सोमवार, 20 जून 2022

मानवता के लिए योग

         योगेन चित्तस्य पदेन वाचा मलं शरीरस्य च वैद्यकेन। 

योऽपा करोत्तम प्रवरं मुनीनाम् पतञ्जलिं प्राञ्जलिरान तोऽस्मि॥

 इस शताब्दी का आठवाँ विश्वयोगदिवस मनाया जा रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध अभी तक समाप्त नहीं हुआ है, चीन-ताइवान युद्ध और भारत-पाकिस्तान युद्ध की भूमिकाएँ रची जाने लगी हैं। सृजन से अधिक विनाश के उपकरणों का निर्माण किया जा रहा है। नित नये महाविध्वंसक आयुधों का निर्माण हो रहा है।

भारत में निरंकुश हो चुकी अराजकता गृहयुद्ध जैसी स्थितियाँ निर्मित करने में लगी है। आये दिन हिंसा हो रही है। परिश्रम से अर्जित सम्पत्तियों को नष्ट किया जा रहा है। दशकों से बनायी जाती रही नस्लीय और साम्प्रदायिक विनाश की नींव अब हर किसी को स्पष्ट दिखायी देने लगी है। चारो ओर असंतोष, आक्रोश और विरोध की आग है, समाधान के प्रयास कहीं दिखायी नहीं देते, शायद किसी को उसकी आवश्यकता भी नहीं है।

मानवता की भी बात की जाती है जो कागजों और भाषणों में बंदी हो चुकी है। आये दिन होने वाली छुटपुट हिंसाओं और युद्ध में न जाने कितने लोगों की हत्याएँ हो रही हैं, इसी बीच विश्वयोगदिवस भी मनाया जा रहा है। शायद यूक्रेन में हो रहे युद्ध के बीच दोनों पक्षों के सैनिक भी सुबह-सुबह योग कर रहे होंगे। योग तो पाकिस्तान और चीन में भी किया जाने लगा है जहाँ मानवता को रौंदते हुये विस्तारवाद की ही पूजा की जाती है। हम सब ऐसे ही विरोधाभासों के बीच मुस्कराने के लिए बाध्य हैं।

कुछ लोग पूछते हैं – योग तो रोज करता हूँ, लाभ क्यों नहीं हो रहा? यही प्रश्न महर्षि पतञ्जलि से पूछा जाता तो वे बताते कि हमने तो अष्टाङ्ग योग के लिए कहा था आप तो केवल योगासन और प्राणायाम ही कर रहे हैं वह भी बीच में छलाँग लगाकर, यम और नियम की सीढ़ियों पर चढ़े बिना सीधे आसन और प्राणायाम! बीज बोये बिना खेत में बजूका लगाकर अच्छी फसल की आशा कर रहे हैं! परिणामस्वरूप यह सभ्यता योगासन और प्राणायाम करते हुये भी प्रतिपल महाविनाश की ओर बढ़ती जा रही है।

अभी तक स्वस्थ्य तन और स्वस्थ्य मन के लिए योग की बातें की जाती रही हैं। मधुमेह, कैंसर, हृदयरोग, एंज़ाइटी और पार्किंसोनिज़्म जैसी व्याधियों की चिकित्सा के लिए औषधियों के साथ-साथ योगासन और प्राणायाम का भी उपयोग किया जाने लगा है। अर्थात चिकित्सा के स्थूल उपायों के साथ-साथ सूक्ष्म उपायों का भी उपयोग किया जाने लगा है। किंतु इतना ही पर्याप्त नहीं है, समस्याएँ अभी भी हैं, जो विभिन्न रूपों में हमारे सामने आती जा रही हैं। जो सचमुच सुख और शांति चाहते हैं उन्हें एक बार फिर अष्टाङ्गयोग के विभिन्न अङ्गों के बारे में चिंतन-मनन की आवश्यकता है।

यदि समाज और प्रकृति अस्वस्थ है तो हम भी उसकी अस्वस्थता से प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकते। मानवता और विश्वबंधुत्व हमारी आवश्यकता है, शांति और प्रसन्नता हमारी आवश्यकता है, इसीलिए अष्टाङ्गयोग भी हमारी आवश्यकता है।

हम डार्क-वेव के युग में प्रवेश कर चुके हैं, भौतिकता बढ़ रही है पर वह स्थूल से सूक्ष्मतर होती जा रही है। फ़्री-रेडिकल्स शरीर में ही नहीं, समाज में भी हैं और उनका सामना करने के लिए उपलब्ध एण्टीऑक्सीडेन्ट्स पर्याप्त नहीं हैं। मानवता के लिए हमें समाज में पनपते फ़्री-रेडिकल्स को यम-नियम के द्वारा संतुलित करना होगा।   

शुक्रवार, 17 जून 2022

अग्निपथ

 "अग्निवीर का अग्निकाण्ड" लेख पर कई लोगों ने टिप्पणियाँ भेजी हैं। टीवी डिबेट्स में आने वाले विद्वानों की शैली में हम विमर्श नहीं कर सकेंगे। किसी सार्थक विमर्श को एक स्वस्थ्य एवं सकारात्मक वातावरण की अपेक्षा होती है जिसके लिए मर्यादा, अध्ययन और तर्क की आवश्यकता होती है। जिन लोगों ने विमर्श में गम्भीरता दिखायी है, उनका स्वागत है। जो प्रश्न प्रायः उठाये जा रहे हैं उनमें से विचारणीय हैं – 1-इस नौकरी को चार साल के लिए ही क्यों रखा गया, चार साल के बाद युवक क्या करेगा, चार साल तो प्रशिक्षण में ही निकल जाएँगे तो ऐसी नौकरी का क्या अर्थ? 2- सेना को प्रयोगशाला या मजाक का विषय क्यों बनाया जा रहा है? 3- चार साल के बाद पुनः बेरोजगार हुये युवक सेना की गोपनीयता को भंग कर सकते हैं या अपने सैन्य प्रशिक्षण का दुरुपयोग आतंकी गतिविधियों के लिए कर सकते हैं जिससे देश की सुरक्षा ख़तरे में आ सकती है।

 

किसी पद के लिए 25 स्थान रिक्त हैं किंतु प्रथम चरण में भर्ती 100 लोगों की कर ली जाती है, इस अपेक्षा के साथ कि इन एक सौ लोगों में श्रेष्ठता के लिए प्रतिस्पर्धा होगी तो सेना के लिए श्रेष्ठतम 25 लोगों का चयन चार साल बाद दूसरे चरण में किया जा सकेगा। अतिरिक्त 75 लोगों को घर वापस न भेजकर अन्य सेवाओं की तैयारी के लिये सेना में एक प्लेटफ़ॉर्म प्राप्त होगा जो सवैतनिक होगा। यह उनकी अतिरिक्त योग्यता होगी जो उन्हें विभिन्न क्षेत्रों की अन्य सेवाओं के चयन में प्राथमिकता दिलाने वाली होगी। इन 75 में से शायद ही कोई ऐसा होगा जो आगे भी बेरोजगार हो सकेगा। अंतिम विकल्प निजी व्यवसाय का है, जो हर किसी के लिए खुला है।

हाँ! दुनिया भर की सेनायें कई तरह के प्रयोग करती रहती हैं किंतु वे किसी रंगरूट को अपने प्रयोग का गिनी पिग नहीं बनातीं। चीन और पाकिस्तान अचानक आक्रमण करने के लिये जाने जाते हैं। और भारत की सेना को तो 1947 के बाद से लगभग प्रतिदिन ही युद्ध करना पड़ रहा है। जब शत्रु अपने चारो हो तो आने वाले समय के लिए पहले से तैयारी क्यों नहीं की जानी चाहिए? यह मजाक नहीं गम्भीरता है।

संवादहीनता का आरोप सही है, सरकार युवाओं को यह समझाने में असफल रही कि चार वर्षीय यह सेवा अंतिम नहीं है, वहीं युवकों ने भी योजना को समझने में गम्भीरता का परिचय न देकर, हिंसा और अराजकता का सहारा लेना अधिक उचित समझा। ऐसे युवकों को कोई सरकारी नौकरी क्यों मिलनी चाहिए?    

सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किंतु चार साल के बाद सेना से वापस से आये अतिरिक्त जवानों के आतंकी गतिविधियों में लिप्त होने की उतनी ही आशंकाएं हो सकती हैं जितनी कि सेना में कार्यरत या सेवानिवृत्त सैनिकों की। आशंकाओं को कारण बनाकर किसी बड़ी गतिविधि को रोका नहीं जा सकता। हमें सकारात्मक दिशा में सोचने की आवश्यकता है।

अग्निपथ

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम अभी तक जीवन में शिक्षा के महत्व का निर्धारण नहीं कर सके। इसे वैयक्तिक विकास के स्थान पर आजीविका का साधन मान लिया गया है। हम आस्तिक हैं, ईश्वर की सत्ता में विश्वास करते हैं, पूजा-पाठ करते हैं जिसके बदले में हमारी ईश्वर से अपेक्षा होती है कि वह हमारी सभी भौतिक ऐषणाओं का हमें मनोनुकूल परिणाम देगा। हमारी अपेक्षा पूरी नहीं होती तो हम ईश्वर के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगाने लगते हैं। आजीविका के लिए सरकारी नौकरी ही क्यों? निजी क्षेत्रों की नौकरियाँ भी हैं, निजी व्यवसाय भी हैं। उनके बार में क्यों नहीं सोचा जाना चाहिये? युवक सुंदर पिचाई क्यों नहीं बनना चाहते? समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलता है कि रेलवे में स्वीपर के पद के लिए इंजीनियर्स और पीएच.डी. वालों ने भी आवेदन भेजे हैं। हमें यह भी पढ़ने को मिलता है कि कोई इंजीयर लाखों के पैकेज को छोड़कर गन्ने का रस बेचने या डेयरी व्यवसाय के लिए भारत वापस आ गया है। इन दोनों घटनाओं में से हमारे लिए प्रेरक कौन सी होनी चाहिए?

 “उत्तम खेती मद्धम बान, निखिद चाकरी भीख निदान” को हम गुजरे जमाने की कहावत कहकर एक कोने में फेक सकते हैं किंतु यह विचार नहीं करना चाहते कि यह कहावत आज इतनी अव्यावहारिक हो गयी तो उसके कारण क्या हैं! मौर्यकाल में भारत की समृद्धि के क्या कारण थे!

सरकारी नौकरी में मेरी दुर्दशा देख-देख कर बड़े हुये मेरे बेटे ने प्रारम्भ से ही सरकारी नौकरी का लक्ष्य नहीं बनाया किंतु शिक्षा से मुँह भी नहीं मोड़ा। हमारे एक युवा साथी सरकारी नौकरी छोड़ने का मन बना चुके हैं। माना कि हर व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता किंतु हम केवल इतना ही बताना चाहते हैं कि सरकारी नौकरी ही जीवन नहीं है। हमारे देश की प्रतिभायें निजी क्षेत्रों की नौकरियों को प्राथमिकता क्यों देती हैं? और क्यों कुछ लोग पीएच.डी के बाद भी केवल सरकारी नौकरी ही करना चाहते हैं, भले ही वह स्वीपर की ही क्यों न हो?  

हमें माध्यम और लक्ष्य के भेद को समझना होगा। चार साल की सेवा लक्ष्य नहीं, माध्यम है। औपचारिक शिक्षा के कुछ न्यून पड़ावों पर भी नौकरी की जा सकती है फिर भी लोग उच्च पड़ावों की ओर आगे बढ़ते हैं। छात्रवृत्ति के लिए परिश्रम करने वाले सभी छात्रों को छात्रवृत्ति नहीं मिलती किंतु केवल इसीलिए अन्य छात्र पढ़ायी छोड़ नहीं देते। छात्रवृत्ति लक्ष्य नहीं प्रोत्साहन का तरीका है जिससे छात्रों में प्रतिस्पर्धा का भाव बढ़ता है और वे अपेक्षाकृत अच्छे परिणाम लाने के लिए प्रयत्नशील होते हैं। किसी प्रतियोगी परीक्षा में उत्तीर्ण हुए सभी लोगों को नौकरी नहीं मिल जाती, साक्षात्कार के लिए बुलाये जाने वाले अभ्यर्थियों की संख्या वास्तविक पदों से कहीं अधिक होती है। हर अग्निवीर को सेना में स्थायी नहीं किया जायेगा किंतु 25 प्रतिशत तो हैं जो स्थायी होने की पात्रता रखते हैं। शेष 75 प्रतिशत वे हैं जो निर्धारित पदों से अधिक हैं और उन्हें अवसर दिया गया है कि वे सेना में चार साल रहते हुये अपने भविष्य के लिए और अच्छी तरह तैयारी करें। इन लोगों का प्रशिक्षण व्यर्थ नहीं जायेगा। आजीविका के लिए कुछ नहीं तो अंत में स्वतंत्र व्यवसाय तो किया ही जा सकता है। आख़िर स्वतंत्र व्यवसाय से लोगों को इतना परहेज क्यों है?

सरकारी नौकरियों की कार्यशैली के बारे में कुछ न कहा जाय वही अच्छा होगा। हम अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में क्यों नहीं पढ़ाते? अपनी चिकित्सा सरकारी चिकित्सालयों में क्यों नहीं करवाते? सरकारी बस छोड़कर निजी कैब में ऑफ़िस क्यों जाते हैं? सरकारी कम्पनियों के शेयर एक बार ख़रीद लेने के बाद वर्षों तक कान पकड़कर कसमें क्यों खाते रहते हैं? हर सरकारी व्यवस्था को उपेक्षा और नकारात्मक भाव से क्यों देखते हैं? यदि सरकारी संस्थाएँ इतनी ख़राब और घटिया हैं तो हमें केवल नौकरी ही सरकारी क्यों चाहिये?

रेल सरकारी थी, जला दी। विद्यालय सरकारी था, जला दिया। जो कुछ सरकारी है उसे तोड़ देने, जला देने वाली अपसंस्कृति का समर्थन कैसे किया जा सकता है? किसी को चार साल का यह सवैतनिक प्रशिक्षण पसंद नहीं तो यह बाध्यकारी भी तो नहीं है। अजीत जोगी ने चिकित्सा का त्रिवर्षीय पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया था जिसका पूरे देश में मजाक बनाया जाता रहा। किंतु जब उन युवकों/युवतियों को नियुक्तियाँ दी गयीं और उनके परिणाम देखे गये तो उसकी स्वीकार्यता होने लगी। आप चिकित्सा से जुड़े हर व्यक्ति या कर्मचारी से चिकित्सक की ही भूमिका की अपेक्षा क्यों करते हैं! देश की सम्पत्ति को आग लगाने वाले युवकों से सेना के लिए अपेक्षित योग्यता की आशा कैसे की जा सकती है! क्या इस तरह हम अराजकता और निरंकुशता को प्रोत्साहित नहीं कर रहे हैं!  

ऐलान-ए-जंग

         वे कहते हैं कि उन्होंने देश को आज़ादी दिलायी थी और अब वे उसमें आग लगा देंगे। उनका ख़्याल है कि उनका मालिक आज भी भारत का बादशाह है जिसकी पूजा हर किसी को करनी ही चाहिए भले ही वह कितना भी अराजक, अमर्यादित, निरंकुश, स्वार्थी और लुटेरा क्यों न हो।

यह वो मध्ययुगीन मानसिकता है जो हिंसा के माध्यम से दुनिया पर हुकूमत करना अपना अधिकार समझती है। यह जिंघेस ख़ान, तैमूर लंग, और बाबर की परम्परा है जो अपने अलावा किसी और को बर्दाश्त नहीं करती। यह औरंगजेबी परम्परा है जो अपने ही सगे भाइयों की हत्या करके बादशाहत छीन लेती है। इस परम्परा को जनता से कोई अभिप्राय नहीं होता, हुकूमत उनके लिए सर्वोपरि होती है। यह वो मानसिकता है जो यह मानती है कि वे सर्वोपरि हैं, सभी कानूनों, नैतिकताओं और सीमाओं से ऊपर इसीलिए उनके आपराधिक कृत्यों का भी विरोध करना अक्षम्य अपराध है।

यह वो परम्परा है जो अपने कबीले के सरदार की ख़ुशी के लिए पूरी बस्ती में आग लगा देती है और बस्ती को लूटकर जश्न मनाती है। भारत का टूटा-फूटा लोकतंत्र यह नहीं समझ पाता कि कबीले के सरदार के प्रति इतना घातक और विनाशकारी समर्पण उपजता कहाँ से और कैसे है?

भारत का लोकतंत्र इतना अवश्य समझ चुका है कि भारत में अराजकता, दासता और निरंकुश भेड़िया तंत्र को स्थापित करने के लिए भरपूर उर्वरता की कमी नहीं है।    

मिट रही है हस्ती

         जो लोग सोचते हैं कि “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी” वे बहुत बड़े भ्रम में हैं। हड़प्पा और माया सभ्यता जैसी कई सभ्यताएँ समाप्त हो गयीं या कर दी गयीं। देववाणी संस्कृत दैनिक व्यवहार से समाप्त हो गयी। सरस्वती नदी और दुनिया के चौथे सबसे बड़े  सागर अराल जैसे कई जलस्रोत समाप्त हो गये। जैवविविधता को प्रतिवर्ष कुछ प्राणियों और वनस्पतियों के लुप्त हो जाने का सामना करना पड़ता है। सर्वाइवल के लिए संघर्ष करना पड़ता है, जो आर्यों की संतति में अब कहीं दिखाई नहीं देता।

मोहनदास करमचंद के भक्त नरेंद्र दामोदर दास मोदी मुस्लिम तुष्टिकरण का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देते। हिन्दुत्व की रक्षा के नाम पर वोट लेकर प्रधानमंत्री बने मोदी आज हिन्दुओं की रक्षा करने के स्थान पर मोहनदास की तरह सनातनियों के लिए काँटे बोने में लगे हुए हैं। उनकी नीतियाँ मुसलमानों के अन्याय को प्रोत्साहित करती हैं जिससे सनातनियों का अस्तित्व ही संकट में आ गया है। केंद्र सरकार ने एक बार फिर मुस्लिम तुष्टिकरण करते हुये अल्पसंख्यकों के हितों के लिए बजट में वृद्धि की है जिसमें उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, छात्रवृत्ति, आवास आदि कल्याणकारी योजनाएँ सम्मिलित हैं।

हम टीवी पर मुस्लिम स्कॉलर्स को भारतीय संस्कृति का अपमान करते हुये, मुस्लिम इंजीनियर्स और डॉक्टर्स को राष्ट्रविरोधी हिंसक गतिविधियों में और दंगाई मुसलमान को हिन्दुओं के विरुद्ध विभिन्न गतिविधियों में लिप्त देख रहे हैं। मोदी को लगता है कि ऐसी कौम के हित के लिए वह सब कुछ किया जाना चाहिए जिसे सनातनियों के लिए करने की उनके अंदर राजनीतिक इच्छाशक्ति और दृढ़ता का अभाव है।

इस्लामिक मुल्क बनाने के लिए अलगाववादी और साम्राज्यवादी मुसलमानों के पास समयबद्ध आक्रामक योजनाएँ है, निश्चित लक्ष्य है, उनकी कार्ययोजना तैयार है और उसके क्रियान्वयन के चरण निरंतर आगे बढ़ते ही जा रहे हैं। हम बहुत कुछ खो चुके हैं, बहुत कुछ खोते जा रहे हैं।

मोदी ने शाहीन बाग के सामने घुटने टेक दिए, कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा करने में असफल रहे, राष्ट्रीय नागरिकता पंजी की अब कोई बात भी नहीं करता, एक देश एक कानून के विरोध का सामना करने से पहले ही हार मान ली। पालघर के संतों की निर्मम हत्या और नूपुर शर्मा की हत्या के फ़तवे पर मोदी जी मौन ही रहते हैं। मोहनदास करमचंद की तरह ही मोदी ने भी अपनी गतिविधियों और नीतियों से सनातनियों को संदेश दे दिया है कि उन्हें अपनी सुरक्षा स्वयं करनी होगी, भारत का सत्ता तंत्र उनके साथ नहीं है।

किंतु कोई सनातनी कैसे करेगा अपनी सुरक्षा, जब हिंसा हो रही हो तब कैसे बचाएँगे वे अपने आप को? इस्लामिक काल में जब हमारी हस्ती बच सकी तब कुछ राज्यों की सत्तायें हमारे साथ थीं, हमारे पास महाराणा प्रताप और गुरु गोविंद सिंह जैसे कई जुझारू लोग थे जिन्होंने सनातनियों की रक्षा के लिए संघर्ष किया, आज तो सनातनियों की रक्षा के लिए कानून भी नहीं है, मोदी, शाह और मोहनभागवत की तो बात ही छोड़िए, आज तो हमारे पास हमारे शंकराचार्य भी नहीं हैं। मुलायमवंश और सोनियावंश तो पहले से ही सनातन विरोधी रहे हैं। भारत के सनातनियों को अपनी रक्षा का विकल्प खोजना ही होगा अन्यथा एक जनवरी 2050 की सुबह मुसलमानों की योजना को सफल होता हुआ देखने के लिए तैयार रहना होगा।

अग्निवीर का अग्निकाण्ड

            रेल गाड़ियों में तोड़फोड़ और आगजनी करने वाले इन युवकों की आँखों में देश की सुरक्षा का सपना है। वे सैनिक बनना चाहते हैं और देश में आग लगा रहे हैं, बिना यह समझे हुये कि अग्निवीर योजना है क्या! क्या आपको पता है कि ---

1-    पहली बात यह कि सेना कोई नौकरी नहीं एक जुनून है जिसका मूल्यांकन पैसों से नहीं किया जा सकता। सेना को दिया जाने वाला वेतन उनकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए होता है, यह उनकी अमूल्य सेवाओं की कीमत नहीं है।   

2-    अग्निवीरों की सेवाओं को सरकारी नौकरी की तरह न लेकर “सरकारी नौकरियों की सवैतनिक प्रारम्भिक तैयारी” के रूप में लिया जाना चाहिए।

3-    जो लोग मानते हैं कि सेना के साथ प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए उन्हें यूक्रेन और इज़्रेल से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है। जहाँ तक जवानों के तकनीकी प्रशिक्षण की बात है तो आपको मध्ययुगीन युद्धों में सम्मिलित होने वाले उन सैनिकों को भी याद करना होगा जो शांति के समय अपने-अपने घरों में अपने पारम्परिक व्यवसाय किया करते थे और युद्ध के समय सेना में सम्मिलित हो जाया करते थे। उन्हीं सैनिकों के बल पर दुनिया के देशों की सीमाएँ न जाने कितनी बार बनती और मिटती रही हैं।

4-    अब बात आती है सेना की गोनीयता की, तो इस बात की क्या गारंटी कि 15-20 साल की सेवा के दौरान कोई विश्वासघाती गोपनीयता भंग नहीं करेगा केवल चार साल के दौरान ही विश्वासघात करेगा!

5-    सेना में चार साल की सेवा आपके जीवन का अंत नहीं है, चार साल के बाद आपकी अधिकतम आयु होगी 25 वर्ष। उसके बाद आपके लिए वे सारे रास्ते खुले हैं जो अन्य सामान्य लोगों के लिए खुले हुये हैं। इज़्रेली युवक-युवती भी सेना में तीन साल की सेवाओं के बाद विभिन्न क्षेत्रों में जाते हैं। सेना में चार साल की सेवाओं के बाद अन्य विभागों की सेवाओं में आपको प्राथमिकता दी जायेगी और उनमें आपका प्रवेश अपेक्षाकृत सरल होने वाला है।

6-    अग्निवीरों की भर्ती हर साल होगी और उनमें से उपयुक्त पाये गये 25 प्रतिशत लोगों को सेना में स्थायी सेवाओं के लिए रखा जाएगा। आप इसे यूँ समझिए, जो छात्र इंजीनियरिंग में प्रवेश नहीं ले पाते उन्हें सरलता से पॉलीटिक्निक में लेटरल प्रवेश मिल जाता है साथ ही योग्य छात्रों को इंजीनियरिंग में सीधे दूसरे साल में प्रवेश की पात्रता होती है। क्या यह लेटरल प्रवेश प्रक्रिया आपको अपेक्षाकृत अधिक और सरल अवसर उपलब्ध नहीं करवाती!  

7-    इज़्रेल में तीन साल के लिए हर युवक-युवती को सेना में सेवाएँ देना अनिवार्य है। भारत सरकार चार साल के लिए आपकी सेवाएँ सेना में लेना चाहती है। क्या आपने सोचा कि तीन साल के बाद इज़्रेली युवक-युवतियाँ क्या करते हैं! क्या उनके घुटने टूट जाते हैं! क्या उनका जीवन तबाह हो जाता है!

8-    यूक्रेन युद्ध के समय जब नाटो देशों ने यूक्रेन को अपने सैनिक देने से मना कर दिया तब युद्ध के दौरान ही सेना के सेवानिवृत्त सैनिकों के साथ-साथ सामान्य नागरिकों से भी सेना में भर्ती होने का आह्वान किया गया। सामान्य नागरिकों को हथियार चलाना सिखाया गया और अब देश की रक्षा में उनकी सेवाएँ ली जा रही हैं। यह सब युद्ध के बीच में हुआ, उन्हें परम्परागत प्रशिक्षण देने का समय ही नहीं था किंतु देश को सैनिकों की आवश्यकता थी। वही यूक्रेन शक्तिशाली रूस से अभी तक टक्कर ले रहा है।

9-    शासकीय कार्यालयों में हमारी बहुत बड़ी समस्या कार्यसंस्कृति का अभाव है जिसके कारण सरकारी संस्थाएँ पंगु होती जा रही हैं। सेना में चार साल के लिए युवकों की सेवाओं के दौरान उनमें उस कार्यसंस्कृति का बीजारोपण होगा जिसकी इस देश को बहुत आवश्यकता है और जिसके अभाव के कारण ही शासकीय संस्थाएँ अपेक्षित परिणाम दे सकने में असफल होती रही हैं और देश के विकास में गम्भीर प्रकृति की बाधाएँ उत्पन्न होती रही हैं। यही कारण है कि लालफीताशाही और कार्यालयीन भ्रष्टाचार को कोई भी सरकार समाप्त नहीं कर पा रही है।           

गुरुवार, 16 जून 2022

क्या हम हारते जा रहे हैं

           अँधेरों की विजय यात्रा अनवरत है जिसे रोक पाने में हम असमर्थ होते जा रहे हैं।

जब हम अपनी बोलियों और समझ में उलटी गंगा बहाना प्रारम्भ कर देते हैं तो आक्रमण को अपराध बिल्कुल नहीं माना जाता जबकि प्रत्याक्रमण को बहुत गम्भीर अपराध माना जाने लगता है। जिन चार शब्दों “विवादास्पद बयान” और “बेतुकी बात” के माध्यम से हम सब पूरी बाजी उलट देते हैं वे इतने बड़े षड्यंत्र के निर्णायक उपकरण हैं जो निरपराधी को अपराधी और अपराधी को अपराधमुक्त कर देते हैं। सोशल मीडिया इन शब्दों के प्रति या तो गम्भीर नहीं है या फिर वह भी इस षड्यंत्र में सम्मिलित है।

सनातनी आराध्यों को लेकर वर्षों से सोशल मीडिया पर अश्लील और अपमानजनक बातें बोली और लिखी जाती रही हैं। इसे कभी किसी ने अपराध नहीं माना किंतु जब इनका विरोध प्रारम्भ हुआ तो इसे “विवादास्पद बयान” और “बेतुकी बात” कहकर वातावरण को विषाक्त बनाना प्रारम्भ कर दिया गया। शासन-प्रशासन द्वारा भी वास्तविक अपराधी पर तो कोई कार्यवाही नहीं की जाती किंतु निरपराधी पर तुरंत कार्यवाही प्रारम्भ कर दी जाती है। इसका सबसे प्रमाण तो हम सोशल मीडिया और टीवी पर दिन भर देखते-सुनते हैं। शिव, गणेश, दुर्गा, ब्रह्मा, सरस्वती, गाय, पंचगव्य, वेद, पुराण आदि भारतीय ज्ञान-विज्ञान और संस्कृति से जुड़े सभी प्रतीकों पर प्रतिदिन न जाने कितनी बार आक्रमण किये जाते हैं, इन आक्रमणों पर शासन-प्रशासन क्या कार्यवाही करता है? यदि कार्यवाही हुयी होती तो टीवी डिबेट्स में दिखायी देने वाले लोगों की भीड़ अब तक जेल में होती। यह भीड़ जेल में नहीं है किंतु नूपुर शर्मा का सर तन से जुदा करने के लिए उन्हें भीड़ के हवाले कर दिए जाने के लिए दुनिया भर में हंगामें हो रहे हैं। यह न्याय और नैतिक मूल्यों के साथ सामूहिक बलात्कार है जिसके लिए हम सत्ता को निर्दोष नहीं मान सकते।  

एशियायी ही नहीं बल्कि सभ्य और विकसित माने जाने वाले अमेरिकी और योरोपीय देशों में भी नूपुर शर्मा को लेकर जो अन्यायपूर्ण समझ बनी है वह प्रदर्शित करती है कि धरती की एक बहुत बड़ी भीड़ को तर्क, नैतिकता और न्याय से कोई मतलब नहीं।

भारत के तार्किक मुसलमानों ने जिस निर्भयता और सत्य के साथ अन्याय और अत्याचारों का विरोध करना प्रारम्भ किया है, सनातनियों में उसका लगभग अभाव देखा जा रहा है। मुसलमानों का सनातन के प्रति तर्कपूर्ण आकर्षण एक दार्शनिक और तात्विक क्रांति है जिसके लिए उन्हें प्रकृति की सभी सात्विक ऊर्जाओं का आशीर्वाद प्राप्त हो रहा है। दुनिया भर के तार्किकों की तरह हम भी यह समझ पाने में असमर्थ रहे हैं कि तमसोमा ज्योतिर्गमय को अपने जीवन का आदर्श मानने वाले सनातनी बंधु प्रकाश की ओर गमन क्यों नहीं करना चाहते, वे अँधकार में ही क्यों डूबे रहना चाहते हैं?   

बुधवार, 15 जून 2022

भारत के गृहमंत्री के नाम एक खुला पत्र

 सेवार्थ –

माननीय गृहमंत्री

भारत सरकार, नई दिल्ली

विषय – निरंकुश, अराजक एवं अलगाववादी तत्वों के लिए विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के औचित्य के सम्बंध में निवेदन।           

माननीय महोदय!

सादर निवेदन है कि भारत के सर्वाङ्गीण विकास के निमित्त विभिन्न स्रोतों से संग्रहित की जाने वाली धनराशि का एक बड़ा हिस्सा निरंकुश, अराजक एवं अलगाववादी तत्वों के लिए भी विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च किया जाना देश की प्रगति में बाधक बना हुआ है। राष्ट्रीय विकास में ऐसे तत्वों का योगदान शून्य है। दूसरी ओर विभिन्न शासकीय सुविधाओं को प्राप्त करने वाले ये तत्व भारत के विभाजन के लिए हिंसा एवं अराजकता के माध्यम से बहुसंख्य करदाताओं की तथा सार्वजनिक हित की न केवल सम्पत्ति को नष्ट करते हैं बल्कि निर्दोषों की हत्याएँ भी करते हैं। इस तरह के लोगों की एक बड़ी संख्या देश की अखण्डता और सम्प्रभुता के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हो गयी है। भारत के बहुसंख्य लोग इन लोगों द्वारा फैलायी गयी दहशत में जीने के लिए बाध्य हैं। स्वतंत्रता के बाद भी भारत पर सांस्कृतिक आक्रमण कर रही धर्मोन्मादी शक्तियों से भारत के बहुसंख्यक एवं राष्ट्रवादी लोग भयभीत हैं। हाल ही में विभिन्न धर्मगुरुओं द्वारा सनातनियों के आराध्यों के सम्बंध में अश्लील बातों के दुष्प्रचार की घटनाओं में तीव्रता से वृद्धि देखी गयी है जिससे भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर गहरा संकट छा गया है और सामाजिक विद्वेष एवं साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण में अप्रत्याशित वृद्धि हुयी है जो अत्यंत चिंता का विषय है। हमारा माननीय महोदय से विनम्र अनुरोध है कि –

1-निरंकुश, अलगाववादी, साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने वाले और सांस्कृतिक आक्रमण करने वाले भारतीयों के साथ-साथ विदेशी मूल के अवैध घुसपैठियों के कल्याणार्थ अनाज, स्वास्थ्य एवं स्वावलम्बन आदि विभिन्न शासकीय योजनाओं पर व्यय की जाने धनराशि पर सदा के लिए रोक लगायी जाय एवं उनके पासपोर्ट सदा के लिए रद्द किए जाएँ।

2-बिंदु क्रमांक 1. में उल्लेखित ऐसे लोगों को मताधिकार से वंचित किया जाय एवं उनके उन स्रोतों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाय जहाँ धर्म के नाम पर धार्मिक विद्वेष की शिक्षा दी जाती है एवं उन्हें हिंसा एवं अन्य अपराधों के लिए तैयार किया जाता है।

3-भारत के बहुसंख्य लोगों की सुरक्षा के लिए संकट बन चुके अलगाववादी नेताओं को दी जाने वाली सभी तरह की सुविधाओं एवं सुरक्षा से तत्काल वंचित किया जाय जिससे उन पर व्यय होने वाली भारी भरकम राशि का उपयोग देश की सुरक्षा एवं विकास की योजनाओं के लिए किया जा सके।

4-जाति-धर्म-सम्प्रदाय से परे उन सभी निरंकुश तत्वों पर कार्यवाही सुनिश्चित की जाय जो सोशल मीडिया में आपत्तिजनक वीडियो अपलोड कर देश, समाज एवं संस्कृति को क्षति पहुँचाने के लिए विषवमन करते हैं; भारत की संस्कृति, सभ्यता और भारतीय जीवनमूल्यों पर अमर्यादित टिप्पणियाँ करते हैं, उत्तेजक वार्ताएँ कर देश की अखण्डता को चुनौतियाँ देते हैं, हिन्दुओं को मिटा देने का आह्वान करते हैं, सामूहिक यौनदुष्कर्म और हत्या करने की धमकियाँ देते हैं और ऐसे कार्यों में संलिप्त होते हैं।

5-धार्मिक संस्थाओं को प्राप्त होने वाले दान की राशि उसी धर्म के लोगों के कल्याणार्थ व्यय की जाय, अन्य धार्मिक समुदाय के लोगों पर कदापि नहीं।

6-राज्य सरकारों द्वारा धर्मगुरुओं को दिए जाने वाले वेतन या मानधन पर तत्काल रोक लगायी जाय, धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म विशेष को इस तरह संरक्षण देना किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं है।

7-कश्मीरी पंडितों की हत्याओं को रोकने हेतु तत्काल कड़े कदम उठाते हुए जम्मू-कश्मीर में उनकी सुरक्षा सुरक्षित की जाय जिससे भारत भर में धार्मिक हिंसा रोकने का शुभ संदेश प्रसारित हो सके।

8-पालघर में मारे गये संतों के हत्यारों पर कठोर दण्डात्मक कार्यवाही की जाय। 

9-घर वापसी करने वाले सभी लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाय जिससे वे निर्भय होकर जीवनयापन कर सकें। 

 

हम आशा करते हैं कि उपर्युक्त बिंदुओं पर गम्भीरतापूर्वक कार्यवाही कर देश की संस्कृति और अखण्डता को सुरक्षित करने के संतोषजनक उपाय किए जाएँगे। धन्यवाद!

निवेदक

भारत के नागरिक