तुम देने लगते हो हमें
भद्दी-भद्दी गालियाँजब तुम बंद कर देते हो
भींच कर मेरा मुँह
जब तुम ठूँस देते हो हमें
घसीट कर कारा में
तब समझ जाते हैं लोग
कि तुम्हारे पास
अब नहीं बचे हैं कुतर्क भी
कि सिद्ध कर सको हमें अपराधी।
तुम इसे राष्ट्रवाद कहते हो
लोग इसे असुरवाद कहते हैं।
बहुत बोझिल होता है
अहंकार
ईश्वरत्व और श्रेष्ठता का
उद्धारक और महानता का।
हमने देखा है
अहंकार को
दब कर कुचलते हुये
अपने ही बोझ से,
हम तो फिनिक्स हैं
जल कर भी जी उठेंगे फिर
पर नहीं मिलता अवसर
अहंकारी को पुनः।
मालायें
कितनी भी धारण कर ले रावण
वह साधु नहीं हो जाता
झूठ
कितना भी क्यों न कर ले सिंगार
वह सच नहीं हो पाता
सावधान!
निकट आ गया है
बहुरूपियों का अंत।
यह अघोषित आपातकाल
बहुत भारी पड़ने वाला है तुम्हें।
जिन्हें समझा था दीपस्तंभ
वे चित्र निकले
जिन्हें समझा था स्वर
वे मूक निकले
पर सदा मौन रहने वाला मैं
आज बोल सकता हूँ
भूल गये हो तो बता दूँ
अँधेरों को भी
छँटना ही पड़ता है एक दिन।
रावण!
तुम्हें मरना ही होगा!
आपकी कविता सीधी और असरदार लगती है। तुम गुस्सा भी दिखाते हो और उम्मीद भी बनाए रखते हो। फिनिक्स वाला उदाहरण बहुत अच्छा लगा, क्योंकि वह हार के बाद फिर खड़े होने की ताकत बताता है। ऐसी कविताएँ लोगों को सोचने पर मजबूर करती हैं और यही कविता की असली ताकत होती है।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद! अब कोई अंतर्द्वंद्व नहीं रहा, सब कुछ स्पष्ट है कि हम अपने ही लोगों के रचे षड्यंत्रों में फँसते रहे हैं। सत्य के साथ खड़े होने वाले क्रांतिवीरों से अनुरोध है कि वे अपनी सशक्त लेखनी को आयुध बनाकर धर्मयुद्ध के योद्धा बनें। आपकी टिप्पणी उत्साहवर्द्धक है और प्रेरक भी। आभार!
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