नृत्यरत
सत्ता-नेतृत्व,निरंकुश
षड्यंत्ररत
कालनेमि गुट
हुंकारित...
"करेगा संशय जो
नेतृत्व की निष्ठा पर
सत्ता की स्वेच्छा पर
होगा सर्वनाश
विरोध के स्वरों का।"
सुनकर हुईं हतप्रभ
देवी सरस्वती जी।
कौन है यह, किसने दिया श्राप!
किसने बना लिया बंदी
चिंतन, मंथन
और वैचारिक प्रक्रिया की
सहज अभिव्यक्ति को!
राजसत्ता
हो गई
सर्वोपरि
सर्वशक्तिमान
और इतनी असहिष्णु!
इतनी निरंकुश!
किसकी है हुंकार
कौन यह होलिका
कौन यह सूर्पनखा
चीख-चीख कर रही
लांछित सत्य को
वांछित असत्य को!
सुनो ऐ कृष्णविवर!
सुनो ऐ भस्मासुर!
शक्तिशाली हो तुम
किंतु नहीं
हो अमर
लिख लिया तुमने
अपनी ही लेखनी से
अपना मृत्युपत्र
सावधान!
अंत
कृष्ण विवरणों का
आ गया है निकट।
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