बन दुर्बल
वह बार-बारभर हुंकार
छीनता अधिकार।
अधिकार,
तमस में सुषुप्त हो
दीर्घकाल जीने का!
अधिकार,
अनंतकाल आरक्षित हो
शिथिलता में शक्ति का!
विद्रोह किया तुमने
है करना अब तुम्हें ही
संधान भी उत्तर का।
ऋषिवाणी मौन है
आरक्षण के उबाल पर
पता है ऋषियों को
तपाये बिना स्वर्ण
जब प्रमाणित होगा 'शुद्ध'
अबुद्ध घोषित होंगे 'बुद्ध'
होने लगेगा प्रकाश भी अवरुद्ध
कुपथ पर चलेंगे सब
होगा फिर धर्मयुद्ध।
हठ से
तमस
नहीं होता उजास,
रात
नहीं होती भोर,
पक्षीवृंद
नहीं करते कलरव,
कलियाँ
नहीं होतीं कुसुमित,
कुक्कुट भी
बाँग नहीं देते,
शिथिलता
दृढ़ता नहीं होती,
अयोग्यता
योग्यता नहीं होती,
केवल
मिलते हैं अवसर
छीन लेने के
दूसरों के अवसर
होने के सिंहासनारूढ़
प्रवंचना और धूर्तता के।
बौद्ध
जब हठ करता है
बुद्ध
तब मौन रहता है
जानकर भी सब कुछ
कि मान बैठे जिसे तुम
अपना अधिकार
वह तो तमस है।
और तुम
भरे तमस
किये हठ
उलीच रहे कृष्ण मेघ
सूरज के मंडल पर।
भृकुटि तान सूर्य को
घूर रहे कुपित मेघ
मैं दलित, तू दूर हट!
रे! विदेशी दूर हट!
तमस के भय से
आ न रहा पास
कोई उजास
और तुमने मढ़ दिया
फिर एक कलंक
कि अहंकारी है उजास
करता है भेदभाव
मानता है दलितों को
नीच, खल और अछूत।
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