रविवार, 1 मार्च 2026

"समझ" और "विश्वयुद्ध"

संघ और भागवत को समझने के लिए ऐसा कुछ भी कठिन नहीं है जैसा कि वे कहते हैं। हाँ, मोदी को समझना अवश्य सरल नहीं, कम से कम मेरे लिए तो नहीं। हिंदू अहित के मूल्य पर मोहनदास की तरह मुस्लिम तुष्टीकरण के समर्थक रहे मोदी ने कल कहा कि वे ईरान का समर्थन नहीं करते। "कट्टरवाद को आर्थिक सहायता देने वाले किसी भी देश को समर्थन देने का प्रश्न ही नहीं उठता।"


मोतीहारी वाले मिसिर जी कहते हैं -
"मोदी बीच-बीच में एक ऐसी चमक छोड़ दिया करते हैं जिससे उनके विरोधी भी चमत्कृत हो जाया करते हैं।"

मोदी आगे बढ़ते हैं फिर पीछे हटते हैं, विवाद उत्पन्न करते हैं फिर उसका  समाधान करते दिखाई देते हैं, जातिवाद की आलोचना करते हैं फिर अपने कट्टर समर्थक सवर्णों पर निर्मम आक्रमण भी करते हैं, राष्ट्रीय एकता की बात करते-करते विभाजन और विघटन के बीज बो देते हैं, 'न खायेंगे न खाने देंगे' की शपथ लेते हैं फिर अपने कट्टर विरोधियों को उनके अपराधों और भ्रष्टाचार के लिए बढ़ावा भी देते हैं, राजनीतिक शुचिता की बात करते हैं फिर अपनी ही पार्टी के अच्छे और समर्पित नेताओं को उठाकर नेपथ्य में फेक देते हैं, विपक्ष के ठुकराये हुये नेताओं का स्वागत करते हैं और दुनिया भर के देशों से सर्वोच्च पुरस्कार बटोर लाते हैं, प्रत्यक्षतः ईरान के साथ नहीं हैं पर संकट के समय ईरान को चावल और दवाइयाँ भेज देते हैं।

एक साथ नौ देशों पर सीधा आक्रमण करने वाले ईरान का धार्मिक नेता ख़ामेनेई मारा जा चुका है। युद्ध को लेकर ब्रिटेन तो अपने विरोधी अमेरिका के साथ आ गया पर फ्रांस ने स्वयं को इस युद्ध से अलग रहने का वक्तव्य दे दिया है। लखनऊ और श्रीनगर में शिया संप्रदाय के लोग ईरान के समर्थन में प्रदर्शन पर उतर आये हैं जबकि पाकिस्तान के लोगों ने कराची और इस्लामाबाद में अमेरिकी दूतावास पर आक्रमण कर उसमें आग लगा दी है। उधर पैगम्बर मोहम्मद के वंशजों के देश जाॅर्डन पर भी ईरान ने आक्रमण कर दिया है। क्या सचमुच इस्लामिक विश्व की अवधारणा को ग्रहण लग चुका है!

तकनीकी दृष्टि से मध्य एशिया में विश्वयुद्ध प्रारंभ हो चुका है। धन-बल की  अनियंत्रित हुयी शक्ति में हो रहा विस्फोट सब कुछ शांत करने की दिशा में बढ़ता जा रहा है। जो हो रहा है वह अच्छा है, जो होगा वह भी अच्छा ही होगा। शक्तियों का संतुलन आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
इस युद्ध में बदलते वैश्विक समीकरणों का लाभ भारत को भी मिलने जा रहा है, जबकि पाकिस्तान की स्थिति "न घर के न घाट के" वाली होने जा रही है।

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