बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

नक्सलियों से एक अपील

कोई घर बसाकर कभी तुम भी देखो 
बेसहारा किसी को न फिर कर सकोगे /


जां किसी की बचाकर कभी तुम भी देखो 
ये खूं - ख़राबा न फिर कर सकोगे /


ये खूं - ख़राबा , ये दहशत के साए 
कभी माँ से पूछो , कब उन्हें रास आये /


ग़ुल कोई खिलाकर कभी तुम भी देखो 
बर्बाद कुछ भी न फिर कर सकोगे /


आओ मिल- बैठ कर नेक मंथन करें 
चूक गए  ग़र तो कुछ भी न फिर  पा सकोगे /



गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

किताबों में खोया बचपन

रात  के दस बज चुके हैं, 
बुजुर्गों के हिसाब से 
यह बच्चों के सोने का वक़्त है /
वह पढ़ने में मशगूल है 
और माँ है 
कि दस्तरखान पर बेटी का कबसे  इंतज़ार कर रही है / 
बुला-बुलाकर 
जब थक कर चुप हो गयी माँ
तो अचानक वह चुपके से आई  
और पीछे से गले में बाहें डालकर झूल गयी....... 
'उठो  माँ खाना खायेंगे '
.................................
दो रोटी खाकर ही उठ बैठी वह....... 
'बस माँ अब और नहीं 
..........नींद आयेगी 
तो फिर पढ़ेगा कौन,
अभी तो थीसिस भी सबमिट नहीं हुयी है  '
माँ के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच आयीं------ 
इतनी फिक्रमंद हो गयी है मेरी बच्ची !
और किताबों  ने तो जैसे बचपन ही छीन लिया है इसका /
बच्ची की उम्र  
कब  फ्रॉक से सलवार-कुर्ते में बदल  गयी 
पता  ही नहीं चला ./  
पुरानी यादों में डूब गयी माँ
फिर  आँखों की कोर पर छलक आयी बूंदों को पोंछ 
मन ही मन 
न  जाने कितनी दुआएं दे डालीं बेटी को 

...................
रात के दो बज रहे हैं 
माँ ने फिर प्यारी सी झिड़की दी
अब सो भी जाओ
सुबह पढ़ लेना /
'बस .....थोड़ी देर और माँ '
बेटी नें आवाज़ दी 
तभी बूढ़े चाँद नें खिड़की से झाँक कर कहा
'तू खुद को मेरी सहेली कहती है ना! 
तो चल, 
अब माँ का कहना मान ले'
बेटी ने मुस्कराकर बंद कर दी किताब 
और लेट कर पलकों से ढँक लीं अपनी आखें 
जैसे   सो गयी  हो /
...............
अब कमरे में सिर्फ वह थी 
और था बूढा चाँद /
बूढ़े की आँखों में नींद कहाँ !
थोड़ी देर और ठहरा चांद
फिर इत्मीनान करने के लिए
उसके बालों को हौले से छुआ
गाल को थपथपाया 
और  नींद  की चादर ओढाकर 
आगे बढ़ गया........
अगली 
किसी और खिड़की से झाँकने,
शायद और भी कोई जाग रहा हो अभी /
कितनी  फिक्र रहती है बच्चों की 
माँ को 
और इस बूढ़े चन्दा मामा को / 
बच्चे 
कितने   बे -फिक्र  हैं 
इनकी  चिंताओं से !





शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

बस्तर की है माटी न्यारी

कण-कण में बिखरा है जिसके 
भोला-भाला प्यार
बस्तर की है माटी न्यारी
अद्भुत है इसका संसार.
इमली की पाती पर लिख कर 
दिया है उसने 
केवल प्यार
भर कर भी ना पोथी-पोथी 
हो पाए जिसका विस्तार .
वन महुआ, आँगन महुआ
तन महुआ, मन महुआ -महुआ
धरती महुआ, अम्बर महुआ 
महुआई है चाल.
टंगिया, छाता  और लंगोटी
टेढ़ी-मेढ़ी पथरीली पगडंडी
मस्त-व्यस्त हो बढ़ता जाए 
नंगा-भूखा निर्मल प्यार.


तुम सा मेरा रूप नहीं है 
तन उजला 
मन कृष्ण नहीं है 
छलना मत मेरे प्यार को प्यारे 
दोने भर सल्फी की आड़.
पत्थर  भी कोमल पाती से
यहाँ है पाता प्यार-दुलार 
पत्थर से टकराकर पानी 
हंसता
कहता
कर लो प्यार.
चहंक-चहंक कर कहती मैना 
बांटो सबको केवल प्यार.
भूल न जाना 
मडई आना
फिर तुम अगली बार.






चित्रकूट, जगदलपुर 
























      

बुधवार, 29 सितंबर 2010

एक बच्चा प्यारा सा ....

वह अभी मात्र दो वर्ष का है.और सेरिब्रल पैल्सी से पीड़ित है. उसकी माँ बड़ी आशा से मेरे पास लेकर आयी थी उसे .जब मैंने उससे कहा कि हम इसके लिए कुछ ख़ास नहीं कर सकेंगे तो उसकी ममता आखों से फूट पडी. मैंने कुछ दवाइयां लिखकर दे दीं. पर मैं जानता हूँ वह ठीक नहीं हो सकेगा. जाते समय उसकी निराशा थकी हुयी चाल  में स्पष्ट देखी जा सकती थी. इस बच्चे को वह कब तक अपनी छाती से लगाकर जी सकेगी ? उसे कठोर बनना होगा. किसी माँ के लिए यह कितना मुश्किल काम है. वह एक जीवित लाश से अधिक और कुछ नहीं था. उसके जाते ही मुझे भी अपनी आँखें  पोछनी पडीं. बच्चे के लिए सचमुच मुझे बहुत दुःख हुआ. काश ! ऐसे बच्चों के लिए कुछ भी किया जा सकना संभव हो पाता. चिकित्सा विज्ञान अभी भी कितना असहाय है ?
.

रविवार, 26 सितंबर 2010

अस्वीकृत किन्तु ग्राह्य

अन्धकार में पनपते उद्योग की 
एक छोटी सी
किन्तु
सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हूँ मैं 

सभ्यता की बाहों में खेलकर 
बढ़ा- पौढ़ा
गहरी-गहरी साँसे लेता
समाज के कचड़े को खाता-निगलता 
चलता-फिरता
एक जीवित उद्योग है यह 
जिसकी 
एक महत्वपूर्ण कड़ी हूँ -------- मैं. 

मेरे सर्वस्व की लागत पर स्थापित 
सबको
शुद्ध लाभ देने वाले
इस उद्योग से
न जाने कितनों का पेट पलता है
मेरे अस्तित्व की आड़ में .

उत्पाद ?
आपके शब्दों में -----आनंद
या भय मिश्रित आनंद का एक झोंका भर
या
शायद एक छलावा भर.

सह उत्पाद ?
इसे बताने से क्या लाभ -------
भला कौन ग्राहक होगा इसका
इसे तो मुझे ही पीना होता है
अंतिम साँसों तक
क्योंकि
आँखों के ठीक नीचे हैं होंठ 
इसलिए जैसे भी हो
पीना तो मुझे ही होगा न !

प्रदूषण ?
हाँ, क्यों नहीं !
उद्योग है तो प्रदूषण भी होगा ही
पर इससे किसी को क्या -----
कि अपसंस्कृति  का विषैला प्रदूषण
कितनों का जीवन तबाह कर देगा.
आप तो बस, 
यदि ग्राहक हैं ------
तो -------जो लेने आये हैं
लीजिये ----संतुष्ट होइए ------और ----
अपने घर जाइए.

उपभोक्ता ?
हूँ ---ऊँ ----ऊँ -----ऊँ ------
शायद आपको छोड़ कर 
शेष सभी
आम भी ----ख़ास भी ----

भविष्य ?
सभ्यता के उत्कर्ष के साथ-साथ ----
पल्लवित-पुष्पित होता रहेगा .--------
समाज की अंतिम साँसों तक
बिना किसी शर्म के .

अंतिम टिप्पणी ?
निंदा करते हैं सब इस उद्योग की
फिर भी ----
बनाए रखना चाहते हैं सब.
सारी निंदाओं के बाद भी ----
कोई बंद नहीं करना चाहता इसे
कोई भी नहीं.
बंद कर भी नहीं सकते
बहुतों की सहभागिता जो है.
बस,
यूँ समझ लीजिये
कि मैं -----अपना शरीर बेचती हूँ
और 
लोग ------अपनी आत्मा.
आपने ठीक समझा
मैं -----गणिका हूँ ----------
एक वर्ज़ना ----
सम्मानहीन  ----
अस्वीकृत ------
किन्तु ग्राह्य.




अस्वीकृत किन्तु ग्राह्य

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

कश्मीर .... कितने दूर .... कितने पास ..



आज दिनांक -२१ सितम्बर के दैनिक भास्कर में गोपाल कृष्ण गांधी का लेख -कितने दूर कितने पास पढ़ा. उनकी यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि कश्मीर पर देश की जनता के बीच संवाद की प्रक्रिया प्रारम्भ होनी चाहिये. अभी तक हम कश्मीर पर सिर्फ अपने निर्णय देते आये हैं .....कश्मीर हमारा है ......यह भारत का अविभाज्य अंग है......आदि-आदि. किन्तु मुझे लगता है कि हमने कभी अपने आचरण से यह प्रदर्शित करने का प्रयास नहीं किया कि कश्मीर हमारा है और हम कश्मीर के हैं. हो सकता है कि कश्मीर की  छटपटाहट जिन्ना की छटपटाहट जैसी हो .....केवल कुछ लोगों की छटपटाहट भर. पर एक अहम् सवाल यह है कि हमने अभी तक कश्मीरियों से  कितनी मोहब्बत की  है ? और केवल कश्मीरी ही क्यों, पूर्वांचल के लोगों से भी हम कितने जुड़  सके हैं ? अब अगला सवाल यह है कि हम उनसे जुड़ें कैसे ? देखिये, देश के शेष  भागों  में भी मुसलमान  हिन्दुओं  के साथ  रह  रहे  हैं वहां ये समस्याएं नहीं हैं. ......क्योंकि हम सामाजिक तौर पर उनसे गहरे  जुड़े हुए हैं, और एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी हैं.जब तक हमारे सामाजिक सरोकार एक-दूसरे से नहीं जुड़ेंगे तब तक कश्मीरी हमें अपना नहीं समझ पाएंगे....और समझें भी आखिर क्यों ? हमें उन से नातेदारी  बनानी होगी और उन्हें अपने विश्वास में लेना होगा. सीमान्त प्रान्तों में हमारी घनिष्ठता बनाने का एक अच्छा और बहुत पुराना तरीका  है....शादी-ब्याह के सम्बन्ध बनाना. परस्पर शादी-ब्याह की नातेदारी हमें एक-दूसरे के करीब लाएगी ही. गरीबी-अमीरी बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है. सबसे बड़ी चीज है पारस्परिक प्रेम और भाई-चारा. अपनत्व दूर-दूर से नहीं पैदा होता....करीब आना होगा.....एक-दूसरे के दुःख-सुख में पूरी शिद्दत के साथ सहभागी बनना होगा. राज-तंत्र के जमाने में राजा लोग दूर-दूर वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करते थे इसके पीछे कूटनीतिक विषय  भी एक महत्वपूर्ण  कारण हुआ करता था . बहरहाल पिछले कुछ महीनों से कश्मीर में जो कुछ हो रहा है........पथराव, आगजनी, मौत का तांडव और इस सब पर सियासत  का नंगा खेल ....... वह अत्यंत दुखद है हम इन हालातों में खुद अपने को रख कर देखें तो दर्द का अंदाजा हो जाएगा. दैनिक भास्कर की टीम नें कर्फ्यूग्रस्त कश्मीर का दर्दनाक चित्र खिंच कर शेष भारत को कश्मीर के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर दिया है. और इस नेक काम के लिए उनकी पूरी टीम धन्यवाद की पात्र है. शायद    इसी बहाने हम नॅशनल  इंटीग्रेशन की तरफ सही मायनों में कुछ कदम बढ़ सकें. अभी तो  हम कश्मीरी भाइयों के लिए चिंतित हैं.वहां के हालात जल्दी से जल्दी सुधरें और बेहतर हों इसके लिए हम इश्वर से प्रार्थना करते हैं.