गुरुवार, 26 मार्च 2026

थोड़ा सा मुसलमान

कहानी संग्रह "थोड़ा सा मंटो" के बाद अब "थोड़ा सा मुसलमान" मेरी अगली पुस्तक का नाम हो सकता है।

जब आप भाजपा-कांग्रेस-सीपीएम के बंद कूपों से निष्ठापूर्वक बाहर निकलकर अपने स्व-भाव में प्रवेश करते हैं तो स्वयं को सर्वथा भिन्न पाते हैं। इस दृष्टि से मैं स्वयं को थोड़ा सा साम्यवादी, थोड़ा सा मुसलमान और बहुत सा सनातनी पाता हूँ। मुझे लगता है इस तरह हम सनातनी दर्शन के लौकिक स्वरूप का एक विहंगम परिदृश्य अपने सामने पाते हैं।
वर्षों पहले मैंने दुर्गा और सरस्वती पूजा के विकृत होते आयोजनों पर कुछ लेख लिखकर सांप्रदायिक टकरावों की आशंका को लेकर सचेत किया था। आज हम उन शंकाओं को सच होता देख रहे हैं। हमें अपने ही देश में अपने सांस्कृतिक अनुष्ठानों, उत्सवों और परंपराओं के लिए सरकारी सुरक्षा की आवश्यकता होने लगी है। जब देश में विभाजनकारी शक्तियाँ निर्भय हों, सांप्रदायिक आतंक के सामने सत्ता निर्बल हो, जनता सुषुप्तावस्था में हो तब ऐसे आनुष्ठानिक आयोजनों के लौकिकस्वरूप पर चिंतन करना आवश्यक हो जाता है।
आज मैं मूर्ति को लेकर उसके वैज्ञानिक महत्व के बाद भी इस्लामिक अवधारणा के साथ खड़े होने के लिए विवश हो रहा हूँ। विश्व भर में समय-समय पर मूर्तियों को जिस तरह तोड़ने और उन्हें अपमानित करने की घटनायें होती रही हैं, उन पर मंथन किया जाना आवश्यक है। देवी-देवताओं से लेकर राजनैतिक व्यक्तियों तक की मूर्तियों के साथ किए जाने वाले अपमानजनक व्यवहार किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं किये जा सकते। मूर्तियाँ बनवाकर युगों तक अमर रहने के लोभ से अमिताभ बच्चन और मायावती जैसे लोगों को भी मुक्त होना चाहिए। विगत कुछ वर्षों में मार्क्स, स्टालिन, मुजीबुर्रहमान, भीमराव और मोहनदास की मूर्तियाँ भी कट्टरपंथियों के लक्ष्य पर रही हैं। सैद्धांतिक दृष्टि से मैं मोहनदास का विरोधी रहा हूँ, पर जिस तरह उनकी मूर्ति के साथ किशोरवय बच्चों द्वारा अश्लील और अपमानजनक व्यवहार प्रदर्शन किया गया है वह स्वीकार नहीं किया जा सकता। यहाँ मैं मूर्तिनिषेध की इस्लामिक परम्परा के साथ स्वयं को बरबस ही खड़ा पाता हूँ। विरोध और घृणा प्रदर्शन के लिए मूर्तियों के साथ दुर्व्यवहार किया जाना विचारों से बहुत आगे बढ़कर उनका भौतिक रूपांतरण है जो भीड़ को हिंसा के लिए उत्तेजित करता है। बस, यहीं पर मैं थोड़ा सा मुसलमान हो जाना चाहता हूँ। यदि हम मूर्तियों की सुरक्षा नहीं कर सकते तो चौक-चौराहों पर उनकी स्थापना का क्या औचित्य!

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