मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

विरोध की अंतरधाराएँ -१

(जातीयविभाजन की गहरी होती खाइयाँ)

विक्रम संवत् २०८२, का फाल्गुन माह भारतीय समाज के लिए दुःखद होता जा रहा है। यूजीसी के समर्थन और विरोध की आग अब सांस्कृतिक युद्ध में रूपांतरित होती जा रही है। महाशिवरात्रि के दिन पुजारी की हत्या और इससे पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय में रुचि तिवारी के साथ तहर्रुश गेमिया की क्रूर घटना एवं पश्चिमी भारत में ब्राह्मण पत्रकारों पर हिंसक आक्रमण की घटनाओं पर विराम नहीं लग पा रहा है। ब्राह्मणों को खुलकर अश्लील गालियाँ देने और भारत छोड़ने की धमकियों की प्रतिस्पर्धा में अब बौद्धपुजारी भी सामने आ चुके हैं। 

देश-विदेश में भारतीय संस्कृति और आर्ष परंपराओं के विरुद्ध कई वैचारिक अंतरधाराएँ पहले से ही प्रवाहित होती रही हैं। 

बौद्धसमाज ने भीमराव आंबेडकर को संविधाननिर्माण के एकमात्र योद्धा के रूप में श्रेय देते-देते भगवान के अवतार के रूप में स्थापित करने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त कर ली है जिससे एक ओर तो भीमराव की मानवीय प्रतिभा नेपथ्य में बहुत पीछे चली गयी तो दूसरी ओर श्रीराम, श्रीकृष्ण, महावीर और सिद्धार्थ गौतम जैसी विभूतियों के अवतारत्व पर भी प्रश्न खड़े हो गये हैं। क्या हमारे समाज में स्वार्थों और षड्यंत्रों की एक ऐसी अंतरधारा सदा से विद्यमान रही है जो मानवेतर शक्तियों को अनुकूल अवसर पाते ही अपनी आवश्यकताओं के अनुसार गढ़ने और थोपने में समर्थ होती रही है? कहीं इसीलिए तो नहीं इन अंतरधाराओं की विषाक्तता को समझकर धर्म को अफीम माना जाने लगा? 

मानवीय प्रतिभाओं की हत्या कर देने में सक्षम होने से कोई भी अतिवादी विचार किसी भी तरह समाज के लिए शुभ नहीं हो सकता। इस अशुभता को प्रोत्साहित और संरक्षित करने में जहाँ शासन-प्रशासन बड़ी रुचि के साथ अपनी भूमिका निभाता रहा है वहीं  आम जनता भी वैचारिकअतिवाद के जनकों और प्रचारकों के षड्यंत्रों को समझने में असफल होती रही है। 

सावधान! इतिहास, पुरातात्त्विक तथ्यों और वैज्ञानिक सत्य को पूरी तरह उलट कर एक सर्वथा नवीन और विकृत इतिहास को गढ़ने की दक्षता किसी भी सभ्यता की हत्या कर देने में सक्षम है।

क्रमशः...

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