शिवशक्ति (Cosmic energy) के तीनों स्वरूपों- सृजन (Creation, Evolution), लय (Harmony) और विलय (Disappearance, Envolution) में असंतुलन का चरमकाल है कलियुग। अब संतुलन की साधना अपरिहार्य है।
चेतना जागरण और शक्ति संतुलन की रात्रि "महाशिवरात्रि" प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी हो! इसी ऐषणा के साथ, जय महाकाल!
हे शिव! हे महाकाल!
त्रयंबकेश्वर विराट!
चेतन ! अब जाग-जाग
हो रहा प्रतिकूल काल ।
अ-शिव हुआ जग
कर असंतुलन
धरती का दोहन ।
कर्मविरत तृष्णा महान
धर्मविरत ले शक्तिपाश
निकले बनने सब रावण महान!
पोषण से द्वेष लिए
शोषण की चाह लिए
ध्वंस का मान लिए
चल पड़े करने 'सृजन'!
किसका सृजन? कैसा सृजन?
है राजदण्ड भी खड़ा
अट्टहास कर रहा
विध्वंस ही तो है 'सृजन' !
गा रहे 'समानता'
बाँटकर 'असमानता'
निकल पड़े रावण सब
धारण कर साधुवेश
निर्बल निरुपाय हुयीं
देश की वैदेहियाँ सब।
पोषण की चाह नहीं
शिव की यह राह नहीं
पर
शोषण अधिकार मान
"निर्बल हूँ" चीख-चीख
छीन रहे सब आरक्षण
क्या सचमुच ये निर्बल हैं?
कर छिन्न-भिन्न मर्यादा
लाँघ-लाँघ लक्ष्मण रेखा
छीन रहा वह शक्तिस्रोत
कर अनधिकृत आधिपत्य,
हों न क्यों शिव कुपित!
हो रही
छीना-झपटी
कंपित हैं दिग् दिगंत।
घुमड़ रहे कृष्णमेघ
गरज-गरज युद्धघोष
निरंकुश लोभ
विस्तृत हो सुरसा बन
हो जाए जब प्रचण्ड
करना ही होगा तब
शक्ति का संतुलन
रोकना होगा उन्हें
युद्ध को उद्यत हुये जो।
कैसे हो नव सृजन!
साधी क्या कभी ताल?
अस्थिर है लय
विकराल है विलय
किंतु अब कर विराम,
थिर ! थिर ! थिर !
चल उठ
संकल्प ले
शिवसाधना ! शिवसाधना !
शिव की महारात्रि
जागृत कर चेतना
संतुलित अब शक्ति कर
विनाश का विनाश कर
सृष्टि का विकास कर।
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