मंगलवार, 15 सितंबर 2020

फ़िल्म उद्योग का कोई सम्बंध नहीं है ड्रग माफ़िया से – गृह विभाग, भारत सरकार

गंधर्वलोक पापमुक्त होता है क्योंकि वहाँ सत्य ही सत्य है, वहाँ सौंदर्य ही सौंदर्य है, वहाँ शक्ति ही शक्ति है, वहाँ ऐश्वर्य ही ऐश्वर्य है । जहाँ ऐश्वर्य होता है वहाँ पाप नहीं होता ।

गंधर्वलोक के किसी भी कलाकार को नशे से मुक्ति के लिए कभी नशामुक्ति केंद्र में जाने की आवश्यकता नहीं होती । गंधर्वलोक में शोषण, कुंठा, अवसाद और ड्रग्स लेने के कारण कभी कोई आत्महत्या नहीं करता । गंधर्वलोक की फ़िल्मों में काली दुनिया का कोई संत काला पैसा नहीं लगाता, और न कभी कोई दाउद वहाँ के किसी मामले में कोई हस्तक्षेप करता है ।  

...क्योंकि वहाँ मोनिका वेदी होती है जिसका कभी किसी अंडरवर्ल्ड से सम्बंध नहीं रहता, वहाँ गुलशन कुमार की मौत होती है जिसमें कोई षड्यंत्र नहीं होता, वहाँ सलमान ख़ान होता है जो कभी किसी काले हिरण का शिकार नहीं करता, वहाँ संजय दत्त होता है जिसके पास कभी कोई ग़ैरकानूनी हथियार नहीं होता, वहाँ अब्दुल राशिद होता है जो कास्टिंग काउच से कभी किसी लड़की का शोषण नहीं करता ।

हम आशा करते हैं कि साम्राज्ञी जी को यह मुलम्मा पसंद आयेगा ।

थाली में छेद किसने किया ?

थाली में बहुत से छेद थे जिन्हें रंगीन फूलों के ढेर से ढक कर रखने की सुनियोजित परम्परा थी । यह बात बहुत से संतों को मालुम थी, किंतु जैसी कि परम्परा थी, इसे गोपनीय बनाने रखने के मिशन में हर कोई सम्मिलित होता चला गया । बड़े-बड़े स्वयम्भू भूपति सारा तमाशा देखते और जानते रहे किंतु उन्हें अपनी परम्पराओं से गहरी मोहब्बत थी इसलिए वे हमेशा गहरी ख़ामोशियों के बीच मुस्कराते रहे ...और नैतिक निष्ठा से समझौते करते हुये अपने ऐश्वर्य में वृद्धि करते रहे । ।

थाली के छेदों को कँगना ने देखा ...रवि किशन ने देखा ...मानवी तनेजा ने देखा ...और भी बहुत से लोगों ने देखा और गहरे सन्नाटे को चीरने के लिए कूद कर सामने आ गये । रवि किशन ने आवाज़ उठायी कि थाली में जो छेद हैं उन्हें भरा जाय और यह सुनिश्चित किया जाय कि भविष्य में अब कोई दूसरा छेद न हो ।

सायकिल सवार साम्राज्ञी को यह बात अच्छी नहीं लगी । उन्हें ही क्या ...और भी बहुत से कलाकारों को यह बात अच्छी नहीं लगी । जो साम्राज्ञी सुशांत सिंह राजपूत की असामायिक मृत्यु के हंगामे पर ख़ामोश रही वह अचानक मुखर हो गयी । साम्राज्ञी ने रविकिशन को आरोपित कर दिया । एक कलाकार ने दूसरे कलाकार को आरोपित कर दिया । एक माननीय ने दूसरे माननीय पर कीचड़ उछाल दिया ।

मायानगरी के स्वयंभू सम्राट बहुत पहले ही स्वीकार कर चुके हैं कि वे राजनीति के लिए उपयुक्त व्यक्ति नहीं थे और अब वे कभी राजनीति में नहीं आयेंगे । मुझे याद नहीं आता साम्राज्ञी की राजनीतिक यात्रा में कभी कुछ भी उल्लेखनीय रहा हो ।

गंधर्वलोक की ख़ामोशियाँ के बीच काँव-काँव...

वे सब हमेशा की तरह तमाशबीन बने रहना चाहते थे, अपने चारो ओर फैल रही गंदगी से उन्हें कभी कोई ऐतराज़ नहीं हुआ । समारोहों में मुस्कराते हुये पुरस्कार लेने वाले चेहरे, आत्मप्रशंसा के मुलम्मे में झूमते रहने वाले चेहरे अचानक काँव-काँव करने लगे क्योंकि ...

...क्योंकि एक नारी शक्ति ने अपने चारो ओर फैली सड़ाँध से परेशान होकर नाक-भौं सिकोड़नी ही नहीं शुरू कर दी बल्कि सफाई की बात भी कह दी ।

सुशांत सिंह की मृत्यु पर चुप्पी साधे लोग अचानक बोल पड़ते हैं, रिया चक्रवर्ती की ग़िरफ़्तारी उन्हें अन्याय लगती है । हर बात में पटर-पटर बोलने वाले मोतीहारी वाले मिसिर जी को यह सारा तमाशा गहरी विरक्ति से भर देता है ।

गंधर्व लोक के बनावटी चेहरे हमारे आदर्श क्यों हैं?      

मोतीहारी वाले मिसिर जी कहते हैं – “रिया आ शोविक के ग़िरफ़्तारी दुःखद बा । दू गो नवका झाड़ बॉढ़े-पउढ़े से पहिलहीं मुरझा गॉइलन । उनकर भविस्य पर ग्रिहन लाग गॉइल बा । पर सनी देव जी के आपन काम कॉरे के परी । अनुसासन आ नियाय के स्थापना करे खातिर कुल दुःख सहन करे के चाहीं”। 

हम मिसिर जी की भावनाओं का सम्मान करते हैं । चक्रवर्ती परिवार इस घटना से पूरी तरह बिखर गया है किंतु इस पूरे प्रकरण में रिया के पिता के दायित्वों की असफल भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती । हम सुशांत सिंह को भी पूरी तरह निर्दोष नहीं मान सकते । यदि उनके अंदर दृढ़ इच्छा शक्ति होती तो वे इस दलदल से निकल सकते थे । बहरहाल यह सब बहुत बड़ा पाठ है समाज के लिए ...हमें रिया के पिता की भूमिकाओं और सुशांत सिंह की मनः स्थितियों के विश्लेषण से बहुत कुछ सीखना और सँभलना होगा ।

हमें बोलना ही होगा...

आवश्यक नहीं कि हम मोतीहारी वाले वयोवृद्ध मिसिर जी की हर बात से सहमत हों ...फिर भी उनकी सजग दृष्टि और समाज के प्रति उनकी व्यथा हमें उनकी ओर आकर्षित करती है । एक दिन हमने पूछा – “मिसिर जी ! हर बात में आप क्यों कूद पड़ते हैं? आपकी चिंता से क्या होगा ? अब इस चौथेपन में आपको सन्यास लेकर भगवान का भजन नहीं करना चाहिए?”   

मिसिर जी की ओर से कोई आवाज़ नहीं आयी तो हमें लगा कि शायद फ़ोन कट गया है । हम दोबारा फोन लगाने ही वाले ही थे कि उनकी गम्भीर आवाज़ सुनायी दी – “सजग रॉहब तऽभिये नू भजन होई भगवान के रचल सिरस्टी के । चुप रहलीं तऽ अफगानिस्तान बॉन गऽइल , चुप रहलीं तऽ अरबी आ फिरंगी बिदेसिया के गुलाम हो गऽइलीं, चुप रहलीं तऽ हम बहुसंख्यक से अल्पसंख्यक हो गऽइलीं, चुप रहलीं तऽ हमार पहचान मिटाय के कुल अभियान सफल हो गइल, अभियो कॉहतऽड़ के चुप रॉहे के चाहीं ? ए हो बचवा सुनॉ ...हमरा के गोली मार दऽ हम चुप हो जाइब”।

मिसिर जी का यह उत्तर हमें हमें भारत की कोटि-कोटि प्रजा के प्रति अपने दायित्वों के लिए ललकारता है ।

मिसिर जी ! हमसे भारी भूल हो गयी । आप बोलिये, आपको बोलना ही होगा ।  

2 टिप्‍पणियां:

  1. संभ्रांत मायानगरी के लोग चुप रहे क्योंकि सुशांत उनका बेटा नहीं था | सुशांत की गलती यही रही वो वफ़ादार लोगों से दूर हो गये और चाटुकारों की मडली से घिर कर असुरक्षित हो गये और काल के कुचक्र में जा फंसे | कडवा सच है मायानगरी ने कामयाबी की थाली बस अपनों के लिए परोसी है दुसरे लोग आये तो वो कब गायब हुए किसी को पता भी नहीं चला |या फिर ऐसा हश्र हुआ जैसा सुशांत का हुआ | तो फिर मायानगरी गंगा जैसी निर्मल कैसे कहाई जा सकती है |इसका काला इतिहास समय की गर्त में छुपा रह गया | अगर किन्ही दुस्साहसी लोगों ने इस कालिख से मायानगरी को बचाने के लिए सच बोला तो वे कृतघ्न कहलाये | पर मिस्र जी जैसे लोग मायानगरी की परिधि से दूर सच बोलने की हिम्मत रखते हैं , उन्हें बोलने से कोई नहीं रोक सकता || शायद उनकी बुलंद आवाज ही न्याय का विगुल हो |

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  2. ड्रग, अंडरवर्ल्ड और कास्टिंग काउच का मायानगरी से बहुत पुराना रिश्ता रहा है पर किसी महारथी या महानायक ने इसके विरुद्ध आवाज़ नहीं उठायी । वे केवल पैसा और कीर्ति कमाने में लगे रहे ...शायद उन्होंने कीर्ति भी ख़रीदी है ....। इलाहाबाद में जब लड़कियों ने महानायक के स्वागत में अपने दुपट्टे उतारकर सड़क पर बिछा दिए तो महानायक ने दुपट्टों के ऊपर चलते हुये ख़ुशी ज़ाहिर की थी । भारतीय संस्कृति और परम्पराओं की दुहाई देने वाला अपनी महानता से आत्ममुग्ध महानायक यह भूल गया कि आँचल पर पैर रखकर चलने का अर्थ क्या होता है । लड़कियों को भी सोचना चाहिये था ...किंतु महानायक का भी कर्तव्य बनता था कि वे लड़कियों का सम्मान करते और उन्हें ऐसा करने से रोकते । महानायक की उसी दिन नैतिक मृत्यु हो गयी थी ...उसके बाद से आज तक वह एक लाश बनकर अपनी महानता को ढो रहा है ।

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टिप्पणियाँ हैं तो विमर्श है ...विमर्श है तो परिमार्जन का मार्ग प्रशस्त है .........परिमार्जन है तो उत्कृष्टता है .....और इसी में तो लेखन की सार्थकता है.