्रिया की यही वैज्ञानिक पद्धति
Social-physiology के रूप में समाज और राष्ट्र के लिए भी प्रयुक्त होती है, जिसे नये संदर्भों में इन्हीं नैसर्गिक प्रक्रियाओं की दृष्टि से समझना होगा। भारतीय वांग्मय में "पुरुषोऽयं लोकसंमितः" की अवधारणा और "लोकोऽयं पुरुष संमितः" में सैद्धांतिक रूप से कोई अंतर नहीं। यावन्तो हि लोके (मूर्तिमन्तो) भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके। जब पुरुष लोक की तरह होता है तो लोक भी पुरुष की ही तरह होता है। जब आप परमाणु संरचना और मात्राभौतिकी (Quantum physics) के परिप्रेक्ष्य में शारीरक्रिया (Bio-Physiology) की घटनाओं को देखेंगे तो "पुरुषोऽयं लोक संमितः" और "लोकोऽयं पुरुष संमितः" का वैज्ञानिक सत्य समझ में आने लगेगा। हमारा
शरीर किसी भी विजातीय द्रव्य (Foreign body) को स्वीकार नहीं करता और उसे शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया प्रारंभ कर देता है।
विदेशों में रहने वाले सनातनी प्रवासियों और भारत में रहने वाले पारसियों की सफलता का यही रहस्य है। वे जिस भी देश में जाते हैं उसके अनुसार स्वयं को बना लेते हैं, ये उस देश की परंपराओं और सामाजिक मूल्यों का न केवल वाचिक सम्मान करते हैं अपितु उनका व्यावहारिक आचरण भी अपना लेते हैं।
रोग तभी उत्पन्न होते हैं जब खाया हुआ भोजन पचने के स्थान पर अपनी पृथक सत्ता और पहचान के साथ शरीर में रहने का हठ करता है। विवाद और सामाजिक व्याधियाँ तभी उत्पन्न होती हैं जब कोई प्रवासी अपनी मान्यताओं, जीवनशैली और सांप्रदायिक अवधारणाओं को विदेशी धरती पर जाकर वहाँ के स्थानीय नागरिकों पर थोपने ही नहीं लगता अपितु उन्हें इसके लिए हिंसक क्रियाओं से बाध्य भी करता है। आमाशय में पहुँचा दाल-भात उसी रूप और अपनी उसी पहचान के साथ वहाँ नहीं रह सकता, उसे रूपांतरित होना ही होगा। दाल-भात का जो अंश रूपांतरित नहीं हो सकेगा उसे बाहर जाना ही होगा। यही प्रकृति (Physiological phenomenon) है, इसके प्रतिकूल जो भी घटनायें और स्थितियाँ होती हैं वे सब विकृतियाँ (Pathological states) है जो अंततः व्याधिकारक होती हैं और उपचार न होने पर अनियंत्रित होकर मृत्यु का कारण बनती हैं।
भारत में ही नहीं अपितु विश्व भर के देशों में फैली विकृतियाँ अपनी पहचान और अस्तित्व को थोपने में लगी हुयी हैं जिनका उपचार हर देश को करना ही होगा। अन्यथा रुग्ण कोशिकाओं का अनियंत्रित विस्तार और बढ़ती संख्या अर्बुद (Carcinomatic growth) बनकर पूरे देश में व्याप्त (metastasize) हो जाएगी और अंत में उसे समाप्त कर देगी। शरीर के निष्प्राण होते ही व्याधि का भी अस्तित्व नहीं रहता।
जिन्हें अपनी विशिष्टपहचान के साथ विश्व पर शासन करने की अदम्य चाहत है उन्हें समझना होगा कि विजातीय बनकर रहने का हठ किसी के लिए भी शुभ नहीं होता। शरीरांत के साथ ही सभी व्याधियों के भी अंत होने में कोई संदेह नहीं होना चाहिए।
सारांश यह कि भारत में यदि रहना है तो भारत जैसा बनना होगा। भारतीय मूल्यों का सम्मान न कर सको तो कम से कम उनका अपमान तो न ही करो।

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