कश्मीर के भाइओ और बहनों ! पिछले कुछ महीनों से घाटी में जो कुछ हो रहा है वह पीड़ादायक है , संकट की इस घड़ी में हम पूरी तरह आपके साथ हैं. आप न कभी अकेले थे. न अभी हैं और न कभी अकेले रहेंगे .आपके दुःख में हम पूरी तरह सहभागी हैं.
गुरुवार, 23 सितंबर 2010
बुधवार, 22 सितंबर 2010
सही-सलामत
सुबह
सोकर उठा, तो देखा
मैं सलामत हूँ ......और मेरा घर भी
बाज़ार से
सब्जी भी लेकर आ गया घर
पर कुछ नहीं हुआ.
फिर ...... दफ्तर में भी गुज़र गया .........पूरा दिन
बिना किसी हादसे के.
शाम को बच्चे भी आ गए .........स्कूल से वापस
सही सलामत .
ताज्जुब है !
एक दिन और गुज़र गया सही-सलामत,
किसी ने
बदला नहीं लिया मुझसे.
क्या बताऊँ !
नेक दिल बना था,
जान का दुश्मन बन गया ज़माना.
तरक्की किसे नहीं है पसंद ?
पर क्या करूँ !
चाह कर भी नहीं बन पाया
चापलूस और बेईमान.
उल्टे, मेरे ही पीछे पड गए
सरकारी नुमाइंदे.
डर बना रहता है
न जाने कब .......
क्या हो जाए ?
दूर-दर्शन पर
हादसाईं ख़बरें देख-देख कर
दिल
अब बैठा .........कि तब बैठा होने लगता है
दहशत भरा
एक-एक लम्हा गुज़रता है
किसी अनहोनी के इंतज़ार में,
कहीं आज ..........मेरी बारी तो नहीं !
उन्नीस सौ सैंतालिस के बाद से
आज़ादी
निरंतर बढती जा रही है मेरे देश में
सिर्फ गुनाहों के लिए .
शराफत और इंसानियत .........
जिन्हें घायल कर गए थे अंग्रेज़
आज ...........उन्हें मार-मार कर
रोज़ दफ़न कर रहे हैं
हम ................हिन्दुस्तानी.
ऐ चक्रधारी !
अभी कितनी प्रतीक्षा और करोगे ..........
अधर्म के बढ़ने की ?
अब तो आंसू भी सूख गए हैं
और सूरज
न जाने कब का डूब चुका है .
रविवार, 19 सितंबर 2010
EXISTENCE
लोग
मुग्ध होकर देख रहे हैं
कि कैसे
पाषाणों के वक्ष को चीरकर
बाहर आ गई है
वो
अपने पूरे अस्तित्व के साथ.
धन्य है उसकी जिजीविषा.
पूरे उमंग के साथ आगे बढती है
वो
मार्ग की बाधाओं से जूझती
बढती ही जाती है
आगे ....और आगे .......और-और आगे ...
जैसे कि अब रुकेगी ही नहीं
शांत होगी, तो बस ......समुद्र में मिलकर ही.
पर .....
हर पहाड़ी नदी के भाग्य में ऐसा कहाँ ?
धरती के मुक्त .....विस्तृत आँगन तक आते-आते
अपनी ही रेत में फंसकर रह गई है
वो ......
गंगा की तरह ....यमुना की तरह ........
लोग
चिंतित हो उठे हैं
कि कहीं यह भी तो सरस्वती कि तरह ......
नहीं-नहीं .....बचाना ही होगा इसे ....
सबको तृप्त करती ....सृजन करती ......, आगे बढती
यह
मात्र कोई सरिता, कविता, या ............गीता ही नहीं
नारी की अस्मिता भी है.
आप चाहें
तो इसे कुछ और भी नाम दे सकते हैं.
में तो इसे ..........''अन्वेषिका'' कहता हूँ.
बुधवार, 8 सितंबर 2010
वो ज़ालिम.......
कुछ ऐसी बातें होती हैं, के भाषा चुप हो जाती है.
तब ख़ामोशी ही चुपके से सब, करने बयाँ आ जाती है.
कुछ ख़ास इबारत है इसकी, इसका भी इल्म ज़रूरी है.
गर पढ़ना इसे नहीं आता, तो हर तालीम अधूरी है.
हर बार पहल करते हम ही, ये भी तो हमारी शराफत है.
इस पर भी वो खामोश रहें, तो ज़ाहिर है ये बगावत है.
आज - कल वो न जाने क्यों, बहुत मसरुफ रहते हैं.
पता हमको चला है, वो दिखावा भर ही करते हैं.
जो बोले बोल ही मीठे, तो समझो वो परिंदे हैं.
जो सब रस घोलता जाए, उसी के हम दीवाने हैं.
बहा कर खून वो ज़ालिम, ख़ुदा की बात करते हैं.
ख़ुदा ऐलान करता है, के वो वहशी दरिन्दे हैं.
तब ख़ामोशी ही चुपके से सब, करने बयाँ आ जाती है.
कुछ ख़ास इबारत है इसकी, इसका भी इल्म ज़रूरी है.
गर पढ़ना इसे नहीं आता, तो हर तालीम अधूरी है.
हर बार पहल करते हम ही, ये भी तो हमारी शराफत है.
इस पर भी वो खामोश रहें, तो ज़ाहिर है ये बगावत है.
आज - कल वो न जाने क्यों, बहुत मसरुफ रहते हैं.
पता हमको चला है, वो दिखावा भर ही करते हैं.
जो बोले बोल ही मीठे, तो समझो वो परिंदे हैं.
जो सब रस घोलता जाए, उसी के हम दीवाने हैं.
बहा कर खून वो ज़ालिम, ख़ुदा की बात करते हैं.
ख़ुदा ऐलान करता है, के वो वहशी दरिन्दे हैं.
मंगलवार, 7 सितंबर 2010
Silence is not silent ......in the moonlight.....
सर्दियों की रात की ये खामोशी...... और........
खोया - खोया सा चाँद.
नहीं - नहीं .......
चुप नहीं है ......पूरी कायनात में पसरी ये 'खामोशी' .
चुप नहीं है ......पूरी कायनात में पसरी ये 'खामोशी' .
सच......
इसने सब कुछ बता दिया है मुझे
इसने सब कुछ बता दिया है मुझे
कि अभी तक ख़त्म नहीं हुई है तेरी तलाश.
भोले चाँद!
सुना है कि तू भी रोता रहा है रात भर.
देख , झूठ मत बोल,
मैंने देखे हैं
जुही की कलियों पर ठहरे ......
तेरे आंसू ...
कलिओं ने रात भर समेटा है उन्हें
चलो न !
आज रात हम दोनों
मिल कर तलाशें
अपनी -अपनी मंजिलें
शायद मिल जाएँ .
गुरुवार, 2 सितंबर 2010
In search of evidences of Aaryan excellency.
यदि मैं कहूँ कि आम भारतीय विरोधाभासों के बीच जीने का अभ्यस्त है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी .एक ओर तो हम आध्यात्म कि बात करते हैं दूसरी ओर अनुचित तरीके से उपलब्धियां हासिल करने में भी पीछे नहीं रहना चाहते. कम से कम परिश्रम में अधिक से अधिक लाभ की प्रवृत्ति ने हमें मानव से दानव बना दिया है. पूजा-पाठ-मंदिर-कथा-भागवत.......इस सबके बाद भी पाप में प्रवृत्त होने से अपने को बचा नहीं पा रहे हैं हम.
एक दूसरे से श्रेष्ठ दिखना मानव समाज का विशिष्ट गुण है. इसके पीछे मूल प्रवृत्ति प्रतिस्पर्धा की है.लोगों ने श्रेष्ठता प्रदर्शन के कई तरीके खोज लिए हैं.हिटलर स्वयं को आर्य कहता था, हम भी अपने को आर्य कहते हैं. हम मिथ्या अभिमान के साथ जीने के अभ्यस्त हो गए हैं जिसके परिणाम स्वरूप हमारे चारो ओर कई विषमताओं ने भी जन्म ले लिया है.
आपकी तरह हमें भी अपनी श्रेष्ठता पर गर्व है. इसीलिए मैंने अपने समाज में, अपने चारो और इस श्रेष्ठता को खोजने का बहुत प्रयास किया पर असफल रहा. वैदिक ज्ञान की धरोहर की बात को यदि अभी छोड़ दिया जाय तो हमारे शेष इतिहास में गर्व करने जैसी कोई बात मुझे कहीं नहीं दिखी. भारतीय दर्शन एवं आध्यात्म का व्यावहारिक धरातल अत्यंत निराशा जनक है. हमारे समाज में विरोधाभासों की भरमार है. भारत में मंदिरों की संख्या, धार्मिक उत्सवों एवं राष्ट्र व्यापी भ्रष्टाचार के बीच कहीं कोई संतुलन या नियंत्रण जैसी स्थिति देखने को नहीं मिलती. आइये हम अपने को गर्व करने के योग्य बनाने का प्रयास तो करें.....मूल्यों को स्थापित करने और भ्रष्टाचार के विरोध में एक अभियान छेड़ कर ही हम आर्य कहलाने के योग्य बन सकेंगे.
एक दूसरे से श्रेष्ठ दिखना मानव समाज का विशिष्ट गुण है. इसके पीछे मूल प्रवृत्ति प्रतिस्पर्धा की है.लोगों ने श्रेष्ठता प्रदर्शन के कई तरीके खोज लिए हैं.हिटलर स्वयं को आर्य कहता था, हम भी अपने को आर्य कहते हैं. हम मिथ्या अभिमान के साथ जीने के अभ्यस्त हो गए हैं जिसके परिणाम स्वरूप हमारे चारो ओर कई विषमताओं ने भी जन्म ले लिया है.
आपकी तरह हमें भी अपनी श्रेष्ठता पर गर्व है. इसीलिए मैंने अपने समाज में, अपने चारो और इस श्रेष्ठता को खोजने का बहुत प्रयास किया पर असफल रहा. वैदिक ज्ञान की धरोहर की बात को यदि अभी छोड़ दिया जाय तो हमारे शेष इतिहास में गर्व करने जैसी कोई बात मुझे कहीं नहीं दिखी. भारतीय दर्शन एवं आध्यात्म का व्यावहारिक धरातल अत्यंत निराशा जनक है. हमारे समाज में विरोधाभासों की भरमार है. भारत में मंदिरों की संख्या, धार्मिक उत्सवों एवं राष्ट्र व्यापी भ्रष्टाचार के बीच कहीं कोई संतुलन या नियंत्रण जैसी स्थिति देखने को नहीं मिलती. आइये हम अपने को गर्व करने के योग्य बनाने का प्रयास तो करें.....मूल्यों को स्थापित करने और भ्रष्टाचार के विरोध में एक अभियान छेड़ कर ही हम आर्य कहलाने के योग्य बन सकेंगे.
Agony........
अपनी-अपनी पीड़ा के पहाड़ ढोते लोगों से भरा नगर,
नगरों से भरा देश
और देशों से भरी यह धरती......
स्वयं, कितनी बौनी है अपने सौर -मंडल में!
किन्तु पीड़ा का संसार.....
न जाने कितना विस्तृत है.
धरती-धरती भर पीड़ा ले कर
न जाने कितने सौर-मंडल समाये हैं
हमारी अपनी आकाश-गंगा में.
ऐसी असंख्य आकाश-गंगाओं की पीडाओं से
कितनी बौनी है तेरी पीड़ा,
चल उठ,
अब कितने आंसू और बहायेगा
अपनी बौनी पीड़ा पर!
सबकी पीड़ा गले लगा ले,
कुछ प्रश्नों के उत्तर दे ले
फिर देख
इस अनंत ब्रह्माण्ड में
तेरा बौना अस्तित्व
कितना महत्त्वपूर्ण है.
नगरों से भरा देश
और देशों से भरी यह धरती......
स्वयं, कितनी बौनी है अपने सौर -मंडल में!
किन्तु पीड़ा का संसार.....
न जाने कितना विस्तृत है.
धरती-धरती भर पीड़ा ले कर
न जाने कितने सौर-मंडल समाये हैं
हमारी अपनी आकाश-गंगा में.
ऐसी असंख्य आकाश-गंगाओं की पीडाओं से
कितनी बौनी है तेरी पीड़ा,
चल उठ,
अब कितने आंसू और बहायेगा
अपनी बौनी पीड़ा पर!
सबकी पीड़ा गले लगा ले,
कुछ प्रश्नों के उत्तर दे ले
फिर देख
इस अनंत ब्रह्माण्ड में
तेरा बौना अस्तित्व
कितना महत्त्वपूर्ण है.
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