संघ और भाजपा के जाल में फँसे मध्य और उत्तर भारतीय दलितों की अपमानजनक, विघटनकारी और हिंसक हुंकार की प्रतिक्रिया ने देश के सभी वर्गों को जहाँ झकझोर कर रख दिया है वहीं सांप्रदायिक शक्तियों को भी अपनी रोटियाँ पकाने का सुअवसर उपलब्ध करवा दिया है। कुछ लोग इसे सवर्णविरोधी षड्यंत्र मान रहे हैं तो कुछ लोग मात्र एक चुनावी चाल भर। यदि यह एक चुनावी रणनीति भर है तो भी लोकतांत्रिक मूल्यों पर क्रूर प्रहार होने के कारण संकटजनक है। समूह विशिष्ट के विरुद्ध ऐसी उन्मूलनकारी कूटनीति संभवतः अन्यत्र किसी देश में नहीं होती होगी। कई तटस्थ विचारक इसे जातीय ध्रुवीकरण का एक धूर्ततापूर्ण षड्यंत्र मान रहे हैं। ऐसे विचारकों में संघ और भाजपा के समर्थक ही नहीं प्रत्युत दलित वर्ग के भी विवेकशील लोग सम्मिलित हैं जो समावेशी समाज के लिए एक शुभ संकेत है। इस पूरे प्रकरण में रविशंकर प्रसाद, संविद पात्रा, बाँसुरी स्वराज और सुधांशु त्रिवेदी जैसे लोगों का रहस्यमय मौन कई और प्रश्नचिन्ह खड़े करता है।
यूजीसी रेगुलेशन वरदान नहीं अभिश्रापभारत में आरक्षण का स्वरूप पूरी तरह समाजमनोवैज्ञानिक सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ाते हुये सामाजिक विघटन के नये-नये आयाम स्थापित करने वाला रहा है। यह पूरी तरह विघटनकारी और नैसर्गिक सिद्धांतों के भी विरुद्ध है।
दस वर्ष के लिए प्रावधानित आरक्षण का स्वरूप विकृत कर "थोड़ा देकर सब कुछ छीन लेने" के सिद्धांत पर पुनर्गढ़ित कर परोसा जाने लगा है। आरक्षण पाने वाले वर्तमान की क्षुद्र उपलब्धि को ही संपूर्ण निधि समझ बैठे हैं जबकि वास्तव में वे अपने भविष्य का अपना सबकुछ खो रहे हैं। आरक्षण का वर्तमान स्वरुप वह अफीम है जिसे अगले दो सौ सालों तक आप एक वर्ग को खिलाकर समाज को अपंग बनाने का कुचक्र रच रहे हैं।
मोहन भागवत! आप देश को आग में झोंकने का दुस्साहस कर भारत के एक और मोहनदास बन गये हैं । सवर्णों और भारतीय इतिहास पर आपके मनगढ़ंत आरोप ऐतिहासिक तथ्यों से परे और निराधार ही नहीं धूर्ततापूर्ण भी हैं कि-
१. जातियाँ पंडितों ने बनाईं,
२. सवर्ण पिछले दो हजार वर्षों से दलितों का शोषण और उत्पीड़न करते आ रहे हैं।
इसीलिए आवश्यक होने पर उन्हें अगले दो सौ वर्षों तक आरक्षण दिया जाना चाहिए। यह विचार निंदनीय ही नहीं कुत्सित और वीभत्स भी है।
इस तरह के वैचारिक षड्यंत्र ने भारतीय इतिहास का एक और कलंकित अध्याय लिखना प्रारंभ कर दिया है।
कलियुग में सत्य, धर्म, करुणा और प्रेम जैसी संज्ञायें केवल प्रवचन और छल के लिए ही प्रयुक्त होने लगी हैं, वास्तविकता से इनका कोई संबंध नहीं होता। हिंदुत्व की काल्पनिक बयार से सम्मोहित हम सब उसे पूजनीय मानते रहे जो जोड़ने का छल करके समाज को तोड़ने में लगा रहा है।
जिसे २०० साल तक आरक्षित रखे जाने का प्रस्ताव किया गया है उसे आरक्षण के दो सौ वर्ष और देकर उसे कुछ देने की इच्छा है या उसके पास जो है उसे भी छीन लेने का षड्यंत्र है? प्रकृति का सिद्धांत है, शरीर के जिस भाग का व्यवहार और अभ्यास नहीं किया जाता वह निष्क्रिय हो जाता है। ये कौन चिंतक, विचारक और हिंदुत्व के स्वयंभू मठाधीश हैं जो समाज के एक महत्वपूर्ण वर्ग का बौद्धिक विकास कुंठित करने का षड्यंत्र कर रहे हैं!
सावधान! अजीत भारती जैसे हजारों युवकों की आँखों में धूल नहीं झोंक जा सकती।
विवेक पर किसी का एकाधिकार नहीं होता। जिस तरह कुछ ब्राह्मण इस कुचक्र के समर्थन में खड़े दिखाई देने लगे हैं उसी तरह कुछ दलित भी इस कुचक्र के विरोध में खड़े होने लगे हैं। सनातन संस्कृति को इस तरह विनष्ट नहीं होने दिया जायेगा। राष्ट्रप्रथम के लिए समर्पित सभी भारतीय एक हैं, उन्हें बाँटने के षड्यंत्र सफल नहीं होने दिये जाएँगे।
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