सीखा होगा
संतों ने "सन्यास"
कदाचित्
सेव के वृक्षों से
पहले फलदान
फिर पत्रदान,
दे दिया सब कुछ
हो गये निर्वस्त्र
हिमपात के स्वागत में।
टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.
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