शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

यात्रा १९४७ से २०२६...

"जातियों में बँटा समाज अभिशाप है, इससे समाज टूटता है और विकास अवरुद्ध होता है"। हमने यही पढ़ा था, यही सुना था। फिर जब हम स्वतंत्र हुए तो जातिवाद समाप्त करने के लिए सरकारों ने कुछ और जातियाँ बनाईं, टूटे समाज को और बाँटा। वर्तमान सत्ता ने इस शिखर को स्पर्श किया, सारी सीमाएँ तोड़ कर अपराध को भी आरक्षित कर दिया। अब...

जाति देखकर पात्रता और कुपात्रता निर्धारित की जाने लगी है। आरक्षित कुछ भी करे वह निर्दोष माना जाएगा, अनारक्षित कुछ भी न करे तो भी अपराधी और दंड का भागी माना जाएगा।

भीड़ की प्रतिक्रिया...

भारत विभाजन के समय भीड़ की अराजक और क्रूरष्ट प्रतिक्रियाएँ इतिहास में अंकित हो चुकी हैं। स्वतंत्र भारत में यह अराजकता और क्रूरता समाप्त नहीं हुई, उसकी तीक्ष्णता और भी बढ़ती चली गई। परिणामतः धार्मिक आधार पर द्विराष्ट्र सिद्धांत मुसलमानों के लिए तो सार्थक रहा पर हिंदुओं के लिए निरर्थक ही नहीं रहा प्रत्युत और भी नकारात्मक होता चला गया। यह निरंतरता आज भी है। 

इस बीच देश की सामान्य प्रजा की भूमिका कैसी रही, क्या वह सजग रही? क्या उसने अपने प्रजा धर्म का पालन किया?

आज धर्म को लेकर पूरे विश्व में क्रूर तांडव मचा हुआ है। भारत के अतिरिक्त अन्य देशों की सत्तायें अपने दायित्व को समझ चुकी हैं। भारत में क्यों नहीं? क्या हम एक और उपनिवेशवाद के मुँह में समा जाने वाले हैं? क्या हम विदेशी  पराधीनता के चक्र से कभी मुक्त नहीं हो सकेंगे? 

...और अंतिम प्रश्न यह कि क्या हमें समुद्रमंथन की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए?

कोई अपराध घटित होता है तो पहले अपराधी की जाति देखी जाती है, उसका धर्म देखा जाता है इसके बाद भीड़ निर्धारित करती है  कि किसे पीट-पीट कर मार डालना है और किसे ससम्मान छोड़ देना है।

इस सारी अराजकता में न्यायालयों और सत्ताधीशों की भूमिका इस अराजकता को और भी प्रोत्साहित करने वाली रही है। हिंदू में कई और धर्म हो गये, जो सवर्ण थे उसमें से शूद्र वर्ण को दलित बनाकर वर्णविहीन (अवर्ण) कर दिया गया। शेष तीन वर्ण सवर्ण हो गये, चौथा वर्ण भी सवर्ण क्यों नहीं है! वर्णव्यवस्था जो कि वैज्ञानिक है, को समाप्त करने के नाम पर एक और वर्ण, जो कि अवैज्ञानिक है, रच दिया गया। किसने किया यह सब, क्या ब्राह्मणों ने!

सावधान! यह भारतीय सभ्यता और जीवनमूल्यों के अस्तित्व को बचाने का समय है। 

जब सत्ता और न्यायालयों में कुपात्रों की भरमार हो जाती है तो अराजकता पल्लवित-पुष्पित होती है। पराधीनता के युग से लेकर आज तक हम दासता के अभ्यस्त होते रहे हैं। यह समाज-राजनैतिक कैंसर है  जिसकी मेटास्टेटिस हो चुकी है, और अब शल्य चिकित्सा आवश्यक है। 

वैदिक धर्म का संकेत है कि चिकित्सा से पहले समुद्रमंथन करना ही होगा...इस अनुबंध के साथ कि मंथन करने वाले लोग अपने सभी पूर्वाग्रहों का परित्याग कर शुद्ध मन से आगे आएँ। उनका मन कोरा कागज होना ही चाहिए। मंथन होगा तो समाधान भी होगा। सिद्धांतविहीन "अमृतकाल" एक और छलावा ही सिद्ध हुआ है। हमें स्वीकार करना होगा कि मंथन होगा तो विष भी निकलेगा और अमृत भी। विष और अमृत दोनों को धारण करना होगा, बस हमें शिव को खोजना होगा जो विष धारण कर सकें, और कुछ देवताओं को भी जो अमृत का दुरुपयोग न करें। 

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