मंगलवार, 18 जनवरी 2011

अपसंस्कृति ...कौन है ज़िम्मेदार ?

दिव्या जी ! आप अपसंस्कृति के लिए चिंतित हो रही थीं .....कल फिर एक खबर छपी है -हॉस्टल डे पर १५ जनवरी की रात हमारे शहर कांकेर में छात्र-छात्राओं नें एकल और सामूहिक नृत्य किये .अखबार के अनुसार "लोकप्रिय गीत मुन्नी .....और शीला.....कार्यक्रम में छाये रहे ..... बीच-बीच में हौसला अफजाई के लिए प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में उच्च पदों पर आसीन अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों ने भी छात्र-छात्राओं के साथ ठुमके लगाए" .इसके बाद महिला मंत्री, महिला विधायक , एक और युवा विधायक, अ.ज.जा. आयोग के अध्यक्ष ....कई अधिकारियों, प्रोफेसर्स व अधिवक्ता आदि के नाम उपस्थित लोगों की सूची में दिए हुए हैं. इसमें तीन बातें हैं, १- इन गीतों को लोकप्रिय गीतों के खिताब से नवाज़ा गया, २- नृत्य में छात्रों के साथ छात्राओं नें भी नृत्य किया, ३- कार्यक्रम में ज़िम्मेदार नेता और अधिकारी भी थे.......निश्चित ही अभिवावक भी रहे होंगे.४- हफ्तों पहले से इसकी तैयारी की गयी होगी.
अब विचारणीय यह है कि जिस अपसंस्कृति के लिए ज़िम्मेदार लोगों को चिंतित होना चाहिए था ...वे तो हौसला अफजाई में लगे हुए हैं ......किसी एक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. इसमें अभिवावकों से लेकर हमारी संस्कारहीन शिक्षा का भी पूरा-पूरा योगदान है. अब सवाल यह है कि किया क्या जाय ? कोई इसे रोकना नहीं चाहता ...बढ़ावा देना चाहते हैं लोग. हमारे आपके जैसे कुछ लोग यदि चिंतित होते भी हैं तो उनकी सुनने वाला है कौन ?  

सोलह सिंगार

हम तो बैठे थे ..सोलह सिंगार करके
बेसब्री से इंतज़ार में.
वो आये.....
और ताबड़तोड़ करके क़त्ल हमें 
चल दिए अगले शिकार की तलाश में. 
मर गए हम....रह गयी हमारी कविता 
हमारी  लाश पर भिनभिनाती हुई.
ये शहर भी कितना बेशर्म है 
कितना खेलता रहा है मुझसे,  सारी ज़िंदगी.....
मगर दे नहीं सका एक छोटा सा कफ़न भी.
आज आख़िरी वक़्त में.


मंगलवार, 11 जनवरी 2011

1- 
मुझे पता चल गया है

क्यों थम जाती हैं...... 
सिर्फ नदी की ही साँसें .........
जब भी सख्त होता है मौसम, 
और .........कोई समंदर क्यों नहीं बनता 
खुद एक ग्लेशियर ? .
सूरज का अहम्
क्यों टकराता है बार-बार
चांदनी से ?  
मुझे पता चल गया है ........
"रात" उस दिन भी आयी थी .....
आते ही ...फूट-फूट कर रोई थी 
मैंने देखा ......
उसके ज़िस्म पर
चोटों के गहरे निशान थे.  
२- 
कमाल है .....
बस 
ज़रा सी तो पिघली थी बर्फ़ ......
हिम नदी की 
और इस कदर शोर मचाने लगा समंदर ........!
कमाल है .........
इतने भी आँसू 
समेट नहीं पाता किसी के.......
बड़ा मर्द बना फिरता है . 
३- 
ग़ज़ल

रात दिन .........
ये ज़ो कतरा-कतरा खून 
जलता रहता है न ! मेरे जेहन में  
उसी  के धुंएँ से बनी हैं  .......
ये ढेरों आकृतियाँ ..........
ज़ो इतनी खूबसूरत लगती हैं तुम्हें ......... 
और लोग .......कितने दीवाने हैं 
कि इन्हें ही समझ बैठते हैं 
मेरी ग़ज़ल.
  

सोमवार, 10 जनवरी 2011

......तुम अब भी खामोश हो !

मैंने तो माँगी थी
धूप  की गुनगुनाहट भर 
आग तो नहीं !
फिर क्यों आ गए बहुत से आतिशी शीशे
मेरे 
और सूरज के बीच ?
और क्यों बेताब है 
हर शीशे से निकला 
एक-एक झूठा सूरज 
.......सब कुछ ख़ाक कर देने के लिए ?
अब तो 
झुण्ड के झुण्ड फैल गए हैं ये सूरज...... 
पूरी धरती पर
और संभावनाओं के वृक्ष 
अपने गर्भ में धारण किये एक बीज, 
ज़ो फेंक दिया गया है 
रेत में उगने के लिए
जल कर ख़ाक हो रहा है....आहिस्ता....आहिस्ता....
उधर 
अपने अस्तित्व की रक्षा में 
छटपटा रही है
संभावनाओं   के अंकुरित होने की संभावना.
पुष्प पल्लव अभी कल्पना में हैं 
और प्रतीक्षा 
पश्चिमी क्षितिज पर ...
कहीं खो गयी है 
सूरज ! 
तुम अब भी खामोश हो ???

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

नहीं लौटाना चाहता कुछ चीजें

तुम्हारी भेजी टोकरी में रखे फूलों नें 
हंस-हंस कर.....गा-गा कर  
सारा हाल सुना दिया है तुम्हारा .
इन पीले और गुलाबी फूलों नें 
न जाने कितनी बातें की हैं मुझसे .
और ....अपनी खुशबू के साथ-साथ 
तुम्हारी भेजी वह खुशबू भी चुपके से सौंप दी मुझे    
ज़ो तुम्हारे हृदय से अनजाने ही उपजी होगी.
पल भर में कब घुल गयी वह मेरे रक्त में 
मुझे तो पता ही नहीं चला
..............................
पर मैं 
धन्यवाद नहीं दूंगा तुम्हें 
पता है क्यों .........?
मुझे लगता है 
यह औपचारिकता तो उनके लिए है 
ज़ो बढ़ जाना चाहते हैं आगे ..... 
हिसाब चुकता करके
महज़ किसी व्यापार का दस्तूर सा निभाकर.  
तुम्हारी भावनाओं को तौला नहीं जा सकता किसी तराजू  से 
इसलिए  ........
मैं तो ठहरना चाहता हूँ वहीं  ...
और नहीं लौटाना चाहता कुछ चीजें  
.................................वे चीजें  
ज़ो रहनी चाहिए  हमारे ही पास. 
बस ..., धन्यवाद की जगह 
हृदय से कुछ तरंगें सी निकलती हैं विद्युत् की
निकलती ही रहती हैं ..........
और चलती चली जाती हैं अनंत में 
.......................नृत्य करती हुई
दिव्य है वह नृत्य.   
................................और 
जिसकी चीजें रख ली हैं न ! मैंने आपने पास  
मैं अपनी बंद आँखों से 
मुस्कुराते हुए देखता रहता हूँ उसे  
बस ....देखता ही रहता हूँ निरंतर ...
अब तो पलक झपकाने का व्यवधान भी समाप्त हो गया न ! 
  

बुधवार, 5 जनवरी 2011

.......न जाने कब से

सुलग-सुलग कर ख़ाक होती रही है 
आहिस्ता-आहिस्ता ........मेरे शहर की शराफ़त
.............न   जाने  कबसे  ! 
सरेआम ....
धुंआ बनकर उड़ती रही है ....
ज़हरीली तम्बाकू पर लिपटी सफ़ेदपोश चेतावनी 
.............न जाने कबसे !

ज़िस्म का भूगोल बन गए हैं सारे "तथ्य "
सर्व विदित होकर भी 
रहस्य ही बना रहता है "सब कुछ".
विस्तृत होते-होते 
शून्य हो गया है 'पाप'
जिसे ओढ़कर 
बड़ी सहजता से भागा जा रहा है ये शहर ..न जाने कबसे !!.

हर खूबसूरत चीज़ 
आते-आते इस शहर की सीमा में 
बन जाती है बुत,
इन्हीं बेजान बुतों से 
धनी होता जा रहा ये 'शहर' 
अब 
अपनी सीमाओं को लांघता.......फैलता जा रहा है 
जहाँ काबिलियत की मोहर खरीदने 
बोलियाँ लगाते हैं कुबेर
और पैमाने 
रद्दी से भी सस्ते में बिकते हैं गली-गली.
इसी भावशून्य शहर में 
बिना किसी भाव के 
बड़ी बेदर्दी से घिसटती रही है 
ये ...अपनी भी ज़िंदगी ....आहिस्ता-आहिस्ता ....न जाने कब से !!

टुकड़े ज़िस्म के .......बड़े महंगे हैं 
मगर ज़िंदगी ? 
पेट भर भोज़न में 
ख़रीद लो जितनी चाहो उतनी.
यहाँ बरसती हैं संवेदनाएं ....बिना वेदना के 
और कचरे के ढेर में पडी रहती हैं 
अभावग्रस्त भावनाएं.

पता चला है .......
मंदिर में बैठी मूर्तियों की 
भंग  हो गयी है आस्था...
अपने ही पुजारी के प्रति
और बेतहाशा दौड़ते यथार्थ सहम कर अचानक .....
कहने लगे हैं आदमी से- 
'रुकने का ठौर
कोई  हो तो बता दो 
किनारे तो क्षितिज में समाये हुए हैं न जाने कब से' .

ख़ासियत यही है इस शहर की
कि सरेआम होती रही है बे-आबरू 
शहर के  इक्के-दुक्के शरीफ़ों की शराफ़त.
टुच्चे 
नसीहतें देने निकले हैं 
और क़ातिल 
फ़ैसले करने लगे हैं सड़क पर.
तुमने तो देखा है मेरे भाई 
न्याय की आँखों पर 
पट्टी बंधी है न जाने कबसे !!

शनिवार, 1 जनवरी 2011

अंतरजाल की आचार-संहिता



विचित्र है अंतरजाल की रहस्यमयी माया 
स्वतंत्रता और सम्प्रेषण के इस मार्ग नें सभी को लुभाया 
किसी को हर्षाया ..किसी को भरमाया 
किसी को निखारा ...किसी को मंच तक पहुंचाया  
कहीं विवाद करवाया .... कहीं तनाव करवाया  
कहीं किसी बिछुड़े को मिलवाया ... 
तो किसी को मधुर प्रेम के बंधन में बांधा  
 ...हर क्षण ...हर पल सबको कुछ न कुछ सिखाया /  

हमें भी आपकी तरह कुछ नए रिश्ते मिले हैं  
दूर-दूर अनजाने देशों में नए-नए फूल खिले हैं 
और उनकी खुशबू नें सराबोर कर दिया है मेरी आत्मा को 
मैं ऋणी हूँ ...उन सबका  
जिन्होंनें अति सूक्ष्म संवेदनाओं का परिचय दिया 
मन की आँखों से मुझे देखा 
..अपनी संवेदनाओं से मुझे स्पर्श किया  
ज़ो कल तक ....."होगा कोई मुझे क्या ?" से पहचाने जाते थे 
आज ..."तुम सा कोई नहीं ".....या "मेरे अज़ीज़" की तरह पहचाने जाते हैं 
सब नें दिलों में उनकी तस्वीरें बना रखी हैं 
..अपने-अपने क्षितिजों को और विस्तृत कर लिया है / 
टूट चुकी हैं धर्म और जाति की दीवारें 
यहाँ केवल प्रेम के झरने बह रहे हैं 
और तुम अभी भी अपने अँधेरे ...बदबूदार कुएं में से बाहर नहीं आना चाहते !!!!!!!
आश्चर्य है ..........धर्म के नाम पर 
अपने को श्रेष्ठ और दूसरों को हेय सिद्ध करना चाहते हो 
हम तो खड़े हैं तुम्हारे दरवाज़े पर कब से 
तुम्हीं नें इतने कांटे बो रखे हैं 
कि भीतर घुसने में डर लगता है 
आइये नव वर्ष में हम प्रतिज्ञा करें कि 
अंतरजाल की दुनिया में किसी का दिल नहीं दुखायेंगे 
और इंसानियत ...सिर्फ इंसानियत की बात करेंगे 
नफ़रत की जगह प्रेम और सिर्फ प्रेम ही बाटेंगे 
....और इस तरह हर सुबह नव-वर्ष मनाएंगे 
पर इससे पहले 
अंतरजाल की एक आचार-संहिता बनायेंगे 
और उसका ईमानदारी से पालन करेंगे /