साध्वी के श्राप पर चर्चा से पहले कृष्ण-गांधारी संवाद को स्मरण कर लेना प्रासंगिक होगा।
"माधव! मैं तुम्हें और तुम्हारे वंश को सर्वनाश का श्राप देती हूँ।""माता गांधारी! आपका दुःख स्वाभाविक है। किंतु दुर्योधन की जंघा का तोड़ा जाना और दुःशासन के वक्ष का चीरा जाना आवश्यक था अन्यथा एक स्त्री के साथ राजवंश के लोगों द्वारा किया गया निंदनीय कृत्य आम लोगों के लिए आदर्श और आचरणीय हो जाता। आपने अपने पुत्रों को खोया पर इस खोने से ही आर्यावर्त की संस्कृति बच गयी, क्या यह उपलब्धि नहीं है!"
पुनः साध्वी के श्राप पर आते हैं। घर की बात घर में सुलझाई तो तब जाय जब घर के मुखिया समस्या को मानने और सुलझाने के लिए तैयार हों। एक ओर निरंतर प्रहार पर प्रहार, दूसरी ओर केवल याचना पर याचना!
घर का विवाद था तो साध्वी जी ने ही क्यों नहीं सुलझा लिया! वे तो मोदी जी से सहज संवाद कर सकती थीं।
साध्वी जी समस्या की गंभीरता को समझने में या तो असफल रही हैं या फिर समझना ही नहीं चाहतीं। यह जरा सी फुंसी की समस्या नहीं है, मेटास्टेसाइज्ड मैलिग्नेंट कैंसर की समस्या है जिसकी प्राॅग्नोसिस केवल हिंदू उन्मूलन है। जब सनातनी ही नहीं बचेंगे तो केवल मंदिरों से धर्म संस्थापना कैसे संभव है?
निरंतर आक्रमण सहते हुये भी यदि हम सत्ता की अंधभक्ति में लीन रहते हैं तो यह हमारी मूर्खता का परिचायक है।
प्रबुद्ध जनता सत्ता की विरोधी नहीं, उसकी विघटनकारी कुनीतियों की विरोधी है।
सुना है, संघ अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में उतर चुका है। यदि यह सच है तो जनता में जो संदेश जायेगा उससे भाजपा की समस्यायें कम नहीं होंगी। पहले सनातन के संत ही न्याय और अन्याय को सुनिश्चित कर लें। जनता तो सुनिश्चित कर चुकी है।
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