वह भाजपाई है, ...नहीं-नहीं वह तो कम्युनिस्ट है। वह आस्तिक है, ...नहीं-नहीं वह तो पक्का नास्तिक है।
राजनीति और दर्शन के संबंध में जब किसी के प्रति प्रेक्षकों द्वारा विभाजित और परस्पर विरोधी निर्णय किए जाने लगें तो समझ लेना चाहिये कि जिसके संबंध में चर्चा की जा रही है उसकी दृष्टि विहंगम दृश्य की पक्षधर है। वह पूर्णता की संधान यात्रा में पूरकता के छोटे-बड़े अंशों को स्वीकार करता हुआ चलने में विश्वास रखता है। यदि कोई दर्शन पूर्ण होता तो अन्य दर्शनों की आवश्यकता ही नहीं रहती, तब न चार्वाक दर्शन होता और न वैशेषिकादि षड्दर्शन।
राजनीतिक परिपक्वता के लिए सापेक्ष श्रेष्ठता का चयन परिवर्तनकारी होता है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है। हिमाचल जैसे प्रांतों में सतत सत्तापरिवर्तन सापेक्ष श्रेष्ठता के चयन का प्रतीक है। वहाँ के मतदाता कांग्रेस या भाजपा से बँधकर नहीं रह पाते। ऐसा कोई भी बंधन राजनीतिक दलों में आने वाली निरंकुशता का आधार बन जाता है जो लोकतंत्र की एक अवांछित विकृति है जिससे बचा जाना चाहिए।
कट्टरहिंदू
मैं पहले भी कह चुका हूँ, पुनः स्पष्ट कर दूँ, मैं कट्टर हिन्दू नहीं, निष्ठावान हिंदू हूँ।निष्ठा और कट्टरता के अर्थों को जाने बिना इन शब्दों के प्रयोग में सावधानी होनी चाहिए। कट्टरता एक अंधी वीथिका है, जिसका सनातन संस्कृति में कोई स्थान नहीं। जो हिंदू है वह कट्टर नहीं हो सकता, जो कट्टर है वह हिंदू नहीं हो सकता।
यही बात भक्त और आलोचक के लिए भी है। भक्त आलोचना नहीं कर सकता, जो आलोचक है वह भक्ति नहीं कर सकता। भक्ति केवल ईश्वर की हो सकती है, किसी देहधारी की नहीं।
राजनेताओं की आलोचना हो सकती है, भक्ति नहीं। हम लोगों ने भक्ति करके ही भाजपा और संघ को निरंतर विकृत होने देने का पाप किया है। हमने संघ और मोदी का अंधसमर्थन किया, कभी स्वस्थ आलोचना नहीं की। इन दोनों पर उठने वाली उंगलियों और कलंकों के लिए हम सभी अपराधी हैं जो सत्य से सदा भागते रहे और कभी इनके विचारों और कार्यों की आलोचना नहीं की। आलोचना उतनी ही आवश्यक है जितनी किसी रुग्ण की चिकित्सा, इसे पाप या विरोध नहीं समझा जाना चाहिए। मैं पुनः सावधान कर रहा हूँ, सतत परिमार्जन और स्वस्थ आलोचना का यदि इसी तरह बहिष्कार किया जाता रहेगा तो एक दिन संघ और भाजपा के अध्याय सदा के लिए बंद हो जाएँगे।
जब हम अच्छे समालोचक नहीं होते तो राजनीतिक क्षितिज पर लोकहितों की हत्या होते हुये देखते हैं।
ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, नरेंद्र मोदी या मोहन भागवत को पूरी तरह दोषी नहीं माना जा सकता, ये सब हमारी दीर्घकालिक निष्क्रियता के परिणाम हैं जिन्हें भोगने के लिए हम सब विवश हैं।
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